लेखक राष्ट्रीय हितों की रक्षा के मामले में नाकामी के बावजूद नाकारापन का प्रदर्शन होता देख रहे हैं...
हाल ही में अमेरिका ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि पाकिस्तान के इस आरोप में कोई दम नहीं कि भारत बलूचिस्तान में विद्रोह को हवा दे रहा है। अमेरिका को ऐसा इसलिए करना पड़ा, क्योंकि पाकिस्तान को उसकी भारत विरोधी गतिविधियों के लिए जब भी कठघरे में खड़ा किया जाता है तो वह बलूचिस्तान में भारत की कथित दखलंदाजी का रोना रोने लगता है। यदि कूटनीति नैतिकता का दूसरा नाम है तो फिर अमेरिका की ओर से भारत को दी गई क्लीनचिट संतोष का विषय है, लेकिन यदि भारत बलूचिस्तान में कुछ नहीं कर रहा तो फिर यह सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है कि आखिर वह पाकिस्तान की हरकतों का जवाब किस तरह दे रहा और उस पर दबाव कैसे डाल रहा? क्या सिर्फ खोखले बयान देकर या फिर पाकिस्तान में छिपे और भारत में वांछित आतंकियों की अधकचरी सूचियां सौंपकर? यदि भारत इतना ही कर रहा है तो फिर क्या रॉ वाले मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं? पाकिस्तान को सौंपी गई 50 भगोड़ों की सूची में गफलत के बाद एक नया शिगूफा नेशनल ग्रिड की स्थापना का छेड़ा गया है। आखिर जब सीबीआइ, आइबी, एनआइ और रॉ में तालमेल ही नहीं है तो फिर नेशनल ग्रिड फेल होने के अलावा और क्या कर लेगी? भारतीय अखबारों में आए दिन यह छपता है कि दाऊद इब्राहिम कराची के अमुक-अमुक इलाके में रह रहा है, लेकिन हमारी खुफिया एजेंसियां उसकी एक फोटो भी हासिल नहीं कर पा रही हैं। किसी को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि निकट भविष्य में ऐसा कुछ होगा, क्योंकि एक तो हमारी खुफिया एजेंसियां नाकारापन की मिसाल कायम कर रही हैं और दूसरे, हमारा राजनीतिक नेतृत्व राष्ट्रीय हितों की रक्षा के मामले में राजनीतिक इच्छाशक्ति से शून्य है। इसका एक प्रमाण हाल में तब मिला जब न्यूयार्क में भारतीय राजनयिक की बेटी को गलत आरोप में न केवल गिरफ्तार किया गया, बल्कि इस दौरान उसके साथ दुर्व्यवहार भी किया गया। भारत की आपत्ति पर अमेरिका की ओर से यह कहा गया कि राजनयिकों के परिजनों को किसी तरह की छूट हासिल नहीं है। आश्चर्यजनक रूप से किसी ने यह सवाल नहीं पूछा कि क्या अमेरिका को गैर-राजनयिकों के परिजनों के साथ बदसलूकी करने और यहां तक कि बेवजह उनकी गिरफ्तारी करने और फिर उस पर बेशर्मी दिखाने का भी अधिकार प्राप्त है? अफ्रीकी देशों के दौरे से लौटते समय जब प्रधानमंत्री ने यह कहा कि शिकागो की अदालत में डेविड हेडली ने जो कुछ कहा उसमें कुछ नया नहीं तो हैरत हुई, लेकिन यदि वास्तव में ऐसा है तो फिर हेडली के साथी तहव्वुर हुसैन राणा से पूछताछ करने की जरूरत क्यों समझी जा रही है? सवाल यह भी है कि इसके पहले यह जरूरत क्यों नहीं महसूस हुई? आखिर भारतीय नेतृत्व किसे बेवकूफ बना रहा है-देश को, अमेरिका को या फिर खुद को? किसी को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए किभारत सरकार किन्हीं बाध्यताओं के कारण केवल भारतीय सीमाओं से बाहर राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में असमर्थ है, क्योंकि वह आंतरिक मोर्चे पर भी नाकामी के रिकार्ड रच रही है। ऐसे ही एक रिकार्ड के बारे में देश को तब पता चला जब यह तथ्य सामने आया कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस हादसे के बाद यानी पिछले एक साल से झारखंड से लेकर पश्चिम बंगाल के बीच रात्रि में रेल संचालन ठप है। नक्सलियों से डरी सरकार इस रेल खंड में रात में ट्रेनों को चलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही। यह तब है जब खुद प्रधानमंत्री वर्ष में दो-तीन बार यह कहते हैं कि नक्सली आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। एक ओर नक्सली आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताए जाते हैं और दूसरी ओर उनके स्वघोषित हमदर्द योजना आयोग का सदस्य बनाए जाते हैं। नि:संदेह नक्सलियों से सहानुभूति रखना अपराध नहीं, जैसा कि बिनायक सेन को जमानत देते समय उच्चतम न्यायालय ने कहा, लेकिन यह कोई ऐसा कृत्य भी नहीं जिसके लिए किसी को पुरस्कृत किया जाए। आखिर बिनायक सेन को योजना आयोग की स्वास्थ्य संबंधी समिति का सदस्य बनाने से छत्तीसगढ़ सरकार को चिढ़ाने के अतिरिक्त किस राष्ट्रीय हित की पूर्ति हुई? देश को यह भी बताना चाहिए कि संसद पर हमले के आरोपी अफजल को फांसी में देरी सेकौन सा राष्ट्रीय हित सध रहा है? अब यह स्पष्ट है कि उसे फांसी देने मं जानबूझकर देरी की जा रही है। यह देरी वे लोग कर रहे हैं जो देश को यह उपदेश देते रहते हैं कि आतंकियों-अपराधियों की न तो कोई जाति होती है और न ही मजहब। शायद सच्चाई इसके उलट है, क्योंकि जब अमेरिका ने ओसामा को मारकर समुद्र में बहा दिया तो पूरी दुनिया में सिर्फ दो बड़े लोगों को उसकी कब्र की चिंता सताई। इनमें एक थे मिस्र के मौलाना और दूसरे कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह। वैसे तो अफजल को फांसी देने से समूची कांग्रेस डर रही है, लेकिन आतंकियों में उनकी जाति या मजहब देखने का महान कार्य अन्य दल भी कर रहे हैं। इस पर आश्चर्य नहीं कि खूंखार आतंकी देवेंद्र सिंह भुल्लर को फांसी देने का विरोध अकाली दल भी कर रहा है। आतंकियों के प्रति उपजा यह प्रेमभाव मानवता नहीं, एक किस्म की कायरता है। अब यह एक राष्ट्रीय रोग बन गई है। राष्ट्र को इसके लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर लेना चाहिए कि ऐसी ही कायरता के प्रदर्शन तब होंगे जब अजमल कसाब को फांसी देने की बारी आएगी। सबसे पहले तो यही कोशिश होगी कि उसे फांसी देने की नौबत ही न आए और यदि किसी कारण यह नौबत आ ही जाती है तो फिर मानवतावादी, मानवाधिकारवादी यह तर्क लेकर सामने आ सकते हैं कि कसाब को फांसी देने से पाकिस्तान से संबंध बिगड़ सकते हैं। वे ऐसे किसी तर्क से देश को डराने का भी काम कर सकते हैं कि उसे फांसी देने से भारत में और आतंकी हमले हो सकते हैं। (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)
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