Monday, September 19, 2011

बहाना आरक्षण का, निशाना वोटों पर

लखनऊ विधानसभा चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री मायावती द्वारा मुसलमानों को आबादी के हिसाब से आरक्षण देने करी वकालत करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखने से सूबे की सियासत का तापमान बढ़ गया है। बसपा सुप्रीमो ने प्रधानमंत्री से इसके लिए जरूरी होने पर संविधान में संशोधन की मांग कर गेंद यूपीए सरकार के पाले में डाल दी है। वहीं, कांग्रेस एवं सपा ने इसे मायावती की मुसलमानों को गुमराह करने वाली सियासी चाल करार दिया है। कांग्रेस ने पलटवार में मुख्यमंत्री से कहा है कि मुख्यमंत्री मायावती वाकई यदि मुस्लिम समाज की फिक्रमंद हैं तो 27 प्रतिशत ओबीसी और 21 प्रतिशत अनुसूचित जाति के आरक्षण कोटे से पिछड़े एवं दलित मुसलमानों को आरक्षण देने का एलान करें। इसमें किसी भी संविधान संशोधन की जरूरत नहीं और यह राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र का मामला है। दरअसल, सूबे में सत्ता का खेल बनाने और बिगाड़े में मुसलमानों की 20 प्रतिशत से ज्यादा आबादी का अहम् रोल रहता है। यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से करीब एक तिहाई सीधे तौर पर मुस्लिम वोटों के प्रभाव में है। लगभग बीस जिलों में मुस्लिम आबादी 20 से 22 प्रतिशत के बीच है। मुसलमानों को पार्टी में वापस लाने के प्रयास में जुटी केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार ने इसी के मद्देनजर उनके कल्याण के लिए करीब एक दर्जन से अधिक योजनाएं लागू की है। ऐसे में बसपा प्रमुख मायावती ने मुसलमानों को आबादी के हिसाब से आरक्षण का मुद्दा उठाकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। मसलन, मायावती ने एक तरफ जहां दलित-मुस्लिम समीकरण बनाने का दांव चला है। वहीं, मुसलमानों को रिझाने में पूरी शिद्दत से जुटी सपा और कांग्रेस का खेल बिगाड़ने का प्रयास किया है। जाहिर है मायावती के इस दांव से मुस्लिमों का खैरख्वाह बनने की होड़ में जुटीं सपा व कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ीं हैं। विधानपरिषद में कांग्रेस के नेता नसीब पठान कहते है कि प्रधानमंत्री को पत्र लिखने से पहले मुख्यमंत्री को अपने कार्यकाल में अल्पसंख्यक हित में किए कार्य गिनाने चाहिए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व मुस्लिम रिजर्वेशन मूवमेंट की केंद्रीय कार्यसमिति सदस्य हाजी युसूफ कुरैशी कहते है कि बसपा मुस्लिमों की वाकई फिक्रमंद है तो उसे मंडल कमीशन की सिफारिश के मुताबिक ओबीसी कोटे में मुस्लिमों की 27 पिछड़ी जातियों का 9 प्रतिशत कोटा सुनिश्चित कर देना चाहिए, क्योंकि इसके लिए संविधान संशोधन की जरूरत नहीं है। राज्य सरकार अनुसूचित जाति के 21 प्रतिशत आरक्षण कोटे में भी मुस्लिम दलितों के लिए स्थान सुरक्षित करना चाहिए। सपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ.मसूद का आरोप है कि बसपा के पूरे कार्यकाल में मुस्लिमों को अपमानित करने के अलावा कुछ नहीं हुआ। मुख्यमंत्री ईमानदारी के साथ बताए कि उन्होंने कितने मुस्लिमों को नौकरियां दी? मसूद का दावा है कि मुस्लिमों के हितों की लड़ाई पूरे मुल्क में केवल मुलायम सिंह ही लड़ रहे है। मुलायम के शासन में पीएसी व पुलिस में मुस्लिमों की खुले दिल से भर्ती हुई, उर्दू को सम्मान दिलाया। मुसलमान अब किसी के बहकावे में आने वाला नहीं है। भाजपा जैसी पार्टी भी इस बार मुस्लिमों को मैनेज करने के लिए हाथ पैर मार रही है। मुस्लिम स्वाभिमान सम्मेलन करने के अलावा भाजपा अपने चुनावी एजेंडे से ऐसे मुद्दों की धीरे धीरे छंटनी कर रही है। जिनसे मुस्लिमों की मानसिकता भाजपा को हराने के लिए वोट करने की बनी। उमा भारती जैसी फायरब्रांड नेता का पिछड़े मुस्लिमों को आरक्षण कोटे की तरफदारी करना इसी रणनीति का हिस्सा है। जबकि भाजपा से चुनावी गठजोड़ की नीति छोड़ रालोद जैसे छोटे दल भी मुस्लिम वोटों को ध्यान रखते हुए मुसलमानों को दस प्रतिशत आरक्षण की पैरोकारी कर रहे हंै। पीस पार्टी, उलेमा काउंसिल व नेलोपा जैसी करीब आधा दर्जन पार्टियां मुस्लिम एकजुटता के नारे पर सत्ता पाने की कोशिशों में लगी है

No comments:

Post a Comment