Tuesday, June 28, 2011

भावी खतरे से बेपरवाह ओबामा

अमेरिकी राष्ट्रपति ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। इस ऐलान को अफगानिस्तान में दस साल से जारी युद्ध के अंत की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। इतिहास के आईने से देखने वाले 2012 तक 33 हजार और 2014 तक सभी सैनिकों को स्वदेश बुलाने के ओबामा प्रशासन के फैसले को अमेरिकी हार बता रहे हैं। उनका कहना है कि ब्रिटिश और सोवियत सेना की ही तरह अमेरिकी नेतृत्व वाले उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) ने तालिबान से हार मान ली है, इसलिए उन्होंने लौटने में भलाई समझी। दूसरी ओर अमेरिका में आम राय बन चुकी है कि अधिक देर तक लड़ना मतलब ज्यादा नुकसान और जल्दी युद्ध से निकलना मतलब कम क्षति। आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे अमेरिका के लिए इस युद्ध का अंत बेहद जरूरी है। वहां 2012 में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और ओबामा ने पिछले चुनाव में इराक तथा अफगानिस्तान से सैन्य वापसी का वादा किया था। ऐसे में अमेरिका के लिए यह फैसला हर लिहाज से उचित कहा जा सकता है, लेकिन सैन्य वापसी का प्रभाव केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान, ईरान और भारत पर भी इसका गहरा असर पड़ने वाला है। अमेरिकी हितों का पेच राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगानिस्तान में वर्ष 2009 में 33 हजार अतिरिक्त सुरक्षाबल भेजने का फैसला किया था। ओबामा प्रशासन ने वहां सैनिकों की संख्या बढ़ाई, ताकि तालिबान का जल्द से जल्द सफाया किया जा सके और जुलाई 2011 से चरणबद्ध सैन्य वापसी में अड़चन पैदा न हो। अफगानिस्तान में तत्कालीन अमेरिकी कमांडर जनरल स्टेनली मैकक्रिस्टल सैन्य वापसी की योजना से सहमत नहीं थे। इसी के चलते उन्होंने ओबामा प्रशासन के खिलाफ बयानबाजी की। परिणामस्वरूप उन्हें पद से हाथ धोना पड़ा और इराक में सैन्य वापसी के सूत्रधार रहे जनरल डेविड एच पेट्रियास को शीर्ष कमांडर बनाया गया। पेट्रियास को निर्धारित समय के भीतर सैन्य वापसी का एक सूत्रीय एजेंडा थमाकर ओबामा प्रशासन ने काबुल भेजा। इसमें दो राय नहीं कि मैकक्रिस्टल, पेट्रियास सहित नाटो के शीर्ष सैन्य अधिकारी मानते हैं कि वापसी की योजना जोखिम भरी है। इससे अमेरिकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है, क्योंकि तालिबान कमजोर नहीं पड़ा है। रक्षा विशेषज्ञों की इस राय से इत्तेफाक रखने के बाद भी ओबामा प्रशासन ने जोखिम भरा रास्ता चुना है। इसके पीछे उसकी मजबूरियां हैं। मसलन, युद्ध के बढ़ते खर्च, 2012 में राष्ट्रपति चुनाव और सबसे बड़ी बात लादेन का मारा जाना। अमेरिकी सेना लादेन का पीछा करती हुई अफगानिस्तान गई थी और उनकी राह में तालिबान आ गया। अब लादेन मारा जा चुका है और अमेरिकी नागरिक इस युद्ध को गैरजरूरी मान रहे हैं। जहां तक सुरक्षा को खतरे की बात है तो इसके लिए कुछ विकल्प हैं। इनमें अफगानिस्तान में स्थायी सैन्य ठिकाने बनाना सबसे प्रमुख है। इसके जरिए ओबामा प्रशासन यह भरोसा देना चाहता है कि विदेशी सैनिकों के हटने के बाद तालिबान अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ नहीं सकेगा। अगर अमेरिकी नजरिए से देखें तो ओबामा प्रशासन का फैसला संतुलित दिखाई देता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे अफगानिस्तान का भविष्य संवारने में मदद मिलेगी? गृहयुद्ध को आमंत्रण! सोवियत सेना की वापसी के बाद अफगानिस्तान में गृहयुद्ध की शुरुआत हुई, जिसके परिणामस्वरूप वहां तालिबान का शासन कायम हुआ। इसके बाद 9/11 हुआ और अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी सेना ने हमला बोल दिया। तालिबान को खदेड़ने के बाद अमेरिका के समर्थन से हामिद करजई की लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ। ठीक उसी तरह जिस प्रकार 1979 में सोवियत संघ के समर्थन से अफगानिस्तान में बाबराक कामरल की मा‌र्क्सवादी सरकार अस्तित्व में आई थी। शंका इसलिए भी होती है कि अमेरिका सहित दुनिया के शक्तिशाली देशों की सेना जिस तालिबान से दस वर्ष तक पार नहीं पा सकी, उसका मुकाबला अफगान सेना कितने दिन कर पाएगी? विदेशी सैनिकों के जाते ही पश्चिम समर्थकों पर हमले तेज होंगे। ऐसे में गृहयुद्ध की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यह सर्वविदित है कि अफगान तालिबान के तीनों प्रमुख धड़ों मुल्ला उमर गुट, हक्कानी नेटवर्क और गुलबुद्दीन हिकमतयार गुट का रिमोट पाक सरकार के हाथ में है। वह कभी नहीं चाहेगा कि उसकी भूमिका के बगैर सुलह हो। यदि उसकी चली तो न केवल अफगान सरकार, बल्कि अमेरिका और भारत के हितों को भी आघात पहुंचेगा। क्षेत्रीय हालात और वैश्विक आतंकवाद यह सच है कि तालिबान और अलकायदा को अमेरिका ने ही पैदा किया, लेकिन यह भी सही है कि अफगानिस्तान पर जिस समय हमला हुआ, उस समय वहां तालिबान का क्रूर शासन था। तालिबान के शासन में पाक के हुक्मरानों ने अफगानिस्तान को आतंकवाद का गढ़ बना रखा था। कंधार विमान अपहरण कांड का दर्द भारतीयों ने तालिबान के शासन में ही झेला। यदि सुलहके प्रयासों में पाकिस्तान मध्यस्थ बना तो वह निश्चत रूप से हक्कानी गुट को अफगान सत्ता में महत्वपूर्ण स्थान दिलाने का प्रयास करेगा। हक्कानी गुट अलकायदा का करीबी होने के साथ ही भारत विरोधी गतिविधियों में भी लिप्त है। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे वाले इलाकों में लश्कर-ए-तैयबा की मौजूदगी की पुष्टि कई बार हो चुकी है। पाकिस्तान, अफगान तालिबान के जरिये अपने देश के स्वशासित कबाइली इलाकों पर फिर से पकड़ बनाना चाहता है। अगर पाक सरकार अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान को उचित स्थान दिलाने में कामयाब रही तो उसके कई मकसद सफल हो जाएंगे। इनमें सबसे प्रमुख है, फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज (फाटा) की सात एजेंसियों में रहने वाले पख्तूनों का झुकाव अपनी ओर करना। ये वही पख्तून हैं, जो 1947 के युद्ध में भारत के खिलाफ लड़े थे और पाक सेना कश्मीर का एक हिस्सा छीनने में सफल रही थी। पख्तून लड़ाकों के आगे पहले ब्रिटेन फिर सोवियत और अब अमेरिकी सेना का हश्र दुनिया ने देखा। जाहिर है, अगर पाक समर्थित अफगान तालिबान के धड़े काबुल में सत्ता की धुरी बने तो भारत के लिए खतरे की घंटी बजेगी। सबसे ज्यादा नुकसान हामिद करजई को होगा। अफगानिस्तान के मौजूदा राष्ट्रपति करजई के पिता की तालिबान ने हत्या करा दी थी। इसके बाद करजई इस्लामाबाद की गलियों में पश्चिमी देशों के दूतावास तलाशते फिरते थे, लेकिन वह आइएसआइ को पसंद नहीं थे। करजई का झुकाव भारत की ओर है। यदि पाकिस्तान अपने मंसूबों में कामयाब रहा तो अफगान तालिबान करजई का विकल्प बन सकता है। इन्हीं समीकरणों के कारण अमेरिका, करजई और पाकिस्तान तीनों तालिबान के साथ सुलह का अलग-अलग राग अलाप रहे हैं। भारत इस बात को समझता है, इसलिए वह अच्छे और बुरे तालिबान की बात का विरोध कर रहा है। मौजूदा दौर में अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्ते पटरी से उतरे हुए हैं। लादेन की मौत तो एक बहाना है, लेकिन असली खेल तो अफगानिस्तान की सत्ता को लेकर है। पिछले कुछ महीनों से ओबामा प्रशासन पाक पर सख्त है। व्हाइट हाउस में आम राय बन पड़ी है कि अफगानिस्तान में आतंकवाद के विरुद्ध जंग तो प्रतीकात्मक है। आतंक के खिलाफ वैश्विक जंग जीतने के लिए मस्जिद-पैसा-ताकत के गठजोड़ को तोड़ना होगा यानी सऊदी अरब, पाकिस्तान और ईरान की गुटबंदी को खत्म करना होगा। अफगान तालिबान और अलकायदा का नेटवर्क सऊदी अरब और ईरान से आने वाले पैसे से चल रहा है। दूसरी ओर पाकिस्तानी सत्ता के गलियारों से उन्हें शरण मिल रही है। 9/11 सहित विभिन्न आतंकी हमलों के पीछे यही नेटवर्क था। अमेरिका इसे भलीभांति जानता है कि उस पर हुए आतंकी हमलों को फंड सऊदी अरब और ईरान से मिला और इनकी साजिश पाकिस्तान में रची गई, लेकिन हमला करने के लिए अफगानिस्तान को चुना गया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि सऊदी अरब के पास तेल, ईरान पर हमले का आधार नहीं था और पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं। इस पूरे नेटवर्क में पाकिस्तान धुरी है और संतोषजनक बात यह है कि ओबामा प्रशासन अब उस पर ध्यान केंद्रित रहा है। भविष्य के समीकरण इसी पर निर्भर करेंगे कि पाकिस्तान से अमेरिका कैसे निपटता है|

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