Friday, June 10, 2011

उदारता के मामले में कहां ठहरता है भारत

अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्रिका साइंस में एक अध्ययन रिपोर्ट छपी है। यह दुनिया के 33 देशों में संपन्न अध्ययनों का निचोड़ है, जिसमें उदारता तथा अनुदारता के लिए कुछ मानक तय कर उस पर अंक दिए गए हैं। शोध टीम के सदस्यों के मुताबिक 33 देशों में सिर्फ पाकिस्तान और मलेशिया भारत से ज्यादा अनुदार पाए गए। निश्चित ही वे सभी जो भारत की महान सहिष्णुता की कहानियों पर पले बढ़े हैं, उन्हें प्रस्तुत अध्ययन के निष्कर्ष देखकर धक्का लग सकता है। 21वीं सदी का उदितमान भारत जिसके बारे में यह बात बार-बार बताई जा रही हो कि वह बेहद उदार विचारों से संचालित हो रहा हो, उसका दुनिया के सबसे दमनात्मक समाजों में रूपांतरण देखकर लोगों के लिए सहसा यकीन करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन विडंबना यही है कि दुनिया का यह सबसे बड़ा जनतंत्र जड़सूत्रतावाद के सूचकांकों में शीर्ष पर दिखता है। अगर हम अधिक वास्तुनिष्ठ होकर अपने समाज को देखने की कोशिश करें तो भारतीय समाज के बारे में कुछ बातें स्पष्ट हैं। आज के समय में भी जो देश अपने यहां डायन हत्या देखता है, मौका मिलते ही स्ति्रयों को निर्वस्त्र कर उनके दौड़ाए जाने को देखता है और संपत्ति के नाम पर या इज्जत की रक्षा के नाम पर या अकेली स्त्री को पाकर उसे तंग करने वाली नजरों को देखता है तो इसे क्या कहा जा सकता है। लोग पीछे-पीछे दौड़ते हैं, फोटो खींचतें हैं, हंसते हैं। और ऐसी घटनाएं किसी खास प्रांत से आती नहीं दिखती हैं। आखिर हमारे ही समाज के परिवारों मे दहेज मांगा जाता है। इसके लिए दबाव बनाया जाता है। हर 77 मिनट में औरत दहेज के लिए मार दी जाती है। लड़के वाले श्रेष्ठ और लड़की वाले कम इज्जत के पात्र होते हैं। बेटे की चाहत में बेटी को कोख में खत्म करना, तीन करोड़ से ऊपर विधवाओं को या तो परिवारों में रहकर दोयम दर्जे का जीवन जीना पड़ता है या अंतत: विधवा आश्रम का मुंह देखना पड़ता है। आंकड़ों में और सर्वेक्षणों में दहेज हत्याएं और दहेज उत्पीड़न बढ़ता दिख रहा है। कुछ साल पहले के आंकड़ों के मुताबिक, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो में दर्ज तथ्य के अनुसार जहां 2006 में दहेज हत्या के केस 7618 थे, वहीं 2007 में यह आंकड़ा बढ़कर 8095 हो गया। दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के बर्न विभाग की एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में 16 से 34 साल के बीच की उम्र की महिलाएं किचन में जलने की शिकार अधिक हो रही हैं। अनुमानत: यहां हर साल जलने के कारण मौत की घटनाएं 1.63 लाख होती हैं, जिसमें युवा पुरुषों की तुलना में युवा महिलाओं की संख्या तीन गुना अधिक होती है। चूंकि औरत ही रसोई में अधिक काम करती है, इसलिए दुर्घटना भी उसी के साथ अधिक हो सकती है, लेकिन सारी मौतें दुर्घटना के कारण नहीं होती हैं। उत्तर भारत का पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इज्जत के नाम पर हत्या (ऑनर किलिंग) के मामले में अव्वल माना जाता रहा है। ऐसा नहीं है कि अन्य राज्यों में ऐसी घटनाएं नहीं होती हैं, लेकिन ये इलाके ऐसी हत्याओं और उसे मिली सामाजिक वैधता के मामले में सबसे आगे हंै। आंकड़े बताते हैं कि हरियाणा में हत्याओं में 10 प्रतिशत मामले इज्जत की खातिर होते है। जब घरवाले अपने बच्चों को इज्जत में बट्टा लग जाने की एवज में मौत के घाट उतार देते हैं तो इसमें उनके जानने वालों तथा पूरे गांव की भी सहमति होती है। निजी दायरों में होने वाली हिंसा का मामला सिर्फ स्ति्रयों तक सीमित नहीं है। 2007 के शुरू में ही परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसमें कहा गया था कि कैसे 53 फीसदी बच्चें यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं, जिसमें सबसे अधिक उत्पीड़क परिवार के ही सदस्य और नजदीकी रिश्तेदार होते हैं। यह भी उजागर हुआ था कि बच्चे बड़ों के द्वारा, कुछ मामलों में अपने गुरुजनों और रिश्तेदारों के द्वारा तो पीडि़त हैं ही, वे पर्यटकों तथा धार्मिक आस्था के नाम पर यौन अत्याचार झेलते हैं। इसमें कभी-कभी उनसे थोड़े बड़े बच्चे भी अत्याचारी बनते हैं यानी बचपन में ही खेल-खेल में वे दूसरे को गंभीर आघात पहुंचाते हैं, जिसका साया जिंदगी भर पीडि़त बच्चे के साथ रहता है। आधिकारिक तौर पर भारत में बाल मजदूरों की संख्या 4 से 5 करोड़ है यानी जिस उम्र में बच्चों को खेलना-कूदना चाहिए, उस उम्र में वह किसी के घर पर, किसी होटल-दुकान में या फिर कारखाने में काम करते पाए जाते हैं। हम तमाम पढ़े-लिखे, सुशिक्षित कहे जाने वाले परिवारों में यह बात अक्सर सुनते हैं कि वह उनके यहां काम करने वाले बच्चे को अपनी संतान की तरह पालते हैं। दरअसल, यह सरासर झूठ होता है, उसे 14-16 घंटे काम करवाते ही हैं। अगर हम इन परिवारों के पाखंडपूर्ण व्यवहार को छोड़ भी दें तो क्या यह किसी सहिष्णु समाज का परिचायक है कि वहां इतने बड़े पैमाने पर बाल श्रमिक हैं! रेयर ऑफ दी रेयरेस्ट केस यानी कोर्ट-कचहरी की भाषा में जो अत्यंत क्रूरतापूर्वक किए गए अपराध हैं, उन्हें तो आसानी से अनुदार श्रेणी में रखा ही जाता है, लेकिन आम परिवारों में आम व्यवहार में जो असहिष्णुता तथा अभद्रता का चलन है, उसे व्यापक पैमाने पर सहमति मिली हुई है और एक तरह से सहज बोध का हिस्सा बन जाना ज्यादा चिंतनीय है यानी जो व्यवहार गलत नहीं माना जाता, वह सुधारा कैसे जाएगा? निजी दायरों में प्रकट होती और वैध मानी जाती हिंसा सार्वजनिक दायरों में भी अधिक बर्बर ढंग से सामने आती है। आजादी के साठ साल बाद भी दलितों-आदिवासियों के साथ होने वाली संगठित हिंसा, उनकी बस्तियों में की जाने वाली आगजनी, उनके दूल्हे के घोड़ी पर चढ़ जाने से फूंके जाते मकान, विभिन्न स्तरों पर उनके साथ बरता जा रहा अस्पृश्यता या अन्य किस्म के भेदभाव आदि की जितनी चर्चा की जाए वह कम है। राजनीतिक-सामाजिक दायरे में भी हम उसे असहमति रखने वाली किताबों को जलाने, फिल्मों पर पाबंदी लगाने और यहां तक कि प्रेम का इजहार करने के लिए बने त्योहारों के दिन आततायियों की टोलियों द्वारा सड़कों पर मचाए जाते उत्पात के रूप में देख सकते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ, जब जम्मू-कश्मीर की एक लड़की द्वारा चिनाब नदी में कूदकर की गई आत्महत्या का समाचार छपा था। जांच में पता चला कि वह अपने परिचित के साथ अकेले में कहीं बैठी थी, जिसे देखकर पुलिसवाले ने उसे उत्पीडि़त करने की कोशिश की थी। मगर प्यार के इन पहरेदारों का किस्सा महज सुदूर जम्मू-कश्मीर का ही नहीं है, राजधानी में लोदी गार्डन से लेकर तमाम पार्को में पुलिस द्वारा की जाने वाली इसी किस्म की हरकतों से हम परिचित होते रहते हैं। विडंबना यही है कि दो वयस्कों के निजी क्षणों में पुलिस द्वारा की जाने वाली दखलंदाजी को सिविल कहे जाने वाले समाज का अच्छा खासा हिस्सा सही मानता है। अपने समाज की कमियों की जब भी चर्चा छिड़ती है तो स्वयं को देशभक्त और राष्ट्रवादी साबित करने के लिए मानो यह बताना जरूरी होता है कि पाश्चात्य संस्कृति कितनी बुरी है। संभव है कई मायने में वे बदतर हों भी, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता है कि दूसरे की कमी हमारी अच्छाई को सुनिश्चित करती है। जिस सहिष्णुता की परंपरा की कथाएं सुनी जाती रही है, अगर वे सही थीं तो फिर हमारा समाज इतना क्रूर और अनुदार तथा भोंडा व्यवहार करने वालों का समाज क्यों बन गया? दरअसल, वह कभी उदार था ही नहीं। यदि ऐसा होता तो ऊंच-नीच की भावना वाली जाति व्यवस्था ईजाद क्यों करता, महिलाओं को कैद करके रखने की हिमायत क्यों करता?साइंस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन हमें दरअसल वह आईना प्रदान करता है कि भारतीय समाज को सही अर्थो में सभ्य तथा सुसंस्कृत बनाने की चुनौती अभी बरकरार है, जिसमें उदारता और सहिष्णुता का तत्व प्रमुख हो। (लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

No comments:

Post a Comment