Monday, September 19, 2011

दिल्ली कूच से पहले सूबे में रिकॉर्ड जीत का लक्ष्य

 अहमदाबाद उपवास को लांचिंग पैड बनाकर दिल्ली कूच करने को तैयार नरेंद्र मोदी पहले गुजरात में मिशन इंपासिबिल को अंजाम देने में जुट गए हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए अकाली दल के बाद शिवसेना से भी समर्थन मिलने के बाद दिल्ली की सियासत में उनके प्रवेश की पेशबंदी और मजबूत हो गई है, लेकिन उससे पहले मोदी ने 2012 के विधानसभा चुनाव में असंभव लगने वाले 150 सीटों के आंकड़े को पार करने का लक्ष्य साध लिया है। गुजरात के इतिहास में सर्वाधिक सीटें जीतने का रिकॉर्ड बनाकर वह बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में क्रमश: नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और जयललिता के आगे बड़ी लकीर खींचने की तैयारी में जुट गए हैं। मोदी कब बोलते हैं और कब चुप रहते हैं? इसके न सिर्फ गुजरात बल्कि दिल्ली की सियासत में भी हमेशा से खासे मायने रहे हैं। दंगों के मामलों की सुनवाई गुजरात में ही कराए जाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश और वीजा न देने वाले अमेरिका की सराहना पाने के बाद मोदी यकायक सक्रिय जरूर हुए, लेकिन केंद्रीय सियासत में धमाकेदार प्रवेश की उनकी तैयारी पुरानी है। सियासत की टाइमिंग में माहिर मोदी ने अपने 61वें जन्मदिन पर तीन दिन के उपवास के साथ सद्भावना मिशन के जरिए सांप्रदायिकता के मोर्चे पर दामन पर लगे दाग धोने की कोशिश तो शुरू कर ही दी है। वास्तव में केंद्रीय राजनीति में जाने और राजग में स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए यह मोदी की फौरी जरूरत भी है, लेकिन गुजरात की 183 विधानसभा सीटों में से माधव सिंह सोलंकी का 147 सीटों में जीत का असंभव सा लगने वाला रिकॉर्ड तोड़ने की मंशा उनके एजेंडे में सबसे ऊपर है। गुजरात की सियासत में फिलहाल मोदी के सामने उनके कद का कोई नेता नहीं है। अब उन्होंने मुस्लिमों और आदिवासियों की बहुलता वाले मध्य गुजरात में अपनी सोशल इंजीनियरिंग तेज कर दी है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को इस इलाके में 2002 के चुनाव के मुकाबले करीब डेढ़ दर्जन सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था। इसकी भरपाई के लिए उन्होंने 2010 के स्थानीय निकाय चुनाव से ही मुस्लिमों के बीच पैठ बढ़ाने की शुरुआत कर दी थी। स्थानीय निकाय चुनाव में करीब 200 मुस्लिम प्रत्याशी भाजपा के टिकट पर जीते। मोदी के प्रबंधक एक-एक सीट का गणित लगाकर मिशन-150 की तैयारी में जुट गए हैं। मतलब साफ है कि अगर अकेले दम पर मोदी दो-तिहाई बहुमत के साथ भाजपा को सत्ता में वापस लाते हैं तो यह गठबंधन बनाकर लड़े नीतीश-ममता और जयललिता से बड़ी लाइन तो होगी ही, साथ ही इतनी सीटें गुजरात में लाने के बाद सांप्रदायिकता के आरोपों की ढाल भी उनके पास होगी

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