रहीस सिंह दक्षिण चीन सागर में आइएनएस ऐरावत से चीनी युद्धपोत की झड़प के बाद ऐरावत को तत्काल दक्षिण चीन सागर से बाहर निकालने की चेतावनी, भारतीय सीमा पर परमाणु क्षमता से संपन्न अत्याधुनिक सीएसएस-5 एमआरबीएम मिसाइलों की तैनाती और निकट भविष्य में पाक अधिकृत कश्मीर को चीन के झिंजियांग प्रांत से जोड़ने के लिए रेल लाइन बिछाने की योजना, ये सभी तथ्य यही स्पष्ट करते हंै कि चीन के इरादे ठीक नहीं हैं। इस बीच चीन ने वियतनाम के साथ मिलकर दक्षिणी चीन सागर में भारत के तेल और गैस निकालने की योजना पर एक बार फिर निशाना साधा है। सवाल यह उठता है कि यह उसके युद्धोन्मादी पक्ष की अभिव्यक्ति है या फिर आत्मरक्षा की उत्कंठा? एक विशेष वर्ग इसे केवल आत्मरक्षा से जोड़कर देख सकता है, लेकिन यह दृष्टिकोण संपूर्ण सच को व्यक्त करने वाला नहीं होगा। ऐसी खबर है कि निकट भविष्य में चीन और पाकिस्तान पाक-अधिकृत कश्मीर और चीन के झिंजियांग प्रांत के बीच रेल लाइन बिछाने वाले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार चीन और पाकिस्तान ने इस बावत आपसी बातचीत भी शुरू कर दी है। चीन में पाकिस्तान के राजदूत मसूद खान ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है। मसूद के अनुसार चीनी इंजीनियर इस परियोजना का बड़ी ही बारीकी से छानबीन कर रहे हैं और एक बार चीन से हरी झंडी मिलते ही इस परियोजना को अमल में लाया जाएगा। इस रेल परियोजना के लागू होने से चीन और पाकिस्तान के व्यापार को खासा लाभ होने की संभावना है, लेकिन इसका एकमात्र आर्थिक पक्ष ही नहीं है, बल्कि यह रेल लाइन सामरिक रूप से भी चीन और पाकिस्तान को करीब कर देगी, जो भारत के लिए अहम चिंता का विषय बन कर उभर सकता है। ऐसा कहना इसलिए युक्तिसंगत है, क्योंकि चीन लगातार ऐसी गतिविधियां चला रहा है, जो भारत के लिए सामरिक लिहाज से हितकर नहीं हैं। यह अलग बात है कि भारत की तरफ से इन चीनी हरकतों के खिलाफ कड़ा प्रतिरोध प्रदर्शित नहीं किया गया है। चीन लगातार अपनी शक्ति का विस्तार करने में जुटा हुआ है। इसलिए यह प्रश्न उभरना स्वाभाविक है कि आखिर वह ऐसा क्यों कर रहा है? चीन ने धीरे-धीरे भारत के इर्दगिर्द ऐसी शक्ति-बाधाओं का निर्माण कर लिया है, जिनकी प्रकृति भारत पर दबाव बनाने या भारत को डराने जैसी लग रही है। इंग्लैंड के फाइनेंशियल टाइम्स की खबर के मुताबिक अभी कुछ दिन पहले ही विवादित दक्षिण चीन सागर में चीनी युद्धपोत की भारतीय युद्धपोत आइएनएस ऐरावत से झड़प हो गई थी, जिसके बाद चीनी युद्धपोत ने ऐरावत को तत्काल दक्षिण चीन सागर से बाहर निकलने की चेतावनी दे डाली। सामान्य कारण तो यह है कि चीन दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा जताता रहता है, इसलिए वह इस समुद्र पर मलयेशिया, वियतनाम, ताइवान आदि के दावों को स्वीकार नहीं करता। लेकिन असल कारण यह लगता है कि भारत की लुक ईस्ट की नीति को वह अपनी स्टि्रंग ऑफ पर्ल्स को काउंटर बैलेंस करने के हथियार के तौर पर देखता है। भले ही इस घटना को भारतीय नौसेना न स्वीकार रही हो, लेकिन इतना तो मानना ही पड़ेगा कि कहीं कुछ हुआ तो था। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन द्वारा जारी की गई खबर और भी चिंता पैदा कर रही है। उसके अनुसार चीन ने रडार से बच निकलने वाले स्टील्थ लड़ाकू विमान, विमानवाहक पोत, अंतरिक्ष और क्रूज मिसाइल के विकास में सफलता प्राप्त करने के बाद चीन की सेना अत्याधुनिक हथियारों से लैस हो रही है। इसमें यह भी अनुमान लगाया गया है कि चीन प्रमुख विश्व शक्तियों के साथ प्रौद्योगिकी अंतर को वर्ष 2020 तक समाप्त कर दुनिया की बड़ी ताकत बनकर उभरेगा। उसकी रक्षा पंक्ति केवल यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि पेंटागन की एक रिपोर्ट की मानें तो उसने भारतीय सीमा पर परमाणु क्षमता से संपन्न अत्याधुनिक सीएसएस-5 एमआरबीएम मिसाइलें भी तैनात कर दी हैं। हालांकि इससे पहले उसने भारतीय सीमा पर तरल ईधन वाली सीएसएस-2 आइआरबीएम मिसाइलें तैनात कर रखी थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन ने व्यापार और उच्च स्तरीय बातचीत के जरिए भारत के साथ रिश्ते मजबूत बनाए हैं, जिसके कारण वर्ष 2010 में द्विपक्षीय व्यापार 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया। लेकिन उसने भारत के साथ अपने सीमा विवादों को हल करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है। यही कारण है कि सीमा पर उत्पन्न तनाव दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित कर रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने पिछले साल अपनी नयी दिल्ली यात्रा के दौरान मतभेदों को कुछ हद तक दूर करने का प्रयास किया था, लेकिन गंभीर बातों पर गौर नहीं किया। फलत: दोनों के बीच जो गलतफहमियां मौजूद थीं, वे अभी तक कायम हैं। रिपोर्ट पर भले ही हमारे नीतिकार ध्यान दें, लेकिन सच तो यह है कि चीन भारत के साथ अपने रिश्तों को आर्थिक क्षेत्र तक सीमित रखना चाहता है। इससे उसी का लाभ है, क्योंकि भारत का बड़ा बाजार चीन के निर्यातों के लिए पूरी तरह से खुला हुआ। इसके बावजूद वह भारत को दक्षिण एशिया में काउंटर बैलेंस करने के लिए पाकिस्तान को शक्तिशाली बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। यह बात केवल पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी हदें नेपाल, बांग्लादेश सहित कुछ अन्य देशों तक भी विस्तृत हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि सामरिक मामलों में उसका रवैया भारत विरोधी ही रहता है। फिर चाहे वह मामला तवांग मठ का हो, नत्थी वीजा को हो, पाकिस्तान को विभिन्न प्रकार की सैनिक-आणविक मदद का हो या फिर हिंद महासागर में अपनी मोतियों की माला वाली रणनीति के जरिए भारत को घेरने का। दक्षिण एशिया में अब पाकिस्तान चीन के विश्वस्त सिपहसालार की भूमिका में आ चुका है और जरदारी साहब यह इच्छा भी जाहिर कर चुके हैं कि पाकिस्तान और चीन में सीमा अवरोध पूरी तरह से समाप्त हो जाए। इसलिए चीन पाकिस्तान को सैनिक मामलों में शक्तिशाली बनाना चाहता है। इस संदर्भ में पेंटागन द्वारा दी गई रिपोर्ट का कहना है कि चीन के पाकिस्तान से नजदीकी सैन्य रिश्ते और हिंद महासागर, मध्य एशिया एवं अफ्रीका में बीजिंग की बढ़ती दखल भारत के लिए चिंता का विषय है। उसके अनुसार पाकिस्तान पारंपरिक हथियारों को लेकर चीन का प्रमुख ग्राहक बना हुआ है। चीन ने पाकिस्तान को जेएफ-17 विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक, के-8 ट्रेनर्स, एफ-7 लड़ाकू विमान, हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, पोत भेदी मिसाइलें और तकनीक मुहैया कराई है। चीन पाकिस्तान की सेना का प्रशिक्षित करने के लिए लगातार संयुक्त युद्धाभ्यास की रणनीति अपनाए हुए है। अभी कुछ समय पहले ही चीन की 101, 102 और 103 इंजीनियरिंग रेजीमेंट ने पाकिस्तानी सेना के साथ रहिमयार खान क्षेत्र के सिंध नाला व सूर्यान केट व बीकानेर से लगती सीमा के अंदर चोलिस्तान क्षेत्र के भावलपनूर व यजमान मंडी में युद्धाभ्यास किया। इस युद्धाभ्यास का मकसद चीन द्वारा पाकिस्तान को बेचे गए युद्ध के उपकरणों व हथियारों का प्रशिक्षण देना बताया गया है, लेकिन यह बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है, क्योंकि इससे पहले गैस व तेल की खोज के बहाने चीन जैसलमेर सीमा तक आ चुका है। सीमा के उस पार इस प्रकार की चीनी सक्रियता का लगातार दिखना पेशानी पर बल डालने वाला है। क्या ये गतिविधियां वास्तव में इस बात का संकेत नहीं हो सकतीं कि पूर्वी सीमा पर एक सकारात्मक स्थिति निर्मित कर लेने के बाद चीनी सेना पाकिस्तान के सहयोग से भारत की पश्चिमी सीमा पर भी वैसी ही रणनीति को अंजाम देना चाहती है? चीन की हाल भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़ी खबरें जिस तस्वीर का निर्माण करती हैं, उनसे एक बात तो बहुत हद तक साफ हो जाती है कि चीन का भारत के प्रति दोस्ताना नजरिया नहीं है। इस स्थिति में चीन प्रत्येक स्थिति में भारत की प्रगति को रोकने के साथ-साथ स्वयं को कम से कम दक्षिण एशिया में महाशक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। ऐसे में यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि चीनी सक्रियता भारत की सुरक्षा के लिए एक प्रबल चुनौती है। यह अलग बात है कि भारत का नीति-नियामक तंत्र इसे स्वीकार न करे, लेकिन यह सच है। फिलहाल इतिहास तो हमें हर क्षण यही हिदायत देता है कि हम चीन से सावधान रहें, ताकि उसे दोहराने का खतरा उत्पन्न न हो। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं
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