Wednesday, June 1, 2011
अहम साबित होगी यह शुरुआत
अफ्रीकी भू-भाग प्राकृतिक संसाधनों के मामले में दुनिया के अन्य भू-भागों से कहीं अधिक समृद्ध है और उसके पास कूटनीतिक शक्ति भी है, जो दुनिया के नियामकों का प्रबंधन करने में अहम भूमिका निभाती है। अफ्रीकी देशों के प्राकृतिक संसाधनों पर अमेरिका-यूरोप की कुदृष्टि से वहां भुखमरी पसरी और राजनीतिक संघर्षो को ऑक्सीजन मिला। यूरोप और अमेरिका के बाद अब चीन की खतरनाक उपस्थिति अफ्रीकी देशों में हुई है। खासकर चीन ने तानाशाही जैसी बुराई और आग को हवा देने में कोई कोताही नहीं बरती। इसके बदले में चीन ने अफ्रीकी देशों के तेल और गैस संसाधनों पर कब्जा जमाया और कूटनीतिक स्तर पर अपनी शक्ति भी जुटाई, जिसका उपयोग चीन ने अंतरराष्ट्रीय नियामकों के निर्णयों को प्रभावित करने के लिए करता रहा है। अराजक, हिंसक और उपनिवेशिक संस्कृति से पूर्ण चीन की समूचे अफ्रीका में मजबूत पहुंच हमारे लिए परेशानी का एक और मोर्चा है। अफ्रीकी देशों की कूटनीतिक-आर्थिक शक्ति को न पहचानने की बड़ी कीमत हमारी संप्रभुता ने चुकाई है। खासकर संयुक्त राष्ट्र संघ के विस्तार के मामले में अफ्रीकी देशों से गठजोड़ न करने की विफलता कैसी रही है? यह जगजाहिर है। संयुक्त राष्ट्र संघ के विस्तार के लिए हमनें जर्मनी, जापान और ब्राजील के साथ मिलकर ग्रुप फोर बनाया था। इसमें अफ्रीका को अलग रखना एक बड़ी कूटनीतिक भूल थी, जबकि अफ्रीकी देशों के साथ हमारी विरासत जुड़ी हुई है। महात्मा गांधी का रंगभेद के खिलाफ आगाज आज भी अफ्रीकियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। अफ्रीकी देशों को अपने साथ जोड़ने में महात्मा गांधी की विरासत एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती थी। जाहिर तौर हमनें अफ्रीका पर कूटनीतिक पहुंच में देरी की है। अब भारतीय कूटनीतिकारों को यह अहसास हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय नियामकों को और लोकतांत्रिक बनाने में अफ्रीकी देशों का सहयोग जरूरी है। भारत अफ्रीका के रचनात्मक विकास और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रवाह में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अफ्रीका के कई देशों में तानाशाही पसरी हुई है और इस्लामिक आतंकवाद की जड़े भी गहरी हैं। अभी हाल ही में संपन्न भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन के निष्कर्ष और घोषणा पत्र से भारत और अफ्रीकी देशों के बीच सहयोग की नई कड़ी जुड़ी है और इस कड़ी की गूंज पूरी दुनिया ने सुनी है। अफ्रीकी यूनियन द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का समर्थन करना भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। चीन की आक्रामक मार्केटिंग के आगोश में अफ्रीका पहले से ही जकड़ा हुआ है। चीन की कंपनियां न केवल तेल और गैस के उत्खनन में आगे निकल चुकी हैं, बल्कि अन्य कारोबारों पर भी उनका कब्जा है। भारत-अफ्रीका सहयोग मंच बनने के बाद स्थितियां बदली हैं और दोनों तरफ से व्यापार को बढ़ाने के गंभीर प्रयास हुए हैं। लेकिन भारत को व्यापार संतुलन को अपने पक्ष में करने की चुनौती होगी। भारतीय कंपनियों को अफ्रीकी देशों में व्यापार के नए क्षेत्रों को चुनना होगा और चीन की आक्रामक मार्केटिंग की भी तोड़ खोजनी होगी। चीन के सस्ते और दो नंबरिया माल की जगह गुणवत्ता आधारित व्यापार से भारत उसे पछाड़ सकता है। अगर हमारे संबंध अफ्रीकी देशों के साथ प्रगाढ़ होते हैं तो यह कूटनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण होगा। खासकर वैश्विक नियामकों की उपनिवेशिक राजनीति के संदर्भ में। दुनिया अब भी लोकतांत्रिक नहीं है। दुनिया को लोकतांत्रिक बनाने के लिए उपनिवेशिक शक्तियां अब भी तैयार नहीं हैं। खासकर संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का विस्तार एक बड़ा मुद्दा है। सुरक्षा परिषद के विस्तार पर भारत ने जर्मनी, जापान और ब्राजील को मिलाकर गु्रप फोर बनाया था। ग्रुप फोर की मुहिम कोई विश्वास हासिल नहीं कर सकी। ग्रुप फोर की हमारी कूटनीति चाक-चौबंद नहीं थी। एक तरह से कहें तो अफ्रीकी देशों को अलग रखना हमारी कूटनीतिक भूल थी। अफ्रीकी देशों के सहयोग और समर्थन के बिना हम सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के सपने को पूरा नहीं कर सकते हैं। अब अफ्रीकी यूनियन ने सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का समर्थन कर दिया है। यह समर्थन भारत की बढ़ती वैश्विक कूटनीति में एक और जीत है। भविष्य में भारत अफ्रीकी यूनियन के इस समर्थन का लाभ उठा सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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