Wednesday, June 29, 2011
अब ब्रह्मपुत्र पर चीन की टेढ़ी नजर
हाल के सालों में दुनिया ने बार-बार अलबर्ट आइंस्टीन के उस कथन को याद किया है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। जी हां, पानी हर गुजरते दिन के साथ दुनिया के लिए एक बड़ी नेमत बनता जा रहा है। इंसान ने अपनी हरकतों से पानी पर कई किस्म के जो संकट खड़े किए हैं, अब उन संकटों के चलते जो दूसरे संकट सामने आ रहे हैं, उनसे निपटने के लिए राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जोर जबरदस्ती और षड्यंत्र दिखने लगा है। चीन हाल के सालों में बार-बार अपनी हरकतों से हमें चौकन्ना करता रहा है। कभी सरहद पर उत्तेजक गतिविधियों के जरिये वह हमें चौंकाता रहा है, कभी पाकिस्तान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हमें डराने की कोशिश करता रहा है तो कभी पाकिस्तान के नापाक मंसूबों के साथ वह पाक अधिकृत कश्मीर में अपनी मौजूदगी दर्शाता रहा है। अब वह एक नई हरकत के साथ सामने आया है। चीन अब ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव को गुपचुप तरीके से मोड़ने की कोशिश कर रहा है। अगर वह इस हरकत को अंजाम देता है तो यह भारत के लिए न सिर्फ रणनीतिक स्तर पर एक बड़े संकट का सबब बनेगा, बल्कि इससे हमें एक बड़े पारिस्थितिक संकट का भी सामना करना पड़ेगा। चीन पहले भी ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव से छेड़छाड़ करने की कोशिश करता रहा है। चीन राकलोंग सांगपो (चीन में ब्रह्मपुत्र का नाम) को हमेशा एक रणनीतिक हथियार के तौर पर देखता रहा है, लेकिन फिलहाल चीन की अर्थव्यवस्था इसलिए एक नए संकट से घिर गई है, क्योंकि चीन में इस साल पिछले छह दशकों में से सबसे ज्यादा सूखे और अकाल की मार पड़ी है। चीन जब से समाजवादी राष्ट्र बना, तब से अब तक पहले कभी इतने बड़े सूखे और अकाल का सामना नहीं किया। चीन के दस प्रांतों में पानी का गंभीर संकट पैदा हो गया है, क्योंकि मानसून के तीन महीने गुजर जाने के बावजूद एक बूंद भी बारिश नहीं हुई। यही नहीं, चीन की कई नदियों में जलस्तर भी इतिहास में सबसे नीचे चला गया है। चीन इस स्थिति से निपटने के लिए और अपनी खेती को चौपट होने से बचाने के लिए सांगपो यानी ब्रह्मपुत्र की धरा को मोड़ना चाहता है। लेकिन न तो अंतरराष्ट्रीय जल कानून इसकी इजाजत देते हैं और न ही भारत किसी भी कीमत पर चीन को यह हरकत करने देगा, क्योंकि चीन की इस हरकत से न सिर्फ भारत का उत्तर-पूर्व का इलाका गंभीर जल संकट का शिकार हो जाएगा, बल्कि रणनीतिक नजरिये से भी भारत को इसका जबरदस्त खामियाजा भुगतना पड़ेगा। अगर चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बना लिया तो असम और पश्चिम बंगाल पूरी तरह से सूखे का शिकार हो सकते हैं। असम की अर्थव्यवस्था में ब्रह्मपुत्र नदी का उतना ही महत्वपूर्ण योगदान है, जितना उत्तर प्रदेश और बिहार की अर्थव्यवस्था में गंगा का है। ब्रह्मपुत्र में अगर चीन ने बांध बना लिया तो भारत का वह हिस्सा जहां से ब्रह्मपुत्र नदी गुजरती है, पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस जाएगा। ब्रह्मपुत्र नदी में चीन द्वारा बांध बनाए जाने का एक खतरा यह भी है कि जब जबरदस्त बारिश होगी तो चीन बांध को खोल देगा और भारत का एक बड़ा हिस्सा पानी में डूब जाएगा। भारत के लिए चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने का मतलब है खतरा ही खतरा। इसलिए भारत कभी भी इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। दो साल पहले भी चीन ने इस तरह की हरकतें की थीं, तब भारत ने इस मुद्दे को बहुत गंभीरता से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया था। फिर जाकर कहीं चीन अपनी इस हरकत से बाज आया था, लेकिन जैसा कि चीन की आदत है, वह आसानी से नहीं मानता। किसी भी मुद्दे पर वह एक नहीं, अगर दो बार भी कदम पीछे हटा ले तो भी जरूरी नहीं है कि उसने उससे अपने को पीछे ही कर लिया है। सिर्फ चीन कुछ दिनों के लिए ऐसा करता है ताकि दुनिया का ध्यान उस पर से हट जाए। जैसे ही चीन यह देखता है कि दुनिया अब उस मुद्दे के बारे में नहीं सोच रही, तब वह फिर से अपनी पुरानी हरकत पर लौट आता है। ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन के बांध बनाए जाने की खतरनाक साजिश का पता उसके उस योजनागत रणनीतिक पत्र से भी लगता है, जिसमें उसके योजना मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया है कि 2011 से 2015 की अपनी पंचवर्षीय योजना में वह देश में दो दर्जन से ज्यादा बांध बनाएगा, जिससे पानी की संग्रहण क्षमता को बढ़ाया जा सके और बिजली उत्पादन में भी वृद्धि हो। जाहिर है, चीन अपनी इस महत्वाकांक्षी योजना में महज इसलिए फेरबदल नहीं करेगा कि भारत को यह गवारा नहीं है। चीन की 2011 से 2015 की पंचवर्षीय योजना में कम से कम तीन बांध ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए जाने की है। हालंाकि चीन भारत के आपत्ति जताने पर हमेशा की तरह इनकार किया है कि वह ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव की दिशा मोड़ रहा है, लेकिन उसने अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार किया है कि वह अपनी कुछ-कुछ छोटी छोटी जल परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जिनके लिए ब्रह्मपुत्र नदी पर छोटे-छोटे बांध बनाएगा। उसने यह भी कहा कि इससे ब्रह्मपुत्र के बहाव में कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन नदियों के साथ छेड़छाड़ का पुराना इतिहास बताता है कि उनके कुदरती रास्ते पर अगर इंसान ने अपनी फायदे के लिए कुछ छेड़छाड़ करता है तो उसका हर हाल में असर होता है। भारत को वाकई इस मुद्दे पर हमेशा की तरह सुस्त, ढुलमुल और निष्कि्रय रवैया नहीं अपनाना चाहिए, बल्कि इसे तमाम बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाना चाहिए। इसे बहुत जोर शोर से उठाकर रोकना ही चाहिए, क्योंकि यदि ऐसा नहीं किया तो यह सिर्फ जल संकट या रणनीतिक संकट ही नहीं होगा, बल्कि पर्यावरण के लिए एक गंभीर पारिस्थितिक संकट भी पैदा हो जाएगा। ब्रह्मपुत्र में पानी घट जाने या कम हो जाने से सिर्फ असम या उत्तर-पूर्व में जल संबंधी समस्या ही नहीं खड़ी होगी, बल्कि इसके चलते कई तरह के संास्कृतिक और पारिस्थितिकीय संकट भी खड़े हो जाएंगे। नदियां सिर्फ जल की आपूर्ति नहीं करतीं, बल्कि एक समूची पारिस्थितिक थाती की मालकिन भी होती हैं। अगर एक बार नदी का बहाव बिगड़ता है तो फिर कई तरह के संकट खड़े हो जाते हैं। पारंपरिक वनस्पतियां नष्ट हो जाती हैं। वनस्पतियों के नष्ट होने से जीव प्रजाति चक्र गड़बड़ा जाता है। लोगों की रोजी-रोटी का पारंपरिक रास्ता बदल जाता है और सबसे बड़ी बात यह होती है कि भूगोल समाज के साथ-साथ लोगों का मनोविज्ञान भी बदल जाता है। यह सिर्फ पानी और नदी के साथ छेड़छाड़ नहीं होती, बल्कि कुदरत के नियम पर भी खड़ा किया गया संकट होता है। इसलिए हमें जोरदार तरीके से चीन के ऐसी किसी हरकत के विरोध के लिए तैयार रहना चाहिए। उसे दुनियावी मंचों पर मजबूर करना चाहिए कि वह ब्रह्मपुत्र के साथ छेड़छाड़ से बाज आए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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