Wednesday, June 1, 2011

अमेरिकी मंत्रियों की इस दौड़ के मायने

अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा मंत्री (सेके्रटरी फॉर होमलैंड सिक्योरिटी) जेनेट नेपोलिटानो की भारत यात्रा और अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की पाकिस्तान यात्रा एक साथ आयोजित होना महज संयोग है या सुनियोजित, इसका उत्तर देना कठिन है। कहा जा सकता है कि नेपोलिटानो की भारत यात्रा काफी पहले निर्धारित हुई थी, जबकि हिलेरी को एबटाबाद में ओसामा के मारे जाने के बाद पाकिस्तान के अंदर मची खलबली और बढ़ रहे अमेरिका विरोधी वातावरण के बीच आने को मजबूर होना पड़ा है। यह सच है, पर यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि दोनों यात्राओं को एक साथ संपन्न कराए जाने को एक रणनीति के रूप में अमेरिकी प्रशासन ने लिया होगा। दक्षिण एशिया में अमेरिका की नीति दोनों के बीच संतुलन बनाने की है, लेकिन इस समय अमेरिका बेहद जटिल स्थिति में है। पाकिस्तान में अमेरिका के विरुद्ध जो वातावरण है, उसे न तो वह नजरअंदाज कर सकता है और न ही आतंकवाद विरोधी युद्ध की अपनी रणनीति एवं तेवर में ही बदलाव ला सकता है। हिलेरी द्वारा पाक में दिए गए बयानों को इस संदर्भ में देखें तो अतिवादी प्रतिक्रियाओं से बचा जा सकता है। दोनों यात्राओं के स्वरूप में अंतर है। भारत के साथ अमेरिका की यह पहली आंतरिक सुरक्षा बातचीत है। इस नाते इसका महत्व अलग है। अमेरिका में 11 सिंतबर 2001 के आतंकवादी हमले के बाद गृह सुरक्षा के लिए होमलैंड सिक्योरिटी नाम का एक अलग मंत्रालय और विभाग गठित किया गया। अमेरिका का यह अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्रालय है। आंतरिक सुरक्षा संबंधी पूरा दायित्व इसी के जिम्मे है। तो नेपोलिटानो की यात्रा भारत के साथ आतंकवाद से खतरे या आंतरिक सुरक्षा के मामले पर दोनों देशों के बीच बहुआयामी सहयोग की शुरुआत करनी थी। साझा पत्रकार वार्ता में गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा भी कि आतंकवाद के खिलाफ दोनों देशों की आंतरिक सुरक्षा के लिए परस्पर सशक्त और प्रभावी रणनीतिक सहयोग की जरूरत है। जारी साझा बयान में भी मुंबई आतंकी हमलों की जांच में आपसी सहयोग बढ़ाने का संकल्प दोहराते हुए पाकिस्तान से इसमें शामिल अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई में तेजी लाने की मांग की गई। इसके समानांतर हिलेरी का मुख्य फोकस पाकिस्तान में पैदा हुए अमेरिका विरोधी वातावरण को कम करने के साथ आतंकवाद विरोधी युद्ध को सघन करना और अपना समयबद्ध लक्ष्य हासिल करने का रास्ता बनाए रखना था। आप दोनों नेताओं के दोनों देशों में दिए गए बयानों पर नजर डालिए, अमेरिका की रणनीति काफी साफ हो जाएगी। नेपोलिटानो ने कहा, मैं सोचती हूं कि मेरे अनुसार लश्करे तैयबा अलकायदा और संबंधित समूहों के आतंकवादी संगठनों में उच्च स्थान रखता है, जो लोगों को हानि पहुंचाते हैं तथा निर्दोष लोगों की जान लेते हैं। उनकी पंक्ति थी, हमारा मानना यह है कि लश्कर बहुत-बहुत, मैं महत्वपूर्ण नहीं कहूंगी, क्योंकि इससे इन्हें बहुत ज्यादा विश्वसनीयता मिल जाती है, लेकिन एक ऐसा संगठन जिसकी रैंकिंग अलकायदा से संबंधित अन्य समूहों के समान है। उनके वक्तव्यों का हम अपने अनुसार अर्थ लगाने के लिए स्वतंत्र हैं। नेपोलिटानो ने लश्कर के बारे में हमारी सोच के अनुसार बयान नहीं दिया, लेकिन उन्होंने लश्कर को कमजोर नहीं माना है। नेपोलिटानो ऐसे समय भारत आई हैं, जब लश्कर का एक आतंकी व मुंबई हमलों का एक मुख्य अभियुक्त डेविड कोलमैन हेडली तथा कनाडा के तहव्वुर राणा की शिकागो न्यायालय में सुनवाई चल रही है और उनका बयान सुर्खियों में है। हेडली का जो बयान अमेरिका के संघीय जांच ब्यूरो ने रिकॉर्ड किया है, केवल न्यायालय में उसकी पुष्टि हो रही है। जब अमेरिका की जांच एजेंसी के पास लश्कर के खतरनाक कारनामों के सबूत हैं तो अमेरिका कैसे उसे कमतर आंक सकता है। किंतु सच यह भी है कि अमेरिका का निशाना अभी लश्कर नहीं है। भारत लश्कर को एक वैश्विक जिहादी संगठन के रूप में स्वीकारता है, लेकिन अमेरिका के लिए अलकायदा और तालिबान मुख्य निशाना हैं। हमें यह मान लेना चाहिए कि जितना फोकस वह इन पर करेगा, उतना लश्कर पर नहीं। वह आतंक विरोधी युद्ध का फोकस लश्कर की ओर नहीं मोड़ सकता। राष्ट्रपति ओबामा ने जुलाई 2011 से अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी की घोषणा की हुई है और पूरे युद्ध का फोकस वैसा परिणाम लाने पर केंद्रित है। हिलेरी ने जिन पांच वांछित आतंकियों की सूची पाकिस्तान को सौंपी, उनमें अलकायदा के अयमान अल जवाहिरी, अफगान तालिबान नेता मुल्ला उमर, कमांडर सिराज हक्कानी, लीबिया में अलकायदा कार्रवाई का प्रमुख आतिया अब्दुल रहमान एवं इलियास कश्मीरी शामिल है। इलियास कश्मीरी का नाम मुंबई हमले से जरूर जुड़ा है, लेकिन वह जिहादी आतंकवाद में इतना बड़ा नाम बन गया है, जिसका क्षेत्र अरब से लेकर पूरा दक्षिण एशिया है। इस सूची का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है। आप इन आतंकियों को पकड़ने या मारने में सहयोग करिए या फिर अमेरिका इनके बारे में खुद फैसला करेगा। यह अमेरिका की रणनीति है। किंतु हिलेरी ऐसा सार्वजनिक रूप से नहीं कह सकती थीं। निस्संदेह उनका बयान पाकिस्तान के प्रति नरम था। उन्होंने जो कहा उस पर ध्यान दीजिए, अमेरिका के पास इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि पाकिस्तान की सरकार में उच्च स्तर के किसी व्यक्ति को लादेन के वहां होने का पता था। आगे उन्होंने कहा कि वे पाकिस्तान के साथ संबंधों में और ज्यादा प्रतिबद्धता की भावना लेकर वाशिंगटन लौट रही हैं। इसे पाकिस्तान की सेना और आइएसआइ को क्लीन चिट देना माना जा रहा है। पहली नजर में ऐसा लगता भी है। यह सीआइए प्रमुख के पूर्व में दिए गए बयान के विपरीत है। उन्होंने कहा था कि यह संभव नहीं है कि लादेन बगैर सहयोग और संरक्षण के वहां रह रहा था। हिलेरी यदि इसी प्रकार का कोई वाक्य दुहराती तो हमारे कानों को ज्यादा सुकून मिलता, किंतु हम भूल गए कि लादेन के मारे जाने के बाद ही ह्वाइट हाउस के प्रवक्ता ने कहा था कि पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध जटिल हैं, पर अमेरिका के लिए उसके साथ काम करना जरूरी है। यही अमेरिका की समस्या है। हिलेरी के बयान पर भारत में हुई मीडिया एवं आम नागरिकों की प्रतिक्रिया का अमेरिका में संज्ञान लिया गया है। अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मार्क टोनर ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि हिलेरी ने आइएसआइ को क्लीन चिट दी है। उन्होंने कहा कि हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि इन संबंधों में कठिनाइयां हैं, लेकिन मूल बात यह है कि यह वह संबंध है, जो हमारे और पाकिस्तान दोनों के हित में है। इसलिए हमें आगे बढ़ने के लिए इन चुनौतियों को पार करते हुए काम करने की जरूरत है। साफ है कि अमेरिका युद्ध को इच्छित परिणाम तक ले जाने के साथ एकपक्षीय कार्रवाई में लादेन के मारे जाने के बाद अपने खिलाफ निर्मित वातावरण को शांत करने की रणनीति पर भी काम कर रहा है। हालांकि हिलेरी ने कहीं नहीं कहा कि पाकिस्तान निर्दोष है। इसके विपरीत उन्होंने कहा कि लादेन मारा गया, पर उसका आतंकी सिंडिकेट हम दोनों के लिए खतरा बना हुआ है और पाकिस्तान आतंकवाद से संघर्ष करने के लिए निर्णायक कदम जरूर उठाए। यह पाकिस्तान पर निर्भर है कि वह आने वाले दिनों में आतंकियों के खिलाफ निर्णायक कदम उठाए। हिलेरी की यह पंक्ति भी देखिए, अमेरिका पाकिस्तान की समस्या नहीं सुलझा सकता। यह पाकिस्तान को ही सुलझाना है, लेकिन अपनी समस्या सुलझाने में पाकिस्तान को समझना चाहिए कि अमेरिका विरोधवाद एवं साजिश का आरोप समस्याओं को नहीं भगा सकता। तो हिलेरी के वक्तव्यों में मनाने एवं जिम्मेवारी का अहसास कराने, दोनों का भाव था। हां, मनाने वाली नरम बातें घुमाकर कही गई कर्तव्यों की याद दिलाने वाली बातों पर भारी थी। अमेरिका को लगता है कि पाकिस्तान के बगैर वह अफगानिस्तान का युद्ध नहीं जीत सकता। हालांकि यह दृष्टिकोण सही नहीं है, पर भारत के सामने अमेरिका की यह दुविधा स्पष्ट रहनी चाहिए। अन्यथा, हम उसके किसी एक दुत्कार को अपने पक्ष में एवं एक पुचकार को उसके पक्ष में मानने की भूल करते रहेंगे। भारत में नेपोलिटानो ने हमारी तरह सीधे आइएसआइ का नाम लेकर उसे आतंकवादी कार्रवाई का दोषी नहीं कह सकती थीं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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