इस सप्ताह 6-7 सितंबर को हो रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ढाका दौरे में भारत-बांग्लादेश रिश्तों में अड़चन बन रहे कई पुराने विवादों पर हमेशा के लिए विराम लगा देगा। एक दशक से ज्यादा वक्त के बाद हो रहे भारतीय प्रधानमंत्री की इस बांग्लादेश यात्रा में जहां सीमा निर्धारण और जल बंटवारे की लंबित समस्याओं के निपटारे की उम्मीद है वहीं दोनों मुल्कों के बीच आवाजाही से जुड़े मसलों पर संभावित नए समझौते से बेहतर संपर्क के दरवाजे भी खुलेंगे। दोनों देशों के बीच शिखर स्तरीय द्विपक्षीय मुलाकात की तैयारी में विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय समझौतों की बारीकियों को अंतिम रूप देने में लगे हैं। इस कड़ी में दोनों देशों के बीच कई दशकों में तय न हो सकी करीब साढ़े छह किमी की सीमा का निर्धारण का करार हो जाएगा। विदेश मंत्रालय के मुताबिक नवंबर 2010 में साझा सीमा कार्यसमूह की बैठक में व्यापक समाधान को लेकर सहमति बनी थी और इस कड़ी में दोनों देशों ने एक दूसरे की भूमि पर एन्क्लेव कहलाने वाले इलाकों में जनगणना का काम भी 15-18 जुलाई 2011 को पूरा कर लिया। वहीं एडवर्स पोजीशन कहलाने वाले क्षेत्रों में इसके अलावा छोटी-बड़ी 54 नदियों का जल साझा करने वाले दोनों देशों के बीच तीस्ता के पानी के बंटवारे और तिपाईमुख बांध निर्माण पर लंबे अर्से से जारी खींचतान खत्म हो सकती। फिलहाल केवल 1996 के गंगा जल बंटवारे को लेकर बंधे दोनों मुल्कों के बीच तीस्ता के बाद फेनी, गोमती, खोवई, मुहुरी आदि अन्य नदियों के पानी की साझेदारी पर भी आपसी समझ बनाने का रास्ता खुलेगा। सूत्रों के मुताबिक बीते दिनों विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के बांग्लादेश दौरे में तीस्ता जल विवाद निपटारे के लिए समझौते का खाका तय हो गया था जिस पर प्रधानमंत्री की यात्रा में मुहर लग सकती है। जानकारों का मानना है कि भारत और बांग्लादेश के बीच आवाजाही का समझौता भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए विकास के नए अवसर खोल सकता है। थिंकटैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की एसोसिएट फेलो जोयिता भट्टाचार्य कहती हैं कि इस समझौते को लेकर बांग्लादेश में कई तरह की भ्रांतियां और आशंकाएं हैं जो लंबे समय से रोड़ा बनती रही हैं। ऐसे में भारत अगर बांग्लादेश को राजी कर लेता है तो दोनों देशों को काफी फायदा मिलेगा। फिलहाल केवल सिलीगुड़ी के रास्ते जुड़े दोनों मुल्कों के बीच वैकल्पिक रास्ते खुलते हैं तो बांग्लादेश को चिटगांव को एक क्षेत्रीय बंदरगाह के रूप में विकसित करने का भी मौका मिलेगा।
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