Wednesday, June 15, 2011
अमेरिका की दुविधा
ओसामा बिन लादेन की मौत से एक नए युग की शुरुआत हुई है, जिसमें आतंक के खिलाफ दुनिया की लड़ाई के बारे में 11 सितंबर, 2001 के बाद अपनाई जा रही अमेरिकी नीति की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है। पिछले दस सालों से दोस्त और दुश्मन के बीच फर्क करने का एकमात्र आधार यह था कि कोई देश ओसामा की तलाश में मदद कर रहा है या रोड़े अटका रहा है। अब जबकि ओसामा नहीं रहा है, भारत को नजर रखनी होगी कि बराक ओबामा अमेरिका को किस प्रकार एक नई दिशा में ले जाते हैं, ताकि दुनिया से आतंकवाद का खतरा मिट सके। उन्हें फिर से एशिया की ओर ध्यान देना होगा, जहां उनके देश का भविष्य मौजूद है। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पाकिस्तान में मौजूद परमाणु हथियार तालिबान के हाथ न पड़ जाएं। अगर ऐसा हुआ तो पूरे एशिया की तस्वीर ही बदल जाएगी। अशांति, असुरक्षा और पश्चिमी देशों के खिलाफ हिंसा के आज के इस दौर में लादेन का मारा जाना एक महत्वपूर्ण घटना है। इसका सबसे अधिक असर यह हुआ है कि आज अनेक खूंखार आतंकवादी अपनी जान बचाने के लिए भागते फिर रहे हैं। ऐसा ही एक आतंकी दाऊद इब्राहीम है, जिसका आइएसआइ की मदद वाला व्यापक नेटवर्क है। 1993 से पहले दाऊद का धंधा केवल तस्करी और जबरन वसूली तक ही सीमित था, लेकिन आज वह न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन गया है। आइएसआइ के साथ उसके संबंध 1993 में मुंबई विस्फोटों में उसका हाथ होने के बाद से बने हुए हैं। बाद में वह आइएसआइ को साजो-सामान मुहैया कराने लगा। मुख्य ऑपरेटर की भूमिका अब आइएसआइ की दूसरी शाखा लश्करे-तैयबा द्वारा निभाई जा रही है। लेकिन लश्कर भी भारत से, खास तौर से गुजरात और महाराष्ट्र से, नए रंगरूट भरती करने के लिए उसी पर निर्भर है। ओसामा के बाद सबसे खतरनाक आतंकवादी दाऊद है। लश्कर के साथ उसके जगजाहिर संबंध और भी खतरनाक हो गए हैं, क्योंकि लश्कर और अलकायदा के बीच सहयोग लगातार बढ़ रहा है। पहले तो भारत के लिए उसका महत्व अधिक था, क्योंकि लश्कर का सारा ध्यान भारत की ओर ही था। लेकिन पिछले दस सालों में उसकी दिलचस्पी पश्चिमी देशों में अधिक बढ़ गई है, जिसका संकेत पश्चिमी देशों में हमलों की बढ़ती संख्या में देखा जा सकता है। इन बातों से घबरा कर अमेरिका ने 2003 में उसे विशेष विश्व आतंकवादी घोषित कर दिया था। पिछले साल जनवरी में अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में दाऊद और उसके गिरोह को दक्षिण एशिया में अमेरिकी हितों के लिए सीधा खतरा बताया गया था। चिंता की बात तो यह है कि ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद लश्कर पर अलकायदा की निर्भरता बढ़ सकती है। वह दाऊद को दक्षिण एशिया से अफ्रीका तक फैले उसके विशाल नेटवर्क का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए करने के लिए राजी कर सकता है। अमेरिका को इस बात का ध्यान रखना होगा और तत्काल कार्रवाई करनी होगी। यह भारत के लिए अच्छा संकेत हो सकता है। अब भारत-पाकिस्तान-अमेरिका-चीन रिश्तों में नया मोड़ आ सकता है। पाकिस्तान दोहरा खेल खेल रहा है। 1950 से वह अमेरिका से भारी मात्रा में सैन्य तथा आर्थिक सहायता ले रहा है। आज अमेरिकी सेनाओं का पाकिस्तान में छावनियों पर असरदार नियंत्रण है। साथ-साथ पाकिस्तान ने चीन से भी अच्छे संबंध कायम कर लिए हैं। चीन ने पाकिस्तान को आर्थिक, सैन्य और तकनीकी सहायता दी है और दोनों ही सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मित्र देश बन गए हैं। अब अमेरिका को चीन के मित्र पाकिस्तान या भारत में से किसी एक को चुनना होगा। शायद भारत के लिए यह एक अच्छा मौका है। अमेरिका से नजदीकियों से उसे सैन्य तथा आर्थिक शक्ति हासिल हो सकती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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