Wednesday, June 29, 2011

यूनान का संकट

कर्ज में डूबे यूनान के हालात पर लेखक की टिप्पणी
यूनान सरकार द्वारा संकट से उबरने के लिए सरकारी खर्च में कटौती की दिशा में उठाए गए कदमों और प्रस्तावित आर्थिक सुधारों के विरोध में देश में विद्रोह जैसे हालात पैदा हो गए हैं। प्रदर्शनों, हड़तालों का सिलसिला रुकने का नाम हीं नहीं ले रहा है। देखा जाए तो समस्या की शुरुआत नौ साल पहले यूनान के डॉलर को छोड़ यूरो को अपनाने से हुई, जो यूरोप के 16 देशों में चलने वाली एकीकृत मुद्रा है। जैसे ही यूनान की पहुंच यूरो मुद्रा वाले देशों तक बढ़ी वैसे ही उसने कर्ज लेकर घी पीने की शुरुआत कर दी, जिससे अर्थव्यवस्था में एक कृत्रिम उफान आया। 2007-08 की वैश्विक आर्थिक मंदी आते ही कर्ज का Fोत सूखने लगा, जिससे ऋण संकट की शुरुआत हुई। लेकिन यूनान ने अपने वित्तीय हालात पर तब तक परदा डाले रखा, जब तक कि उसका वित्तीय घाटा असहनीय स्तर (जीडीपी के 13 फीसदी) तक नहीं पहुंच गया, जबकि यूरोपीय संघ के नियमों के मुताबिक इसे 3 फीसदी ही रहना चाहिए। यूनान संकट ने यह साबित कर दिया कि मौद्रिक एकीकरण रामबाण नहीं है और किसी आर्थिक जोन की सदस्यता किसी कमजोर देश को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय माहौल के दबाव से बचा नहीं सकती। दरअसल साझा मुद्रा के कमजोर होने की सबसे मुख्य वजह यह रही कि इसे समर्थन देने की कोई संयुक्त राजनीतिक पहल नहीं हुई। मौद्रिक एकीकरण को एक राजनीतिक एकीकृत व्यवस्था की जरूरत थी। इससे एक और सच उजागर हुआ कि इस तरह के अपरिपक्व एकीकरण में सबसे कमजोर कड़ी को बेलआउट पैकेज देने की चिंता हमेशा हावी रहती है। यूरो जोन में यही हो रहा है। यूरो जोन के कर्ज संकट की शुरुआत अप्रैल 2010 में हुई थी जब यूनान की सरकार का घाटा दोगुने से भी ज्यादा हो गया था। इस संकट से निपटने के लिए उसे 110 अरब यूरो की सहायता दी गई। इसके बाद आयरलैंड में हाउसिंग बाजार में मंदी के चलते अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ी तब उसे 85 अरब यूरो की सहायता दी गई। अब पुर्तगाल 80 अरब यूरो का पैकेज मांग रहा है, जिस पर विचार चल रहा है। यूनान में लगातार तीसरे वर्ष देश के जीडीपी का आकार घटा है। घरेलू खपत और निवेश में कमी आई है। बेरोजगारी का आंकड़ा 16 फीसदी तक पहुंच गया है। बजट घाटा जीडीपी का 10 फीसदी हो गया है। यूनान को 2012 तक बाजार से करीब 30 अरब यूरो जुटाने हैं, लेकिन यूनान की साख को बाजार पहले ही कचरे (जंक) की रेटिंग दे चुका है। ऐसी स्थिति में यदि सरकार अपने खर्च कम करने तथा नए कर लगाने का पैकेज लाकर कर बढ़ाती है तो दंगे होना तय है। यूनान की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत छोटी (यूरो जोन के कुल जीडीपी का 2 फीसदी) है, लेकिन उसका कुल ऋण 330 अरब यूरो है जो कि छोटी राशि नहीं है। समस्या यह है कि यूनान के बांडों में बैंको ने भारी-भरकम राशि निवेश की हुई है। उदाहरण के लिए जापानी बैंक 50 करोड़ डॉलर, स्पेनिश बैंक 60 करोड़ डॉलर, अमेरिका बैंक 1.8 अरब डॉलर, इटालवी बैंक 2.6 अरब डॉलर, ब्रिटेन 3.2 अरब, फ्रांस 19.8 अरब डॉलर, जर्मन बैंक 26 अरब और अन्य यूरोपीय बैंक करीब 15.7 अरब डॉलर का निवेश कर चुके हैं। यदि यूनान के दिवालिया होने की स्थिति बनती है तो इस बात की आशंका है कि यूरो जोन के वित्तीय संकट से ग्रस्त सभी सदस्य देशों में सॉवरिन बांड बाजार ढह जाएंगे और उसके साथ बैंकों का भी यही हश्र होगा। इसलिए यूनान की अर्थव्यवस्था को ढहने देने के बजाय उसे बचा लेना ही बेहतर है। यह भी सच है कि यूनान की अर्थव्यवस्था में समय-समय पर पैसे डालना उसकी मूल समस्या को हल नहीं करेगा। ऋण की पुनर्सरचना कहीं अधिक स्थायी और उपयुक्त हल सुझा सकती है। इस प्रक्रिया से यूनान अपने कर्ज-जीडीपी अनुपात को कम करके अधिक प्रबंधनीय स्तर पर ला सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

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