निरंकार सिंह भूकंप उन कुदरती विपदाओं में से एक है, जिसके बारे में अब तक यह पता नहीं लगाया जा सका है कि यह कब और कहां आएगा। भारत-नेपाल सीमा पर गत रविवार को आए भूकंप के झटके उत्तर भारत सहित नेपाल और बांग्लादेश तक महसूस किए गए। इस भूकंप का केंद्र सिक्किम में धरती के नीचे लगभग 20 किलोमीटर पर था। इसका प्रभाव बहुत दूर रहा, लेकिन सिक्किम जैसे पहाड़ी प्रदेश में घनी आबादी नहीं होने के कारण ज्यादा क्षति नहीं हुई। दरअसल, सिक्किम देश के सबसे खतरनाक भूकंपीय जोन-चार में आता है। रविवार को आए भूकंप की तुलना 21 अगस्त 1988 और 19 नवंबर 1980 में सिक्किम में आए भूकंप से की जा रही है। इसमें 21 अगस्त 1988 का भूकंप ज्यादा खतरनाक था। सिक्किम सहित इस पूरे क्षेत्र के पहाड़ भी इस भूकंप की ही देन है, जो अपेक्षाकृत काफी नए हैं। भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार सिक्किम में आया यह भूकंप भविष्य में आने वाले बड़े भूकंप का भी संकेत है। हमारी राजधानी दिल्ली भूकंप के लिहाज से देश के सबसे संवेदनशील 30 शहरों में से एक है। श्रीनगर देश का सबसे संवेदनशील शहर है। दिल्ली, अमृतसर और चंडीगढ़ जोन-4 (हाई रिस्क) में है, जबकि श्रीनगर जोन-5 (सर्वाधिक खतरा) में आता है। ब्यूरो ऑफ स्टैंडर्ड द्वारा तैयार नक्शे के अनुसार देश का 58.6 प्रतिशत क्षेत्र भूकंप क्षेत्र जोन-5 (सबसे ज्यादा खतरा), जोन-4 (अधिक खतरा) और जोन-3 (कम खतरा) में आता है। अल्मोड़ा, अंबाला, बहराइच, देहरादून, गंगटोक, गुवाहाटी, गोरखपुर, बरौनी, भुज, बुलंदशहर, दरभंगा, दार्जिलिंग, इम्फाल, कोहिमा, लुधियाना, मंडी, मुरादाबाद, नैनीताल, पटना, पीलीभीत, रूड़की, शिमला और तेजपुर जिले भी भूकंपीय जोन-4 और जोन-5 में आते हैं। क्या खतरे को कम किया जा सकता है विज्ञान और तकनीक की सहायता से आज ऐसी चेतावनी प्रणालियां विकसित कर ली गई हैं, जिससे इस खतरे को कम तो किया ही जा सकता है। इंडोनेशिया के सुमात्रा में समुद्र के नीचे आए भूकंप से भारत सहित दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में भारी तबाही हुई है। पिछले सौ सालों के दौरान आए दस सर्वाधिक शक्तिशाली भूकंपों में से एक और पिछले चार दशक का यह सबसे शक्तिशाली भूकंप था। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 8.9 आंकी गई है। भूकंप का केंद्र समुद्र की तलहटी में था। इसलिए भूकंप के बाद जेट विमान से तेज चलाने वाली सुनामी लहरों ने श्रीलंका और भारत के तटीय प्रदेशों सहित इंडोनेशिया, थाइलैंड, मलेशिया, मालदीव सहित सात एशियाई देश में भारी विनाश किया है। इन लहरों की लंबाई 300 किलोमीटर और गति 600 किलोमीटर प्रतिघंटे थी। इस भूकंप के आने के 15 मिनट बाद दुनिया के 26 देशों में यह अलर्ट जारी कर दिया गया था कि इससे पैदा होने हो सकने वाली सूनामी लहरों से बचने के उपाय कर लिए जाएं, लेकिन भारत, श्रीलंका और इंडोनेशिया के पास इसकी चेतावनी देने वाला अलार्मिग सिस्टम नहीं है। भारत में आने वाले भूकंप के बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि इस भूकंप के कारण दिल्ली और आसपास के शहरों की भूगर्भ स्थिति, भारतीय परत तथा हिमालय और वर्मा की परत का टकराव होगा। पूरा भारत भारतीय परत पर स्थित है और यह परत पांच सेंटीमीटर रफ्तार से उत्तर व उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ रही है। यह पश्चिम की वर्मा, अंडमान-सुमात्रा परत तथा उत्तर में हिमालय की निचली पहाडि़यों एवं पाकिस्तान की परतों से रगड़ खाएगी तो बड़ा झटका लगेगा। इस सक्रिय भारतीय परत में भूकंपीय गतिविधियों के बढ़ने से कोई भी खतरा पैदा हो सकता है। संसार में अभी तक भूकंपों से बचने का उपाय नहीं खोजा जा सका है। भूगर्भ शास्त्र के जानकारों के अनुसार कुछ भूकंप ज्वालामुखी फटने से आते हैं, लेकिन अधिकतम भूकंप चट्टानों की संरचना में परिवर्तन होने के फलस्वरूप आते हैं। सवाल यह है कि परिवर्तन आखिर क्यों होता है? रूस के भू-रसायन एवं विश्लेषणात्मक रसायन शास्त्र संस्थान के निदेशक प्रो. वरसूकोव का कथन है कि इस सारी खुराफात की जड़ उत्तरी ध्रुव है, जो उत्तर अमेरिका की ओर 11 सेंटीमीटर प्रति वर्ष के हिसाब से भाग रहा है। भूगर्भ विज्ञान के अनुसार यह गति बहुत तेज है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि पृथ्वी की धुरी बदल रही है और इस धुरी पर पृथ्वी के घूमने की बदलती स्थिति के कारण चट्टानों की संरचना में परिवर्तन होता रहता है। इसलिए दिनों दिन भूकंपों की संख्या बढ़ती जा रही है। अनुमान है कि भविष्य में भूकंपों की संख्या और ज्यादा बढ़ेगी। विज्ञान की भाषा में भूंकप पृथ्वी की ऊपरी परतों के वे कंपन होते हैं, जो धरती की सतह को कंपा देते हैं और उसे आगे-पीछे हिलाते हैं। ये कंपन किसी शांत तालाब में फेंके गए पत्थर से उठी लहरों की तरह होते हैं। भूकंप के साथ-साथ पृथ्वी की सतह में ऐंठन भी होने लगती है। वर्ष 1980 में असम में जो भूकंप आया था, उसकी लहरें धान के खेतों में साफ-साफ दिखाई पड़ी थी। ऐसी लहरों के चढ़ाव और उतार लगभग एक फुट तक के होते हैं। इस चढ़ाव और उतार के कारण धरती फट जाती है और दरारों में मिट्टी, बालू, पानी और कभी-कभी गैसें भी बड़ी तेजी से निकलने लगती हैं। धरती पर आए सभी भूकंपों के विवरण यदि मौजूद होते तो शायद ही कोई स्थान बचता, जहां कभी न कभी भूकंप न आया हो। जिन जगहों पर अभी कोई भूकंप नहीं आया है, उन जगहों पर पहले जरूर आया होगा। वैज्ञानिक मानते हैं कि हर तीन मिनट में एक भूकंप आता है। आधुनिक खोजों के अनुसार भूकंप क्षेत्र को दो वृत्ताकार कटिबंधों में बांटा गया है। इनमें से एक भूकंप क्षेत्र न्यूजीलैंड के पास दक्षिणी प्रशांत महासागर से शुरू होकर उत्तर प्रशांत की ओर होता हुआ चीन के पूर्वी भाग में आता है। यहां से उत्तर पूर्व की ओर मुड़कर जापान होता हुआ बोरिंग मुहाने को पार करता है और फिर दक्षिणी अमेरिका के दक्षिण-पश्चिम की ओर होता हुआ अमेरिका की पश्चिम पर्वतमाला तक पहंुचाता है। दूसरा क्षेत्र जो पहले की शाखा है, ईस्ट इंडीज द्वीपों से शुरू होकर बंगाल की खाड़ी से होता हुआ वर्मा, हिमालय, तिब्बत और आल्पस को पार करता हुआ वेस्टइंडीज होता हुआ, मैक्सिको में पहले वाले भूकंप क्षेत्र में मिल जाता है। पहला भूकंप क्षेत्र प्रशांत परिधि पट्टी और दूसरा भूकंप क्षेत्र सागरीय पट्टी कहलाता है। पहले क्षेत्र में 68 प्रतिशत और दूसरे में 21 प्रतिशत भूकंप आते हैं। इन दोनों क्षेत्रों के अलावा चीन, मंचूरिया और मध्य अफ्रीका के साथ-साथ हिंद, अटलांटिक और आर्कटिक महासागरों में भी भूकंप क्षेत्र हैं। तुर्कमानिया के मौसम विज्ञान संस्थान के निदेशक मुख्तार कुर्बानोव का कहना है कि आशिकाबाद में साढ़े चार किलोमीटर की गहराई में भूमिगत प्रयोगशाला की स्थापना से भूकंप की सही भविष्यवाणी का काम आसान हो गया है। इस प्रयोगशाला में बहुत सूक्ष्म और नाजुक उपकरण हैं, जो पृथ्वी की पपड़ी में होने वाली प्रक्रियाओं संबंधी परिवर्तन की विस्तृत जानकारी देते हैं। भावी भूकंप के संभावित संकेत कुर्वानोव के अनुसार, भूकंप आने से बहुत पहले पृथ्वी के अंदरूनी भाग में काफी हलचल हेाती है। पृथ्वी की ऊपरी सतह पर इसकी प्रतिक्रिया को देखा जा सकता है। गहरे कुओं के पानी में भी प्रतिक्रिया को देखा जा सकता है। इसके अलावा कुछ और संकेत भी हैं। उदाहरण के लिए सांप, मेढक, छिपकली और गिरगिट आदि के व्यवहार में भूकंप से पहले बड़ी बेचैनी आ जाती है। इन सभी संकेतों पर लगातार निगाह और उनके विश्लेषणों से भूकंप की भविष्यवाणी संभव हो जाती है। भूकंपों की सही और सटीक भविष्यवाणी संभव हो जाने पर सरकारों की जिम्मेदारी भी बढ़ जाएगी। भूकंप से प्रभावित होने वाले स्थानों को खाली कराना भी देश की सरकारों का काम हो जाएगा। ऐसी भविष्यवाणियों की यदि कभी उपेक्षा की गई तो भारी जन और धन की हानि होगी, लेकिन अभी तक ऐसी कोई विधि नहीं खोजी जा सकी है, जिससे भूकंपों को आने से रोका जा सके। इन सब सवालों के समाधान के लिए अभी दुनिया भर के वैज्ञानिकों के बीच गहमागहमी जारी है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
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