कोलकाता शुरू से ही जिस बात की आशंका थी वही हुआ। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध के चलते केंद्र को अंतत: तीस्ता जल बंटवारा रद करना पड़ा। साथ ही मुख्यमंत्री का सम्मान करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि राज्य की सहमति के बिना करार को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता। बावजूद इसके बनर्जी ढाका न जाने के अपने फैसले पर अडिग हैं। करार रद होने के सवाल पर मुख्यमंत्री ने सिर्फ इतना कहा कि समय आने पर वह इस बारे में बताएंगी। ममता को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार असम, त्रिपुरा, मिजोरम और मेघालय के मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की ढाका यात्रा में शामिल होना था। वैसे इस मुद्दे पर ममता बनर्जी ने अचानक ही मुंह नहीं फेरा है। करार का मसौदा तैयार होने की शुरुआत से ही पश्चिम बंगाल अपने हितों की बात कहता रहा है, लेकिन समझौते के प्रारूप को मूर्त देने में लगे रणनीतिकारों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अंतत: बनर्जी ने इस मुद्दे पर अपने स्वभाव के अनुरूप रुख अपनाया। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भले ही इसका अंदाजा नहीं था, लेकिन केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को सारी जानकारी थी, बावजूद इसके उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मसला मानकर तीस्ता जल बंटवारे के मसौदे को अंतिम रूप देने में किसी प्रकार का दखल नहीं दिया। हालांकि अंतिम क्षण में ममता को विश्वास में लेने का प्रयास जरूर किया गया, लेकिन तब तक बात बहुत आगे बढ़ चुकी थी। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन भी जब इस मुद्दे पर बातचीत करने कोलकाता आए तो ममता ने उनसे अपनी असहमति जताई थी। अंत में बांग्लादेश को कुछ अधिक पानी देने की शर्त पर मेनन मुख्यमंत्री की सहमति लेकर दिल्ली गए।
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