Wednesday, June 1, 2011

व्यापारिक रिश्तों के नए समीकरण

इन दिनों प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अफ्रीकी देशों की यात्रा पर हैं। सौ से भी अधिक बरस पहले गांधी जी ने अपने दक्षिण अफ्रीका के प्रवास के दौरान रंगभेद के खिलाफ जिस तरीके से लड़ाई लड़ी थी, उसे अफ्रीका के लोग कृतज्ञ भाव से अब भी याद करते हैं। अंग्रेजों के खिलाफ स्वदेश में आंदोलन का श्रीगणोश करने से पहले ही गांधी जी ने अफ्रीकी अश्वेत समाज को अपने हकों से लिए लड़ने के लिए प्रेरित कर दिया था। अफ्रीकी मूल के सबसे बड़े नायक चाहे वे मार्टनि लूथर किंग हो या फिर नेल्सन मंडेला, सभी गांधी के योगदान को स्वीकार करते रहे हैं। यहां तक कि पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी गांधी के योगदान को कृतज्ञ भाव से याद करते हैं। हालांकि गांधीजी के बाद से दुनिया काफी बदल चुकी है। अब वैश्विक संबंधों में वाणिज्यिक रिश्तों का महत्व बेहद खास हो गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अफ्रीका यात्रा में भी वाणिज्य-व्यापार अहम बिन्दु हैं। भारत की इच्छा है कि अफ्रीका के बाजार में उसे भी स्पेस मिले। भारत कतई नहीं चाहेगा कि वहां पर चीन, ब्राजील और दूसरे देश ही जम जाएं। इसी वजह से भारतीय विदेश नीति नियंता समूचे अफ्रीका पर खास फोकस करने लगे हैं। भारत ने अफ्रीकी देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों को मजबूत बनाने की ठोस पहल शुरू कर दी है। देर से ही सही, पर उसे अफ्रीका के महत्व का अहसास हो गया है। खासकर तब जब चीन वहां पर बड़े स्तर पर प्रवेश कर गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री के दौरे का मकसद भारत और अफ्रीका के बीच व्यापारिक रिश्तों का नया व्याकरण रचना है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इथोपिया की राजधानी आदिस अबाबा में अफ्रीकी यूनियन (एयू) के 15 सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और दूसरे अहम नुमाइंदों से उन संभावनाओं का पता लगाएंगे जिनके आधार पर भारतीय कंपनियां अफ्रीका में अपनी मौजूदगी बढ़ा सकें। इस सम्मेलन की बुनियाद दिल्ली में सन 2008 में अफ्रीका समिट में रख दी गई थी। तब भी खासी संख्या में अफ्रीकी देशों के शीर्ष नेताओं ने शिरकत की थी। बहरहाल, अफ्रीका में पहले से टाटा, महिन्द्रा, भारती एयरटेल, बजाज ऑटो, ओएनजीसी वगैरह कंपनियां कारोबार कर रही हैं। पिछले साल ही भारती एयरटेल ने अफ्रीका में अपने पैर रखे। अब वह करीब डेढ़ दर्जन अफ्रीकी देशों में अपनी सेवाएं देनी लगी हैं। केन्या की राजधानी नेरोबी हो या फिर साउथ अफ्रीका के प्रमुख शहर, सभी में भारतीय कंपनियों के विशाल विज्ञापनों को प्रमुख चौराहों पर देखा जा सकता है। भारत की स्टील कंपनियों को भी अफ्रीका में व्यापक संभावनाएं नजर आती हैं। मोजाम्बिक में जिंदल साउथ बेस्ट ने कोल ब्लाक लिए हैं। इसी प्रकार से जगुआर ओवरसीज लिमिटेड राजधानी मलूना में टेक्नोलॉजी पार्क का निर्माण कर रही है। जाहिर है, अफ्रीका के गांधी जी से जिस प्रकार के भावनात्मक संबंध रहे हैं, उसका लाभ भारत को अवश्य मिलेगा। भारत को लेकर पूर्वी अफ्रीकी देशों- तंजानिया, केन्या और युगांडा में बहुत सम्मान और सद्भावना का माहौल है। इन सभी देशों में ब्रिटिश काल में अंग्रेज पंजाब के बहुत सारे लोगों को रेल लाइनें बिछाने के लिए जाते थे। इनमें से बहुत लोग वहीं बस गए। इसी तरह पूर्वी अफ्रीकी देशों की अर्थव्यवस्था में गुजराती कारोबारी भी लम्बे समय से अपना अहम योगदान दे रहे हैं। भारत को लेकर समूचे अफ्रीका महाद्वीप में सद्भावना रही है, फिर भी हमने इतने बड़े क्षेत्र को कमोबेश नजरअंदाज ही किया। हमारा सारा फोकस व्यापार के स्तर पर अमेरिका, खाड़ी और यूरोपीय देशों तक ही सीमित रहा। भारत का अफ्रीकी संघ के देशों के साथ 1990 तक व्यापारिक कारोबार मात्र एक अरब डॉलर तक ही था। यह भारत के कु ल विदेशों व्यापार का मात्र दो फीसद था। लेकिन अब कु ल विदेशी व्यापार में अफ्रीका का हिस्सा 9 फीसदी के आसपास है। साल 2005 से लेकर 2010 तक दोतरफा व्यापार 40 बिलियन डॉलर पार कर गया है और 2015 तक इसके 70 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। भारत की ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती जरूरतों के लिए भी अफ्रीका अहम है। अंगोला और नाइजीरिया उन दस देशों में शामिल है जिनसे भारत ने साल 2009-10 के दौरान सर्वाधिक कच्चे तेल का आयात किया। अफ्रीकी मामलों के जानकार कहते हैं कि भारतीय कंपनियों के लिए अफ्रीकी देशों के बाजार संभावनाओं से लबरेज हैं। अफ्रीका का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) भारत से बेहतर है। इसकी आबादी हमसे कम है जबकि क्षेत्रफल काफी अधिक। भारत को अफ्रीका पर खास फोकस देना होगा क्योंकि समूचा अफ्रीका हमें लेकर बहुत ही सकारात्मक सोच रखता है। वहां पर हमारी कंपनियों का स्वागत होता है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि हमारी कंपनियां अफ्रीका में जाकर वहां विकास की बयार को और गति दें। लेकिन इस दौरान उनका मकसद सिर्फ धन अर्जित करना ही नहीं होना चाहिए।

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