Wednesday, June 1, 2011
दोहरी नीति अपना रहा है अमेरिका
अमेरिका और पाकिस्तान के बीच रिश्ता इस समय नाजुक दौर से गुजर रहा है। अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को जिस तरह से अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर बिना उसे बताए मार गिराया, उससे पाकिस्तान की सरकार और वहां की जनता में अमेरिका के प्रति नफरत की भावना तेज हुई है, दूसरी अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत अमेरिका अफगानिस्तान से अपनी सेना की वापसी के लिए भी प्रतिबद्ध है। ऐसे में अमेरिका के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह इस पूरे क्षेत्र के अलावा पाकिस्तान में उसके प्रति बढ़ रहे नफरत को कम और पाकिस्तान सरकार को अपने विश्वास में ले, ताकि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान का भविष्य में भी सहयोग मिलता रहे और अमेरिका अपने मिशन में कामयाब हो सके। इसी संदर्भ में अमेरिका ने एक साथ भारत और पाकिस्तान में अपने दो महत्वपूर्ण मंत्रियों-आंतरिक सुरक्षा मंत्री जेनेट नेपोलिटानों और विदेश मंत्री हिलैरी क्लिंटन को सद्भावना और विश्वास बहाली की रणनीतिक यात्रा पर भेजा है। परंतु यहां सवाल केवल अमेरिकी हितों की नहीं, बल्कि भारतीय हितों की भी है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने यह तय किया था कि वे आतंकवाद की लड़ाई में एक-दूसरे के हितों का न केवल ध्यान रखेंगे, बल्कि परस्पर समन्वय और सहयोग बनाकर खुफिया जानकारियों को साझा करेंगे और आतंकवाद की लड़ाई में साथ चलेंगे। अब जबकि लादेन मारा जा चुका है और 26/11 को मुंबई हमले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला डेविड कोलमैन हेडली व कनाडाई नागरिक तहव्वुर राणा पर शिकागो की अदालत में केस चल रहा है तो ऐसे में अमेरिकी सुरक्षा मंत्री का सिर्फ तालिबान और अलकायदा तक सीमित रहने की रणनीति भ्रम पैदा करती है। उल्लेखनीय है कि 9/11 की घटना के बाद अमेरिका ने दुनिया में हर तरह के आतंकवाद और आतंकवादी संगठनों को खत्म किए जाने की बात की थी, लेकिन बाद में जो देखने को मिल रहा है वह बिल्कुल अलग है। आज अमेरिका केवल उन्हीं आतंकवादी संगठनों के प्रति कठोर रवैया अपनाता दिख रहा है जो सीधे-सीधे उसके प्रति और उसके नागरिकों के प्रति हिंसक रवैया अपना रहे हैं। यदि मुंबई हमलों में अमेरिकी नागरिकों की मौत नहीं होती तो शायद अमेरिका डेविड हेडली और तहव्वुर राणा को भी नहीं पकड़ती और न ही इस बारे में पाकिस्तान पर कोई खास दबाव बनाता। अमेरिकी आंतरिक सुरक्षा मंत्री जेनेट नेपोलिटानों द्वारा लश्करे तैयबा के प्रति नरम रवैया अपनाया जाना इसी बात का संकेत है, लेकिन इसके लिए भारत को अमेरिका पर दबाव बनाना चाहिए कि वह पाकिस्तान को तरजीह देते वक्त भारत के हितों की अनदेखी न करे और वह आतंकवाद की लड़ाई के प्रति एक जैसी नीति का पालन करे। अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद भारत की भूमिका कहीं पाकिस्तान के सहयोगी की न रह जाए इसके लिए हमें अभी से प्रयास करना होगा। अमेरिका इस बात को अच्छी तरह समझता है कि पाकिस्तान की धरती से वैश्विक आतंकवाद फल-फूल रहा है और भारत के खिलाफ पाकिस्तान की एकतरफा रणनीति ही आतंकवाद को फैलाना है। इसके लिए अब अमेरिका को किसी प्रमाण की जरूरत भी नहीं, क्योंकि डेविड हेडली के खुलासों ने सब कुछ साफ कर दिया है। अमेरिका पाकिस्तान पर अपनी पकड़ बनाए रखने और अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए वह सब कुछ कर रहा है, जो उसे सही लगता है। इसके लिए वह पाकिस्तान की संप्रभुता तक हनन कर सकता है, लेकिन जब बात भारत के हितों की आती है तो मामला पलट जाता है। इस स्थिति के लिए अमेरिका नहीं, बल्कि हम खुद ही जिम्मेवार हैं। भारत को अमेरिका समेत अंतरराष्ट्रीय मंच से पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए और यथोचित कार्रवाई करनी चाहिए ताकि हमारी सॉफ्ट स्टेट की छवि न बनने पाए। इसके जरूरी नहीं कि युद्ध ही किया जाए या फिर अमेरिकी नीति का ही अनुसरण किया जाए। जिस तरह अमेरिका पाकिस्तान पर एक साथ पुचकारने और दबाव बनाने की रणनीति के साथ चल रहा है, कुछ वैसा ही हमें भी पाक के साथ करना होगा। पाकिस्तान यह दिखावा करके कि आतंकवाद से उसे सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है, फायदा लेने की कोशिश कर रहा है। और वह इसमें सफल होता दिख भी रहा है। (लेखक भारतीय राजनयिक रह चुके हैं)
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