हिमालय पर्वतमाला उत्पत्ति की दृष्टि से दुनिया में सबसे युवा पर्वतमाला है और समूचा क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि बहुत ही हलचल वाला होने की वजह से भूकंप-संभावित क्षेत्र है। दुनिया के सारे महाद्वीप, छोटे टापू और समुद्र सात-आठ विशाल ठोस शिलाखंडों पर टिके हुए हैं। ये शिलाखंड पृथ्वी के भीतरी भाग में पिघली हुई चट्टान के ऊपर तैरते रहते हैं। हमारा भारतीय उपमहाद्वीप भी एक विशाल शिलाखंड पर बसा हुआ है। इस शिलाखंड को टेक्टोनिक प्लेट के रूप में भी जाना जाता है। भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक यह भारतीय टेक्टोनिक प्लेट हर साल 5-6 सेंटीमीटर की रफ्तार से उत्तर की तरफ बढ़ रही है और एशियाई प्लेट से टकरा रही है। आज हम हिमालय के जिस अलौकिक रूप को देख कर गदगद होते हैं वह भारतीय प्लेट और एशियाई प्लेट की टक्कर के कारण ही अस्तित्व में आया है। करीब 5.5 करोड़ वर्ष पहले शुरू हुई यह प्रक्रिया इस वक्त भी जारी है। प्लेटों की टक्कर के फलस्वरूप कई वर्षो तक दबाव बनता रहता है जो किसी दिन भूकंप के रूप में बाहर निकलता है। यही वजह है कि इस क्षेत्र को समय-समय पर भूकंपीय गतिविधियों का भयानक रूप देखना पड़ता है। हिमालय क्षेत्र में रिकॉर्ड किया गया पहला भूकंप 1255 में काठमांडू में आया था। इस भूकंप से एक-तिहाई नेपाल नष्ट हो गया था। जून, 1505 में आए भूकंप ने दक्षिणी तिब्बत में कई बौद्ध मठ तबाह कर दिए थे। इसके एक महीने बाद ही एक बड़ा भूकंप अफगानिस्तान में आया था। कश्मीर में भूकंप का पहला रिकार्ड 1555 का है जिसमे सैकड़ों लोग मारे गए थे। इसके बाद इस क्षेत्र में आए सभी बड़े भूकंपों के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। पिछले 200 वर्षो के दौरान इस क्षेत्र ने कई बड़े भूकंप झेले हैं। 1833 में नेपाल के भूकंप, 1897 में असम के भूकंप,1905 में कांगड़ा भूकंप और 1934 में बिहार-नेपाल के भूकंप ने जानमाल का भारी नुकसान किया था। हाल के समय में उत्तरकाशी (1991), चमोली (1999) और कश्मीर (2005) को बड़े भूकंप झेलने पड़े हैं। इन सभी भूकंपों ने भारी तबाही मचाई थी। भूकंप वैज्ञानिक पिछले काफी समय से पूर्वोत्तर भारत में एक बड़े भूकंप की चेतावनी दे रहे थे। समझा जाता है कि बड़े भूकंप प्राय: एक भूकंपीय चक्र का अनुसरण करते हैं। किसी क्षेत्र में भूकंपीय दबाव के एकत्र होने और उसके भूकंप की शक्ल में विस्फोटित होने में वक्त लगता है। यदि हिमालय के किसी क्षेत्र में 7 से ऊपर की तीव्रता का भूकंप आता है तो उसी इलाके में वैसा भूकंप कई दशक बाद आएगा। दूसरी बात यह है कि यदि उस क्षेत्र में लंबे अरसे से बड़ा भूकंप नहीं आया है तो वहां बड़े भूकंप की आशंका को गंभीरता से लेना चाहिए। भारतीय भूकंप वैज्ञानिक के खत्री और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलराडो के प्रोफेसर रोजर बिल्हेम ने मध्य हिमालय में एक ऐसे भूकंपीय क्षेत्र की पहचान की थी जहां पिछले 200 वषरें के दौरान कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है। बिल्हेम के अध्ययन से पता चलता है कि भारतीय टेक्टोनिक प्लेट हिमालय के नीचे एक बड़ी दरार के साथ हर वर्ष करीब 1.8 सेंटीमीटर की रफ्तार से बढ़ रही है। प्लेट की यह हलचल विनाशकारी भूकंपों के रूप में प्रकट होती है। हिमालय क्षेत्र में पिछले कई वषरें से एक बड़े भूकंप के न आने का अर्थ यह था कि इस क्षेत्र में भूकंपीय दवाब कभी भी फूट पड़ेगा। वैसे पूर्वोत्तर भारत में पिछले कई वर्षों से मध्यम और कम तीव्रता के झटके महसूस किए जाते रहे हैं। केंद्रीय भूकंपीय वेधशाला के रिकार्ड के मुताबिक इस क्षेत्र ने 2009 में कम और मध्यम तीव्रता के 34, 2008 और 2006 में 26-26 झटके महसूस किए थे। हिमालय के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में भूकंप से निपटना एक बड़ी चुनौती है। विपदा घट जाने पर बचाव कार्य भी आसान नहीं है। सिक्किम में रविवार की शाम आए भूकंप के कई घंटे गुजरने के बाद भी राहतकर्मियों को प्रभावित इलाकों में पहुंचने में खासी कठिनाई हो रही है। हिमालय से सटे सभी इलाकों के भूकंप-संभावित होने के कारण सरकार को वहां ऐसा ढांचा खड़ा करना चाहिए जो भूकंप के आघात को झेल सके। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं
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