Wednesday, June 29, 2011
बेन अली को 35 साल की सजा, करोड़ों का जुर्माना
पूर्व राष्ट्रपति जैनुल आबदीन बेन अली को यहां की एक अदालत ने 35 साल जेल की सजा सुनाई है। उल्लेखनीय है कि अरब क्रांति के जनक ट्यूनीशिया में सत्ता विरोधी प्रदर्शन के कारण गत 14 जनवरी को बेन अली शासन छोड़ परिवार समेत सऊदी अरब चले गए थे। फिलहाल वह वहीं रह रहे हैं। सोमवार को अदालत ने उनकी अनुपस्थिति में उन्हें चोरी और भारी मात्रा में नकदी और आभूषण पर गैर कानूनी तरीके से अधिकार रखने के मामले में दोषी करार देते हुए सजा सुनाई। उनकी पत्नी लैला त्राबेल्सी को भी यही सजा सुनाई गई है। खास बात यह है कि केवल छह घंटे की सुनवाई में ही अदालत ने यह फैसला सुना दिया। इस फैसले से ट्यूनिशिया के लोग पूरी तरह खुश नहीं हैं। सुबह से फैसले का इंतजार कर रही छात्रा मरियम ने कहा, यह फैसला जनता को बहुत राहत देने वाला नहीं है। दूसरी तरफ बेन अली के वकील अकरम अजोरी ने फैसले को हास्यास्पद बताया। जबकि मुकदमे से अलग रहे एक अन्य वरिष्ठ वकील अबदुर्रज्जाक किलानी ने कहा, इस तरह के मामले में दंपति को अधिकतम सजा मिली है। बेन अली और लैला पर यहां की अदालतों में अभी और भी मुकदमे हैं। बेन अली के मुकदमों पर मिस्र की पैनी नजर है। मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक पर भी नागरिकों की हत्या के आरोप में मुकदमा चलाया जाना है। सजा सुनाने वाले जज तौहामी हफियान ने बेन अली और उनकी पत्नी पर साढ़े छह करोड़ डॉलर (लगभग तीन सौ करोड़ रुपये) का जुर्माने भी लगाया। उन्होंने कहा कि नशीले पदार्थो और हथियारों की तस्करी जैसे आरोपों पर 30 जून को फैसला सुनाया जाएगा।
अब सूखे से छह महीने पहले हो जाएगी खबर
ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो छह महीने पहले ही किसी इलाके में पड़ने वाले सूखे की स्थिति के बारे में बता सकती है। भारत में भी सूखे के हालात कई राज्यों में अलग-अलग समय पर देखे जाते हैं। यह खोज निश्चित रूप से भारत समेत पूरे विश्व के लिए लाभप्रद हो सकती है। विक्टोरिया यूनिवर्सिटी के शिशुतोष बरुआ ने यह महत्वपूर्ण खोज की है। उनके द्वारा तैयार उपकरण वातावरण में जल और जलवायु संबंधी बदलाव को मापकर उस क्षेत्र में नमी का आकलन करने के साथ पूर्व की परिस्थितियों के आधार पर भविष्य में सूखा पड़ने की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। बरुआ ने कहा कि सूखे के बारे में अग्रिम जानकारी होने पर जल प्रबंधन से जुड़े लोग फसल को बचाने के लिए पहले ही पानी की समुचित व्यवस्था कर सकते हैं। अपने अध्ययन के लिए उन्होंने विक्टोरिया में पहले पैदा हुई सूखे की परिस्थितियों पर भी गौर किया। उनका कहना है कि इससे पहले हुई खोजों से केवल वर्षा की कमी के बारे में ही पता लग पाता था। मगर इस तकनीक के जरिए जमीन में जल के भंडार, धारा प्रवाह और जमीन से पानी के वाष्पोत्सर्जन की दर का भी पता लगाया जा सकता है। इससे सूखे की मार से बचने के लिए पहले ही सारे उपाय करने में मदद मिलेगी। उन्होंने बताया कि हाल के ऑस्ट्रेलिया में पड़े 13 साल लंबे सूखे से यह पता चला है कि इससे प्रभावित लोगों के लिए ऑस्ट्रेलिया में पहले से ही पानी की कमी हो गई थी। उन्हें यह उम्मीद है कि अब सरकारें और जल प्रबंधन प्रशासन उनकी इस खोज का लाभ उठाते हुए समय रहते जल का समुचित प्रबंध कर सकेगा। उन्होंने कहा कि पिछले 60 सालों में ऑस्ट्रेलिया के लगातार कई साल तक सूखा पड़ता रहा है। लेकिन यहां आने वाले सालों में ना सिर्फ और सूखा पड़ेगा बल्कि सूखा और भीषण व भयावह भी होता जाएगा। इसका कारण वहां वातावरण में भारी परिवर्तन होना है।
नेतृत्व और वैचारिक बदलाव के लिए तैयार हो रहा चीन
क्या यह अरब देशों में हो रही जनक्रांतियों का नतीजा है? कभी दुनिया के सबसे शक्तिशाली कम्युनिस्ट देश रहे सोवियत संघ के विघटन से चीन सबक लेना चाहता है। सत्ताधारी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) सोवियत संघ जैसे विभाजन से बचने के लिए मुख्य नेतृत्व में बदलाव के साथ नए वैचारिक बदलाव की तैयारी कर रही है। उल्लेखनीय है कि सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के 74 साल के शासन के बाद 1991 में सोवियत संघ कई राष्ट्रों में विभाजित हो गया था। इस साल सीपीसी के 90वें स्थापना दिवस और सत्ता के 62 साल पूरे होने पर पार्टी के अधिकारियों ने कहा है, सीपीसी 60 वर्ष के घबराहट (नर्वस सिक्सटी) के दौर से गुजर रही है। सीपीसी के मुख्य अंग चीन एक्जिक्यूटिव लीडर एकेडमी के उपाध्यक्ष शाओ जिंतांग ने पत्रकारों से कहा, सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी का 74 वर्ष के शासन के बाद हारना चीन के लिए बड़ा सबक है। उन्होंने कहा, सीपीसी उच्च और निम्न वर्ग के बीच खाई को पाटने के साथ मुख्य नेतृत्व में बदलाव की तैयारी कर रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि इस वर्ष ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, जॉर्डन और यमन में जनक्रांति से चीन का नेतृत्व बेहद डरा हुआ है। चीन के शिनजिंयाग प्रांत, तिब्बत, हांगकांग और मकाउ में पहले से विरोध के स्वर उठ रहे हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व अपनी नीतियों में भारी बदलाव को ही विकल्प मानकर चल रहा है। अगले वर्ष राष्ट्रपति हू जिंताओ और प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ का दूसरा कार्यकाल भी पूरा हो जाएगा। इस साल चीन सरकार ने आंतरिक सुरक्षा के लिए 95 सौ करोड़ डॉलर (लगभग चार लाख 27 हजार करोड़ रुपये) का बजट पारित किया है, जो रक्षा विभाग के बजट (91 सौ डॉलर) से कही ज्यादा है। खास बात यह है कि सीपीसी पर विभाजन और सत्ता छूटने का का डर इतना हावी हो चुका है कि वह अपने संस्थापक माओ की नीतियों को भी दरकिनार करने लगी है। ननचांग शहर के उप मेयर और पार्टी के वरिष्ठ सदस्य शाओ गुआन का कहना है, चीन के इतिहास को माओ से ज्यादा किसी ने नहीं दिया, लेकिन वह भगवान नहीं थे। उन्होंने कुछ गलतियां की, जिन्हें हमने सुधारा है।
ब्रह्मपुत्र पर चीन की बुरी नजर के नहीं मिले सबूत
चीन की बांध परियोजनाओं की भारत सैटेलाइट निगरानी भी कर रहा है। ब्रह्मपुत्र की धारा मोड़ने और बांध निर्माण की खबरों के बाद नई दिल्ली ने सैटेलाइट तस्वीरों से भी इनकी तस्दीक की। सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत को धारा मोड़ने के कोई निशान नहीं मिले हैं। हालांकि इस कड़ी में असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने गुरुवार को विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से मुलाकात कर मामले पर अपनी चिंताएं साझा कीं। ताजा तथ्यों के साथ भारत ब्रह्मपुत्र पर चीन की परियोजनाओं पर लगातार नजर रखे हुए है। नई दिल्ली की नजर ब्रह्मपुत्र की मुख्य धारा ही नहीं, उपधाराओं पर बनने वाली छोटी बांध परियोजनाओं पर भी है। इस बीच असम के मुख्यमंत्री ने चीन में ब्रह्मपुत्र की धारा मोड़ने की कोशिशों से जुड़ी खबरों के बाद विदेश मंत्री से मुलाकात कर अपनी चिंता जताई। गोगोई का कहना था कि यदि ऐसे होता है तो असम की कृषि पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। वैसे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा यह स्पष्ट कर चुके हैं कि तिब्बत क्षेत्र में चीन की झांगमू बांध परियोजना से घबराने की जरूरत नहीं है। कृष्णा के अनुसार झांगमू बांध ब्रह्मपुत्र की धारा की दिशा में बनाया जा रहा है जिसमें पानी रोका नहीं जाएगा। लिहाजा इसके कारण भारत में आने वाले ब्रह्मपुत्र के पाने में फर्क नहीं पड़ेगा। सूत्रों के मुताबिक ब्रह्मपुत्र का अधिकतर प्रवाह क्षेत्र भारत में जरूर है, लेकिन नदी की धारा में चीन से आने वाले पानी की मात्रा भारत से बाहर जाने वाले जल की तुलना में कम है। असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने विदेश मंत्री के अलावा गृहमंत्री पी चिदंबरम से भी बात की और उन्हें उल्फा और सरकार के बीच इस महीने के अंत में शुरू होने वाली औपचारिक वार्ता की जानकारी दी। गोगोई ने कहा कि उल्फा के अध्यक्ष अरविंदा राजखोवा के नेतृत्व वाले दल के साथ अनौपचारिक बातचीत सकारात्मक रूप से आगे बढ़ रही है और दोनों पक्ष जल्द ही असम में अपना अभियान बंद करने की घोषणा करेंगे।
महंगी पड़ेगी भारत की ख़ामोशी
चीन पिछले पांच दशकों के सबसे भीषण सूखे से दो-चार हो रहा है। उसके दक्षिण और मध्य चीन के तकरीबन दस प्रांतों की स्थिति बेहद नाजुक हो चली है। खेती-गृहस्थी तो चौपट हो ही चली है। बिजली का उत्पादन भी अपने निम्नतम स्तर पर जा पहुंचा है। इस स्थिति से निपटने के लिए चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर पानी की समस्या से मुक्ति पाना चाहता है। हालांकि चीन ऐसी किसी भी कोशिश से इनकार कर रहा है, लेकिन भारत के खिलाफ उसकी साजिश को देखते हुए उसकी बातों पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। अभी गत वर्ष ही उसने स्वीकार किया कि वह ब्रह्मपुत्र नदी पर तकरीबन 1-2 बिलियन डॉलर की लागत से हाइड्रो इलेक्टि्रक पॉवर बना रहा है। चीन की पंचवर्षीय योजना से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज ने भी पश्चिमी कैनाल प्लान से अलग योजना सुझाते हुए कहा है कि पानी को उत्तर-पश्चिमी दिशा में मोड़ दिए जाने से पानी की समस्या से निजात पाई जा सकती है। चीन इन सुझावों पर अमल भी कर रहा है। दूसरी ओर भारत की बेबसी साफ दिख रही है। उसकी आपत्तियों के बावजूद चीन ध्यान नहीं दे रहा है। उसका रटा-रटाया जवाब है कि ब्रह्मपुत्र पर प्रस्तावित उसकी सभी परियोजनाएं छोटी हैं। रक्षा विषेशज्ञों की मानें तो चीन का यह कदम उसके दुस्साहसपूर्ण रवैये को इंगित करता है। अरुणाचल प्रदेश और असम जैसे भारतीय राज्य ब्रह्मपुत्र नदी के जल का उपयोग करते हैं। ऐसे में विदेश मंत्री एसएम कृष्णा का यह कथन आश्चर्य पैदा करता है कि नदी पर बनने वाली पन बिजली परियोजना के लिए जलसंग्रह नहीं किया जाएगा और इससे भारत में आने वाली नदी की धारा प्रभावित नहीं होगी। विभिन्न पहलुओं पर सूक्ष्म ढ़ग से विचार किया जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि चीन भारत के खिलाफ योजनाबद्ध रणनीति के तहत काम कर रहा है और भारत चेतनाशून्य पड़ा हुआ है। एक ओर चीन अरुणाचल के विस्तृत भू-भाग पर कब्जा कर उसका विस्तार में जुटा हुआ है। वहीं, पाक अधिकृत कश्मीर में भी उसकी दखलंदाजी बढ़ती जा रही है। हाल में अरुणाचल प्रदेश के वित्त एवं योजना मंत्री कालीखो पुल ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को बताया कि राज्य में कारगिल जैसे हालात बनते जा रहे हैं, लेकिन सरकार मानने के लिए तैयार नहीं है। अभी पिछले दिनों ही सीमा पर तैनात सेना के उत्तरी कमान के वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरल केटी परनाइक ने भी संकेत दिया था कि चीन एक बार फिर भारत पर हमले की तैयारी में जुटा है। चीन की सरकारी पत्रिका में भी भारत को खुलेआम युद्ध की धमकी देते हुए कहा गया कि अगर भारत अमेरिका के साथ मिलकर उसे घेरने की कोशिश करेगा तो चीन लड़ाई छेड़ने से नहीं हिचकेगा। चीन में बढ़ती बेरोजगारी, आंतरिक असंतोष और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी भारत पर हमला करने का एक महत्वपूर्ण कारण बन सकता है। भारत की लाख कोशिशों के बावजूद वह सीमा विवाद को हल करना नहीं चाह रहा है। एक बार नहीं, सैकड़ों बार चीनी सैनिक भारत की सीमा में घुसकर अपने देश का नाम भारतीय भू-भाग पर लिख चुके हैं और वहां काम कर रहे भारतीय मजदूरों को काम बंद करने की धमकी भी देते हैं। लेकिन भारत सरकार चीन के इस दुस्साहस पर अपना कड़ा प्रतिवाद जताने के बजाए नरमी ही बरतती देखी जाती है। भारत की यह उदार नीति चीन जैसे साम्राज्यवादी देश के मनोबल को बढ़ाने वाली है। सुनने में तो यहां तक आ रहा है कि भारत-पाकिस्तान के बीच लगभग 800 किमी नियंत्रण रेखा पर चीन अपने सैनिकों की तैनाती भी कर चुका है। पीओके के बंकरों में पाकिस्तानी सेना के साथ चीन की लाल सेना के जवानों की मौजूदगी का खुलासा भी हो चुका है, लेकिन देश के रक्षामंत्री को सीमा पर चीनी सैनिकों की हलचल बिल्कुल ही नहीं सुनाई नहीं दे रही है। सरकार की यह शुतुर्गमुर्गी स्थिति भारतीय संप्रभुता के लिए खतरनाक है। अरुणाचल प्रदेश से चुने गए किसी भी भारतीय सांसद को वह वीजा नहीं देता है। भारत की गंभीर आपत्तियों के बावजूद वह कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा ही जारी कर रहा है। सवाल यह उठता है कि चीन की कातिल मंशा को भारत समझने में भूल क्यों कर रहा है? क्या संप्रग सरकार चीनी सेना के आक्रमण का उसी तरह इंतजार कर रही है, जैसे कभी कायर शासक आम्भी ने सिकंदर सेना के आगमन के लिए देश की संप्रभुता को दांव पर लगा दिया था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
अब ब्रह्मपुत्र पर चीन की टेढ़ी नजर
हाल के सालों में दुनिया ने बार-बार अलबर्ट आइंस्टीन के उस कथन को याद किया है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। जी हां, पानी हर गुजरते दिन के साथ दुनिया के लिए एक बड़ी नेमत बनता जा रहा है। इंसान ने अपनी हरकतों से पानी पर कई किस्म के जो संकट खड़े किए हैं, अब उन संकटों के चलते जो दूसरे संकट सामने आ रहे हैं, उनसे निपटने के लिए राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जोर जबरदस्ती और षड्यंत्र दिखने लगा है। चीन हाल के सालों में बार-बार अपनी हरकतों से हमें चौकन्ना करता रहा है। कभी सरहद पर उत्तेजक गतिविधियों के जरिये वह हमें चौंकाता रहा है, कभी पाकिस्तान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हमें डराने की कोशिश करता रहा है तो कभी पाकिस्तान के नापाक मंसूबों के साथ वह पाक अधिकृत कश्मीर में अपनी मौजूदगी दर्शाता रहा है। अब वह एक नई हरकत के साथ सामने आया है। चीन अब ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव को गुपचुप तरीके से मोड़ने की कोशिश कर रहा है। अगर वह इस हरकत को अंजाम देता है तो यह भारत के लिए न सिर्फ रणनीतिक स्तर पर एक बड़े संकट का सबब बनेगा, बल्कि इससे हमें एक बड़े पारिस्थितिक संकट का भी सामना करना पड़ेगा। चीन पहले भी ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव से छेड़छाड़ करने की कोशिश करता रहा है। चीन राकलोंग सांगपो (चीन में ब्रह्मपुत्र का नाम) को हमेशा एक रणनीतिक हथियार के तौर पर देखता रहा है, लेकिन फिलहाल चीन की अर्थव्यवस्था इसलिए एक नए संकट से घिर गई है, क्योंकि चीन में इस साल पिछले छह दशकों में से सबसे ज्यादा सूखे और अकाल की मार पड़ी है। चीन जब से समाजवादी राष्ट्र बना, तब से अब तक पहले कभी इतने बड़े सूखे और अकाल का सामना नहीं किया। चीन के दस प्रांतों में पानी का गंभीर संकट पैदा हो गया है, क्योंकि मानसून के तीन महीने गुजर जाने के बावजूद एक बूंद भी बारिश नहीं हुई। यही नहीं, चीन की कई नदियों में जलस्तर भी इतिहास में सबसे नीचे चला गया है। चीन इस स्थिति से निपटने के लिए और अपनी खेती को चौपट होने से बचाने के लिए सांगपो यानी ब्रह्मपुत्र की धरा को मोड़ना चाहता है। लेकिन न तो अंतरराष्ट्रीय जल कानून इसकी इजाजत देते हैं और न ही भारत किसी भी कीमत पर चीन को यह हरकत करने देगा, क्योंकि चीन की इस हरकत से न सिर्फ भारत का उत्तर-पूर्व का इलाका गंभीर जल संकट का शिकार हो जाएगा, बल्कि रणनीतिक नजरिये से भी भारत को इसका जबरदस्त खामियाजा भुगतना पड़ेगा। अगर चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बना लिया तो असम और पश्चिम बंगाल पूरी तरह से सूखे का शिकार हो सकते हैं। असम की अर्थव्यवस्था में ब्रह्मपुत्र नदी का उतना ही महत्वपूर्ण योगदान है, जितना उत्तर प्रदेश और बिहार की अर्थव्यवस्था में गंगा का है। ब्रह्मपुत्र में अगर चीन ने बांध बना लिया तो भारत का वह हिस्सा जहां से ब्रह्मपुत्र नदी गुजरती है, पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस जाएगा। ब्रह्मपुत्र नदी में चीन द्वारा बांध बनाए जाने का एक खतरा यह भी है कि जब जबरदस्त बारिश होगी तो चीन बांध को खोल देगा और भारत का एक बड़ा हिस्सा पानी में डूब जाएगा। भारत के लिए चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने का मतलब है खतरा ही खतरा। इसलिए भारत कभी भी इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। दो साल पहले भी चीन ने इस तरह की हरकतें की थीं, तब भारत ने इस मुद्दे को बहुत गंभीरता से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया था। फिर जाकर कहीं चीन अपनी इस हरकत से बाज आया था, लेकिन जैसा कि चीन की आदत है, वह आसानी से नहीं मानता। किसी भी मुद्दे पर वह एक नहीं, अगर दो बार भी कदम पीछे हटा ले तो भी जरूरी नहीं है कि उसने उससे अपने को पीछे ही कर लिया है। सिर्फ चीन कुछ दिनों के लिए ऐसा करता है ताकि दुनिया का ध्यान उस पर से हट जाए। जैसे ही चीन यह देखता है कि दुनिया अब उस मुद्दे के बारे में नहीं सोच रही, तब वह फिर से अपनी पुरानी हरकत पर लौट आता है। ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन के बांध बनाए जाने की खतरनाक साजिश का पता उसके उस योजनागत रणनीतिक पत्र से भी लगता है, जिसमें उसके योजना मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया है कि 2011 से 2015 की अपनी पंचवर्षीय योजना में वह देश में दो दर्जन से ज्यादा बांध बनाएगा, जिससे पानी की संग्रहण क्षमता को बढ़ाया जा सके और बिजली उत्पादन में भी वृद्धि हो। जाहिर है, चीन अपनी इस महत्वाकांक्षी योजना में महज इसलिए फेरबदल नहीं करेगा कि भारत को यह गवारा नहीं है। चीन की 2011 से 2015 की पंचवर्षीय योजना में कम से कम तीन बांध ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए जाने की है। हालंाकि चीन भारत के आपत्ति जताने पर हमेशा की तरह इनकार किया है कि वह ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव की दिशा मोड़ रहा है, लेकिन उसने अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार किया है कि वह अपनी कुछ-कुछ छोटी छोटी जल परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जिनके लिए ब्रह्मपुत्र नदी पर छोटे-छोटे बांध बनाएगा। उसने यह भी कहा कि इससे ब्रह्मपुत्र के बहाव में कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन नदियों के साथ छेड़छाड़ का पुराना इतिहास बताता है कि उनके कुदरती रास्ते पर अगर इंसान ने अपनी फायदे के लिए कुछ छेड़छाड़ करता है तो उसका हर हाल में असर होता है। भारत को वाकई इस मुद्दे पर हमेशा की तरह सुस्त, ढुलमुल और निष्कि्रय रवैया नहीं अपनाना चाहिए, बल्कि इसे तमाम बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाना चाहिए। इसे बहुत जोर शोर से उठाकर रोकना ही चाहिए, क्योंकि यदि ऐसा नहीं किया तो यह सिर्फ जल संकट या रणनीतिक संकट ही नहीं होगा, बल्कि पर्यावरण के लिए एक गंभीर पारिस्थितिक संकट भी पैदा हो जाएगा। ब्रह्मपुत्र में पानी घट जाने या कम हो जाने से सिर्फ असम या उत्तर-पूर्व में जल संबंधी समस्या ही नहीं खड़ी होगी, बल्कि इसके चलते कई तरह के संास्कृतिक और पारिस्थितिकीय संकट भी खड़े हो जाएंगे। नदियां सिर्फ जल की आपूर्ति नहीं करतीं, बल्कि एक समूची पारिस्थितिक थाती की मालकिन भी होती हैं। अगर एक बार नदी का बहाव बिगड़ता है तो फिर कई तरह के संकट खड़े हो जाते हैं। पारंपरिक वनस्पतियां नष्ट हो जाती हैं। वनस्पतियों के नष्ट होने से जीव प्रजाति चक्र गड़बड़ा जाता है। लोगों की रोजी-रोटी का पारंपरिक रास्ता बदल जाता है और सबसे बड़ी बात यह होती है कि भूगोल समाज के साथ-साथ लोगों का मनोविज्ञान भी बदल जाता है। यह सिर्फ पानी और नदी के साथ छेड़छाड़ नहीं होती, बल्कि कुदरत के नियम पर भी खड़ा किया गया संकट होता है। इसलिए हमें जोरदार तरीके से चीन के ऐसी किसी हरकत के विरोध के लिए तैयार रहना चाहिए। उसे दुनियावी मंचों पर मजबूर करना चाहिए कि वह ब्रह्मपुत्र के साथ छेड़छाड़ से बाज आए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
ब्रिक्स की परीक्षा
डॉमिनिक स्टॉस कॉन के पदत्याग के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) को अपना नया मुखिया चुनना है। गौरतलब है कि फ्रांस मूल के स्टॉस कान को न्यूयॉर्क में एक महिला होटलकर्मी से बलात्कार और यौन उत्पीड़न के आरोपों के कारण अपना पद छोड़ना पड़ा था। नई उम्मीदवार क्रिस्टीन लगार्द भी फ्रांस से हैं, जो वहां की वित्त मंत्री हैं। अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए लगार्द दुनिया के कई देशों के चक्कर काट रही हैं। इस हफ्ते उन्होंने भारत की यात्रा की। उनका अगला पड़ाव चीन था। दरअसल, ब्रिक्स देशों यानी ब्राजील, भारत, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने आइएमएफ का नया प्रमुख विकासशील देशों से चुनने की मांग की थी, लेकिन आइएमएफ में यूरोपीय देशों एवं अमेरिका की हैसियत 50 प्रतिशत से ज्यादा होने के कारण ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता। ब्रिक्स देशों द्वारा विरोध का स्वर उभरने की वजह से लगार्द के लिए जरूरी हो गया था कि अपने नाम पर समर्थन जुटाने के लिए वह विकासशील देशों की उपेक्षा न करें। पिछले दिनों ब्राजील जाकर लगार्द ने आइएमएफ में सुधार की जरूरत को रेखांकित करते हुए उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की वकालत की है। भारत में भी लगार्द ने वही दलीलें दीं जो ब्राजील में दी हैं। अब तक यह परंपरा रही है कि विश्व बैंक के अध्यक्ष पद पर अमेरिकी चुना जाता है और आइएमएफ के प्रमुख का पद यूरोप को दिया जाता है। विकासशील देशों की दलील है कि आइएमएफ प्रमुख का चुनाव किसी परंपरा नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर होना चाहिए। लोकतंत्र और पारदर्शिता का ढोल पीटने वाले पश्चिमी देश यह क्यों भूल जाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष किसी देश की निजी जागीर न होकर एक वैश्विक संगठन है। परंपरा की खोखली दुहाई देकर इसके शीर्ष पदों की आपसी बंदरबांट को किसी भी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। विकसित देश आज जो आर्थिक संकट झेल रहे हैं, उसके मद्देनजर एक बार फिर वैश्विक आर्थिक एवं वित्तीय संगठनों में व्यापक सुधार की जरूरत महसूस हुई है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों के बढ़ते कद को समुचित प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए। सर्वविदित है कि आइएमएफ के कोष में आने वाले धन में विकसित देशों का हिस्सा पचास प्रतिशत से कम हो चुका है। परंतु मतदान का ढांचा इतना अलोकतांत्रिक और पक्षपाती है कि अगर पश्चिमी खेमे में आपसी मतभेद न हों तो विकासशील देशों के किसी प्रत्याशी का जीतना नामुमकिन सा हो जाता है। लेकिन कई बार हार की अहमियत जीत से ज्यादा हो जाती है। इसलिए ब्रिक्स द्वारा हार के डर से क्रिस्टीन लगार्द के सामने प्रत्याशी खड़ा नहीं करना कमजोरी माना जाएगी। एक संगठन के तौर पर ब्रिक्स को कड़े इम्तिहान से गुजरना है। हालांकि पांचों ब्रिक्स देश अब तक एक उम्मीदवार के नाम पर सहमत नहीं हो पाए हैं लेकिन इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि इस मुद्दे पर आपसी मतभेद भुलाकर कोई सर्वसम्मति कायम ही नहीं की जा सकती। भारत के मोंटेक सिंह अहलूवालिया इस पद के मजबूत दावेदार हो सकते थे किंतु उनकी उम्र आइएमएफ प्रमुख की सेवानिवृत्ति उम्र से ज्यादा होने के कारण वह अपात्र हो चुके हैं। ऐसे में भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए? इस मसले पर भारत को चीन के रवैये पर पैनी नजर रखनी होगी। जहां लगार्द को भारत ने कोई आश्वासन नहीं दिया, वहीं चीनी नेताओं से बातचीत के बाद वह अत्यंत प्रसन्न नजर आ रही हैं। चीन विकासशील देशों के प्रत्याशी का समर्थन करने के बजाय लगार्द का समर्थन करना ज्यादा फायदे का सौदा समझ रहा है। सौदेबाजी के तहत चीन आइएमएफ के उप प्रमुख का पद हथिया सकता है। अगर ऐसा हुआ तो न केवल ब्रिक्स के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्न उठेंगे बल्कि उभरती हुई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की एकजुटता के प्रयासों को भी करारा झटका लगेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
महिलाओं के लिए खतरनाक देश है भारत
अधिक संख्या में महिला भ्रूण हत्या, शिशु हत्या और मानव तस्करी होने के चलते भारत विश्व में चौथे सबसे खतरनाक स्थान पर आ गया है। सबसे तकलीफदेह बात यह है कि यह आंकड़े भारत की मौजूदा छवि के एकदम विपरीत हैं। महिलाओं के अधिकारों के लिए कानूनी सूचना और कानूनी सहायता केंद्र थामसन रायटर ट्रस्टला वूमेन की ओर से कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार विश्व में अफगानिस्तान महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक स्थान है। इसके बाद महिलाओं के लिए खतरनाक देशों में डेमोक्रेटिक रिपब्लिकन ऑफ कांगो, पाकिस्तान, भारत और सोमालिया का स्थान आता है। इनमें से तीन देश दक्षिण एशिया में हैं। इस सर्वेक्षण में पांच महाद्वीपों के इस क्षेत्र से संबंधित 213 विशेषज्ञों से देशों को कुल मिलाकर खतरों के मुताबिक देशों को सूचीबद्ध करने को कहा गया था। इन विशेषज्ञों से देशों को सूचीबद्ध करते समय छह मुख्य खतरों की श्रेणियों को ध्यान में रखने को कहा गया था जिनमें स्वास्थ्य खतरे, यौन हिंसा, गैर यौन हिंसा, संस्कृति, परंपरा अथवा धर्म में पालन की जाने वाली हानिकारक प्रथाओं, आर्थिक संसाधनों तक पहंुच में कमी और मानव तस्करी शामिल है। सर्वेक्षण में कहा गया, भारत मुख्यत: बालिका भू्रण हत्या, शिशु हत्या और मानव तस्करी के कारण चौथे स्थान पर है। सर्वेक्षण के मुताबिक वर्ष 2009 में भारत के गृह सचिव मधुकर गुप्ता ने टिप्पणी की थी कि भारत में कम से कम 10 करोड़ लोग मानव तस्करी में शामिल हैं। सीबीआई का अनुमान है कि वर्ष 2009 में करीब 90 प्रतिशत मानव तस्करी देश के अंदर हुई तथा देश में करीब 30 लाख वेश्याएं थीं जिनमें से 40 प्रतिशत बच्चे थे। अन्य तरह के उत्पीड़नों में जबर्दस्ती श्रम कराना और जबर्दस्ती विवाह शामिल है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार, भारत में माना जाता है कि गत सदी के दौरान बालिका भ्रूण हत्या और शिशु हत्या के चलते पांच करोड़ लड़कियां गायब हैं। ट्रस्ट लॉ नाम की एजेंसी के विश्व भर में कराए सर्वे में पांच महाद्वीपों में महिलाओं की दुगर्ति ना सिर्फ सामाजिक, आधार पर है बल्कि उनके खिलाफ हिंसा और अपराध के मामले भी पहले से अत्यधिक हैं.
यूनान का संकट
कर्ज में डूबे यूनान के हालात पर लेखक की टिप्पणी
यूनान सरकार द्वारा संकट से उबरने के लिए सरकारी खर्च में कटौती की दिशा में उठाए गए कदमों और प्रस्तावित आर्थिक सुधारों के विरोध में देश में विद्रोह जैसे हालात पैदा हो गए हैं। प्रदर्शनों, हड़तालों का सिलसिला रुकने का नाम हीं नहीं ले रहा है। देखा जाए तो समस्या की शुरुआत नौ साल पहले यूनान के डॉलर को छोड़ यूरो को अपनाने से हुई, जो यूरोप के 16 देशों में चलने वाली एकीकृत मुद्रा है। जैसे ही यूनान की पहुंच यूरो मुद्रा वाले देशों तक बढ़ी वैसे ही उसने कर्ज लेकर घी पीने की शुरुआत कर दी, जिससे अर्थव्यवस्था में एक कृत्रिम उफान आया। 2007-08 की वैश्विक आर्थिक मंदी आते ही कर्ज का Fोत सूखने लगा, जिससे ऋण संकट की शुरुआत हुई। लेकिन यूनान ने अपने वित्तीय हालात पर तब तक परदा डाले रखा, जब तक कि उसका वित्तीय घाटा असहनीय स्तर (जीडीपी के 13 फीसदी) तक नहीं पहुंच गया, जबकि यूरोपीय संघ के नियमों के मुताबिक इसे 3 फीसदी ही रहना चाहिए। यूनान संकट ने यह साबित कर दिया कि मौद्रिक एकीकरण रामबाण नहीं है और किसी आर्थिक जोन की सदस्यता किसी कमजोर देश को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय माहौल के दबाव से बचा नहीं सकती। दरअसल साझा मुद्रा के कमजोर होने की सबसे मुख्य वजह यह रही कि इसे समर्थन देने की कोई संयुक्त राजनीतिक पहल नहीं हुई। मौद्रिक एकीकरण को एक राजनीतिक एकीकृत व्यवस्था की जरूरत थी। इससे एक और सच उजागर हुआ कि इस तरह के अपरिपक्व एकीकरण में सबसे कमजोर कड़ी को बेलआउट पैकेज देने की चिंता हमेशा हावी रहती है। यूरो जोन में यही हो रहा है। यूरो जोन के कर्ज संकट की शुरुआत अप्रैल 2010 में हुई थी जब यूनान की सरकार का घाटा दोगुने से भी ज्यादा हो गया था। इस संकट से निपटने के लिए उसे 110 अरब यूरो की सहायता दी गई। इसके बाद आयरलैंड में हाउसिंग बाजार में मंदी के चलते अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ी तब उसे 85 अरब यूरो की सहायता दी गई। अब पुर्तगाल 80 अरब यूरो का पैकेज मांग रहा है, जिस पर विचार चल रहा है। यूनान में लगातार तीसरे वर्ष देश के जीडीपी का आकार घटा है। घरेलू खपत और निवेश में कमी आई है। बेरोजगारी का आंकड़ा 16 फीसदी तक पहुंच गया है। बजट घाटा जीडीपी का 10 फीसदी हो गया है। यूनान को 2012 तक बाजार से करीब 30 अरब यूरो जुटाने हैं, लेकिन यूनान की साख को बाजार पहले ही कचरे (जंक) की रेटिंग दे चुका है। ऐसी स्थिति में यदि सरकार अपने खर्च कम करने तथा नए कर लगाने का पैकेज लाकर कर बढ़ाती है तो दंगे होना तय है। यूनान की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत छोटी (यूरो जोन के कुल जीडीपी का 2 फीसदी) है, लेकिन उसका कुल ऋण 330 अरब यूरो है जो कि छोटी राशि नहीं है। समस्या यह है कि यूनान के बांडों में बैंको ने भारी-भरकम राशि निवेश की हुई है। उदाहरण के लिए जापानी बैंक 50 करोड़ डॉलर, स्पेनिश बैंक 60 करोड़ डॉलर, अमेरिका बैंक 1.8 अरब डॉलर, इटालवी बैंक 2.6 अरब डॉलर, ब्रिटेन 3.2 अरब, फ्रांस 19.8 अरब डॉलर, जर्मन बैंक 26 अरब और अन्य यूरोपीय बैंक करीब 15.7 अरब डॉलर का निवेश कर चुके हैं। यदि यूनान के दिवालिया होने की स्थिति बनती है तो इस बात की आशंका है कि यूरो जोन के वित्तीय संकट से ग्रस्त सभी सदस्य देशों में सॉवरिन बांड बाजार ढह जाएंगे और उसके साथ बैंकों का भी यही हश्र होगा। इसलिए यूनान की अर्थव्यवस्था को ढहने देने के बजाय उसे बचा लेना ही बेहतर है। यह भी सच है कि यूनान की अर्थव्यवस्था में समय-समय पर पैसे डालना उसकी मूल समस्या को हल नहीं करेगा। ऋण की पुनर्सरचना कहीं अधिक स्थायी और उपयुक्त हल सुझा सकती है। इस प्रक्रिया से यूनान अपने कर्ज-जीडीपी अनुपात को कम करके अधिक प्रबंधनीय स्तर पर ला सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
यूनान सरकार द्वारा संकट से उबरने के लिए सरकारी खर्च में कटौती की दिशा में उठाए गए कदमों और प्रस्तावित आर्थिक सुधारों के विरोध में देश में विद्रोह जैसे हालात पैदा हो गए हैं। प्रदर्शनों, हड़तालों का सिलसिला रुकने का नाम हीं नहीं ले रहा है। देखा जाए तो समस्या की शुरुआत नौ साल पहले यूनान के डॉलर को छोड़ यूरो को अपनाने से हुई, जो यूरोप के 16 देशों में चलने वाली एकीकृत मुद्रा है। जैसे ही यूनान की पहुंच यूरो मुद्रा वाले देशों तक बढ़ी वैसे ही उसने कर्ज लेकर घी पीने की शुरुआत कर दी, जिससे अर्थव्यवस्था में एक कृत्रिम उफान आया। 2007-08 की वैश्विक आर्थिक मंदी आते ही कर्ज का Fोत सूखने लगा, जिससे ऋण संकट की शुरुआत हुई। लेकिन यूनान ने अपने वित्तीय हालात पर तब तक परदा डाले रखा, जब तक कि उसका वित्तीय घाटा असहनीय स्तर (जीडीपी के 13 फीसदी) तक नहीं पहुंच गया, जबकि यूरोपीय संघ के नियमों के मुताबिक इसे 3 फीसदी ही रहना चाहिए। यूनान संकट ने यह साबित कर दिया कि मौद्रिक एकीकरण रामबाण नहीं है और किसी आर्थिक जोन की सदस्यता किसी कमजोर देश को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय माहौल के दबाव से बचा नहीं सकती। दरअसल साझा मुद्रा के कमजोर होने की सबसे मुख्य वजह यह रही कि इसे समर्थन देने की कोई संयुक्त राजनीतिक पहल नहीं हुई। मौद्रिक एकीकरण को एक राजनीतिक एकीकृत व्यवस्था की जरूरत थी। इससे एक और सच उजागर हुआ कि इस तरह के अपरिपक्व एकीकरण में सबसे कमजोर कड़ी को बेलआउट पैकेज देने की चिंता हमेशा हावी रहती है। यूरो जोन में यही हो रहा है। यूरो जोन के कर्ज संकट की शुरुआत अप्रैल 2010 में हुई थी जब यूनान की सरकार का घाटा दोगुने से भी ज्यादा हो गया था। इस संकट से निपटने के लिए उसे 110 अरब यूरो की सहायता दी गई। इसके बाद आयरलैंड में हाउसिंग बाजार में मंदी के चलते अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ी तब उसे 85 अरब यूरो की सहायता दी गई। अब पुर्तगाल 80 अरब यूरो का पैकेज मांग रहा है, जिस पर विचार चल रहा है। यूनान में लगातार तीसरे वर्ष देश के जीडीपी का आकार घटा है। घरेलू खपत और निवेश में कमी आई है। बेरोजगारी का आंकड़ा 16 फीसदी तक पहुंच गया है। बजट घाटा जीडीपी का 10 फीसदी हो गया है। यूनान को 2012 तक बाजार से करीब 30 अरब यूरो जुटाने हैं, लेकिन यूनान की साख को बाजार पहले ही कचरे (जंक) की रेटिंग दे चुका है। ऐसी स्थिति में यदि सरकार अपने खर्च कम करने तथा नए कर लगाने का पैकेज लाकर कर बढ़ाती है तो दंगे होना तय है। यूनान की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत छोटी (यूरो जोन के कुल जीडीपी का 2 फीसदी) है, लेकिन उसका कुल ऋण 330 अरब यूरो है जो कि छोटी राशि नहीं है। समस्या यह है कि यूनान के बांडों में बैंको ने भारी-भरकम राशि निवेश की हुई है। उदाहरण के लिए जापानी बैंक 50 करोड़ डॉलर, स्पेनिश बैंक 60 करोड़ डॉलर, अमेरिका बैंक 1.8 अरब डॉलर, इटालवी बैंक 2.6 अरब डॉलर, ब्रिटेन 3.2 अरब, फ्रांस 19.8 अरब डॉलर, जर्मन बैंक 26 अरब और अन्य यूरोपीय बैंक करीब 15.7 अरब डॉलर का निवेश कर चुके हैं। यदि यूनान के दिवालिया होने की स्थिति बनती है तो इस बात की आशंका है कि यूरो जोन के वित्तीय संकट से ग्रस्त सभी सदस्य देशों में सॉवरिन बांड बाजार ढह जाएंगे और उसके साथ बैंकों का भी यही हश्र होगा। इसलिए यूनान की अर्थव्यवस्था को ढहने देने के बजाय उसे बचा लेना ही बेहतर है। यह भी सच है कि यूनान की अर्थव्यवस्था में समय-समय पर पैसे डालना उसकी मूल समस्या को हल नहीं करेगा। ऋण की पुनर्सरचना कहीं अधिक स्थायी और उपयुक्त हल सुझा सकती है। इस प्रक्रिया से यूनान अपने कर्ज-जीडीपी अनुपात को कम करके अधिक प्रबंधनीय स्तर पर ला सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Tuesday, June 28, 2011
भावी खतरे से बेपरवाह ओबामा
अमेरिकी राष्ट्रपति ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। इस ऐलान को अफगानिस्तान में दस साल से जारी युद्ध के अंत की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। इतिहास के आईने से देखने वाले 2012 तक 33 हजार और 2014 तक सभी सैनिकों को स्वदेश बुलाने के ओबामा प्रशासन के फैसले को अमेरिकी हार बता रहे हैं। उनका कहना है कि ब्रिटिश और सोवियत सेना की ही तरह अमेरिकी नेतृत्व वाले उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) ने तालिबान से हार मान ली है, इसलिए उन्होंने लौटने में भलाई समझी। दूसरी ओर अमेरिका में आम राय बन चुकी है कि अधिक देर तक लड़ना मतलब ज्यादा नुकसान और जल्दी युद्ध से निकलना मतलब कम क्षति। आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे अमेरिका के लिए इस युद्ध का अंत बेहद जरूरी है। वहां 2012 में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और ओबामा ने पिछले चुनाव में इराक तथा अफगानिस्तान से सैन्य वापसी का वादा किया था। ऐसे में अमेरिका के लिए यह फैसला हर लिहाज से उचित कहा जा सकता है, लेकिन सैन्य वापसी का प्रभाव केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान, ईरान और भारत पर भी इसका गहरा असर पड़ने वाला है। अमेरिकी हितों का पेच राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगानिस्तान में वर्ष 2009 में 33 हजार अतिरिक्त सुरक्षाबल भेजने का फैसला किया था। ओबामा प्रशासन ने वहां सैनिकों की संख्या बढ़ाई, ताकि तालिबान का जल्द से जल्द सफाया किया जा सके और जुलाई 2011 से चरणबद्ध सैन्य वापसी में अड़चन पैदा न हो। अफगानिस्तान में तत्कालीन अमेरिकी कमांडर जनरल स्टेनली मैकक्रिस्टल सैन्य वापसी की योजना से सहमत नहीं थे। इसी के चलते उन्होंने ओबामा प्रशासन के खिलाफ बयानबाजी की। परिणामस्वरूप उन्हें पद से हाथ धोना पड़ा और इराक में सैन्य वापसी के सूत्रधार रहे जनरल डेविड एच पेट्रियास को शीर्ष कमांडर बनाया गया। पेट्रियास को निर्धारित समय के भीतर सैन्य वापसी का एक सूत्रीय एजेंडा थमाकर ओबामा प्रशासन ने काबुल भेजा। इसमें दो राय नहीं कि मैकक्रिस्टल, पेट्रियास सहित नाटो के शीर्ष सैन्य अधिकारी मानते हैं कि वापसी की योजना जोखिम भरी है। इससे अमेरिकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है, क्योंकि तालिबान कमजोर नहीं पड़ा है। रक्षा विशेषज्ञों की इस राय से इत्तेफाक रखने के बाद भी ओबामा प्रशासन ने जोखिम भरा रास्ता चुना है। इसके पीछे उसकी मजबूरियां हैं। मसलन, युद्ध के बढ़ते खर्च, 2012 में राष्ट्रपति चुनाव और सबसे बड़ी बात लादेन का मारा जाना। अमेरिकी सेना लादेन का पीछा करती हुई अफगानिस्तान गई थी और उनकी राह में तालिबान आ गया। अब लादेन मारा जा चुका है और अमेरिकी नागरिक इस युद्ध को गैरजरूरी मान रहे हैं। जहां तक सुरक्षा को खतरे की बात है तो इसके लिए कुछ विकल्प हैं। इनमें अफगानिस्तान में स्थायी सैन्य ठिकाने बनाना सबसे प्रमुख है। इसके जरिए ओबामा प्रशासन यह भरोसा देना चाहता है कि विदेशी सैनिकों के हटने के बाद तालिबान अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ नहीं सकेगा। अगर अमेरिकी नजरिए से देखें तो ओबामा प्रशासन का फैसला संतुलित दिखाई देता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे अफगानिस्तान का भविष्य संवारने में मदद मिलेगी? गृहयुद्ध को आमंत्रण! सोवियत सेना की वापसी के बाद अफगानिस्तान में गृहयुद्ध की शुरुआत हुई, जिसके परिणामस्वरूप वहां तालिबान का शासन कायम हुआ। इसके बाद 9/11 हुआ और अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी सेना ने हमला बोल दिया। तालिबान को खदेड़ने के बाद अमेरिका के समर्थन से हामिद करजई की लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ। ठीक उसी तरह जिस प्रकार 1979 में सोवियत संघ के समर्थन से अफगानिस्तान में बाबराक कामरल की मार्क्सवादी सरकार अस्तित्व में आई थी। शंका इसलिए भी होती है कि अमेरिका सहित दुनिया के शक्तिशाली देशों की सेना जिस तालिबान से दस वर्ष तक पार नहीं पा सकी, उसका मुकाबला अफगान सेना कितने दिन कर पाएगी? विदेशी सैनिकों के जाते ही पश्चिम समर्थकों पर हमले तेज होंगे। ऐसे में गृहयुद्ध की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यह सर्वविदित है कि अफगान तालिबान के तीनों प्रमुख धड़ों मुल्ला उमर गुट, हक्कानी नेटवर्क और गुलबुद्दीन हिकमतयार गुट का रिमोट पाक सरकार के हाथ में है। वह कभी नहीं चाहेगा कि उसकी भूमिका के बगैर सुलह हो। यदि उसकी चली तो न केवल अफगान सरकार, बल्कि अमेरिका और भारत के हितों को भी आघात पहुंचेगा। क्षेत्रीय हालात और वैश्विक आतंकवाद यह सच है कि तालिबान और अलकायदा को अमेरिका ने ही पैदा किया, लेकिन यह भी सही है कि अफगानिस्तान पर जिस समय हमला हुआ, उस समय वहां तालिबान का क्रूर शासन था। तालिबान के शासन में पाक के हुक्मरानों ने अफगानिस्तान को आतंकवाद का गढ़ बना रखा था। कंधार विमान अपहरण कांड का दर्द भारतीयों ने तालिबान के शासन में ही झेला। यदि सुलहके प्रयासों में पाकिस्तान मध्यस्थ बना तो वह निश्चत रूप से हक्कानी गुट को अफगान सत्ता में महत्वपूर्ण स्थान दिलाने का प्रयास करेगा। हक्कानी गुट अलकायदा का करीबी होने के साथ ही भारत विरोधी गतिविधियों में भी लिप्त है। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे वाले इलाकों में लश्कर-ए-तैयबा की मौजूदगी की पुष्टि कई बार हो चुकी है। पाकिस्तान, अफगान तालिबान के जरिये अपने देश के स्वशासित कबाइली इलाकों पर फिर से पकड़ बनाना चाहता है। अगर पाक सरकार अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान को उचित स्थान दिलाने में कामयाब रही तो उसके कई मकसद सफल हो जाएंगे। इनमें सबसे प्रमुख है, फेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज (फाटा) की सात एजेंसियों में रहने वाले पख्तूनों का झुकाव अपनी ओर करना। ये वही पख्तून हैं, जो 1947 के युद्ध में भारत के खिलाफ लड़े थे और पाक सेना कश्मीर का एक हिस्सा छीनने में सफल रही थी। पख्तून लड़ाकों के आगे पहले ब्रिटेन फिर सोवियत और अब अमेरिकी सेना का हश्र दुनिया ने देखा। जाहिर है, अगर पाक समर्थित अफगान तालिबान के धड़े काबुल में सत्ता की धुरी बने तो भारत के लिए खतरे की घंटी बजेगी। सबसे ज्यादा नुकसान हामिद करजई को होगा। अफगानिस्तान के मौजूदा राष्ट्रपति करजई के पिता की तालिबान ने हत्या करा दी थी। इसके बाद करजई इस्लामाबाद की गलियों में पश्चिमी देशों के दूतावास तलाशते फिरते थे, लेकिन वह आइएसआइ को पसंद नहीं थे। करजई का झुकाव भारत की ओर है। यदि पाकिस्तान अपने मंसूबों में कामयाब रहा तो अफगान तालिबान करजई का विकल्प बन सकता है। इन्हीं समीकरणों के कारण अमेरिका, करजई और पाकिस्तान तीनों तालिबान के साथ सुलह का अलग-अलग राग अलाप रहे हैं। भारत इस बात को समझता है, इसलिए वह अच्छे और बुरे तालिबान की बात का विरोध कर रहा है। मौजूदा दौर में अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्ते पटरी से उतरे हुए हैं। लादेन की मौत तो एक बहाना है, लेकिन असली खेल तो अफगानिस्तान की सत्ता को लेकर है। पिछले कुछ महीनों से ओबामा प्रशासन पाक पर सख्त है। व्हाइट हाउस में आम राय बन पड़ी है कि अफगानिस्तान में आतंकवाद के विरुद्ध जंग तो प्रतीकात्मक है। आतंक के खिलाफ वैश्विक जंग जीतने के लिए मस्जिद-पैसा-ताकत के गठजोड़ को तोड़ना होगा यानी सऊदी अरब, पाकिस्तान और ईरान की गुटबंदी को खत्म करना होगा। अफगान तालिबान और अलकायदा का नेटवर्क सऊदी अरब और ईरान से आने वाले पैसे से चल रहा है। दूसरी ओर पाकिस्तानी सत्ता के गलियारों से उन्हें शरण मिल रही है। 9/11 सहित विभिन्न आतंकी हमलों के पीछे यही नेटवर्क था। अमेरिका इसे भलीभांति जानता है कि उस पर हुए आतंकी हमलों को फंड सऊदी अरब और ईरान से मिला और इनकी साजिश पाकिस्तान में रची गई, लेकिन हमला करने के लिए अफगानिस्तान को चुना गया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि सऊदी अरब के पास तेल, ईरान पर हमले का आधार नहीं था और पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं। इस पूरे नेटवर्क में पाकिस्तान धुरी है और संतोषजनक बात यह है कि ओबामा प्रशासन अब उस पर ध्यान केंद्रित रहा है। भविष्य के समीकरण इसी पर निर्भर करेंगे कि पाकिस्तान से अमेरिका कैसे निपटता है|
अमेरिका की मजबूरी
अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी पर लेखक की टिप्पणी
चीन के बढ़ते प्रभाव, मध्य एशिया में ऊर्जा की संभावनाएं, ईरान के परमाणु कार्यक्रम की खिलाफत, काबुल में कमजोर शासन, आंतकवाद को प्रश्रय देता विफल राष्ट्र पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान की जमीनी हकीकत-इन पेचीदा हालात के कारण अमेरिका अफगानिस्तान से वापसी की प्रक्रिया भले ही शुरू कर दे, किंतु वहां से जल्द वापस नहीं आएगा। अफगानिस्तान में करीब डेढ़ लाख सैनिकों को तैनात करने के बावजूद नाटो सेना को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। अफगानिस्तान के देहाती इलाकों में अभी भी तालिबान का जोर है। नई नीति के अनुसार अमेरिका अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण का काम नहीं करेगा। इस अधूरे कठिन काम में भारत सहित कुछ दूसरे देशों की सहायता ली जाएगी। अगर जोर उग्रवाद विरोधी ऑपरेशनों पर रहता है तो अमेरिका को अलकायदा, तालिबान, हक्कानी समूह, गुलबुद्दीन हिकमतयार गुट और ऐसी ही दूसरी ताकतों के विदेशी भाड़े के सैनिकों से निपटना होगा, जिन्हें पाक सेना द्वारा क्वेटा और उत्तर वजीरिस्तान जैसी जगहों पर सुरक्षित पनाह दी जा रही है। काम लंबा और कठिन है और इसे पूरा करने का एकमात्र रास्ता तालिबान के साथ वार्ता का है। खबर है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात की मदद से संपर्क कायम किए गए हैं, लेकिन किसी भी महत्वपूर्ण तालिबान के साथ वार्ता कहलाए जाने जैसी कोई बात नहीं हुई है। अमेरिका अफगान तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर से बात करने की कोशिश कर रहा है जो पाकिस्तान में क्वेटा या उसके आस-पास रह रहा है। बताया जाता है कि उसे दक्षिणी अफगानिस्तान का नियंत्रण सौंपने की पेशकश की गई है। लेकिन सवाल उठता है कि जो तालिबान उत्तर व पश्चिम में भी सेंध लगा चुका है, वह दक्षिणी इलाके के लिए ही क्यों राजी होगा? अफगानिस्तान के आस-पास के इलाकों पर अगर नजर दौड़ाएं तो अनुमान लगाने में देर नहीं लगेगी कि अमेरिका यहां क्यों बना रहना चाहेगा। अमेरिका पश्चिम एशिया के बीच एक अशांत परंतु महत्वपूर्ण इलाके में जमा हुआ है, जहां अरब देशों को अस्थिरता और अशांति का सामना करना पड़ रहा है, जिसे जैस्मीन क्रांति कहा जा रहा है। अफगानिस्तान के उत्तर में मध्य एशिया है, जहां हाइड्रोकार्बनों के मिलने की संभावनाएं हैं। अगर पश्चिमी देश वहां मौजूद न हों तो इसका सीधा फायदा रूस और चीन को मिलेगा। अमेरिका इस क्षेत्र में ईरान का दखल भी नहीं चाहता। इराक का भी बंदोबस्त करना है, जहां सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद का काम पूरा नहीं हुआ है। और फिर अगर चीन से निपटना है, तो पश्चिमी देशों को अफगानिस्तान में किसी भी कीमत पर अपनी मौजूदगी बनाए रखनी होगी। हालांकि चीन ने इससे इनकार किया है, लेकिन ग्वादार में चीन के हित किसी से छिपे नहीं हैं। इसलिए यह सोचना मुश्किल है कि अमेरिका अफ-पाक इलाके से पूरी तरह हटना और चीनी मौजूदगी के लिए रास्ता साफ करना चाहेगा। क्वेटा शूरा पाकिस्तान में मौजूद है। पाकिस्तान तो खुद ही अपने घर में ही लड़ रहा है और उसके ताकतवर सैन्य प्रतिष्ठान पर दबाव है। उसके दफ्तरों और सुविधाओं पर कबाइली लड़ाकुओं और आत्मघाती हमलावरों के हमले जारी हैं। राजनीतिक लिहाज से भी अमेरिका दबाव में है। पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कियानी और आइएसआइ चीफ जनरल शुजा पाशा को नेशनल असेंबली में तलब किया जाना ही अपने आप में अभूतपूर्व है। यह राजनीतिक तथा सैन्य प्रतिष्ठानों के बीच टकराव का संकेत है, जिसमें अमेरिकी सहायता से या उसके बिना जीत सैन्य प्रतिष्ठान की ही होने वाली है। इन सब बातों से पाकिस्तान में बदलते या सुधरते हालात का संकेत नहीं मिलता। अफगानिस्तान में सेनाओं की प्रतीक स्वरूप कमी से भी न केवल पाकिस्तान बल्कि अफगानिस्तान के सभी पक्षों का अमेरिका और नाटो देशों की कीमत पर हौसला बढ़ेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
चीन के बढ़ते प्रभाव, मध्य एशिया में ऊर्जा की संभावनाएं, ईरान के परमाणु कार्यक्रम की खिलाफत, काबुल में कमजोर शासन, आंतकवाद को प्रश्रय देता विफल राष्ट्र पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान की जमीनी हकीकत-इन पेचीदा हालात के कारण अमेरिका अफगानिस्तान से वापसी की प्रक्रिया भले ही शुरू कर दे, किंतु वहां से जल्द वापस नहीं आएगा। अफगानिस्तान में करीब डेढ़ लाख सैनिकों को तैनात करने के बावजूद नाटो सेना को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। अफगानिस्तान के देहाती इलाकों में अभी भी तालिबान का जोर है। नई नीति के अनुसार अमेरिका अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण का काम नहीं करेगा। इस अधूरे कठिन काम में भारत सहित कुछ दूसरे देशों की सहायता ली जाएगी। अगर जोर उग्रवाद विरोधी ऑपरेशनों पर रहता है तो अमेरिका को अलकायदा, तालिबान, हक्कानी समूह, गुलबुद्दीन हिकमतयार गुट और ऐसी ही दूसरी ताकतों के विदेशी भाड़े के सैनिकों से निपटना होगा, जिन्हें पाक सेना द्वारा क्वेटा और उत्तर वजीरिस्तान जैसी जगहों पर सुरक्षित पनाह दी जा रही है। काम लंबा और कठिन है और इसे पूरा करने का एकमात्र रास्ता तालिबान के साथ वार्ता का है। खबर है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात की मदद से संपर्क कायम किए गए हैं, लेकिन किसी भी महत्वपूर्ण तालिबान के साथ वार्ता कहलाए जाने जैसी कोई बात नहीं हुई है। अमेरिका अफगान तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर से बात करने की कोशिश कर रहा है जो पाकिस्तान में क्वेटा या उसके आस-पास रह रहा है। बताया जाता है कि उसे दक्षिणी अफगानिस्तान का नियंत्रण सौंपने की पेशकश की गई है। लेकिन सवाल उठता है कि जो तालिबान उत्तर व पश्चिम में भी सेंध लगा चुका है, वह दक्षिणी इलाके के लिए ही क्यों राजी होगा? अफगानिस्तान के आस-पास के इलाकों पर अगर नजर दौड़ाएं तो अनुमान लगाने में देर नहीं लगेगी कि अमेरिका यहां क्यों बना रहना चाहेगा। अमेरिका पश्चिम एशिया के बीच एक अशांत परंतु महत्वपूर्ण इलाके में जमा हुआ है, जहां अरब देशों को अस्थिरता और अशांति का सामना करना पड़ रहा है, जिसे जैस्मीन क्रांति कहा जा रहा है। अफगानिस्तान के उत्तर में मध्य एशिया है, जहां हाइड्रोकार्बनों के मिलने की संभावनाएं हैं। अगर पश्चिमी देश वहां मौजूद न हों तो इसका सीधा फायदा रूस और चीन को मिलेगा। अमेरिका इस क्षेत्र में ईरान का दखल भी नहीं चाहता। इराक का भी बंदोबस्त करना है, जहां सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद का काम पूरा नहीं हुआ है। और फिर अगर चीन से निपटना है, तो पश्चिमी देशों को अफगानिस्तान में किसी भी कीमत पर अपनी मौजूदगी बनाए रखनी होगी। हालांकि चीन ने इससे इनकार किया है, लेकिन ग्वादार में चीन के हित किसी से छिपे नहीं हैं। इसलिए यह सोचना मुश्किल है कि अमेरिका अफ-पाक इलाके से पूरी तरह हटना और चीनी मौजूदगी के लिए रास्ता साफ करना चाहेगा। क्वेटा शूरा पाकिस्तान में मौजूद है। पाकिस्तान तो खुद ही अपने घर में ही लड़ रहा है और उसके ताकतवर सैन्य प्रतिष्ठान पर दबाव है। उसके दफ्तरों और सुविधाओं पर कबाइली लड़ाकुओं और आत्मघाती हमलावरों के हमले जारी हैं। राजनीतिक लिहाज से भी अमेरिका दबाव में है। पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कियानी और आइएसआइ चीफ जनरल शुजा पाशा को नेशनल असेंबली में तलब किया जाना ही अपने आप में अभूतपूर्व है। यह राजनीतिक तथा सैन्य प्रतिष्ठानों के बीच टकराव का संकेत है, जिसमें अमेरिकी सहायता से या उसके बिना जीत सैन्य प्रतिष्ठान की ही होने वाली है। इन सब बातों से पाकिस्तान में बदलते या सुधरते हालात का संकेत नहीं मिलता। अफगानिस्तान में सेनाओं की प्रतीक स्वरूप कमी से भी न केवल पाकिस्तान बल्कि अफगानिस्तान के सभी पक्षों का अमेरिका और नाटो देशों की कीमत पर हौसला बढ़ेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Saturday, June 18, 2011
Friday, June 17, 2011
Thursday, June 16, 2011
तमिल मुद्दे पर भारत और श्रीलंका के बीच टकराव
श्रीलंका में लंबे समय से चली आ रही तमिल समस्या को सुलझाने के लिए भारत की ओर से दिए गए प्रस्ताव पर श्रीलंका अमल करने को तैयार नहीं है। स्थानीय समाचार पत्र संडे टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यदि भारत ने इस मुद्दे पर अधिक दबाव डाला तो दोनों पक्षों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। श्रीलंका ने भारत से कहा कि वह उसकी राजनीतिक योजना के मुताबिक अपनी मुख्य भूमियों और पुलिस शक्ति को प्रांतीय परिषदों के हवाले नहीं करेगा। श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने शनिवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से कहा कि पुलिस की मुख्य शक्तियों और भूमि नियंत्रण को प्रांतीय परिषदों को नहीं सौंपा जा सकता। सत्ता हस्तांतरण के लिए इन परिषदों का गठन संविधान के 13वें संशोधन के तहत हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार भूमि का नियंत्रण और पुलिस शक्तियों को प्रांतीय परिषदें को नहीं सौंपने के सरकार के कठोर रवैये के कारण ऐसी आशंका है कि श्रीलंका और भारत के बीच कूटनीतिक तौर पर गतिरोध पैदा हो सकता है। दूसरी तरफ राजपक्षे से मुलाकात करने वाले शिवशंकर मेनन, विदेश सचिव निरुपमा राव और रक्षा सचिव प्रदीप कुमार ने ऐसी स्थिति पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। संडे टाइम्स के मुताबिक राजपक्षे की पार्टी यूनाइटेड पीपुल्स फ्रीडम एलांयस के कई सहयोगी प्रांतीय परिषदों को और ज्यादा शक्ति प्रदान करने का विरोध कर रहे हैं। राजपक्षे ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल से कहा कि संविधान के 13वें संशोधन के अनुसार उनकी सरकार संयुक्त सूची में आने वाले अन्य बहुत से विषयों पर छूट देने को तैयार है। इसके अलावा उन्होंने देश के उत्तरी और पूर्वी भाग से आपतकालीन नियंत्रण हटाए जाने की भी बात कही है। मेनन ने संवाददाताओं से कहा कि श्रीलंका ने संवैधानिक संशोधनों को सुधारने का वादा किया है और उन्होंने आशा जताई कि वह भारत की ओर से प्रस्तावित योजना को लागू करेगा।
वतन वापसी की गुहार लगा रहे भारतीय कामगार
तमाम सरकारी कोशिशों के बावजूद मध्य एशियाई मुल्कों में भारतीय कामगारों के शोषण का सिलसिला नहीं थम पा रहा है। हेल्प लाइन नंबर से लेकर द्विपक्षीय समझौते जैसे इंतजामों को बावजूद बेहतर रोजगार की आस में जा रहे भारतीयों के साथ धोखाधड़ी जारी है। ऐसे ही कुचक्र का शिकार बने उत्तर प्रदेश और बिहार के 17 कामगार इन दिनों रियाद में सड़क पर रहने को मजबूर हैं। निर्माण क्षेत्र से जुड़ी कंपनी अल कायद कांटै्रक्टिंग लिमिटेड से जुड़े बिहार में सासाराम के रहने वाले खुर्शीद आलम ने दैनिक जागरण को फोन पर बताया कि बीते डेढ़ साल से दक्षिण एशिया से आए 30 कामगारों का शोषण हो रहा है। इनमें से 23 भारतीय हैं जो वतन वापसी के लिए जिद्दोजहद कर रहे हैं। आलम आरोप लगाते हैं कि इस दौरान सऊदी श्रम अदालत से लेकर भारतीय दूतावास तक गुहार लगाने के बावजूद अपेक्षित मदद नहीं मिल रही है। इस संदर्भ में उन्होंने विदेश मंत्रालय में भी गुहार लगाई है। भारतीय कामगारों की शिकायत है कि अनुबंध की अवधि पूरी होने के बाद भी कंपनी का प्रबंधन न तो उन्हें छोड़ रहा है और न ही वेतन दे रहा है। वहीं कानूनी विवाद के बाद 26 मई को कंपनी प्रबंधन ने इन लोगों से रिहायशी सुविधा भी छीन ली जिसके बाद यह लोग सड़क पर रहने को मजबूर हैं जिनमें कुछ लोगों का स्वास्थ्य भी बिगड़ गया है। भारत से 2008 में सऊदी आए आलम कहते हैं कि प्रबंधन ने अनुबंध में तो उन्हें एक हजार सऊदी रियाल प्रतिमाह वेतन देने का वादा किया था। लेकिन न तो कभी उन्हें वादे के मुताबिक वेतन दिया गया और न ही हर माह भुगतान किया गया। बताया जाता है कि शोषण का शिकार हुए इन लोगों में से कुछ लोग तो पांच साल से इस तरह का बर्ताव भुगत रहे हैं। धोखाधड़ी का शिकार हुए कामगारों में उत्तरप्रदेश के 12, बिहार से पांच तथा आंध्रप्रदेश के दो तथा पश्चिम बंगाल व उत्तरांचल का एक व्यक्ति है। हालांकि इस तरह का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई बार वहीं वर्ष जी-20 श्रम मंत्रियों की बैठक के दौरान उठे शोषण के मामलों पर सऊदी अरब के श्रम मंत्री अब्दुल वाहैद के अल-हुमैद ने कहा था कि अक्सर अधिकारों की जानकारी न होने के कारण कामगार इसी स्थिति में फंसते हैं। उनका कहना था कि अधिकतर मामलों में कामगारों को उनके मुल्क से सऊदी भेजने वाली कंपनी असलियत छुपा लेती है जिसके कारण समस्या बढ़ती है। उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब में भारत के करीब 20 लाख कामगार हैं। यह पहली बार नहीं है कि भारतीय कामगारों के साथ वहां की कंपनियों ने धोखाधड़ी की हो।
तमिल मुद्दे पर भारत और श्रीलंका के बीच टकराव
श्रीलंका में लंबे समय से चली आ रही तमिल समस्या को सुलझाने के लिए भारत की ओर से दिए गए प्रस्ताव पर श्रीलंका अमल करने को तैयार नहीं है। स्थानीय समाचार पत्र संडे टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यदि भारत ने इस मुद्दे पर अधिक दबाव डाला तो दोनों पक्षों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। श्रीलंका ने भारत से कहा कि वह उसकी राजनीतिक योजना के मुताबिक अपनी मुख्य भूमियों और पुलिस शक्ति को प्रांतीय परिषदों के हवाले नहीं करेगा। श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने शनिवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से कहा कि पुलिस की मुख्य शक्तियों और भूमि नियंत्रण को प्रांतीय परिषदों को नहीं सौंपा जा सकता। सत्ता हस्तांतरण के लिए इन परिषदों का गठन संविधान के 13वें संशोधन के तहत हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार भूमि का नियंत्रण और पुलिस शक्तियों को प्रांतीय परिषदें को नहीं सौंपने के सरकार के कठोर रवैये के कारण ऐसी आशंका है कि श्रीलंका और भारत के बीच कूटनीतिक तौर पर गतिरोध पैदा हो सकता है। दूसरी तरफ राजपक्षे से मुलाकात करने वाले शिवशंकर मेनन, विदेश सचिव निरुपमा राव और रक्षा सचिव प्रदीप कुमार ने ऐसी स्थिति पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। संडे टाइम्स के मुताबिक राजपक्षे की पार्टी यूनाइटेड पीपुल्स फ्रीडम एलांयस के कई सहयोगी प्रांतीय परिषदों को और ज्यादा शक्ति प्रदान करने का विरोध कर रहे हैं। राजपक्षे ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल से कहा कि संविधान के 13वें संशोधन के अनुसार उनकी सरकार संयुक्त सूची में आने वाले अन्य बहुत से विषयों पर छूट देने को तैयार है। इसके अलावा उन्होंने देश के उत्तरी और पूर्वी भाग से आपतकालीन नियंत्रण हटाए जाने की भी बात कही है। मेनन ने संवाददाताओं से कहा कि श्रीलंका ने संवैधानिक संशोधनों को सुधारने का वादा किया है और उन्होंने आशा जताई कि वह भारत की ओर से प्रस्तावित योजना को लागू करेगा।
वतन वापसी की गुहार लगा रहे भारतीय कामगार
तमाम सरकारी कोशिशों के बावजूद मध्य एशियाई मुल्कों में भारतीय कामगारों के शोषण का सिलसिला नहीं थम पा रहा है। हेल्प लाइन नंबर से लेकर द्विपक्षीय समझौते जैसे इंतजामों को बावजूद बेहतर रोजगार की आस में जा रहे भारतीयों के साथ धोखाधड़ी जारी है। ऐसे ही कुचक्र का शिकार बने उत्तर प्रदेश और बिहार के 17 कामगार इन दिनों रियाद में सड़क पर रहने को मजबूर हैं। निर्माण क्षेत्र से जुड़ी कंपनी अल कायद कांटै्रक्टिंग लिमिटेड से जुड़े बिहार में सासाराम के रहने वाले खुर्शीद आलम ने दैनिक जागरण को फोन पर बताया कि बीते डेढ़ साल से दक्षिण एशिया से आए 30 कामगारों का शोषण हो रहा है। इनमें से 23 भारतीय हैं जो वतन वापसी के लिए जिद्दोजहद कर रहे हैं। आलम आरोप लगाते हैं कि इस दौरान सऊदी श्रम अदालत से लेकर भारतीय दूतावास तक गुहार लगाने के बावजूद अपेक्षित मदद नहीं मिल रही है। इस संदर्भ में उन्होंने विदेश मंत्रालय में भी गुहार लगाई है। भारतीय कामगारों की शिकायत है कि अनुबंध की अवधि पूरी होने के बाद भी कंपनी का प्रबंधन न तो उन्हें छोड़ रहा है और न ही वेतन दे रहा है। वहीं कानूनी विवाद के बाद 26 मई को कंपनी प्रबंधन ने इन लोगों से रिहायशी सुविधा भी छीन ली जिसके बाद यह लोग सड़क पर रहने को मजबूर हैं जिनमें कुछ लोगों का स्वास्थ्य भी बिगड़ गया है। भारत से 2008 में सऊदी आए आलम कहते हैं कि प्रबंधन ने अनुबंध में तो उन्हें एक हजार सऊदी रियाल प्रतिमाह वेतन देने का वादा किया था। लेकिन न तो कभी उन्हें वादे के मुताबिक वेतन दिया गया और न ही हर माह भुगतान किया गया। बताया जाता है कि शोषण का शिकार हुए इन लोगों में से कुछ लोग तो पांच साल से इस तरह का बर्ताव भुगत रहे हैं। धोखाधड़ी का शिकार हुए कामगारों में उत्तरप्रदेश के 12, बिहार से पांच तथा आंध्रप्रदेश के दो तथा पश्चिम बंगाल व उत्तरांचल का एक व्यक्ति है। हालांकि इस तरह का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई बार वहीं वर्ष जी-20 श्रम मंत्रियों की बैठक के दौरान उठे शोषण के मामलों पर सऊदी अरब के श्रम मंत्री अब्दुल वाहैद के अल-हुमैद ने कहा था कि अक्सर अधिकारों की जानकारी न होने के कारण कामगार इसी स्थिति में फंसते हैं। उनका कहना था कि अधिकतर मामलों में कामगारों को उनके मुल्क से सऊदी भेजने वाली कंपनी असलियत छुपा लेती है जिसके कारण समस्या बढ़ती है। उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब में भारत के करीब 20 लाख कामगार हैं। यह पहली बार नहीं है कि भारतीय कामगारों के साथ वहां की कंपनियों ने धोखाधड़ी की हो।
Wednesday, June 15, 2011
अमेरिका की दुविधा
ओसामा बिन लादेन की मौत से एक नए युग की शुरुआत हुई है, जिसमें आतंक के खिलाफ दुनिया की लड़ाई के बारे में 11 सितंबर, 2001 के बाद अपनाई जा रही अमेरिकी नीति की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है। पिछले दस सालों से दोस्त और दुश्मन के बीच फर्क करने का एकमात्र आधार यह था कि कोई देश ओसामा की तलाश में मदद कर रहा है या रोड़े अटका रहा है। अब जबकि ओसामा नहीं रहा है, भारत को नजर रखनी होगी कि बराक ओबामा अमेरिका को किस प्रकार एक नई दिशा में ले जाते हैं, ताकि दुनिया से आतंकवाद का खतरा मिट सके। उन्हें फिर से एशिया की ओर ध्यान देना होगा, जहां उनके देश का भविष्य मौजूद है। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पाकिस्तान में मौजूद परमाणु हथियार तालिबान के हाथ न पड़ जाएं। अगर ऐसा हुआ तो पूरे एशिया की तस्वीर ही बदल जाएगी। अशांति, असुरक्षा और पश्चिमी देशों के खिलाफ हिंसा के आज के इस दौर में लादेन का मारा जाना एक महत्वपूर्ण घटना है। इसका सबसे अधिक असर यह हुआ है कि आज अनेक खूंखार आतंकवादी अपनी जान बचाने के लिए भागते फिर रहे हैं। ऐसा ही एक आतंकी दाऊद इब्राहीम है, जिसका आइएसआइ की मदद वाला व्यापक नेटवर्क है। 1993 से पहले दाऊद का धंधा केवल तस्करी और जबरन वसूली तक ही सीमित था, लेकिन आज वह न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन गया है। आइएसआइ के साथ उसके संबंध 1993 में मुंबई विस्फोटों में उसका हाथ होने के बाद से बने हुए हैं। बाद में वह आइएसआइ को साजो-सामान मुहैया कराने लगा। मुख्य ऑपरेटर की भूमिका अब आइएसआइ की दूसरी शाखा लश्करे-तैयबा द्वारा निभाई जा रही है। लेकिन लश्कर भी भारत से, खास तौर से गुजरात और महाराष्ट्र से, नए रंगरूट भरती करने के लिए उसी पर निर्भर है। ओसामा के बाद सबसे खतरनाक आतंकवादी दाऊद है। लश्कर के साथ उसके जगजाहिर संबंध और भी खतरनाक हो गए हैं, क्योंकि लश्कर और अलकायदा के बीच सहयोग लगातार बढ़ रहा है। पहले तो भारत के लिए उसका महत्व अधिक था, क्योंकि लश्कर का सारा ध्यान भारत की ओर ही था। लेकिन पिछले दस सालों में उसकी दिलचस्पी पश्चिमी देशों में अधिक बढ़ गई है, जिसका संकेत पश्चिमी देशों में हमलों की बढ़ती संख्या में देखा जा सकता है। इन बातों से घबरा कर अमेरिका ने 2003 में उसे विशेष विश्व आतंकवादी घोषित कर दिया था। पिछले साल जनवरी में अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में दाऊद और उसके गिरोह को दक्षिण एशिया में अमेरिकी हितों के लिए सीधा खतरा बताया गया था। चिंता की बात तो यह है कि ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद लश्कर पर अलकायदा की निर्भरता बढ़ सकती है। वह दाऊद को दक्षिण एशिया से अफ्रीका तक फैले उसके विशाल नेटवर्क का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए करने के लिए राजी कर सकता है। अमेरिका को इस बात का ध्यान रखना होगा और तत्काल कार्रवाई करनी होगी। यह भारत के लिए अच्छा संकेत हो सकता है। अब भारत-पाकिस्तान-अमेरिका-चीन रिश्तों में नया मोड़ आ सकता है। पाकिस्तान दोहरा खेल खेल रहा है। 1950 से वह अमेरिका से भारी मात्रा में सैन्य तथा आर्थिक सहायता ले रहा है। आज अमेरिकी सेनाओं का पाकिस्तान में छावनियों पर असरदार नियंत्रण है। साथ-साथ पाकिस्तान ने चीन से भी अच्छे संबंध कायम कर लिए हैं। चीन ने पाकिस्तान को आर्थिक, सैन्य और तकनीकी सहायता दी है और दोनों ही सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मित्र देश बन गए हैं। अब अमेरिका को चीन के मित्र पाकिस्तान या भारत में से किसी एक को चुनना होगा। शायद भारत के लिए यह एक अच्छा मौका है। अमेरिका से नजदीकियों से उसे सैन्य तथा आर्थिक शक्ति हासिल हो सकती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
शिकागो फैसले के तीन सबक
लेखक तहव्वुर राणा के संदर्भ में अदालत के फैसले में पाक और अमेरिका के समीकरणों की भूमिका देख रहे हैं…
तहव्वुर राणा को मुंबई हमले में लिप्त होने के आरोप से बरी करने के शिकागो अदालत के फैसले से भारत को तीन महत्वपूर्ण सबक मिले हैं। पहला तो यह कि नई दिल्ली को यह अपेक्षा ही नहीं रखनी चाहिए थी कि मुंबई हमलों के दोषियों को सजा दिलाने के लिए अमेरिका आइएसआइ की भूमिका को कठघरे में खड़ा करेगा। अमेरिका की विदेश नीति के अपने हित और मजबूरियां हैं। ओसामा बिन लादेन को मारने के बाद से अमेरिका पाकिस्तान में चार प्रतिनिधिमंडल भेज चुका है, जिसमें विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के नेतृत्व में भेजा गया प्रतिनिधिमंडल भी शामिल है। इन ताबड़तोड़ दौरों का मंतव्य पाकिस्तान से अपने रिश्तों को सुधारना है। वास्तव में सीआइए के निदेशक लियोन पेनेटा, जो पहली जुलाई को रॉबर्ट गेट्स के स्थान पर रक्षा मंत्री बनने जा रहे हैं, ने इस्लामाबाद को एक सकारात्मक संदेश दिया था कि अमेरिका भरोसेमंद और रचनात्मक संबंधों की पुनस्र्थापना चाहता है। वाशिंगटन पाकिस्तान के आतंकवाद से लड़ने के प्रयासों से खुश नहीं है, किंतु फिर भी तीसरे देश भारत में आइएसआइ की आतंक में भूमिका को रेखांकित करने का काम वह सबसे अंत में ही करना चाहेगा। फिलहाल तो सीआइए को आइएसआइ की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है, क्योंकि अमेरिका अफगान तालिबान के साथ हाथ मिलाना चाहता है, जिसका शीर्ष नेतृत्व पाकिस्तान में छिपा हुआ है। दूसरा सबक खुद शिकागो मुकदमे के बारे में है। अभियोजन पक्ष फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन (एफबीआइ) के गूढ़ राजनीतिक लक्ष्य हैं। वह तहव्वुर राणा को मुंबई हमले के आरोप के बजाय इससे कम गंभीर डेनमार्क संबंधी आरोपों में दोषी ठहराना चाहता था। यही नहीं, अभियोजन अपने स्टार गवाह डेविड हेडली के माध्यम से आइएसआइ के आला अधिकारियों को मुंबई हमले से संबद्ध नहीं दर्शाना चाहता था। हेडली को निर्देश देने वाले एक कनिष्ठ आइएसआइ अधिकारी मेजर इकबाल को दोषी ठहराया गया। अभियोजन पक्ष ने जरा भी प्रयास नहीं किया कि इस मामले की तह तक जाकर मुंबई हमले में आइएसआइ के बड़े अधिकारियों की संलिप्तता सिद्ध करे। असलियत में हेडली ने यह दावा करके अपने बयान का ही खंडन कर दिया कि आइएसआइ के बड़े अधिकारियों को मुंबई हमले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। फिर भी इसने स्वीकार किया कि इकबाल का कमांडिंग अधिकारी और आइएसआइ का संबंधित विभाग मुंबई हमले की योजना के बारे में जानता था। यद्यपि इस मुकदमे से यह बात तो सिद्ध हो ही जाती है कि पाकिस्तानी सेना के वर्तमान व पूर्व अधिकारी लश्करे-तैयबा की सहायता कर रहे थे। एफबीआइ इकबाल से आगे अन्य अधिकारियों की भूमिका की तह तक नहीं जाना चाहती थी। अभियोजन ने एक लश्कर नेता साजिद मीर के पूर्व के सैन्य संबंधों की पड़ताल से भी मना कर दिया। साजिद मीर ही मंुबई हमले के दौरान आतंकियों को लोगों को मारने का निर्देश दे रहा था। मूल सवाल की पड़ताल ही नहीं की गई कि अगर एफबीआइ हेडली को आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहने से समय पर रोक पाती तो क्या मुंबई हमले को रोका जा सकता था? हेडली के लश्कर के साथ संबंधों को लेकर सात साल में छह चेतावनी मिलने के बाद भी एफबीआइ ने हेडली को गिरफ्तार नहीं किया, क्योंकि वह अमेरिकी एजेंट के रूप में काम कर रहा था। पूर्व ड्रग तस्कर हेडली आठवें और नवें दशक में गिरफ्तार भी हो चुका था। मुंबई हमले के बाद भी एफबीआइ ने उसे तब तक अपने साथ रखा जब तक पैगंबर मुहम्मद का कार्टून छापने वाले डेनमार्क के एक अखबार पर 2009 में उसने हमले का षडयंत्र नहीं रचा। एफबीआइ ने हेडली के अमेरिकी खुफिया एजेंसी से रिश्तों के संबंध में साक्ष्यों को किसी दुर्घटनावश नहीं दबाया था। इस तरह यह महत्वपूर्ण सवाल यक्ष प्रश्न ही बनकर रह गया कि क्या मुंबई हमलों को रोका जा सकता था? शिकागो फैसला हेडली को लेकर भारत और अमेरिका के बीच पुराने घावों को फिर से हरा कर सकता है। इनमें हेडली की समय से गिरफ्तारी न करना और उससे हासिल महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी को भारत के साथ साझा न करना शामिल है। यही नहीं, 2009 में शिकागो में उसकी गिरफ्तारी के भी काफी समय बाद ही अमेरिकी अधिकारियों ने भारत को उससे सीमित पूछताछ की इजाजत दी। हेडली को दी गई रियायत के कारण ही वह मृत्युदंड और भारत में प्रत्यर्पण से बच पाया। मुंबई हमलों के दोषियों की रिहाई का न्यूयॉर्क में आइएसआइ के खिलाफ चल रहे एक मामले पर भी असर पड़ेगा। इस मामले में आइएसआइ प्रमुख को प्रतिवादी बनाया गया है। इससे इस्लामाबाद को वाशिंगटन के साथ सौदेबाजी का मौका मिल गया। तीसरा सबक है मुंबई में दुस्साहसिक हमले के दोषियों को सजा दिलाने के प्रति भारत की धीमी प्रतिक्रिया। मुंबई हमले के बाद भारत ने छोटे से छोटा कदम भी नहीं उठाया। इसके बजाय इसने एक नए तरह के साक्ष्य बमों पर भरोसा किया। नई दिल्ली ने पाकिस्तान स्थित आतंकियों की सूची भी जारी की। क्या इस तरह के नौकरशाही अभ्यास के बल पर पाकिस्तान अपने सामरिक लाभ को छोड़ देगा और उस विदेश नीति को त्याग देगा जो जिहादी एडवेंचर पर निर्भर है? इसका जवाब हाल ही में पाकिस्तानी विदेश सचिव ने दिया है कि ये पुलिंदे साक्ष्य के बजाय दिलचस्प साहित्य हैं। वास्तव में, लादेन की मौत के बाद उन्होंने भारत की इस मांग की खिल्ली उड़ाई कि इस्लामाबाद को मुंबई हमले के तमाम दोषियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ मामला चलाना चाहिए। कुल मिलाकर बाजी पाकिस्तान के हाथ ही रही है। पाकिस्तान में रह रहे मुंबई हमले के किसी भी दोषी को छुआ तक नहीं गया है और भारत सीमा के करीब आतंकी शिविर भी पहले की तरह जारी हैं। इसके बाद भी राजनीतिक वार्ता शुरू करके भारत जहां से चला था, वहीं पहुंच गया है। अमेरिकी असिस्टेंट सेक्रेटरी रॉबर्ट ब्लैक ने दोनों प्रमुख मांगें छोड़ने के कारण भारत को धन्यवाद दिया था। ये मांगें थीं-मुंबई हमले के दोषियों को गिरफ्तार कर उन्हें सजा दिलाई जाए तथा सीमापार से आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाया जाए। मुंबई हमले में आइएसआइ और नौसेना सहित पाकिस्तानी सरकारी एजेंसियों की भूमिका स्पष्ट है। मुंबई हमले पर पाकिस्तान को खुला छोड़ देने वाले भारतीय नीति निर्माताओं को जनता के सामने दोषी ठहराने का यह सही समय है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
तहव्वुर राणा को मुंबई हमले में लिप्त होने के आरोप से बरी करने के शिकागो अदालत के फैसले से भारत को तीन महत्वपूर्ण सबक मिले हैं। पहला तो यह कि नई दिल्ली को यह अपेक्षा ही नहीं रखनी चाहिए थी कि मुंबई हमलों के दोषियों को सजा दिलाने के लिए अमेरिका आइएसआइ की भूमिका को कठघरे में खड़ा करेगा। अमेरिका की विदेश नीति के अपने हित और मजबूरियां हैं। ओसामा बिन लादेन को मारने के बाद से अमेरिका पाकिस्तान में चार प्रतिनिधिमंडल भेज चुका है, जिसमें विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के नेतृत्व में भेजा गया प्रतिनिधिमंडल भी शामिल है। इन ताबड़तोड़ दौरों का मंतव्य पाकिस्तान से अपने रिश्तों को सुधारना है। वास्तव में सीआइए के निदेशक लियोन पेनेटा, जो पहली जुलाई को रॉबर्ट गेट्स के स्थान पर रक्षा मंत्री बनने जा रहे हैं, ने इस्लामाबाद को एक सकारात्मक संदेश दिया था कि अमेरिका भरोसेमंद और रचनात्मक संबंधों की पुनस्र्थापना चाहता है। वाशिंगटन पाकिस्तान के आतंकवाद से लड़ने के प्रयासों से खुश नहीं है, किंतु फिर भी तीसरे देश भारत में आइएसआइ की आतंक में भूमिका को रेखांकित करने का काम वह सबसे अंत में ही करना चाहेगा। फिलहाल तो सीआइए को आइएसआइ की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है, क्योंकि अमेरिका अफगान तालिबान के साथ हाथ मिलाना चाहता है, जिसका शीर्ष नेतृत्व पाकिस्तान में छिपा हुआ है। दूसरा सबक खुद शिकागो मुकदमे के बारे में है। अभियोजन पक्ष फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन (एफबीआइ) के गूढ़ राजनीतिक लक्ष्य हैं। वह तहव्वुर राणा को मुंबई हमले के आरोप के बजाय इससे कम गंभीर डेनमार्क संबंधी आरोपों में दोषी ठहराना चाहता था। यही नहीं, अभियोजन अपने स्टार गवाह डेविड हेडली के माध्यम से आइएसआइ के आला अधिकारियों को मुंबई हमले से संबद्ध नहीं दर्शाना चाहता था। हेडली को निर्देश देने वाले एक कनिष्ठ आइएसआइ अधिकारी मेजर इकबाल को दोषी ठहराया गया। अभियोजन पक्ष ने जरा भी प्रयास नहीं किया कि इस मामले की तह तक जाकर मुंबई हमले में आइएसआइ के बड़े अधिकारियों की संलिप्तता सिद्ध करे। असलियत में हेडली ने यह दावा करके अपने बयान का ही खंडन कर दिया कि आइएसआइ के बड़े अधिकारियों को मुंबई हमले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। फिर भी इसने स्वीकार किया कि इकबाल का कमांडिंग अधिकारी और आइएसआइ का संबंधित विभाग मुंबई हमले की योजना के बारे में जानता था। यद्यपि इस मुकदमे से यह बात तो सिद्ध हो ही जाती है कि पाकिस्तानी सेना के वर्तमान व पूर्व अधिकारी लश्करे-तैयबा की सहायता कर रहे थे। एफबीआइ इकबाल से आगे अन्य अधिकारियों की भूमिका की तह तक नहीं जाना चाहती थी। अभियोजन ने एक लश्कर नेता साजिद मीर के पूर्व के सैन्य संबंधों की पड़ताल से भी मना कर दिया। साजिद मीर ही मंुबई हमले के दौरान आतंकियों को लोगों को मारने का निर्देश दे रहा था। मूल सवाल की पड़ताल ही नहीं की गई कि अगर एफबीआइ हेडली को आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहने से समय पर रोक पाती तो क्या मुंबई हमले को रोका जा सकता था? हेडली के लश्कर के साथ संबंधों को लेकर सात साल में छह चेतावनी मिलने के बाद भी एफबीआइ ने हेडली को गिरफ्तार नहीं किया, क्योंकि वह अमेरिकी एजेंट के रूप में काम कर रहा था। पूर्व ड्रग तस्कर हेडली आठवें और नवें दशक में गिरफ्तार भी हो चुका था। मुंबई हमले के बाद भी एफबीआइ ने उसे तब तक अपने साथ रखा जब तक पैगंबर मुहम्मद का कार्टून छापने वाले डेनमार्क के एक अखबार पर 2009 में उसने हमले का षडयंत्र नहीं रचा। एफबीआइ ने हेडली के अमेरिकी खुफिया एजेंसी से रिश्तों के संबंध में साक्ष्यों को किसी दुर्घटनावश नहीं दबाया था। इस तरह यह महत्वपूर्ण सवाल यक्ष प्रश्न ही बनकर रह गया कि क्या मुंबई हमलों को रोका जा सकता था? शिकागो फैसला हेडली को लेकर भारत और अमेरिका के बीच पुराने घावों को फिर से हरा कर सकता है। इनमें हेडली की समय से गिरफ्तारी न करना और उससे हासिल महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी को भारत के साथ साझा न करना शामिल है। यही नहीं, 2009 में शिकागो में उसकी गिरफ्तारी के भी काफी समय बाद ही अमेरिकी अधिकारियों ने भारत को उससे सीमित पूछताछ की इजाजत दी। हेडली को दी गई रियायत के कारण ही वह मृत्युदंड और भारत में प्रत्यर्पण से बच पाया। मुंबई हमलों के दोषियों की रिहाई का न्यूयॉर्क में आइएसआइ के खिलाफ चल रहे एक मामले पर भी असर पड़ेगा। इस मामले में आइएसआइ प्रमुख को प्रतिवादी बनाया गया है। इससे इस्लामाबाद को वाशिंगटन के साथ सौदेबाजी का मौका मिल गया। तीसरा सबक है मुंबई में दुस्साहसिक हमले के दोषियों को सजा दिलाने के प्रति भारत की धीमी प्रतिक्रिया। मुंबई हमले के बाद भारत ने छोटे से छोटा कदम भी नहीं उठाया। इसके बजाय इसने एक नए तरह के साक्ष्य बमों पर भरोसा किया। नई दिल्ली ने पाकिस्तान स्थित आतंकियों की सूची भी जारी की। क्या इस तरह के नौकरशाही अभ्यास के बल पर पाकिस्तान अपने सामरिक लाभ को छोड़ देगा और उस विदेश नीति को त्याग देगा जो जिहादी एडवेंचर पर निर्भर है? इसका जवाब हाल ही में पाकिस्तानी विदेश सचिव ने दिया है कि ये पुलिंदे साक्ष्य के बजाय दिलचस्प साहित्य हैं। वास्तव में, लादेन की मौत के बाद उन्होंने भारत की इस मांग की खिल्ली उड़ाई कि इस्लामाबाद को मुंबई हमले के तमाम दोषियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ मामला चलाना चाहिए। कुल मिलाकर बाजी पाकिस्तान के हाथ ही रही है। पाकिस्तान में रह रहे मुंबई हमले के किसी भी दोषी को छुआ तक नहीं गया है और भारत सीमा के करीब आतंकी शिविर भी पहले की तरह जारी हैं। इसके बाद भी राजनीतिक वार्ता शुरू करके भारत जहां से चला था, वहीं पहुंच गया है। अमेरिकी असिस्टेंट सेक्रेटरी रॉबर्ट ब्लैक ने दोनों प्रमुख मांगें छोड़ने के कारण भारत को धन्यवाद दिया था। ये मांगें थीं-मुंबई हमले के दोषियों को गिरफ्तार कर उन्हें सजा दिलाई जाए तथा सीमापार से आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाया जाए। मुंबई हमले में आइएसआइ और नौसेना सहित पाकिस्तानी सरकारी एजेंसियों की भूमिका स्पष्ट है। मुंबई हमले पर पाकिस्तान को खुला छोड़ देने वाले भारतीय नीति निर्माताओं को जनता के सामने दोषी ठहराने का यह सही समय है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
विकिरण के प्रभाव से जापान में जन्मा बिना कानों का खरगोश
जापान में गत मार्च में भीषण भूकंप और सुनामी से क्षतिग्रस्त हुए फुकुशिमा परमाणु संयंत्र से उत्पन्न परमाणु संकट का असर जीव-जन्तुओं पर नजर आने लगा है। इस संयंत्र के पास एक खरगोश बिना कानों के पैदा हुआ है। माना जा रहा है कि संयंत्र से निकलने वाले खतरनाक रेडियोधर्मी विकिरण के दुष्प्रभाव के कारण ऐसा हुआ है। इस घटना ने विशेषज्ञों और अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है। फुकुशिमा के पास नेमी कस्बे में रहने वाले खरगोश के मालिक युको सुगिमोतो ने बताया कि उसका जन्म सात मई को हुआ था। उसे बिना कान का देखकर सभी अचंभित थे। इस कस्बे को भी विकिरण के खतरे से प्रभावित होने वाले संभावित इलाकों में शामिल किया गया था। युको ने साप्ताहिक पत्रिका फ्लैश से बातचीत में बताया कि मैं 10 साल से खरगोश पाल रहा हूं, लेकिन ऐसी घटना पहली बार देखने को मिली। कान नहीं होने के अलावा खरगोश में रंगहीनता (एलबिनिज्म) के भी लक्षण दिख रहे हैं। इसमें त्वचा एकदम सफेद होने के अलावा आंखों का रंग लाल दिखता है। कई बार यह बीमारी जींस में आए परिवर्तन के कारण भी होती है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों ने यह मानने से इंकार कर दिया है कि खरगोश में विकिरण के कारण ऐसा हुआ है। उनका कहना है कि जानवरों में ऐसी विकृति होना कोई बड़ी बात नहीं है।
अफ्रीकी संघ के प्रस्ताव लागू करेगी लीबिया सरकार
लीबिया सरकार ने सोमवार को कहा कि वह लीबिया में संघर्ष खत्म करने के लिए अफ्रीकी संघ द्वारा दिए गए सभी प्रस्तावों को क्रियान्वित करेगी। लीबिया की सरकारी समाचार एजेंसी जेना न्यूज के मुताबिक, लीबिया सरकार ने कहा कि वह सभी प्रस्तावों को क्रियान्वित करने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए सकारात्मक तरीके से सहयोग करेगी। प्रस्तावों के क्रियान्वयन के लिए उसने एक कार्यदल का गठन किया है। अफ्रीकी संघ ने लीबिया में संघर्ष विराम के लिए एक योजना प्रस्तुत की है, लेकिन इसमें पिछले 40 वर्षो से सत्ता पर काबिज कर्नल मुअम्मर गद्दाफी को सत्ता से हटाने का जिक्र नहीं है। जबकि लोकतंत्र समर्थकों का कहना है कि लीबिया में संकट की स्थिति समाप्त करने की किसी भी योजना में गद्दाफी के सत्ता छोड़ने की शर्त शामिल होनी चाहिए। इससे पहले भी लीबिया में संघर्ष विराम के कई प्रयास किए जा चुके हैं, लेकिन सभी असफल रहे। फरवरी से यहां लोकतंत्र समर्थकों और गद्दाफी की सेनाओं के बीच संघर्ष जारी है। नाटो सेनाएं भी गद्दाफी को अपदस्थ करने के लिए लगातार उनके ठिकानों पर हमले कर रही हैं। अब जर्मनी ने भी लीबिया के विद्रोहियों को मान्यता दी बर्लिन : जर्मनी ने लीबियाई विद्रोहियों की राष्ट्रीय परिवर्तन परिषद को आधिकारिक मान्यता दे दी है। जर्मन विदेश मंत्री गुइडो वेस्टरवेल ने लीबिया का औचक दौरा करने के बाद अपनी सरकार के नए रुख का एलान किया। उन्होंने कहा कि विद्रोहियों की परिषद वहां की जनता की असल प्रतिनिधि है। वेस्टरवेल ने कहा, हम तटस्थ नहीं है, लेकिन हम लोकतंत्र और स्वतंत्रता के पक्ष में हैं। जर्मनी ने लीबिया में नाटो के सैन्य अभियान में शामिल होने से इंकार कर दिया था।
अमेरिका ने हेडली से सौदेबाजी का किया बचाव
मुंबई हमले के साजिशकर्ता पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकी डेविड कोलमैन हेडली के साथ डील का अमेरिकी अभियोजन पक्ष ने बचाव किया है। डील के मुताबिक गवाह बनने के बदले उसे न तो उसे मौत की सजा दी जा सकती है और न ही उसे भारत, पाकिस्तान और डेनमार्क को प्रत्यर्पित किया जा सकता है। पिछले सप्ताह शिकागो की अदालत में चले मुकदमे के मुख्य अभियोजक का कहना है कि हेडली के पास से मिली जानकारियां अमूल्य हैं और उसे भविष्य में भी आतंकी मुकदमों में गवाह के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। शिकागो की अदालत ने पिछले दिनों हेडली की गवाही के बावजूद मुंबई हमले के आरोपों में पाकिस्तानी मूल के कनाडाई नागरिक तहव्वुर राणा को बरी कर दिया था। जबकि उसे पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की मदद करने और डेनमार्क में हमले की साजिश रचने के आरोपों में दोषी ठहराया गया। राणा के वकील ने जिरह के दौरान कोर्ट में कहा था कि अभियोजन पक्ष द्वारा राणा के खिलाफ एक पूर्व ड्रग डीलर और डीईए के मुखबिर हेडली का इस्तेमाल वैसे ही जैसे एक छोटी मछली को पकड़ने के लिए व्हेल का प्रयोग करना। प्रोपब्लिका के साथ फोन पर बातचीत में अमेरिकी अटार्नी पैट्रिक फिट्जगेराल्ड ने कहा कि आतंकी संगठनों और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के अंदरुनी क्रियाकलापों के बारे में हेडली ने जो सूचनाएं दी हैं वे अप्रत्याशित हैं। मुंबई हमले के मास्टरमाइंड लश्कर-ए-तैयबा के साजिद मीर और अल कायदा प्रमुख इलियास कश्मीरी जैसे भगोड़ों के खिलाफ भविष्य में चलने वाले मुकदमों में हेडली की मदद ली जाएगी। हालांकि फिट्जगेराल्ड ने हेडली का मार्गदर्शन करने वाले आइएसआइ के अधिकारी मेजर इकबाल के बारे में कोई भी जानकारी राजनीतिक रूप से संवेदनशील बताते हुए देने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि राणा के अलावा भी हेडली से काफी सूचनाएं मिली हैं। इस तरह के शख्स के साथ समझौता न कर हम गलती करते, जिसका न सिर्फ इलियास कश्मीरी बल्कि साजिद मीर और मेजर इकबाल के साथ मेलजोल था। उसके पास आतंकी संगठनों और उनकी साजिशों के बारे में बहुतायत जानकारी है। उसने हमें भारत में 34 अन्य जगहों के बारे में बताया, जो कि आतंकियों के निशाने पर थे। वहीं, राणा के वकील चार्ली स्विफ्ट ने फोन पर बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि हेडली ने राणा को गलत तरीके से फंसाया और सरकार को भी मूर्ख बनाया। स्विफ्ट ने कहा कि इसमें संदेह है कि पाकिस्तान में बैठे मुख्य संदिग्धों के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकेगा। एफबीआइ के पास मेजर इकबाल और दूसरे मास्टरमाइंड से जुड़ी काफी जानकारियां हैं, पर उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए अमेरिकी दबाव का पाकिस्तान ने विरोध किया है। लश्कर ने दिखाए थे गुजरात दंगे के वीडियो वाशिंगटन, एजेंसी : पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने मुंबई आतंकी हमले के सह आरोपी डेविड हेडली को भारत के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए 2002 के गुजरात दंगों के वीडियो दिखाए थे। पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकी हेडली उर्फ दाऊद गिलानी ने पिछले दिनों शिकागो की अदालत में अपने बयान में कहा था कि गुजरात दंगों को लेकर उनके बीच अक्सर चर्चा होती थी। लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने हेडली को आतंकी अभियानों के लिए प्रशिक्षित किया था। सरकारी वकील द्वारा हेडली से यह पूछे जाने पर कि क्या गुजरात दंगों ने उसे भारत के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए प्रेरित किया तो उसने इसका जवाब हां में दिया था।
चीन और वियतनाम के बीच समुद्री सीमा पर तनाव बढ़ा
चीन के साथ विवादित समुद्री सीमा को लेकर बढ़ते तनाव के बीच वियतनाम दक्षिणी चीन सागर में गोलीबारी के साथ नौसैनिक अभ्यास कर रहा है। वियतनाम के एक नौसैनिक अधिकारी ने कहा कि नौसेना का नियमित अभ्यास मध्य वियतनाम के क्वांग प्रांत से 40 किलोमीटर दूर एक छोटे से द्वीप हॉन ओंग में किया गया है जो कि वियतनाम की समुद्री सीमा के भीतर है। चीन के सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स ने इसकी निंदा करते हुए कहा कि वियतनाम सैनिक कार्रवाई करके चीन को ललकारने की कोशिश कर रहा है। वियतनाम के एक अधिकारी के मुताबिक नौसैनिक अभ्यास का दूसरा चरण रात्रि में किया जाएगा और इसके लिए जहाजों का आवागमन रोकने की चेतावनी जारी कर दी गई है। विवाद गहराया वियतनाम का नौसैनिक अभ्यास ऐसे समय हुआ है जब समुद्री सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से चला रहा विवाद गहराया हुआ है। दक्षिणी चीनी सागर से होकर महत्वपूर्ण नौवहन मार्ग गुजरते हैं और यहां तेल और गैस के भंडार होने की भी संभावना है। वियतनाम ने पिछले महीने तेल का सर्वेक्षण करने वाले जहाजों का अन्वेषण केबल दो बार काटने का आरोप चीन पर लगाया था। वियतनाम का कहना है कि पिछले हफ्ते इसी तरह की एक अन्य कार्रवाई में चीन की मछली पकड़ने वाली नौकाओं ने जान-बूझकर उसकी नौकाओं के अन्वेषण केबल को नुकसान पहुंचाया, जबकि चीन का कहना है कि पिछले हफ्ते वियतनाम के हथियारबंद जहाजों ने चीन की समुद्री सीमा में घुसकर मछली पकड़ने वाली उसकी नौकाओं का पीछा किया। चीन के विदेश मंत्रालय का कहना है कि चीन की नौका में लगे जाल वियतनाम के तेल अन्वेषक जहाज के केबल में उलझ गई जो कि उस इलाके में गैर कानूनी रूप से घूम रही थी और एक घंटे तक उसके साथ खिंचती चली गई बाद में उसे काट कर अलग किया गया। चीन ने वियतनाम पर अपनी संप्रभुता के गंभीर हनन का आरोप लगाया है और ऐसी उकसाने वाली कार्रवाइयों को तुरंत बंद करने की चेतावनी दी है। सैन्य अभ्यास को आमतौर पर इतनी अहमियत नहीं दी जाती, लेकिन इस वक्त हालात बेहद संवेदनशील हैं। वियतनाम के एक नौसैनिक अधिकारी का कहना है कि ऐसे सालाना प्रशिक्षण अभ्यासों का चीन के साथ हुई हाल की घटनाओं से कोई संबंध नहीं है। नौ घंटे तक चले नौसैनिक अभ्यास का पहला चरण वियतनाम की समुद्री सीमा में स्थित निर्जन हॉन ओंग द्वीप पर पूरा किया गया, जबकि छह घंटे तक चलने वाली गोलीबारी का दूसरा चरण रात में पूरा किया जाएगा। इस बीच लगातार दूसरे सप्ताहांत में हनोई में लोगों ने प्रदर्शन कर चीन से वियतनाम की समुद्री सीमा छोड़ने की मांग की। बीबीसी संवाददाता का कहना है कि आमतौर पर कम्युनिस्ट शासन वाले वियतनाम में प्रदर्शनों को बर्दाश्त नहीं किया जाता, लेकिन दक्षिणी चीन सागर को लेकर चल रहे विवाद को देखते हुए अधिकारियों ने प्रदर्शन की इजाजत दे दी है। समुद्री सीमा को लेकर चीन का कई देशों के साथ विवाद चल रहा है। फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के भी चीन के साथ सीमा विवाद हैं। अमरीका ने भी समुद्र में चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षा को लेकर चिंता जताई है।
गद्दाफी ने महिलाओं के खिलाफ दुष्कर्म को हथियार बनाया
अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत के वकील ने कहा है कि लीबिया के तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी ने दुष्कर्म को लोकतंत्र समर्थक महिलाओं के खिलाफ हथियार के तौर इस्तेमाल किया है। उन्होंने दुष्कर्म के लिए सैनिकों को वियाग्रा जैसी दवाएं भी मुहैया करवाई। हालांकि इस तरह के आरोप उन पर पहले भी लगाए जाते रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय अदालत के वकील लुईस मोरेनो ओकैंपो ने अब उनके खिलाफ सुबूत मिलने की बात कही है। ओकैंपों को उम्मीद है कि गद्दाफी को मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी ठहराते हुए अदालत का फैसला जल्द ही आएगा। उन्होंने कहा कि महिलाओं को बलात्कार की सजा देने के पीछे गद्दाफी का मकसद था कि इससे उनमें डर पैदा होगा और विरोधी स्वर नहीं उठेंगे। ब्रिटिश अखबार डेली मेल के अनुसार, ओकैंपो ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के दफ्तर में मीडिया को बताया कि वह गद्दाफी के खिलाफ काफी सुबूत एकत्र कर चुके हैं। मार्च के महीने में लीबिया की एक महिला, एमान अल ओवैदी, ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था जब वह त्रिपोली के एक होटल में बदहवास सी घुसीं और कहा कि गद्दाफी के सैनिकों ने उनके साथ बलात्कार किया है। फिलहाल वह रोमानिया के शरणार्थी शिविर में अपना इलाज करवा रही है। भारत ने लीबिया को दी 13 करोड़ रुपये की मदद संयुक्त राष्ट्र : भारत ने बृहस्पतिवार को लीबिया को 30 लाख डॉलर (करीब 13.4 करोड़ रुपये) की मानवीय सहायता देने का एलान किया। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई मिशन ने यह घोषणा की। संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय के माध्यम से 10 लाख डॉलर नगद भेजे जाएंगे, जबकि शेष 20 लाख डॉलर की राहत सामग्री और दवाएं बेनगाजी और त्रिपोली को बराबर मात्रा में भेजी जाएंगी। गद्दाफी की सेना ने मिस्राता पर फिर किया हमला बेनगाजी : गद्दाफी की सेनाओं ने बृहस्पतिवार को देश के तीसरे सबसे बड़े शहर मिस्राता पर हमला किया। जवाबी हमले के तौर पर नाटो सेना की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई। लोकतंत्र समर्थकों के प्रवक्ता हसन अल गलाई ने बताया कि दो से तीन हजार सैनिकों के इस हमले में 10 लड़ाकों की मौत हो गई और 26 घायल हो गए। जबकि यहां नाटो सेनाओं के युद्धक टैंक और रॉकेट लॉन्चर तैनात होने के बावजूद कोई जवाबी हमला नहीं किया गया.
ऊंची इमारतों में चीन होगा नंबर वन
चीन में 2016 तक 800 गगनचुंबी इमारतें होगी जिनकी संख्या इस तरह की अमेरिकी इमारतों की तुलना में चार गुना ज्यादा होगी। लेकिन विशेषज्ञों ने इस तरह की इमारतों को अनुमति देने की नीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता जताई है क्योंकि इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है और उनके रखरखाव पर काफी खर्च आता है। शंघाई से निकलने वाली स्काईस्क्रेपर पत्रिका ने कहा कि दुनिया की दस सबसे ऊंची इमारतों में पांच चीन में हैं। चीन की सर्वाधिक गगनचुंबी इमारतें हांगकांग में हैं। इस आधुनिक चीनी शहर में 58 गगनचुंबी इमारतें हैं जबकि शंघाई में ऐसी 51 इमारतें हैं। शेनझेन में ऐसी 45 इमारतें हैं। पत्रिका की खबर के अनुसार 500 फुट (152.4 मीटर) से अधिक ऊंचाई वाली इमारतों को गगनचुंबी इमारतों की श्रेणी में शामिल किया गया है। अमूमन यह बुलंद इमारतों की शुरूआत ही कम से कम पचास मजिलों से होती है। पत्रिका ने चीन की गगनचुंबी इमारतों के एक साल के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि भारत के इस पड़ोसी मुल्क में 2016 तक 800 गगनचुंबी इमारतें होंगी जोकि उस समय तक अमेरिका में मौजूद स्काईस्क्रैपर्स से चार गुना अधिक होंगी। यानी सिर्फ पांच साल बाद दुनिया में सर्वाधिक बुलंद इमारतों वाले देश के रूप में अमेरिका के बजाय सबसे अधिक आबादी वाला देश चीन जाना जाएगा। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इन गगनचुंबी इमारतों की शुरूआत यूंतो भूमि बचाने के लिए हुई थी लेकिन अब इन आलीशान और निर्माण के लिहाज से बेहद आधुनिक इमारतों के निर्माण का मकसद उस देश की छवि और पहचान के रूप में लिया जाने लगा है। चीन भी अत्यधिक आबादी वाला देश है इसलिए उसे अपने देश के शहरीकरण के दौरान ऊंचे बुर्जो की जरूरत है। ऐसी गगनचुंबी इमारतें जमीन बचाने में सहायक हैं। चीन-यूरोप इंटरनेशनल बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर वांग जिनमाओ ने सरकारी पत्रिका ग्लोबल टाइम्स को बताया कि इन गगनचुंबी इमारतों के निर्माण की लागत अत्यधिक होने, रखरखाव महंगा होने और पर्यावरण के लिए यह संकट होने के चलते आसमान छूती इमारतों के प्रोजेक्ट में चीनी सरकार को सावधानी बरतनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि इस समय चीन में 200 गगनचुंबी इमारतों का निर्माण चल रहा है जबकि फिलहाल अमेरिका में कुल गगनचुंबी इमारतें ही इतनी हैं। शंघाई स्थित 421 मीटर ऊंचा जिन माओ टावर दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची इमारत है। इसके निर्माण पर प्रति वर्ग मीटर 20,000 युआन (करीब 3,088 डॉलर) लागत आई है। शंघाई स्थित न्यूज पोर्टल इस्टडे के अनुसार इस इमारत के रखरखाव में प्रतिदिन एक मिलियन युआन का खर्च आता है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन के जिन शहरों में दस लाख आबादी भी नहीं है वहां भी लोग स्काईस्क्रैपरों की परियोजनाओं में रहने की तैयारी में हैं। उदाहरण के लिए चीन के स्वायत्त क्षेत्र गुझिंग जुआंग के फेकचेगैंग शहर में एक 528 मीटर ऊंची इमारत बनाने की योजना है। यह शंघाई के वर्ल्ड फाइनेशियल सेंटर से भी ऊंची होगी। शंघाई की यह इमारत दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची बिल्डिंग है। शंघाई रीयल इस्टेट इकानिमी सोसाइटी के उप निदेशक यिन कुनहुआ के अनुसार अगर छोटे शहरों की इन बुलंद इमारतों में फ्लैट और दफ्तर नहीं बिक पाए तो बिल्डरों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पडे़गा।
सीरियाई सेना फिर दमन की तैयारी में
सीरिया में जारी हिंसा से बचने के लिए हजारों की संख्या में लोग देश छोड़कर तुर्की में दाखिल हो रहे हैं। घर छोड़ने वालों में खासतौर पर जस्र अल शुग़ूर शहर के निवासी हैं, क्योंकि वहां सैनिक कार्रवाई होने का खतरा है। सरकार का कहना है कि इस नगर में सुरक्षाबलों के 120 सदस्य मारे गए थे और वह सशस्त्र गिरोहों से निपटने के लिए सख्त कदम उठाएगी। हालांकि सरकार के विरोधी कहते हैं कि ये स्पष्ट नहीं है कि ये सुरक्षाकर्मी कैसे मारे गए? दूसरी ओर तुर्की के प्रधानमंत्री रिसेप एरडोआन ने कहा कि वे तुर्की में शरण ले रहे विस्थापितों के लिए देश की सीमाएं सील नहीं करेंगे। तुर्की-सीरिया की सीमा पर मौजूद पर बीबीसी संवाददाता ओवेन बेनेट जोन्स के मुताबिक भारी संख्या में तुर्की एंबुलेंस सीरिया के घायल लोगों को लाती ले जाती देखी गई। जोन्स के मुताबिक सीरिया की सीमा पर कुछ तंबू भी देखे जा सकते हैं। ये उन लोगों के ठिकाने हैं जो सेना के डर से शहरों से भागकर वहां पहुंचे हैं। तुर्की सरकार शरणार्थियों के मुद्दे को राजनीतिक रंग नहीं देना चाहती और यही वजह है कि उसने पत्रकारों के साथ शरणार्थियों की बातचीत पर रोक लगा दी है। जस्र अल शुग़ूर के नजदीक लेबनान में मौजूद बीबीसी संवाददाता जिम मुईर के मुताबिक फिलहाल शहर में कोई सैनिक कार्रवाई नहीं हुई है लेकिन सैन्य दलों के तैयारियों में जुटे होने की खबरें हैं। तुर्की के प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि दमिश्क को चाहिए कि इस मामले से एहतियात और धैर्य के साथ निपटे। ब्रिटेन-फ्रांस लाएंगे प्रस्ताव दूसरी ओर ब्रिटेन और फ्रांस ने कहा कि वे सीरिया में जारी सरकार विरोधी प्रदर्शनों को लेकर बुधवार को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के सामने एक प्रस्ताव रखेंगे। इस प्रस्ताव को फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और पुर्तगाल ने तैयार किया था। इसमें राष्ट्रपति असद की सरकार के हाथों हो रही हिंसा की भर्त्सना की गई है और उनसे मांग की गई है कि मानवीय दलों को सीरिया के शहरों में आने दिया जाए। ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलियम हेग ने कहा कि राष्ट्रपति असद अपनी वैधता खोते जा रहे हैं और उन्हें या तो सुधर जाना चाहिए या फिर पद से हट जाना चाहिए। इस प्रस्ताव में सीरिया पर प्रतिबंध या सैनिक कार्रवाई की बात नहीं है। ब्रिटेन और फ्रांस पहले भी सीरिया में जारी हिंसा की निंदा कर चुके हैं। ब्रिटेन का कहना है कि अगर कोई भी देश इस प्रस्ताव पर वीटो करता है तो यह उसकी अपनी नैतिक जि़म्मेदारी होगी। फ्रांस भी कह चुका है कि सीरिया में जारी हालात के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र का इस मुद्दे पर चुप रहना वाजिब नहीं होगा। रूस, सीरिया के मामले पर सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पारित किए जाने का विरोध कर चुका है। दूसरी ओर जस्र अल शुग़ूर के नज़दीक लेबनान में मौजूद बीबीसी संवाददाता जिम मुईर के मुताबिक फिलहाल शहर में कोई सैनिक कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन सैन्य दलों के तैयारियों में जुटे होने की खबरें हैं।
कश्मीरी की मौत के दावों में अमेरिका को दिखी साजिश
अलकायदा के शीर्ष कमांडरों में से एक और 26/11 के मास्टरमाइंड इलियास कश्मीरी की मौत के दावे को लेकर अमेरिका-पाक आमने-सामने आ गए हैं। अमेरिका कश्मीरी के मारे जाने की पुष्टि से इंकार कर रहा है, जबकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी न केवल अपनी ओर से बल्कि ओबामा प्रशासन का हवाला देकर भी इस आतंकी सरगना की मौत का एलान कर चुके हैं। अब अमेरिका-पाक में कश्मीरी की मौत की पुष्टि पर मतभेद बढ़ते जा रहे हैं। हरकत उल जेहाद अल इस्लामी (हुजी) ने कश्मीरी की मौत का बात जिस तरह स्वीकार कर ली उससे भी संदेह गहरा रहा है। पाक सरकार की पुष्टि पर अमेरिकी मुहर न लगना भी यह सवाल खड़ा करता है कि कहीं हुजी की तरह पाक सरकार भी कश्मीरी को अमेरिकी ड्रोन हमलों से तो नहीं बचाना चाहती? 2003 में तत्कालीन पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर जानलेवा हमले के बाद कई आतंकी कमांडर गिरफ्तार किए गए थे। इनमें से इलियास कश्मीरी भी एक था, लेकिन उसे हिज्बुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाउद्दीन की गवाही पर छोड़ दिया गया। कश्मीरी कभी 313 ब्रिगेड और हुजी का सरगना था। कहा जाता है कि उस दौरान वह एक भारतीय सैनिक का सिर काटकर मुशर्रफ के लिए भेंट स्वरूप ले गया था। पाक सेना में कमांडो रह चुके कश्मीरी भारत विरोधी गतिविधियों की वजह से हमेशा से आइएसआइ का चहेता रहा। ऐसे में यह संभव है कि पाक सरकार उसकी मौत की पुष्टि कर उसकी हिफाजत करने की कोशिश कर रही हो। कश्मीरी के बारे में 2009, 2010 में कई बार ऐसी खबरें आई जिनमें उसे मरा हुआ बताया गया। इस बार भी कश्मीरी की मौत की खबर के बाद हुजी की ओर से इंटरनेट पर डाली गई उसकी तस्वीर नकली निकली। जो तस्वीर कश्मीरी की बताकर पेश की गई है वह 26/11 हमले में मारे गए एक पाकिस्तानी आतंकी की हैं। उसका नाम अबू डेरा इस्माइल खान है। घनी दाढ़ी वाले कश्मीरी की एक आंख नहीं थी। तस्वीर में दिखाए गए व्यक्ति की भी एक आंख नहीं है, लेकिन उसके दाढ़ी नहीं है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि संदिग्ध फोटो और हुजी के वक्तव्य से यह समझ पाना मुश्किल है कि कश्मीरी जिंदा है या मर गया? एक अधिकारी ने कहा कि हम फिलहाल उसकी मौत की पुष्टि नहीं कर सकते, क्योंकि हमारे पास परीक्षण के लिए उसका डीएनए नहीं है। अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना है कि हो सकता है कि हुजी ने अमेरिका को गुमराह करने के लिए कश्मीरी की मौत की झूठी खबर फैला दी हो। यदि यह सही है तोइसका मतलब है कि पाकिस्तान उन पांच वांछितों की सलामती चाहता है जिन्हें अमेरिका किसी भी कीमत पर जिंदा या मुर्दा चाहता है। इनमें इलियास कश्मीरी और मुल्ला उमर प्रमुख हैं। ऐसा पहली बार नहीं जब किसी दुर्दात आतंकी की मौत पर रहस्य के बादल मंडराए हों। इससे पहले तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) पाकिस्तान के प्रमुख हकीमुल्ला महसूद की मौत भी सवाल बनकर रह गई थी। 2010 में 9 जनवरी, 14 जनवरी और 31 जनवरी को हकीमुल्ला की मौत खबरें आई, लेकिन तालिबान ने उसकी मौत से इंकार किया। दूसरी ओर पाकिस्तान सहित एशिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने उसकी मौत की बात कही। इसके बाद आइएसआइ के पूर्व अधिकारी ने उसके जिंदा होने की बात कही। एक तथ्य यह भी है कि हकीमुल्ला महसूद 31 दिसंबर 2009 को अफगानिस्तान के खोस्त स्थित सीआइए ठिकाने पर आतंकी हमले के बाद सिर्फ एक बार वीडियो में दिखाई दिया। वीडियो में वह उस फिदायीन के साथ था जिसने खोस्त स्थित सीआइए ठिकाने पर जाकर खुद को उड़ा लिया था। वीडियो से स्पष्ट था कि वह उस समय बनाया गया जब ठिकाने की साजिश रची जा रही थी। विशेषज्ञ मानते हैं कि तालिबान ने जानबूझकर ऐसे तथ्य पेश किए कि मीडिया उसे मरा हुआ मान ले। 2009 में ड्रोन हमलों में मारे गए टीटीपी के पूर्व सरगना बैतुल्ला महसूद को लेकर भी ऐसी ही खबरें आती रहीं, लेकिन उसने कभी खुद को छिपाया नहीं। जब-जब उसकी मौत की खबरें आई वह मीडिया के सामने आया।
केंद्र की कार्रवाई पर अमेरिका में भी उठे सवाल
दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन कर रहे बाबा रामदेव पर पुलिस कार्रवाई का मामला अमेरिका में भी उठा। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की दैनिक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान पत्रकारों ने इससे संबंधित कई सवाल पूछे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मार्क टोनर ने कहा कि रामदेव के बारे में उन्होंने मीडिया में ढेर सारी खबरें देखी हैं, लेकिन उनके मुताबिक यह भारत का आंतरिक मामला है। पत्रकारों के इस बारे में बार-बार सवाल पूछे जाने पर मार्क टोनर ने कहा कि अमेरिका शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करता है, लेकिन साथ ही नागरिक सुरक्षा को लागू करने के एक लोकतांत्रिक सरकार के अधिकार का भी अमेरिका समर्थन करता है। एक पत्रकार ने जब ये पूछा कि इसी तरह की घटना कहीं और होती है तब तो अमेरिका उसे आंतरिक मामला नहीं कहता है फिर भारत के मामले में ऐसा रवैया क्यूं? खासकर जब भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस सवाल के जवाब में मार्क टोनर ने कहा कि जी बिल्कुल कानून के शासन और मानवाधिकार का सम्मान होना चाहिए। एक पत्रकार ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ वहां हजारों की संख्या में लोग जमा हुए थे। वे भारत के नेताओं के जरिए अरबों रुपये देश से बाहर ले जाने का विरोध कर रहे थे और उन्हें देश में वापस लाए जाने की मांग कर रहे थे। उन लोगों पर रात में हमला किया गया। अमेरिकी विदेश मंत्री को इस बारे में कोई बयान देना चाहिए। इसके जवाब में मार्क टोनर ने कहा कि यह बिल्कुल जायज सवाल है, क्योंकि अमेरिका का हमेशा ही कहना रहा है कि वह दुनिया भर में लोगों को अपनी बातों को शांतिपूर्वक तरीके से व्यक्त करने के अधिकार का समर्थन करता है। रामदेव के मामले में उनका कहना था कि रामदेव मामला बहुत पेचीदा है। भारतीय सुरक्षाकर्मी नागरिक सुरक्षा बहाल करने की कोशिश कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों के पास अनशन करने का परमिट हो भी सकता है और नहीं भी। मैं इस बारे में निश्चित तौर पर नहीं कह सकता। हमलोग दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की हैसियत से भारत का सम्मान करते हैं और मानते है कि यह भारत का आंतरिक मामला है और क्या अच्छा है इसका फैसला भारत को करना है। एक पत्रकार ने सवाल किया कि भारत के चार-चार मंत्री रामदेव से बातचीत कर रहे थे, इसलिए परमिट होने या ना होने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता है। इसके जवाब में टोनर ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते भारत की जिम्मेदारी है कि वह शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे लोगों को अपनी बात कहने का मौका दे, लेकिन उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी प्रदर्शनकारियों पर भी है कि वे सुरक्षा जरूरतों का पूरा ख्याल रखें।
Tuesday, June 14, 2011
भारत के लिए भी अच्छा संकेत नहीं
नेपाली संविधान सभा की अवधि तीन माह के लिए बढ़ा दी गई है, जिसका यूरोपीय संघ, स्विट्जरलैंड, नार्वे सहित कई देशों ने समर्थन किया है। नेपाल में संवैधानिक संकट भले ही वर्तमान में टल गया है, लेकिन अंतरिम सरकार के सामने भविष्य में तय समय-सीमा का पालन करने की नई जवाबदेही कानूनी चुनौती के रूप में प्रकट हुई है। इस प्रकार की स्थितियां भारत के लिए अच्छा संकेत नहीं हैं। नेपाल के राजनैतिक इतिहास पर गौर करें तो 1990 का जन आंदोलन लोकतंत्र बहाली का पहला कदम राजतंत्र के साथ-साथ बहुदलीय लोकतंत्र व्यवस्था के रूप में एक बड़ा परिवर्तन लाया। वर्ष 2006 में इसी प्रकार के एक आंदोलन से लोकतंत्र के मार्ग में सफलता का एक और अध्याय जुड़ा। वर्ष 2008 में हुए संविधान सभा के चुनाव से सभी ने यह उम्मीद व्यक्त की कि अब नेपाल में बीते दिनों में हुई गलतियों में सुधार होगा, लेकिन अब तक के बने गतिरोधों और अस्थिरता ने कई समस्याओं को पैदा किया है। इसका गहरा प्रभाव भारत पर पड़ रहा है। एक तरफ भारत को अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करने की जटिलता से सामना करना पड़ रहा है तो दूसरी ओर नेपाली राजनीति में कई नई सोच और शक्तियों का उभार हो रहा है, जिसे भारतीय हितों के रूप में नहीं देखा जा सकता है। संविधान सभा के चुनाव के बाद उनके सामने कई तरह की चुनौतियां आई और दबाव पड़े, जिसमें सभा की असफलता सामने आई। इस वजह से 28 मई 2010 तक संविधान नहीं लिखा जा सका। तब इस संविधान सभा को एक साल के लिए बढ़ा दिया गया। अब एक बार फिर संविधान सभा की अवधि तीन माह के लिए बढ़ा दी गई। अब देखना होगा कि इस तय समय-सीमा का पालन नेपाली संविधान सभा कितनी हद तक कर पाती है। संविधान सभा के गठन के बाद से ही भारत विरोधी आंदोलन नेपाली धरती पर चलते रहे, जिसका स्पष्ट असर वहां की जनता पर भी पड़ा। नेपाल में अंतरराष्ट्रीय समुदायों की बढ़ोतरी भी निरंतर देखी जा रही है और उनके लिए नेपाल का महत्व भी पहले से ही बरकरार है। चूंकि नेपाली अर्थव्यवस्था विदेशी सहायता पर ही निर्भर है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की पहुंच स्वाभाविक ही है। इसके अलावा चीन का नेपाल में अपनी पैठ बढ़ाना और नेपाल के भी कुछ दलों का भारत की अपेक्षा चीन के प्रति ज्यादा लगाव भारत के लिए चिंता का विषय है। नेपाल में मौजूदा गतिरोध की स्थिति में चीन का जवाब तलाशना भारत के लिए मुश्किलों भरी चुनौती है। भारत के सीमावर्ती लोगों का नेपाल के लोगों के साथ वैवाहिक संबंधों के अलावा दोनों देशों के बीच सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक संबंध सदियों से रहा है। दोनों देश अपनी खुली सीमा का लाभ भी उठाते हैं। अभी के चीनी मंसूबों ने इन संबंधों में गतिरोधक की भूमिका निभाई है। जबसे नेपाल में अस्थिरता आई है, भारत भी कई मामलों में अस्थिर हुआ है। पिछले दिनों नेपाली मओवादियों और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के आपसी संबंधों का खुलासा हुआ था। इन दोनों के गठबंधन ने भारत में घुसपैठ का अच्छा माध्यम बना लिया था। भारत का लगभग 60 प्रतिशत व्यापार नेपाल के साथ है, जिसमें पर्यटन, पेट्रोलियम, बिजली आदि क्षेत्रों में भारत का काफी योगदान है। भारत नेपाल का बड़ा निवेशक भी है। चीन का योगदान भी इसी अनुरूप बढ़ता जा रहा है। इसे भारत अनदेखा नहीं कर सकता। इसे नियंत्रित करने के प्रयासों के तहत भारत को अपनी विदेश नीति का पुनरावलोकन करना होगा। भारत के लिए नेपाल का न केवल आर्थिक महत्व है, बल्कि सामरिक-कूटनीतिक महत्व भी है। भारत अपनी जनता के साथ नेपाली जनता के बीच के अभिन्न संबंधों का भी लाभ उठा सकता है। बहरहाल, नेपाल की राजनितिक अस्थिरता और गतिरोध का प्रमुख कारण माओवादियों को मुख्य धारा में शामिल करने को लेकर है। कुछ राजनीतिक दल उन्हें सैन्यबलों में शामिल करने पर जोर दे रहे हैं, जबकि सच यह है कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए असैन्य कार्यो में लगाकर ही उनका और देश का भला हो सकता है। यह सच है कि माओवादियों की बदौलत ही नेपाल में लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त हुआ है, लेकिन अपने लक्ष्य की पूर्ति में उनका हिंसात्मक मार्ग किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर सकता है। अगर नेपाल में माओवादी लड़ाकों को सैन्यबलों में शामिल कर लिया जाता है तो यह आशंका भी है कि नेपाली सेना में दो गुट पैदा हो जाएं और लोकतंत्र का मकसद पूरा होने से पहले ही देश एक बार फिर अशांत हो जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
संविधान सभा के चक्रव्यूह में उलझा नेपाल
नेपाल की राजनीति में तारीख पर तारीख का सिलसिला लगता है संविधान सभा की मजबूरी बन चुका है? इसी का नतीजा है कि एक बार फिर नेपाल में संविधान सभा की अवधि तीन महीने के लिए बढ़ा दी गई है। ये तीन महीने भी यों निकल जाएंगे और फिर तारीख पर तारीख का सिलसिला शुरू होगा। हालांकि संविधान सभा की अवधि बढ़ाने के लिए इसकी वैधानिकता पर सर्वोच्च न्यायालय की मुहर भी लग चुकी थी। सात महीने की सरकारविहीनता के बाद देश को जो सरकार मिली, वह तो और भी निरीह और लाचार है। झलनाथ खनाल के प्रधानमंत्री बनने से लगा था कि महीनों से कायम राजनीतिक गतिरोध और रिक्तता खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका है। सरकार चले या नहीं, संविधान बने या नहीं, इससे नेपाल सरकार को मतलब भी नहीं है। तीन महीने के अवधि विस्तार ने आश्वस्त कर दिया है कि संविधान-निर्माण हो या नहीं, सरकार बनाने-बिगाड़ने का खेल होता रहेगा। नेपाल में पुन: संविधान सभा की अवधि बढ़ा दी जाएगी। नेपाल की जनता यह सोचकर आश्वस्त रहेगी कि देश सरकारविहीन नहीं है। बहरहाल, माओवादियों के कंधे पर चढ़कर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल को सत्ताच्युत करते हुए प्रधानमंत्री बनने में सफल हुए नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) अध्यक्ष झलनाथ खनाल अब तक के सबसे असफल प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। खनाल ने अपने कार्यकाल के दौरान विरोधियों को अपना बनाना तो दूर, अपनों को भी विरोधी बना लिया है। एमाले के जिन नेताओं ने खनाल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए दिन-रात लॉबिंग की थी, बालुवाटार में आज उनकी उपस्थिति भी नहीं होती। जिस समझौते के बल पर माओवादियों ने खनाल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन दिया था, उसी समझौते को न मानने की वजह से आज माओवादी खेमे में भूचाल-सा आ गया है। आलम यह है कि जिस पार्टी के नेता खनाल को सत्ता में नेतृत्व दिलाने का दावा कर रहे थे, वही पार्टी अब खनाल का विकल्प तलाशने लगी है। माओवादियों की बात कुछ देर के लिए छोड़ भी दी जाए तो अब खनाल की पार्टी से ही उनके इस्तीफे की मांग होने लगी है। मंत्रिमंडल के तीसरे विस्तार में जिस तरह खनाल ने पार्टी के निर्णय और सहमति के विपरीत अपने पक्षधर नेताओं को ही मंत्री बनाया है, उससे पार्टी के दो प्रभावशाली नेता अब उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने की मुहिम में जुट गए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल और केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री खनाल द्वारा मनमाने ढंग से मंत्रिमंडल का विस्तार करने व माओवादियों को गृह मंत्रालय देने पर उनके (प्रधानमंत्री) इस्तीफे की मांग पर अड़ गए हैं। नेपाली राजनीति में पिछले तीन दशकों से सक्रिय प्रधानमंत्री खनाल दिन-प्रतिदिन अवसान की तरफ बढ़ रहे हैं। सरकार के संचालन की बात हो या फिर पार्टी चलाने की, दोनों में ही खनाल असफल साबित हो रहे हैं। उन पर पार्टी के निर्णयों और उसकी नीति के विपरीत चलने का आरोप लगातार लग रहा है। पार्टी के भीतर और बाहर भी उनकी कड़ी आलोचना हो रही है। शांति प्रक्रिया व संविधान निर्माण कार्य में भी इस दौरान कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हो पाया है। संवैधानिक समिति में विवाद कायम है। संसद लगातार अवरुद्ध रही, संविधान से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए गठित उप-समिति की समय-सीमा दूसरी बार बढ़ाई गई, लेकिन एक दिन भी बैठक नहीं हो पाई। तीसरी बार के लिए भी समय-सीमा बढ़ाए जाने पर सहमति हुई, लेकिन मसला हल हुआ भी तो केवल तीन महीने के लिए। उधर, सेना समायोजन से संबंधी प्रक्रिया जस की तस पड़ी है। इन्हीं सब कारणों से खनाल सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गई है। वैसे भी झलनाथ खनाल और प्रचंड अपनी ही पार्टी के लोगों से बगावत कर एक षड्यंत्र के तहत प्रधानमंत्री बने। इससे नेपाल में राजनीति संकट के और गहराने की आशंका है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि झलनाथ खनाल एक गोपनीय समझौते के तहत प्रधानमंत्री बने हैं। भविष्य में उनकी स्थिति एक कठपुतली प्रधानमंत्री से अधिक नहीं होगी। माओवादियों तथा एमाले अध्यक्ष के बीच हुए सात सूत्रीय समझौते को खनाल के बतौर प्रधानमंत्री निर्वाचित होने तक छुपाकर रखा गया, जिसकी नेपाल में चौतरफा आलोचना हो रही है। विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के नेतागण भी इसके खिलाफ हैं। बता दें कि 30 मई 2009 को आयोजित इस संविधान सभा की पहली बैठक बेहद उत्साहजनक रही, लेकिन उसके बाद संविधान सभा के सदस्यों में बैठक के प्रति उत्साह घटता गया। बडे़ दलों के शीर्ष नेताओं की अनुपस्थिति से उनके दल के संविधान सभा सदस्यों को भी बढ़ावा मिला और वे संविधान सभा की बैठक में भाग लेने के बजाए संविधानेतर कार्यो तथा विदेशी दौरों में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे। उन्होंने इस संवैधानिक व्यवस्था की कि संविधान सभा की बैठक में लगातार दस बार अनुपस्थित रहने पर सदस्यता समाप्त हो सकती है, इसकी भी कोई परवाह नहीं की। गौरतलब है कि संविधान सभा का कार्यकाल बढ़ाने के लिए दूसरी राजनीतिक पार्टियां लगातार विरोध कर रही हैं। इसी संदर्भ में 19 मई को नेपाली कांग्रेस द्वारा यह कदम उठाया गया। नेपाली कांग्रेस संविधान सभा को बढ़ाए जाने का तब तक समर्थन नहीं करना चाहती थी, जब तक कि माओवादी लड़ाकों के नेपाली सेना में शामिल करने के मुद्दे को लेकर कोई ठोस निर्णय नहीं ले लिया जाता है। क्योंकि नेपाली कांग्रेस केवल 4,000 लड़ाके नेपाली सेना में शामिल करने के लिए कह रही है, जबकि माओवादी नेता सभी लड़ाको को सेना में शामिल करना चाहते हैं। नेपाली कांग्रेस लगभग 20 छावनियों की जांच कराना चाहती है, जहां माओवादी लड़ाकों को रखा गया है। साथ ही नेपाली कांग्रेस अपनी इस मांग पर भी अड़ी हुई कि माओवादियों द्वारा विद्रोह के वक्त लूटी गई संपत्तियों को वापस कर दिया जाए। दूसरी ओर राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने भी 19 मई को नेपाल में राजशाही बहाली की मांग करते हुए काठमांडू में एक जुलूस तक निकाला, जिसका नेतृत्व पूर्व गृहमंत्री एवं संविधान सभा के सदस्य कमल थापा कर रहे थे। बहरहाल, यह तो तय है कि इस साल भी संविधान लेखन की प्रक्रिया पूर्ण करना संभव नहीं है। नेपाली सांसद वर्तमान संविधान सभा के माध्यम से एक जनकल्याणकारी संविधान बनाने के बजाए सत्ता के कुटिल शह और मात के खेल में मशगूल हैं। स्पष्ट रूप से घड़ी की सूइयां संविधान सभा की असफलता का संकेत कर रही हैं। संविधान सभा के जरिए एक नए संविधान की जरूरत इसलिए नहीं महसूस की गई है कि देश में संवैधानिक रिक्तता थी, बल्कि इसलिए कि विगत के संविधान निर्माण प्रक्रिया में नागरिक सहभागिता के अभाव में आम जनता की इच्छाओं और जरूरतों का उचित संबोधन नहीं हुआ था। नए बनने वाले संविधान में पिछली गलतियों को सुधारते हुए संविधान प्रक्रिया में आम नागरिकों की पूर्ण सहभागिता हो, ताकि नई राज्य व्यवस्था के सभी स्तरों पर स्वामित्व, अपनत्व तथा पहुंच का समान अवसर सभी समुदाय को मिल सके। जन आंदोलन द्वारा प्राप्त नेपाली संविधान सभा के गठन की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि इसके गठन के समय राजनीतिक दलों और सरोकार वालों के बीच बिना गहन विचार-विमर्श के इसे कार्यरूप देने की जल्दबाजी की गई। लापरवाही, बेईमानी तथा छल-कपट की नींव पर आधारित तथा संचालित यह संविधान सभा शांति स्थापना के बजाय आज नेपाली जनता के लिए अभिशाप बनती जा रही है। संविधान सभा सभासदों के आक्रोश और धमकी देने वालों की सभा में बदलती जा रही है। दो साल क्या, तीन साल बीत चुके हैं संविधान सभा के गठन को, लेकिन अभी तक संवैधानिक समिति एकीकृत प्रारूप भी नहीं बना सकी है। संविधान सभा का लेखा-जोखा देखा जाए तो पिछले तीन साल में कुल 108 बैठकें हुई हैं। काम सिर्फ 104 दिन ही हुए हैं। इस दौरान 430 सभासदों ने विदेश की यात्राएं की हैं। इन सब प्रक्रिया में अब तक सभासदों के वेतन के तौर पर 1 अरब 36 करोड़ रुपये, सभामुख तथा उपसभामुख के वेतन-भत्ते पर 1 करोड़ 36 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। मौजूदा समय में नेपाल में संविधान सभा द्वारा संविधान बनाना केवल एक मजाक बन कर रह गया है। आशंका तो यह है कि आगे चलकर नेपाल एक फिर जन आंदोलन की आग में न झुलस जाए। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
अमेरिका की दोहरी नीति
एक दशक से भी अधिक समय से अमेरिका पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवाद के खिलाफ मिलने वाले प्रमाणों की अनदेखी करता आ रहा है। हालांकि, इसका नुकसान भी उसे उठाना पड़ा है। ऐबटाबाद ऑपरेशन के बाद वाशिंगटन दुनिया को जवाब दे सकता है कि आइएसआइ को क्यों न एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया जाए? दुनिया का मोस्ट वांटेड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को ऐबटाबाद में पाकिस्तान मिलिटरी अकादमी के पास होना और उसका वहां मारा जाना यही साबित करता है कि पाकिस्तान दहशतगर्दो की शरणस्थली बन गई है। ओसामा के मारे जाने के बाद पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में जो खटास आई है उसे दूर करने के लिए अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिटंन ने अचानक पाकिस्तान का दौरा किया और उन्होंने वहां जाकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी और सेना प्रमुख अशफाक परवेज कियानी से मुलाकात की। दोनों देशों के रिश्तों में जो कड़वाहट आई है उसे दूर करने के लिए दोनों देशों ने कुछ कदम उठाए हैं। पाकिस्तान जहां अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआइए को ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के घर की जांच करने को तैयार हो गया है वहीं अमेरिका अपने सैनिकों की संख्या में कटौती करने को तैयार हुआ है। पाकिस्तान की यात्रा पर आई हिलेरी क्लिंटन ने कहा कि इस बात के कोई सबूत नहीं है कि पाक के उच्च अधिकारियों को ओसामा की कोई जानकारी थी। पाकिस्तान ने अमेरिका को भरोसा दिलाया है कि चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी। वैसे पाकिस्तान में लादेन के मारे जाने से पहले भी कई सार्वजनिक स्थलों, सेना के ठिकानों तथा नेताओं पर आत्मघाती व अन्य हमले होते रहते थे परंतु ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अब इनमें काफी तेजी आ गई है। उदाहरण के तौर पर 22 मई को कराची स्थित नौसेना अड्डे पर चरमपंथियों द्वारा हमला किया गया। अलकायदा के बारे में अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन का मानना है कि यह अब भी एक बड़ा खतरा है और इससे निपटने के लिए पूरे विश्व को एकजुट होकर अलकायदा के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी तभी हम चरमपंथियों के खिलाफ लड़ाई जीत पाएंगे। आजकल पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ दोनों सवालों के घेरे में है। पाकिस्तान की संसद ने प्रस्ताव पास करके यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतांत्रिक सरकार पर भी सेना का ही दबदबा है। इस प्रस्ताव में नाकाम होने की बात स्वीकार की गई है, लेकिन इस बात से इंकार किया गया है कि ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में होने के बारे में सरकार को मालूम था। अमेरिका के कई राजनेताओं ने आश्चर्य व्यक्त किया है कि ओसामा बिन लादेन इतने दिनों तक ऐसे सुरक्षित स्थान में रह रहा था और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी को इसकी जानकारी कैसे नहीं हुई। दुनिया में आतंकवाद को जिंदा रखने में अमेरिका द्वारा पाकिस्तान सेना की भूमिका की जानबूझकर अनदेखी की गई है। पहले जनरल परवेज मुशर्रफ और अब जनरल अशफाक परवेज कियानी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह मनाने की जुगात लगाई है कि वैश्विक आतंकवाद का मुहिम पाकिस्तानी सेना की मदद के बिना मुश्किल है। पाकिस्तान एक ओर तो आतंकवादियों से निपटने की बात करता है वहीं दूसरी ओर वह उन्हें शरण देता है। पाकिस्तान सेना को मिलने वाले मदद का उपयोग आतंकवादियों को तैयार करने में किया जाता है यह किसी से छिपा नहीं है। पाकिस्तान और आइएसआइ दोनों आतंकवादी ढांचे हैं। आइएसआइ के द्वारा ही कई अन्य चरमपंथी संगठन फल-फूल रहे हैं और इन्हीं दहशतगर्दो ने कई देशों में अपना आतंक फैला रखा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Monday, June 13, 2011
Friday, June 10, 2011
उदारता के मामले में कहां ठहरता है भारत
अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्रिका साइंस में एक अध्ययन रिपोर्ट छपी है। यह दुनिया के 33 देशों में संपन्न अध्ययनों का निचोड़ है, जिसमें उदारता तथा अनुदारता के लिए कुछ मानक तय कर उस पर अंक दिए गए हैं। शोध टीम के सदस्यों के मुताबिक 33 देशों में सिर्फ पाकिस्तान और मलेशिया भारत से ज्यादा अनुदार पाए गए। निश्चित ही वे सभी जो भारत की महान सहिष्णुता की कहानियों पर पले बढ़े हैं, उन्हें प्रस्तुत अध्ययन के निष्कर्ष देखकर धक्का लग सकता है। 21वीं सदी का उदितमान भारत जिसके बारे में यह बात बार-बार बताई जा रही हो कि वह बेहद उदार विचारों से संचालित हो रहा हो, उसका दुनिया के सबसे दमनात्मक समाजों में रूपांतरण देखकर लोगों के लिए सहसा यकीन करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन विडंबना यही है कि दुनिया का यह सबसे बड़ा जनतंत्र जड़सूत्रतावाद के सूचकांकों में शीर्ष पर दिखता है। अगर हम अधिक वास्तुनिष्ठ होकर अपने समाज को देखने की कोशिश करें तो भारतीय समाज के बारे में कुछ बातें स्पष्ट हैं। आज के समय में भी जो देश अपने यहां डायन हत्या देखता है, मौका मिलते ही स्ति्रयों को निर्वस्त्र कर उनके दौड़ाए जाने को देखता है और संपत्ति के नाम पर या इज्जत की रक्षा के नाम पर या अकेली स्त्री को पाकर उसे तंग करने वाली नजरों को देखता है तो इसे क्या कहा जा सकता है। लोग पीछे-पीछे दौड़ते हैं, फोटो खींचतें हैं, हंसते हैं। और ऐसी घटनाएं किसी खास प्रांत से आती नहीं दिखती हैं। आखिर हमारे ही समाज के परिवारों मे दहेज मांगा जाता है। इसके लिए दबाव बनाया जाता है। हर 77 मिनट में औरत दहेज के लिए मार दी जाती है। लड़के वाले श्रेष्ठ और लड़की वाले कम इज्जत के पात्र होते हैं। बेटे की चाहत में बेटी को कोख में खत्म करना, तीन करोड़ से ऊपर विधवाओं को या तो परिवारों में रहकर दोयम दर्जे का जीवन जीना पड़ता है या अंतत: विधवा आश्रम का मुंह देखना पड़ता है। आंकड़ों में और सर्वेक्षणों में दहेज हत्याएं और दहेज उत्पीड़न बढ़ता दिख रहा है। कुछ साल पहले के आंकड़ों के मुताबिक, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो में दर्ज तथ्य के अनुसार जहां 2006 में दहेज हत्या के केस 7618 थे, वहीं 2007 में यह आंकड़ा बढ़कर 8095 हो गया। दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के बर्न विभाग की एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में 16 से 34 साल के बीच की उम्र की महिलाएं किचन में जलने की शिकार अधिक हो रही हैं। अनुमानत: यहां हर साल जलने के कारण मौत की घटनाएं 1.63 लाख होती हैं, जिसमें युवा पुरुषों की तुलना में युवा महिलाओं की संख्या तीन गुना अधिक होती है। चूंकि औरत ही रसोई में अधिक काम करती है, इसलिए दुर्घटना भी उसी के साथ अधिक हो सकती है, लेकिन सारी मौतें दुर्घटना के कारण नहीं होती हैं। उत्तर भारत का पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इज्जत के नाम पर हत्या (ऑनर किलिंग) के मामले में अव्वल माना जाता रहा है। ऐसा नहीं है कि अन्य राज्यों में ऐसी घटनाएं नहीं होती हैं, लेकिन ये इलाके ऐसी हत्याओं और उसे मिली सामाजिक वैधता के मामले में सबसे आगे हंै। आंकड़े बताते हैं कि हरियाणा में हत्याओं में 10 प्रतिशत मामले इज्जत की खातिर होते है। जब घरवाले अपने बच्चों को इज्जत में बट्टा लग जाने की एवज में मौत के घाट उतार देते हैं तो इसमें उनके जानने वालों तथा पूरे गांव की भी सहमति होती है। निजी दायरों में होने वाली हिंसा का मामला सिर्फ स्ति्रयों तक सीमित नहीं है। 2007 के शुरू में ही परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसमें कहा गया था कि कैसे 53 फीसदी बच्चें यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं, जिसमें सबसे अधिक उत्पीड़क परिवार के ही सदस्य और नजदीकी रिश्तेदार होते हैं। यह भी उजागर हुआ था कि बच्चे बड़ों के द्वारा, कुछ मामलों में अपने गुरुजनों और रिश्तेदारों के द्वारा तो पीडि़त हैं ही, वे पर्यटकों तथा धार्मिक आस्था के नाम पर यौन अत्याचार झेलते हैं। इसमें कभी-कभी उनसे थोड़े बड़े बच्चे भी अत्याचारी बनते हैं यानी बचपन में ही खेल-खेल में वे दूसरे को गंभीर आघात पहुंचाते हैं, जिसका साया जिंदगी भर पीडि़त बच्चे के साथ रहता है। आधिकारिक तौर पर भारत में बाल मजदूरों की संख्या 4 से 5 करोड़ है यानी जिस उम्र में बच्चों को खेलना-कूदना चाहिए, उस उम्र में वह किसी के घर पर, किसी होटल-दुकान में या फिर कारखाने में काम करते पाए जाते हैं। हम तमाम पढ़े-लिखे, सुशिक्षित कहे जाने वाले परिवारों में यह बात अक्सर सुनते हैं कि वह उनके यहां काम करने वाले बच्चे को अपनी संतान की तरह पालते हैं। दरअसल, यह सरासर झूठ होता है, उसे 14-16 घंटे काम करवाते ही हैं। अगर हम इन परिवारों के पाखंडपूर्ण व्यवहार को छोड़ भी दें तो क्या यह किसी सहिष्णु समाज का परिचायक है कि वहां इतने बड़े पैमाने पर बाल श्रमिक हैं! रेयर ऑफ दी रेयरेस्ट केस यानी कोर्ट-कचहरी की भाषा में जो अत्यंत क्रूरतापूर्वक किए गए अपराध हैं, उन्हें तो आसानी से अनुदार श्रेणी में रखा ही जाता है, लेकिन आम परिवारों में आम व्यवहार में जो असहिष्णुता तथा अभद्रता का चलन है, उसे व्यापक पैमाने पर सहमति मिली हुई है और एक तरह से सहज बोध का हिस्सा बन जाना ज्यादा चिंतनीय है यानी जो व्यवहार गलत नहीं माना जाता, वह सुधारा कैसे जाएगा? निजी दायरों में प्रकट होती और वैध मानी जाती हिंसा सार्वजनिक दायरों में भी अधिक बर्बर ढंग से सामने आती है। आजादी के साठ साल बाद भी दलितों-आदिवासियों के साथ होने वाली संगठित हिंसा, उनकी बस्तियों में की जाने वाली आगजनी, उनके दूल्हे के घोड़ी पर चढ़ जाने से फूंके जाते मकान, विभिन्न स्तरों पर उनके साथ बरता जा रहा अस्पृश्यता या अन्य किस्म के भेदभाव आदि की जितनी चर्चा की जाए वह कम है। राजनीतिक-सामाजिक दायरे में भी हम उसे असहमति रखने वाली किताबों को जलाने, फिल्मों पर पाबंदी लगाने और यहां तक कि प्रेम का इजहार करने के लिए बने त्योहारों के दिन आततायियों की टोलियों द्वारा सड़कों पर मचाए जाते उत्पात के रूप में देख सकते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ, जब जम्मू-कश्मीर की एक लड़की द्वारा चिनाब नदी में कूदकर की गई आत्महत्या का समाचार छपा था। जांच में पता चला कि वह अपने परिचित के साथ अकेले में कहीं बैठी थी, जिसे देखकर पुलिसवाले ने उसे उत्पीडि़त करने की कोशिश की थी। मगर प्यार के इन पहरेदारों का किस्सा महज सुदूर जम्मू-कश्मीर का ही नहीं है, राजधानी में लोदी गार्डन से लेकर तमाम पार्को में पुलिस द्वारा की जाने वाली इसी किस्म की हरकतों से हम परिचित होते रहते हैं। विडंबना यही है कि दो वयस्कों के निजी क्षणों में पुलिस द्वारा की जाने वाली दखलंदाजी को सिविल कहे जाने वाले समाज का अच्छा खासा हिस्सा सही मानता है। अपने समाज की कमियों की जब भी चर्चा छिड़ती है तो स्वयं को देशभक्त और राष्ट्रवादी साबित करने के लिए मानो यह बताना जरूरी होता है कि पाश्चात्य संस्कृति कितनी बुरी है। संभव है कई मायने में वे बदतर हों भी, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता है कि दूसरे की कमी हमारी अच्छाई को सुनिश्चित करती है। जिस सहिष्णुता की परंपरा की कथाएं सुनी जाती रही है, अगर वे सही थीं तो फिर हमारा समाज इतना क्रूर और अनुदार तथा भोंडा व्यवहार करने वालों का समाज क्यों बन गया? दरअसल, वह कभी उदार था ही नहीं। यदि ऐसा होता तो ऊंच-नीच की भावना वाली जाति व्यवस्था ईजाद क्यों करता, महिलाओं को कैद करके रखने की हिमायत क्यों करता?साइंस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन हमें दरअसल वह आईना प्रदान करता है कि भारतीय समाज को सही अर्थो में सभ्य तथा सुसंस्कृत बनाने की चुनौती अभी बरकरार है, जिसमें उदारता और सहिष्णुता का तत्व प्रमुख हो। (लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
जख्मी यमनी राष्ट्रपति सऊदी अरब गए, देश में जश्न
विद्रोही कबाइलियों के हमले में शुक्रवार को घायल हुए यमनी राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह इस समय सऊदी अरब के शहर रियाद में इलाज करा रहे हैं। ऐसी खबरें हैं कि सालेह अब स्वदेश नहीं लौटेंगे। दूसरी ओर राष्ट्रपति के देश छोड़ने से यमन में जश्न का माहौल है। वहां पर हजारों लोकतंत्र समर्थक कई महीनों से सालेह के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। सालेह विरोधी कबाइली लड़ाके बीते 10 दिनों से राजधानी सना में यमनी सेना के साथ संघर्ष कर रहे हैं। रविवार को राजधानी सना की सड़कों पर बड़ी संख्या में लोगों ने नारे लगाकर और झंडे लहराकर राष्ट्रपति सालेह के देश से जाने की खुशी मनाई। वहां कबाइली लड़ाकों और सेना के बीच संघर्ष के चलते गोलियों की आवाजें भी सुनाई दे रही हैं। बीबीसी को मिली जानकारी के अनुसार रविवार को सना के उत्तर में स्थित सैन्य परिसर में हुए ग्रेनेड हमले में पांच लोग मारे गए। खबरें मिल रही हैं कि राष्ट्रपति सालेह की वफादार सेना और विद्रोही अल अहमर कबाइली लड़ाकों के बीच नई लड़ाई शुरू हो गई है। दूसरी ओर यमन के एक अन्य शहर तईज में गोलीबारी शुरू हो गई है, जिसमें पांच लोग मारे गए। मरनेवालों में चार यमनी सैनिक और एक हमलावर शामिल हैं। शनिवार सुबह रियाद पहुंचे संकट और विरोध का सामना कर रहे यमनी राष्ट्रपति सालेह इलाज के लिए शनिवार सुबह रियाद पहुंचे। वह शुक्रवार को राष्ट्रपति परिसर पर हुए विद्रोहियों के हमले में घायल हुए। सालेह सऊदी अरब के एक विशेष चिकित्सा विमान से शनिवार सुबह रियाद पहुंचे। इसी मस्जिद पर हुए हमले में सालेह जख्मी हुए शुक्रवार को उनके परिसर की अल नहदाईन मस्जिद पर रॉकेट हमला हुआ था, जिसमें राष्ट्रपति सालेह और उनके कई बड़े प्रशासनिक अधिकारी जख्मी हो गए थे। ये सभी लोग राजधानी सना के दक्षिण में स्थित राष्ट्रपति परिसर की मस्जिद में दोपहर बाद प्रार्थना कर रहे थे, तभी रॉकेट से हमला हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक राष्ट्रपति सालेह विमान से चलकर बाहर निकले। हालांकि उनकी गर्दन, सिर और चेहरे के जख्म साफ-साफ नजर आ रहा था। उनके परिवार के कई सदस्य भी उनके साथ मौजूद थे। सरकारी अधिकारियों ने सालेह विरोधियों का साथ दे रहे सशस्त्र कबाइली लड़ाकों पर हमले को अंजाम देने का आरोप लगाया है, जिसमें सात लोग मारे गए हैं। हालांकि उन्होंने इस आरोप का खंडन किया है। सालेह के बाद? इस बात को लेकर कई शंकाएं हैं कि सालेह कभी लौटकर यमन आएंगे या नहीं और ये भी कि अरब जगत में हुए सत्ता विरोधी प्रदर्शन की परिणति तीसरे अरब नेता के पतन के रूप में तो नहीं हुई है। राष्ट्रपति सालेह यमन पर 33 साल से शासन कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने कई विद्रोह, बगावत और गृहयुद्ध का सामना करते हुए सत्ता बरकरार रखी। राष्ट्रपति सालेह पिछले कई महीनों से लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शन और विद्रोही कबाइली नेताओं के हिंसक विरोध का सामना कर रहे हैं। पिछले हफ्ते में विद्रोही कबाइली लड़ाकों और उनकी वफादार सेना के साथ संघर्ष तेज हो गया है। अगर राष्ट्रपति सालेह सऊदी अरब से वापस नहीं आते हैं तो उनकी जगह लेने के लिए सत्ता का नया संघर्ष शुरू हो सकता है। यमन के उपराष्ट्रपति, सालेह के बड़े बेटे, दूसरे कबीलाई नेता और लोकप्रिय प्रदर्शनकारी सभी देश का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की कोशिश कर सकते हैं। उपराष्ट्रपति ने संभाली कमान मास्को : उपराष्ट्रपति अब्द-रब्बू मंसूर हादी ने कार्यवाहक राष्ट्रपति और सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर के तौर पर जिम्मेदारी संभाल ली है। यह जानकारी अल जजीरा ने रविवार को दी। समाचार एजेंसी आरआइए नोवोस्ती के अनुसार राष्ट्रपति भवन के अंदर उपस्थित मस्जिद पर उस समय हमला हुआ, जब सालेह और सरकार के शीर्ष अधिकारी वहां जुमे की नमाज अदा कर रहे थे। हमले में कम से कम तीन अंगरक्षकों की मौत हो गई और कई वरिष्ठ अधिकारी घायल हो गए। कुछ प्रारंभिक मीडिया रपटों में कहा गया है कि सालेह भी हमले में मारे गए, लेकिन यमन के सरकारी टेलीविजन ने इन खबरों का तत्काल खण्डन किया और कहा कि राष्ट्रपति स्वस्थ हैं। सालेह के खिलाफ लगभग पांच महीनों से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सालेह 33 वर्षो से सत्ता पर काबिज हैं। हाल में विरोध प्रदर्शन, सालेह के वफादारों और विपक्षी कबायली संगठनों के सैकड़ों सदस्यों के बीच बार-बार के मुठभेड़ों में तब्दील हो गया। पिछले सप्ताह इन मुठभेड़ों में 120 से अधिक लोग मारे गए थे। यमन में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो गई है।
Saturday, June 4, 2011
बेलगाम आइएसआइ ने ही कराई शहजाद की हत्या
पत्रकार सैयद सलीम शहजाद की हत्या में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ के इंकार पर एक प्रमुख अखबार के प्रकाशक ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने दावा किया है कि शहजाद को आइएसआइ ने तीन बार जान से मारने की धमकी दी थी। डॉन मीडिया समूह के प्रमुख हमीद हारुन ने कहा है कि शहजाद ने उन्हें और कुछ अन्य लोगों को बताया था कि पिछले पांच वर्षो में आइएसआइ के अधिकारी कम से कम तीन बार उन्हें जान से मारने की धमकी दे चुके हैं। उन्होंने जोर देकर कहा है कि सरकार और खुफिया एजेंसियों को शहजाद की हत्या की जांच को गंभीरता से लेना चाहिए और उनके अंतिम बयान को भी करीब से परखना चाहिए। आइएसआइ कानून से ऊपर नहीं है। पत्रकार संगठनों और मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया है कि आइएसआइ शहजाद के अपहरण और हत्या में शामिल है। हालांकि एजेंसी ने इन आरोपों का खंडन किया है। शहजाद ने लेख में अलकायदा और पाकिस्तानी नौसेना के बीच साठगांठ का जिक्र किया था। एशिया टाइम्स ऑनलाइन के पाकिस्तान ब्यूरो चीफ शहजाद रविवार शाम को इस्लामाबाद स्थित अपने घर से निकलने के बाद लापता हो गए थे। उनका शव सोमवार को पंजाब प्रांत में एक नहर से बरामद हुआ था। उस पर चोट के कई निशान थे। पत्रकार संगठनों ने मांग की है कि सरकार को शहजाद के मामले की जांच के लिए आयोग गठित करना चाहिए। ऑल पाकिस्तान न्यूजपेपर सोसाइटी के अध्यक्ष हारून ने कहा कि शहजाद ने लापता होने से पहले ह्यूमन राइट्स वाच (एचआरडब्ल्यू), एशिया टाइम्स आनलाइन और अपने पूर्व नियोजक (हारून) को ईमेल भेजे थे। उनका कहना है कि शहजाद की ओर से मीडिया में तीन लोगों को यह जानकारी देने का उद्देश्य आइएसआइ को बदनाम करना नहीं बल्कि अपनी परेशानी बताना था।
Friday, June 3, 2011
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