विशेषज्ञों ने भारत-चीन-अफ्रीका सहयोग का सुझाव दिया हैकू (चीन) : अफ्रीका में भारत और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता की अटकलों के बीच चीनी विद्वानों ने नई दिल्ली, बीजिंग और अफ्रीकी महाद्वीप के बीच त्रिपक्षीय सहयोग की पेशकश की है। इसमें इनके नीति-निर्माताओं और शिक्षाविदों की बातचीत शामिल की जा सकती है। अफ्रीका स्टडी सेंटर की निदेशक ली रोंक ने चाइना इंस्टीट्यूट फॉर कंटेमपररी इंटरनेशनल रिलेशंस में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कहा, भारत, चीन और अफ्रीका के आर्थिक हित समान हैं। इनके बीच त्रिपक्षीय सहयोग अंतरराष्ट्रीय शांति, स्थिरता एवं समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान होगा। ली ने कहा, त्रिपक्षीय सहयोग का दूरगामी रणनीतिक महत्व होगा और यह विश्व में समानता लाएगा। साथ ही यह अफ्रीका में और अधिक अवसर पैदा कर सकता है। हैकू स्थित थिंक टैंक हेनान इंस्टीट्यूट फॉर वर्ल्ड वॉच की ओर से आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए शोध प्रोफेसर मा जियाली ने कहा, भारत-चीन, अफ्रीका में अपने आर्थिक एवं राजनीतिक संबंधों का विस्तार कर उसके साथ एतिहासिक संबंध बना रहे हैं। एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रूप में भारत अपने तथा दक्षिण अफ्रीका के विकास को बढ़ावा देने की स्थिति में है। चीन भी अफ्रीका के साथ सभी क्षेत्रों में संबंध का विस्तार कर रहा है। अफ्रीका में भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा हो सकती है, लेकिन प्रतिद्वंद्विता नहीं है। शंघाई नॉर्म यूनिवर्सिटी में अफ्रीकन स्टडी के लियू वीकाई ने कहा कि चीनी कम्पनियां अफ्रीका स्थित भारतीय कंपनियों से प्रक्रियाओं पर विशेषज्ञता एवं मार्गदर्शन हासिल कर सकती हैं। उन्होंने सलाह दी कि भारत और चीन को अफ्रीका के साथ एक-दूसरे के सम्मेलन में अपने प्रतिनिधि भेजने चाहिए, ताकि अफ्रीकी महाद्वीप में साथ मिलकर काम करने को लेकर भरोसा बहाल किया जा सके। चीनी विशेषज्ञों के इस त्रिपक्षीय सहयोग के विचार को अफ्रीका में सहयोग को लेकर अमेरिका तथा जापान के साथ भारत की शुरू होने वाली वार्ता से जोड़कर देखा जा रहा है। बीजिंग इसे अपनी उभरती शक्ति की राह में बाधा की तरह देख रहा है। दक्षिणी चीन सागर में भारत के प्रवेश से ड्रैगन को लग रहा डर बीजिंग, एजेंसी : विवादित दक्षिणी चीन सागर में भारत के प्रवेश से चीन खासा चिंतित है। वियतनाम के साथ मिलकर दक्षिणी सागर में तेल खोजने के भारत के फैसले से ड्रेगन बेहद सशंकित है। चीन के रक्षा के विशेषज्ञों के मुताबिक, हमारे विरोध के बावजूद वियतनाम की मदद से दक्षिणी चीन सागर में भारत के प्रवेश का मकसद बीजिंग विरोधी रणनीति का ही एक हिस्सा है। उनका कहना है कि म्यांमार और पाकिस्तान के साथ चीन के बढ़ते सामरिक रिश्तों के जवाब के रूप में भारत वियतनाम से दोस्ताना संबंध विकसित कर रहा है। शंघाई स्थित फुदान यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के अध्ययन केंद्र के निदेशक शेन दिंगली के अनुसार, दक्षिणी चीन सागर में वियतनाम के सहयोग से तेल खोजने का भारत का निर्णय सीधे-सीधे चीन के विरोध की रणनीति का हिस्सा है। सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स के साथ बातचीत में शेन ने कहा, यह एक भड़काऊ कदम है। बीजिंग के विरोध के बावजूद दक्षिणी सागर में भारत का प्रवेश यह दर्शाता है कि वह पाकिस्तान और म्यांमार के साथ चीन की मजबूत होती दोस्ती से खासा परेशान है। पाकिस्तान द्वारा चीन को हिंद महासागर में नौसेना बंदरगाह बनाने का प्रस्ताव देने के बाद से भारत की चिंता ज्यादा बढ़ गई है। इसीलिए वह तेल खोजने के बहाने दक्षिणी चीन सागर में अपनी दखल बढ़ा रहा है। जब से भारतीय कंपनी ओएनजीसी ने वियतनाम के नियंत्रण वाले दक्षिणी चीन सागर के दो ब्लाकों में तेल खोजने का जिम्मा संभाला है, तब से चीन भड़का हुआ है। चीन की सरकारी मीडिया ने तो इस मुद्दे पर भारत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। एक अन्य रक्षा विशेषज्ञ वु झिंबाओ का कहना है कि भारत एक सोची समझी रणनीति के तहत दक्षिणी सागर में अपनी दखल बढ़ा रहा है। यह चीन के हित में नहीं है। अमेरिका के इशारे पर भारत, चीन को चुनौती देने की रणनीति पर काम कर रहा है। ध्यान रहे कि तेल के भारी भंडार के लिए मशहूर दक्षिणी चीन सागर एक विवादित जल क्षेत्र है। उस पर चीन के अलावा वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और फिलीपींस भी अपना हक जताते हैं
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