Monday, September 19, 2011

प्रमोद भार्गव भारतीय संविधान धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के मतभाव की अनुमति

प्रमोद भार्गव भारतीय संविधान धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के मतभाव की अनुमति नहीं देता, बावजूद इसके कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि एक ऐसे मसौदे को कानूनी रूप दिए जाने की कवायद की जा रही है, जो समाज को शत्रुता के दो समूहों, मसलन हिंदू और मुस्लिमों में बांटने वाला तो है ही, प्रस्तावित विधेयक प्रारूप जाति के आधार पर असहिष्णुता को भी बढ़ावा देने वाला है। यदि यह विधेयक कालांतर में कानूनी रूप ले लेता है तो समाज में इससे कटुता का इतना विस्तार होगा कि विभिन्न संप्रदायों के बीच सद्भाव के चलते जीविकोपार्जन और भिन्न आर्थिक लेन-देन में जो परस्पर निर्भरता है, वह बुरी तरह प्रभावित होगी। इसमें कई ऐसे आपत्तिजनक प्रावधान भी हैं, जो राज्यों के संघीय ढांचे और स्वायत्तता को सीधे चुनौती साबित होंगे। हैरानी यहां इस बात पर भी है कि जब अन्ना हजारे का नागरिक समाज जनलोकपाल विधेयक को कानून का दर्जा देने की मांग करता है तो खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि यह संविधान और संसद की सर्वोच्चता को चुनौती है, लेकिन जब सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली गैर संवैधानिक संस्था राष्ट्रीय सलाहकार परिषद सांप्रदायिक व लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक 2011 को कानूनी दर्जा देने की बात करती है तो इस मसौदे पर चर्चा के लिए खुद प्रधानमंत्री हाजिर होकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों या उनके प्रतिनिधियों से मुखातिब होकर सलाह मशविरा करते हैं? वह भी एक ऐसे मसौदे पर जिसे आहूत बैठक का बहुमत खतरनाक व समुदायों को बांटने वाला कहकर सिरे से खारिज कर देता है। विडंबना देखिए, संसद की संप्रभुता यहां प्रभावित नहीं होती? क्योंकि इस प्रारूप में खासतौर से कांग्रेस का एक ऐसा गुप्त एजेंडा अंतर्निहित है, जो उसके मुस्लिम वोट बैंक को पुख्ता करने की पूर्व पीठिका रचता है। हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द की परिभाषा भले ही स्पष्ट न हो, लेकिन संविधान में विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच सांप्रदायिक सद्भाव बना रहे, इसके आधार सशक्त हैं। इसलिए फिलहाल सांप्रदायिकता विरोधी ऐसा नया कानून अपेक्षित ही नहीं है, जो बहुसंख्यक समाज की सांप्रदायिक हिंसा को पृथक से रेखांकित करे। ऐसा कोई कानून भविष्य में लाया भी जाता है तो वह सांप्रदायिकता को हवा ही देगा। ऐसा कानून तब और खतरनाक साबित होता है, जब उसे बहुसंख्यक समाज की कथित सांप्रदायिकता की काट के लिए एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की दृष्टि से अमल में लाए जाने कोशिश की जाती है। कांग्रेस, वामपंथी और समाजवादी दलों की कमोबेश हमेशा यह चेष्ठा रही है कि हिंदू सांप्रदायिकता की काट मुस्लिम और ईसाई सांप्रदायिक कार्ड खेलकर की जाए। यह स्थिति विशुद्ध रूप से वोट बैंक मजबूत करने की कुटिल राजनीति है। सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक-2011 नाम के इस कानून के मसौदे को सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने तैयार किया है। इस मसौदे में भागीदारी भी सैय्यद शहाबुद्दीन और तीस्ता सीतलवाड़ जैसे उन नुमाइंदों की रही है, जिनके धर्मनिरपेक्ष चरित्र को निर्विवाद नहीं माना जा सकता। इस कानून की विडंबना और दुविधा यह है कि यह किन्हीं दो धार्मिक समुदाओं के बीच सद्भावना व सहानुभूति पैदा करने की बजाय कटुता व दूरी बढ़ाने का काम करेगा। हालांकि इस कानून का वजूद में आना इतना आसान नहीं है, लेकिन इससे इतना साफ हो गया है कि मनमोहन सिंह और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का मकसद सिर्फ अल्पसंख्यक मतदाताओं को कांग्रेस की ओर लुभाना भर है। सत्ता में बने रहने की इसी मंशा के चलते केंद्र सरकार जेहादियों, माओवादियों और राष्ट्र विरोधी तत्वों के प्रति तो न केवल नरम रुख अपना रही है, बल्कि देश के दुश्मनों को मनमानी करने की छूट भी दे रही है। बहुसंख्यक हिंदुओं को दंगाई घोषित करने का अर्थ होगा देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को खो देना। मुस्लिम अल्पसंख्यक कितने धर्मनिरपेक्ष हैं, इसका उदाहरण कश्मीर है, जहां लगभग समस्त हिंदू आबादी पलायन कर चुकी है। राष्ट्रीय एकता व संप्रभुता कायम रखने के नजरिये से होना तो यह चाहिए कि सोनिया गांधी और उनकी परिषद समान नागरिक कानून बनाने की पहल करती और सरकार व संसद उसे कानूनी दर्जा दिलाते, लेकिन कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हो विपरीत रहा है, वह भी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीतिक पृष्ठभूमि में महज वोटों के ध्रुवीकरण के लिए। वैसे भी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद एक गैर संवैधानिक संस्था होने के साथ, केवल सोनिया गांधी के आभा मंडल को महिमा मंडित बनाए रखने के लिए है, न कि सुपर कैबिनेट की भूमिका में आकर अपनी राय थोपने के लिए? इसीलिए प्रस्तावित कानून के मसौदे का जो मजमून बाहर निकलकर आया है, उससे साफ हो गया है कि परिषद के नुमाइंदे पूर्वग्रही दुष्टि से काम ले रहे हैं। उन्होंने पहले से ही मान लिया है कि सांप्रदायिक हिंसा फैलाने के लिए केवल बहुसंख्यक समाज जिम्मेवार है। जबकि यह नजरिया भ्रामक है। हकीकत यह है कि देश में जब तक बहुसंख्यक समाज धर्मनिरपेक्ष व समावेशी भावना का अनुगामी है, तभी तक देश की धर्मनिरपेक्षता बहाल रह सकती है। इस विधेयक को कानूनी जामा पहना दिया जाता है तो स्वाभाविक है कि न केवल देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र खतरे में पड़ जाएगा, बल्कि सांप्रदायिक दुर्भावना को भी मजबूती मिलेगी। इसलिए यह पक्षपातपूर्ण विधेयक वजूद में लाने की बजाय, ऐसे कारगर उपाय अपनाने चाहिए, जिससे 1984 के सिख विरोधी और 2002 जैसे गुजरात के मुस्लिम विरोधी दंगों के हालात बने ही नहीं। ख्याल इस बात का भी रखना चाहिए कि कश्मीर और पश्चिम बंगाल के देगंगा में जिस तरह से बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी ने हिंदुओं को खदेड़ा है, उसकी पुनरावृत्ति तो हो ही नहीं, उनकी मूल निवास स्थलों में वापसी भी हो। जब संविधान और व्यवस्था हमें समान नजरिया देने के हिमायती हैं तो परिषद या सरकार को क्या जरूरत है कि वह इसे बांटकर संकीर्णता के दायरे में तो लाए और भावनाओं को भड़काकर विस्फोटक हालात भी पैदा करे। क्योंकि मसौदे में जिस तरह से सांप्रदायिक व जातीय हिंसा को समूह के आधार पर परिभाषित किया गया है, वह हालातों को तो दूषित करने वाली है ही, रोकथाम के उपायों को भी विरोधाभासी नजरिये से देखता है। समूह की परिभाषा के मुताबिक इस दायरे में भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यक तो आएंगे ही, अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां भी आएंगी। जबकि वर्तमान स्थितियों में ये जातियां अत्याचार निवारण कानून के दायरे में आती हैं। तय है, एक जाति के दुराचार से संबधित दो तरह के कानून आशंकाएं पैदा करेंगे। मसौदे का जो ब्यौरा सामने आया है, उसके एक अध्याय में यह भी विसंगति है कि सांप्रदायिक हिंसा के जो मामले सामने आएंगे, उनको अलग-अलग वर्गो में बांटकर देखा जाएगा। इन मामलों को केंद्र सरकार जांचेगी-परखेगी, जबकि हमारे संघीय ढांचे में यह जिम्मेवारी राज्य सरकारों की है। यह प्रस्ताव या विचार इस बात का संकेत है कि जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं, उनके कानूनी अधिकारों पर केंद्र सरकार अतिक्रमण करना चाहती है। केंद्र सरकार के माध्यम से इस कानून का जो समिति अमलीकरण करेगी, उसमें सात सदस्य होंगे। यह समिति एक प्राधिकरण के रूप में वर्चस्व में आएगी, जिसे पर्याप्त स्वायत्तता दिए जाने की उम्मीद है। इसमें हैरानी में डालने वाली बात यह भी है कि इसके चार सदस्य अल्पसंख्यक समुदायों से होंगे। इसके उलट इस तरह के मामलों में जो लोग अपराध के दायर में आएंगे, वे बहुसंख्यक समुदायों से होंगे। इससे समिति के प्रति न्याय की कसौटी पर खरी उतरने की आशंका हमेशा बनी रहेगी। इस प्रारूप से यह भी दृष्टि झलकती है कि सांप्रदायिक हिंसा के लिए दोषी केवल बहुसंख्यक समाज है। ऐसे मामलों में अल्पसंख्यकों को दोषी नहीं माना जाएगा, जबकि अपराध एक प्रवृत्ति होती है, और वह किसी भी समाज के व्यक्ति में हो सकती है। इस प्रवृत्ति का वर्गीकरण हम अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक दायरों में नहीं कर सकते। आपराधिक मामले चाहे वे किसी भी प्रकार के हों, उन्हें एकपक्षीय दृष्टि से नहीं देखा जा सकता है। इस दृष्टि का दुष्परिणाम हम दहेज, बलात्कार और दलित उत्पीड़न से संबंधित मामलों में देख भी चुके हैं। वैसे भी एकांगी कानूनों ने अब तक सामाजिक समरसता बढ़ाने की बजाय सामाजिक कटुता ही बढ़ाने का काम किया है। इसलिए यह मसौदा कानून का रूप ले, इससे पहले इसे एकांगी पक्षधरता रखने वाले कानूनों की कसौटी पर भी परखना चाहिए। इस कानून में यह भी साफ नहीं है कि जो सार्वजनिक समानता का भाव पैदा करने वाले मुद्दे हैं, उनके परिप्रेक्ष्य में इस कानून की क्या भूमिका परिलक्षित होगी। यदि कोई राजनीतिक दल धारा 370 हटाने, समान नागरिक संहिता को लागू करने और संसद के हमलावर अफजल गुरु को फांसी देने की मांग करते हैं तो क्या ये बहुसंख्यक समाज के आंदोलनकारी इस कानून के मातहत अभियुक्त के रूप में देखे जाएंगे? जिस कश्मीर से अल्पसंख्यक हिंदुओं को बेदखल कर दिया गया है तो क्या उन्हें बेदखल करने वालों के विरुद्ध इस कानून के तहत मुकदमे चलाए जाएंगे? जम्मू-कश्मीर या केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार इतना जोखिम उठा पाएगी या विस्थापित कश्मीरी पंडितों की मांग करने वाले राष्ट्र प्रेमियों को जेलों में ठूंस दिया जाएगा? इस कानून के मसौदे को लेकर भारत नीति प्रतिष्ठान ने इसका विधिसम्मत जो विश्लेषण प्रस्तुत किया है, यदि उसे तार्किक मानें तो वह झकझोरने वाला है। मसलन, विधेयक के अनुच्छेद 3 (ई) में देश के नागरिकों को समूह में बांटा गया है। कुछ विशेष सांप्रदायिक समुदायों के लिए यह कानून विशेष सुविधा देगा, जिसका सीधा अर्थ धार्मिक अल्पसंख्यकों में खासतौर से मुस्लिम और इसाइयों से है। यह विधेयक सकारात्मक भेदभाव के सिद्धांत पर नहीं, बल्कि फासीवादी मान्यता और दर्शन पर आधारित है। यह कानून लैंगिक अपराधों को भी नस्लवादी चश्मे से देखता है। अल्पसंख्यक महिला सदस्य के साथ यदि इस समुदाय के इतर लोग लैंगिक अपराध को अंजाम देते हैं तो वह गंभीर अपराध माना जाएगा, जिसके तहत साते साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। वहीं, अगर हिंदू महिला के साथ अल्पसंख्यक समाज का व्यक्ति अश्लील हरकत या बलात्कार भी कर देता है तो आरोपी का दुष्कर्म इस विधेयक के दायरे में नहीं आएगा। किसी भी समुदाय के प्रति कुछ मामलों में सदाशयता, संवेदनशीलता और करुणा जताना ठीक है, लेकिन वोट बैंक के लिए अनुकंपा को बाध्यकारी नीतियों में ही तब्दील कर दिया जाए तो इससे हमारे समाज की पारस्परिक निर्भरता पर टिकी जो आंतरिक सरंचना है, वह बिखर जाएगी। व्यक्तिगत मनमुटाव भी अनुसूचित जाति, जनजाति कानून के दुरुपयोग की तरह सांप्रदायिक व लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक का दुरुपयोग करने लग जाएगा। इसलिए संप्रग के सहयोगियों समेत अन्य विपक्ष ने इस कानून पर अपनी नाराज असहमति जताई है तो ठीक ही किया है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं

No comments:

Post a Comment