Tuesday, June 28, 2011

अमेरिका की मजबूरी

अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी पर लेखक की टिप्पणी
चीन के बढ़ते प्रभाव, मध्य एशिया में ऊर्जा की संभावनाएं, ईरान के परमाणु कार्यक्रम की खिलाफत, काबुल में कमजोर शासन, आंतकवाद को प्रश्रय देता विफल राष्ट्र पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान की जमीनी हकीकत-इन पेचीदा हालात के कारण अमेरिका अफगानिस्तान से वापसी की प्रक्रिया भले ही शुरू कर दे, किंतु वहां से जल्द वापस नहीं आएगा। अफगानिस्तान में करीब डेढ़ लाख सैनिकों को तैनात करने के बावजूद नाटो सेना को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। अफगानिस्तान के देहाती इलाकों में अभी भी तालिबान का जोर है। नई नीति के अनुसार अमेरिका अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण का काम नहीं करेगा। इस अधूरे कठिन काम में भारत सहित कुछ दूसरे देशों की सहायता ली जाएगी। अगर जोर उग्रवाद विरोधी ऑपरेशनों पर रहता है तो अमेरिका को अलकायदा, तालिबान, हक्कानी समूह, गुलबुद्दीन हिकमतयार गुट और ऐसी ही दूसरी ताकतों के विदेशी भाड़े के सैनिकों से निपटना होगा, जिन्हें पाक सेना द्वारा क्वेटा और उत्तर वजीरिस्तान जैसी जगहों पर सुरक्षित पनाह दी जा रही है। काम लंबा और कठिन है और इसे पूरा करने का एकमात्र रास्ता तालिबान के साथ वार्ता का है। खबर है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात की मदद से संपर्क कायम किए गए हैं, लेकिन किसी भी महत्वपूर्ण तालिबान के साथ वार्ता कहलाए जाने जैसी कोई बात नहीं हुई है। अमेरिका अफगान तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर से बात करने की कोशिश कर रहा है जो पाकिस्तान में क्वेटा या उसके आस-पास रह रहा है। बताया जाता है कि उसे दक्षिणी अफगानिस्तान का नियंत्रण सौंपने की पेशकश की गई है। लेकिन सवाल उठता है कि जो तालिबान उत्तर व पश्चिम में भी सेंध लगा चुका है, वह दक्षिणी इलाके के लिए ही क्यों राजी होगा? अफगानिस्तान के आस-पास के इलाकों पर अगर नजर दौड़ाएं तो अनुमान लगाने में देर नहीं लगेगी कि अमेरिका यहां क्यों बना रहना चाहेगा। अमेरिका पश्चिम एशिया के बीच एक अशांत परंतु महत्वपूर्ण इलाके में जमा हुआ है, जहां अरब देशों को अस्थिरता और अशांति का सामना करना पड़ रहा है, जिसे जैस्मीन क्रांति कहा जा रहा है। अफगानिस्तान के उत्तर में मध्य एशिया है, जहां हाइड्रोकार्बनों के मिलने की संभावनाएं हैं। अगर पश्चिमी देश वहां मौजूद न हों तो इसका सीधा फायदा रूस और चीन को मिलेगा। अमेरिका इस क्षेत्र में ईरान का दखल भी नहीं चाहता। इराक का भी बंदोबस्त करना है, जहां सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद का काम पूरा नहीं हुआ है। और फिर अगर चीन से निपटना है, तो पश्चिमी देशों को अफगानिस्तान में किसी भी कीमत पर अपनी मौजूदगी बनाए रखनी होगी। हालांकि चीन ने इससे इनकार किया है, लेकिन ग्वादार में चीन के हित किसी से छिपे नहीं हैं। इसलिए यह सोचना मुश्किल है कि अमेरिका अफ-पाक इलाके से पूरी तरह हटना और चीनी मौजूदगी के लिए रास्ता साफ करना चाहेगा। क्वेटा शूरा पाकिस्तान में मौजूद है। पाकिस्तान तो खुद ही अपने घर में ही लड़ रहा है और उसके ताकतवर सैन्य प्रतिष्ठान पर दबाव है। उसके दफ्तरों और सुविधाओं पर कबाइली लड़ाकुओं और आत्मघाती हमलावरों के हमले जारी हैं। राजनीतिक लिहाज से भी अमेरिका दबाव में है। पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कियानी और आइएसआइ चीफ जनरल शुजा पाशा को नेशनल असेंबली में तलब किया जाना ही अपने आप में अभूतपूर्व है। यह राजनीतिक तथा सैन्य प्रतिष्ठानों के बीच टकराव का संकेत है, जिसमें अमेरिकी सहायता से या उसके बिना जीत सैन्य प्रतिष्ठान की ही होने वाली है। इन सब बातों से पाकिस्तान में बदलते या सुधरते हालात का संकेत नहीं मिलता। अफगानिस्तान में सेनाओं की प्रतीक स्वरूप कमी से भी न केवल पाकिस्तान बल्कि अफगानिस्तान के सभी पक्षों का अमेरिका और नाटो देशों की कीमत पर हौसला बढ़ेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

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