गंगटोक भारत में हमारी सरकार हमें नहीं बचा पा रही। चीन आ जाएगा तो क्या करेगी ? आक्रोश भरा यह सवाल सिक्किम की राजधानी गंगटोक में उठ रहा है। ये सब भूकंप से पीडि़त वे लोग हैं, जिनके नाते-रिश्तेदारों का पांच दिनों बाद भी अता-पता नहीं है। इन पीडि़तों के सब्र का बांध टूट रहा है- वे आपा खो रहे हैं। गुरुवार को दैनिक जागरण से मुखातिब लोगों में आक्रोश था। सब लोग गंगटोक आकर यहीं से लौट जा रहे हैं..। बाहर के लोगों को पता नहीं चल रहा कि हकीकत क्या है। क्या हम भारत के नागरिक नहीं हैं? हमारी आवाज दिल्ली तक नहीं पहुंच रही है। नेता लोग हॉस्पिटल में घायलों से मिलकर चले गए। ल्हाचुंग क्यों नहीं जाते? पता नहीं लोग वहां जिंदा हैं भी या नहीं। जो मर गए, वो मर गए। जिंदा लोगों को तो बचा लीजिए। हम कह रहे, हमें हेलीकॉप्टर से वहां ले चलिए। कोई नहीं ले जा रहा। कह रहे, हेलीकॉप्टर लैंड नहीं होगा। पैदल चलकर लोग वहां से कैसे आ गए? गोद में अबोध बच्चे को लिए सोनम लांबा की बातों में दर्द भी है, उम्मीद भी और आक्रोश भी। उस जैसे तमाम लोग हैं। दरअसल, सर्वाधिक प्रभावित उत्तरी सिक्किम के गांव-कस्बों को लेकर पता ही नहीं चल पा रहा कि वहां कौन मरा और कौन बचा। बस्तियां बची भी हैं या नहीं। हालांकि सेना के जवान दिन-रात बचाव कार्य में लगे हुए हैं, लेकिन संसाधनों की यहां कमी भी है। हाल तो गंगटोक का देख लीजिए। नहाना दूर, पीने का पानी मुश्किल है। टैंकरों से जैसे-तैसे पानी पहुंचाया जा रहा है, तो ल्हाचुंग जैसे इलाके में जिंदा बचे लोगों का हाल क्या होगा ? लुचुआ कहती हैं, चिदंबरम साहब आए थे। हम लोगों ने मिलने की कोशिश की, मुलाकात नहीं हो सकी। लुचुआ कहती है, मेरे माता-पिता वहां फंसे हुए हैं, पांच दिन हो गए। कोई अता-पता नहीं। हम दो बहनें यहां गंगटोक में अकेली हैं। गुस्सा स्थानीय मशीनरी से लेकर दिल्ली तक पर बरस रहा। स्थिति भयावह है। संसाधन सीमित। राहत-बचाव कार्य बेशक चल रहा है, अपने नाते-रिश्तेदारों से बेखबर लोग क्या करें। सो, वे गुस्से में हैं
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