Tuesday, September 27, 2011

समुद्र में चीन की चुनौती

17 सितंबर को चीन ने घोषणा की है कि वह हिंद महासागर की तलहटी में खनिज तलाशी विस्तार योजना चलाएगा। पॉली मेटलिक सल्फाइड अयस्क को खोजने के लिए क्षेत्र विस्तार की अनुमति उसे अंतरराष्ट्रीय प्राधिकरण से मिली है। पॉली मेटलिक सल्फाइड एक ऐसा खनिज है जिसमें तीन या उससे अधिक धातुएं बड़ी मात्रा में पाई जाती है। चीन को पहले ही दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर तलहटी में दस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अयस्क खोजने की अनुमति मिली हुई है। अब नई अनुमति से उसके समुद्री क्षेत्र के विस्तार की संभावनाएं बढ़ गई हैं। चीन की इस योजना से भारत का चिंतित होना स्वभाविक है क्योंकि इससे भारत की सुरक्षा को खतरा बढ़ेगा। भारत के लिए समस्या यह है कि चीन का समुद्री खनिज संसाधन शोध एवं विकास संघ वर्ष 2011 के अंत तक अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण के साथ 15 वर्ष के लिए समझौता करने जा रहा है जिससे वह इस क्षेत्र को अयस्क धरोहर के रूप में विकसित कर सके। यदि ऐसा हुआ तो चीन भारत के पिछले हिस्से में अपने युद्धपोतों के संचालन के साथ-साथ भारतीय सामुद्रिक क्षेत्र की निगरानी भी कर सकेगा जो भारत के लिए खतरनाक सिद्ध होगा। 10 अगस्त, 2011 को चीन ने अपने पहले विमानवाहक पोत का जलावतरण करके हिंद महासागर व प्रशांत क्षेत्र में अपनी नौसैनिक शक्ति दिखा दी है। इस पोत को ऐसे समय पर समुद्री परीक्षण के लिए भेजा गया है जब चीन और आसियान समूह के कई देशों के बीच दक्षिण चीन सागर के द्वीप समूहों को लेकर विवाद बढ़ गया है। चीन के सैन्य अधिकारियों के मुताबिक इसका इस्तेमाल अनुसंधान प्रयोग और प्रशिक्षण के लिए किया जाएगा। जबकि सत्यता यह है कि इस पोत से चीनी नौसेना में एक नया आयाम जुडे़गा जो हिंद महासागर में एक बड़ी चुनौती बन सकता है। अब चीन विदेशों में भी अमेरिका की तरह अपने अड्डे भी बना सकता है जो एक गंभीर समस्या है। चीन की बढ़ती सैन्य महत्वाकांक्षा पर अमेरिका की भी चिंता बढ़ गई है। उधर चीन के मुताबिक अभी तक सुरक्षा परिषद के प्रमुख पांच देशों में चीन ही अकेला ऐसा देश था जिसके पास विमानवाहक पोत नहीं था। जबकि अमेरिका, रूस, भारत, जापान व दक्षिण कोरिया के पास यह ताकत थी। चीनी नौसेना में अभी बेइहाई, डोगहाई व ननहाई नामक तीन बेडे़ हैं। इन सभी के अपने सपोर्ट अड्डे, छोटे बेड़े, समुद्री गैरिसन कमांड, विमान डिविजन व समुद्री ब्रिगेड है। अब चीन ने प्रशांत महासागर के साथ-साथ हिंद महासागर में भी अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। इसके लिए उसने म्यांमार, श्रीलंका व बांग्लादेश से सामरिक संबंध बना लिए हैं। इस पोत से पहले चीन ने प्रशांत महासागर में 5057 मीटर की गहराई पर अपनी पनडुब्बी जियोओलांग का 27 जुलाई, 2011 को सफल परीक्षण किया। परीक्षण के दौरान यह पनडुब्बी प्रशांत महासागर के अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में 5057 मीटर की गहराई तक पहुंच गई। महासमुद्री प्रशासन (एसओए) के मुताबिक यह पनडुब्बी दुनिया में समुद्र के 70 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र में पहुंच सकती है। इस उपलब्धि के बाद चीन समुद्री स्तर से 3500 मीटर से अधिक गहराई तक पनडुब्बी भेजने वाले अमेरिका, फ्रांस, रूस व जापान के बाद 5वां देश बन गया है। लेकिन गहराई के मामले में चीन प्रथम है। अपनी सामुद्रिक शक्ति में इजाफा करने के उद्देश्य से चीन सामुद्रिक क्षेत्र में अत्याधुनिक कैरियर मिसाइलों को तैनात कर रहा है। यह पोतरोधी मिसाइल है। यह मिसाइल चीन की डीएफ-21डी मिसाइलों का उन्नत रूप है। इसकी मारक क्षमता 20,000 किलोमीटर है। यह मिसाइल तेज गति से चलने के साथ-साथ किसी भी आधुनिक युद्धपोत को 900 किलोमीटर की दूरी से भेद सकती है। इन्हें समुद्र के साथ-साथ जमीन से भी दागा जा सकता है। चीन का मानना है कि इन मिसाइलों की तैनाती से अमेरिकी नौ सेना के वर्चस्व को रोकने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि चीन अपनी जल सीमा के निकट किसी भी विदेशी युद्धपोतों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। (लेखक सैन्य विज्ञान विषय के प्राध्यापक हैं

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