Wednesday, June 1, 2011
चीन के प्रति चेतने का समय
क्या ऐसा हो सकता है कि ऊंचाइयों को छूने की अपनी निरंतर कोशिश में चीन भारत जैसे पड़ोसियों सहित रास्ते में आने वाली हर चीज को कुचलता हुआ आगे बढ़ता जाए। हमारे प्रधानमंत्री ने हाल ही में कहा था कि भारत को चीन की नई दबंगई से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए। शायद वह चीन की स्टि्रंग आफ पर्ल्स नीति के संदर्भ में बोल रहे थे, जिसके बारे में विशेषज्ञ मानते हैं कि जल्दी ही इससे भारत का दम घुट सकता है। जब अक्सर शांत रहने वाले मनमोहन सिंह ने बेचैनी से हिंद महासागर क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की विश्व शक्तियों की बात की तब यह माना गया कि उन्हें चीन की बढ़ती भूमिका को लेकर सही मायनों में चिंता है। अमेरिका के साथ भारत की नजदीकियों के चलते चीन का रुख भारत के प्रति अधिक आक्रामक हो गया है। भारत के लिए तो यह चीन के इरादों के प्रति सचेत हो जाने की चेतावनी है। हाल की उकसाने वाली कार्रवाइयों की बात करें, तो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चीन की लगातार मौजूदगी से नई दिल्ली की चिंता बढ़ती जा रही है और उसे सीमा पर अपने बुनियादी सुविधा ढांचे को मजबूत करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। चिंता की एक बात यह भी है कि चीन, भारत के सामने के तिब्बत और जिनजियांग आटोनामस इलाकों के सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी सुविधा ढांचे को मजबूत कर रहा है। इनमें प्रस्तावित शंघाई-तिब्बत रेल-मार्ग तथा सड़क और हवाई अड्डा सुविधाएं भी शामिल हैं। चीन पाक कब्जे वाले कश्मीर में स्कार्दू और म्यांमार सीमा के पास चीन के कुनमिंग जैसे एक-दूसरे से दूर के इलाकों में सड़कों का जाल बिछा रहा है। चीन ने अपने सभी राजमार्गो को भारत के साथ लगने वाली सीमा और दक्षिणपूर्वी जम्मू-कश्मीर में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लाजिस्टिक केंद्रों और महत्वपूर्ण रक्षा स्थापनाओं को जोड़ने वाली सड़कें बना ली हैं। हम सभी जानते हैं कि चीन ने तिब्बत में ल्हासा तक एक रेल-मार्ग बना लिया है और इसे वह नेपाल, बांग्लादेश और भूटान तक बढ़ाना चाहता है। यह भारतीय नेताओं पर भी एक तीखी टिप्पणी है कि उन्होंने हमारे दरवाजे तक चीन को सड़कें बनाने दीं, जो हमारे लिए एक गंभीर खतरा बन गई हैं। चीन द्वारा सिंगापुरियन पोर्ट अथारिटी से ग्वादार बंदरगाह का नियंत्रण फिर से अपने हाथों में ले लेने के बाद भारत का संदेह पुष्ट हो गया है कि चीन, पाक कब्जे वाले कश्मीर के रास्ते अरब सागर तक अपने जमीनी रास्ते को सुरक्षित कर रहा है। इन घटनाओं के साथ-साथ यह भी आशंका है कि चीन की सामरिक महत्व की स्टि्रंग आफ पर्ल्स नीति से भारत को घेरा जा रहा है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने हिंद महासागर में अड्डों के लिए चीन की इस महत्वाकांक्षी योजना को स्टि्रंग आफ पर्ल्स नीति का नाम दिया है, जिसमें पाकिस्तान में ग्वादार, श्रीलंका में हंबनटोटा, बांग्लादेश में चटगांव और म्यांमार में सिट्टवे बंदरगाह का स्थान प्रमुख है। नेपाल में, नीति-निर्माताओं को प्रभावित करने में चीन का दखल, भारत को घेरने की योजना का हिस्सा है। भारत की समस्या यह है कि उसने नेपाल के राजनीतिक तंत्र पर कभी भरोसा नहीं किया है। एलटीटीई के बाद आर्थिक सहायता के जरिए चीन ने श्रीलंका में भी अपनी एक खास जगह बनाई है। चीन भारत को घेर ही नहीं रहा है, वह तो अरुणाचल प्रदेश और कश्मीर में भी भारत की प्रभुसत्ता को चुनौती भी दे रहा है। अब, वह जम्मू-कश्मीर के मामलों में भी अपनी टांग अड़ा रहा है। जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के लोगों को वह नत्थी वीजा जारी कर रहा है, क्योंकि वह इन इलाकों को अपना हिस्सा मानता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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