विकासशील देशों में वर्ष 2010 के हथियार खरीदारों की सूची में भारत शीर्ष पर है। अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के ने 5.8 अरब डॉलर (लगभग 286.92 अरब रुपये) के हथियार खरीदे हैं। इस सूची में ताइवान 2.7 अरब डॉलर (लगभग 133.57अरब रुपये) की हथियार खरीद के साथ दूसरे स्थान पर है, जिसके बाद सउदी अरब और पाकिस्तान का स्थान है। रिपोर्ट के मुताबिक, यद्यपि भारत के हथियार बाजार में रूस ने अपना वर्चस्व कायम रखा है लेकिन भारत ने हथियारों में विविधता के लिए इजरायल, फ्रांस और अमेरिका से भी उच्च तकनीक के हथियार लेने शुरू कर दिए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि विकासशील देशों को हथियार स्थानांतरण करने के समझौते में अमेरिका पहले और रूस दूसरे स्थान पर हैं। 2010 में पूरी दुनिया में हुए हथियार खरीद-फरोख्त के समझौतों का मूल्य 40.4 अरब डॉलर (लगभग 1.9 खरब रुपये) था। रिपोर्ट के अनुसार यह 2009 में हुए समझौतों के मुकाबले 38.1 प्रतिशत कम है और 2003 के बाद वैश्विक स्तर पर किए गए सबसे कम हथियार समझौते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस द्वारा दक्षिण एशिया को आधुनिक हथियारों की आपूर्ति अमेरिका के लिए चिंता का विषय है क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की स्थिति है। इसके अलावा इसमें यह भी कहा गया है कि अमेरिका की प्रमुख नीति है कि इन क्षेत्रों में अस्थिर हथियार दौड़ को रोका जा सके, जिसके लिए अमेरिका ने हाल ही मैं भारत के साथ सैन्य सहयोग का विस्तार किया है।
Friday, September 30, 2011
Thursday, September 29, 2011
आसान नहीं है भारत की राह
अगर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पचास के दशक में अमेरिका का प्रस्ताव, चाहे स्वार्थवश ही रहा हो, स्वीकार कर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता ग्रहण कर ली होती तो बात कुछ और ही होती। आज स्थायी सीट हासिल करने के लिए भारत को क्या-क्या नहीं करना पड़ रहा है? संयुक्त राष्ट्र महासभा में हर साल लच्छेदार और विचारोत्तेजक भाषण देने पड़ रहे हैं। छोटे-बड़े देशों की राजधानियों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। सुरक्षा परिषद के पांच महारथियों की मान-मनौव्वल करनी पड़ रही है। तमाम वैश्रि्वक मंचों से अपनी दावेदारी का ढोल खुद पीटना पड़ रहा है और सबसे शर्मनाक तो यह कि उस चीन के सामने गिड़गिड़ाना पड़ रहा है, जिसके पक्ष में स्थायी सीट छोड़ी गई थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र महासभा के 66वें अधिवेशन में जोरदार तरीके से संयुक्त राष्ट्र सुधार की जरूरत बताते हुए भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता देने की वकालत की, पर इस सच्चाई से तो प्रधानमंत्री भी वाकिफ हैं कि यह राह इतनी आसान नहीं है। 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के वक्त उसके सदस्यों की संख्या 50 थी, जो आज बढ़कर 193 हो गई है। इन पैंसठ सालों के दौरान दुनिया भी हर लिहाज से बदल गई है, लेकिन सुरक्षा परिषद में दुनिया के राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व जस का तस बना हुआ है। क्या यह उम्मीद करना समझदारी है कि विकट आर्थिक मंदी, जिहादी आतंकवाद, अधिनायकवादी देशों में आजादी पर अंकुश और जलवायु परिवर्तन जैसी जटिल चुनौतियों का मुकाबला साढ़े छह दशक पहले की दुनिया को प्रतिबिंबित करने वाली सुरक्षा परिषद कर पाएगी? साठ के दशक में अस्थायी सदस्यों की संख्या छह से बढ़ाकर दस कर नवोदित एवं विकासशील राष्ट्रों को चुप कराने की कोशिश की गई थी, लेकिन सुरक्षा परिषद के विस्तार या सुधार की यह पहली और आखिरी कोशिश थी, वह भी आधी-अधूरी। सुधार की मांग शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद फिर से जोर पकड़ने लगी। पर परिणाम क्या निकला? चाहे वह 1992 में सुरक्षा परिषद के पहले शिखर सम्मेलन के बाद महासचिव बुतरस घाली का एजेंडा फॉर पीस दस्तावेज हो या 2005 में महासचिव कोफी अन्नान की इन लार्जर फ्रीडम रिपोर्ट, केवल वार्ता-बहस ही होती रही। बात जुबानी जमाखर्च से आगे नहीं बढ़ पाई। 2005 में जी-4 (भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील) सक्रिय होकर काफी व्यावहारिक योजना प्रस्तुत कर चुका था, लेकिन उसका प्रस्ताव क्षेत्रीय गुटबाजी और वैमनस्य का शिकार हो गया। पाकिस्तान के साथ कई देशों ने मिलकर कथित कॉफी क्लब बना लिया, जिसने स्थायी सदस्यता केवल मौजूदा पांच देशों तक ही सीमित रखने का पक्ष लेकर सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ने ही नहीं दिया। उसके बाद तो न जाने कितनी योजनाएं पेश की जा चुकी हैं। स्थायी सीट के लिए भारत का पक्ष क्यों मजबूत है, यह बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला देश, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र की तमाम गतिविधियों में हिस्सेदारी। अब तो उसकी परमाणु ताकत पर भी मुहर लग चुकी है। लेकिन क्या यह सब पर्याप्त है? बेशक दुनिया का कोई भी बड़ा देश आज सार्वजनिक तौर पर स्थायी सीट के लिए भारत की उम्मीदवारी का विरोध नहीं करता, लेकिन ओबामा हों या पुतिन, सरकोजी हों या कैमरून, यह बताने का कष्ट नहीं करते कि किस प्रारूप और प्रक्रिया के तहत यह संभव होगा। हमारा चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी चीन भी कुछ शर्तो के साथ भारत को समर्थन देने की बात कहता है, लेकिन उन शर्तो में खोट छिपी है। चीन की दलील है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के बढ़ते कद को तो मानता है, लेकिन वह पूरे संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के व्यापक सुधार का समर्थन करता है। मतलब यह कि जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक सुरक्षा परिषद का विस्तार भी नहीं होगा। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य तो यही संकेत करते हैं कि सुरक्षा परिषद के ढांचे को समसामयिक वास्तविकताओं के अनुकूल बनाकर उसमें बुनियादी तब्दीली लाना दूर की कौड़ी है। दरअसल, बदलाव की चर्चा करना एक बात है और उसको अमली जामा पहनाना दूसरी बात। (लेखिक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
संयुक्त राष्ट्र में भारत की दावेदारी
बदल रही विश्व व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन की आवश्यकता तो लंबे समय से महसूस की जा रही है, लेकिन अभी तक इसकी संभावनाएं बनती नजर नहीं आतीं। संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन से भारत, जर्मनी, जापान, ब्राजील जैसे देशों की महत्वाकांक्षाएं भी जुड़ी हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि अभी इन्हें लंबी प्रतीक्षा करनी होगी। भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 24 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में भारत की इसी महत्वाकांक्षा को पेश किया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जल्द सुधार एवं विस्तार होना चाहिए। उनका कहना था कि अगर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को मौजूदा वास्तविकता दर्शानी है तो उसमें सुधार और विस्तार अहम हैं। प्रधानमंत्री का कहना सही है, लेकिन इसके बावजूद क्या इसकी आशा की जा सकती है? आज यह बड़ा सवाल है कि अमेरिका-यूरोप सहित विकसित दुनिया को आर्थिक झंझावतों से निकलने के लिए यदि इन देशों का साथ चाहिए तो फिर सुरक्षा परिषद में भागीदारी क्यों नहीं? लेकिन क्या भागीदार सिर्फ आवेदनों से मिल जाएगी? क्या दुनिया के पांच देश अपनी चौधराहट में किसी अन्य को साझीदार बनाना चाहेंगे? क्या भारत जैसे देश के बाजार को साझा करने के लिए उनमें जितनी दिलचस्पी है, उतनी ही भारत के साथ सामरिक साझेदार बनने की भी है? सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है और वह भी नकारात्मक। लेकिन क्या भारतीय राजनय इसे स्वीकार करने में समर्थ है? यदि ऐसा है तो फिर उसे इस बात पर गौर करना होगा कि सुरक्षा परिषद में स्थायी स्थान केवल भाषणों और आवेदन से मिलने वाला नहीं है। इसके लिए तो अकेले या फिर जी-4 जैसे समूह के साथ मिलकर कूटनीतिक-आर्थिक सौदेबाजी की शक्ति का प्रदर्शन करना होगा। लेकिन क्या भारत ऐसा कर पाएगा? भारत को लंबे अरसे के बाद जब सुरक्षा परिषद की अस्थायी सीट प्राप्त हुई तो हमारे राष्ट्रवाद ने काफी जोर मारा और हमने बहुत सारे सपने गढ़ डाले, जो वास्तविकता से बहुत दूर थे। हम उभरती हुई आर्थिक शक्ति और भविष्य में वैश्विक नेतृत्व करने वाली अर्थव्यवस्था होने का दंभ पिछले कुछ समय से भर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए हमारा प्रयास आवेदन-निवेदन तक ही सीमित रहता है, जिसका परिणाम यह होता है कि हमारे बाजार की ओर आकर्षित होने वाला हर बड़ा व्यापारी हमें सुरक्षा परिषद के लिए सबसे प्रबल दावेदार होने का तमगा दे जाता है या फिर हमारी दावेदारी का रवायती समर्थन कर जाता है, लेकिन इन औपचारिक समर्थनों का अभी तक कोई परिणाम नहीं निकला। अमेरिका भारत का रणनीतिक साझीदार बनने की दावेदारी करने के साथ-साथ भारत के प्रति अपना जितना सकारात्मक रवैया प्रकट करता है, उसके अनुरूप भारत को प्राप्त कुछ नहीं हो पा रहा है। यह शायद भारत के राजनय की विफलता है, लेकिन चीन का रवैया भारत के केवल बाजार तक ही सकारात्मक है, शेष सभी जगह नकारात्मक। चीन ज्यादातर यह व्यक्त करने की कोशिश करता है कि इस गेम में अकेला भारत नहीं है, बल्कि और भी विकासशील देश हैं। हां, फ्रांस और रूस भारत के साथ जरूर हैं। सामान्य तौर पर अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जिन मानदंडों की वकालत करता है, भारत उन मानदंडों को पूरा करने में समर्थ है। अमेरिका आर्थिक आकार, जनसंख्या, सैनिक शक्ति, लोकतंत्र और मानव अधिकारों के प्रति निष्ठा, संयुक्त राष्ट्र को वित्तीय योगदान, संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में योगदान, आतंकवाद से निपटने और परमाणु अप्रसार जैसे कारकों पर आधारित मानदंडों का विकास करते हुए परिषद के समग्र भौगोलिक संतुलन को ध्यान में रखने का दावा करता है। इन मानदंडों पर जितना भारत खरा उतर रहा है, उतना ही दक्षिण अफ्रीका, जापान, जर्मनी और ब्राजील भी खरे उतर रहे हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सुरक्षा परिषद में कम से कम पांच सदस्य बढ़ाए जाने चाहिए, लेकिन बात यहीं पर पूरी नहीं होती दिखाई देती, कुछ और अड़ेंगे इस मार्ग में हैं। शीतयुद्ध के बाद से ही परिषद की कार्यप्रणाली पर विचार-विमर्श के लिए भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील (जी-4) की मांग के मद्देनजर जनवरी 1992 में पहली बार संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में एक सम्मेलन बुलाया गया। इसके बाद बुतरस घाली ने ऐन एजेंडा फॉर पीस तैयार किया, जिसमें सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए सुझाव दिए गए थे, लेकिन अमेरिका के साथ उनके संबंधों में आए तनाव के कारण ये सुधार धरे के धरे रहे गए। पुन: 1997 में ब्रिटेन, फ्रांस और रूस ने सुरक्षा परिषद की संरचना और कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की। इसका परिणाम यह हुआ एक और मंच तैयार किया गया, जिसने ऐन एजेंडा फॉर फरदर रिफॉर्म्स में सुरक्षा परिषद के समग्र सुधार का भी समर्थन किया। इसी बीच मार्च 2005 में इन लार्जर फ्रीडम नाम की एक रिपोर्ट में परिषद की सदस्य संख्या 24 तक करने की मांग कर दी गई। इसमें समाधान के लिए दो विकल्प थे- एक, तीन नए अस्थायी सदस्यों के साथ-साथ छह नए स्थायी सदस्य शामिल किए जाएं। दो, सदस्यों की एक नई श्रेणी बनाई जाए, जिसमें एक अस्थायी सदस्य होगा और आठ नए सदस्य शामिल किए जाएंगे, जिनका कार्यकाल चार वर्ष होगा और उनका फिर से नवीनीकरण किया जाएगा। हालांकि इससे पहले ही जी-4 ने भी योजना प्रस्तुत की थी, जिसके अनुसार पांच नए स्थायी सदस्यों के अतिरिक्त अफ्रीकी महाद्वीप से एक अन्य सदस्य सहित जी-4 को तथा चार अन्य अस्थायी सदस्यों को शामिल किए जाने का प्रस्ताव किया था, लेकिन दुनिया के कुछ अन्य देशों ने इसमें अड़ंगा डाल दिया। दुनिया के अनेक भागों में विभिन्न पड़ोसी देशों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण पांच अन्य देशों- अर्जेटीना, इटली, कनाडा, कोलंबिया और पाकिस्तान ने जी-4 के प्रयासों को असफल करने के लिए जुलाई 2005 में यूनाइटेड फॉर कन्सेंसस (यूएफसी अथवा कॉफी क्लब) का गठन कर लिया। यह मंच मौजूदा पांच देशों की स्थायी सदस्यता को सुरक्षित रखने का पक्षधर है। यह सुरक्षा परिषद में सुधार की बात तो करता है, लेकिन यह इसमें आंशिक रूप से स्थायी या अस्थायी प्रकृति के पांच अन्य सदस्यों को शामिल करने का पक्षधर है। विशेष बात तो यह है कि इन यूनाइटेड फॉर कन्सेंसस ने ओबामा द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के समर्थन का विरोध किया है। कुल मिलाकर संयुक्त राष्ट्र संघ की उम्र और उसकी सदस्य संख्या के विस्तार के साथ उसमें सुधार की आवश्यकता है। 24 अक्टूबर 1945 को जब संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई, उस समय इसकी सदस्य संख्या 50 थी और सुरक्षा परिषद में 11 सदस्य थे यानी कुल संख्या का 22 प्रतिशत। 1960 के दशक में संयुक्त राष्ट्र की सदस्य संख्या तेजी से बढ़ी और 113 पर पहुंच गई। इसलिए सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग भी तेज हुई। परिणाम यह हुआ कि 1963 में सुरक्षा परिषद की सदस्य संख्या बढ़ाकर 15 कर दी गई यानी सुरक्षा परिषद में कुल सदस्य संख्या का प्रतिशत 13.27 रह गया, जबकि वीटो धारकों का प्रतिशत मात्र 4.42 रह गया। आज इस संस्था के 192 सदस्य हैं, जबकि सुरक्षा परिषद की सदस्य संख्या वही 15 ही है। आज जब दुनिया को और अधिक उदार व लोकतांत्रिक बनाने की बात कही जा रही है, तब सुरक्षा परिषद को अनुदार बनाए रखने की आखिर वजह क्या है? सुरक्षा परिषद दुनिया के पुलिसमैन की भूमिका में है, शायद इसलिए। यह निरंकुशता विश्व शांति के अनुकूल नहीं है। वैश्विक आर्थिक मंदी से उबरने के लिए लिए तो महाशक्तियों ने झट से भारत जैसे देशों की बांह पकड़ना कबूल कर लिया, लेकिन यही तरीका वे सुरक्षा परिषद में नहीं अपनाना चाहते हैं, क्योंकि वहां उन्हें अपनी चौधराहट में बट्टा लगता नजर आ रहा है। जो भी हो, स्थितियां संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और विस्तार की अपेक्षा रखती हैं और भारत सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की प्रबल दावेदारी रखता है। यही नहीं, भारत को यदि स्थायी सीट मिलती है तो वैश्विक मुद्दों से निपटने में परिषद की विश्वसनीयता और प्रभाव में वृद्धि होगी, जो वैश्विक संतुलन के हित में भी होगा। लेकिन इसके बावजूद भी सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट अभी भारत के लिए दूर की कौड़ी ही है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
ब्लड मनी देकर छूटे भारतीय फिर शारजाह जेल भेजे गए
चार करोड़ से ज्यादा की ब्लड मनी देकर सजा-ए-मौत से बचे 17 भारतीयों की वतन वापसी में नई बाधा खड़ी हो गई है। घटना में घायल दो पाकिस्तानी नागरिकों की ओर से मुआवजा मांगे जाने से उन्हें फिर शारजाह जेल में डाल दिया गया है। पंजाब और हरियाणा के रहने वाले इन भारतीयों को सजा माफ होने के बाद बीते शनिवार को भारत लौटना था। शारजाह में जनवरी, 2009 में शराब के अवैध कारोबार को लेकर दो गुटों के बीच हुई हिंसक झड़प में पाकिस्तानी नागरिक एम नाजिर खान की मौत हो गई थी। इस घटना में मुश्ताक अहमद और शाहिद इकबाल नामक दो पाकिस्तानी घायल भी हुए थे। स्थानीय अदालत ने इस मामले में 17 भारतीयों को मौत की सजा सुनाई थी। दुबई में बसे होटल व्यवसायी एसपी सिंह ओबेराय ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में रह रहे भारतीय समुदाय की मदद से पीडि़त परिवार को ब्लड मनी चुकाकर इन भारतीयों की सजा माफ करवाई थी। ओबेराय ने बुधवार को यहां बताया कि अब मुश्ताक अहमद और उसके भाई शाहिद इकबाल ने दीवानी अदालत में मुआवजे का दावा ठोंक दिया है। उन्होंने अपनी चोटों के लिए 15 लाख दिरहम (करीब एक करोड़ 90 लाख रुपये) की मांग की है। इसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई पूरी होने तक भारतीयों पर यात्रा संबंधी पाबंदी लगाते हुए उन्हें शारजाह की जेल में रखने का आदेश दिया है।
भारत के साथ हर मुद्दा सुलझाने की इच्छा
पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने कहा कि पाकिस्तान कश्मीर समेत भारत के साथ हर मुद्दे को सुलझाना चाहता है। हिना ने कहा कि भारत के साथ वार्ता जारी है। उम्मीद है कि यह अबाध और फलदायी होगी। वह 193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा को मंगलवार को संबोधित कर रही थीं। 34 वर्षीय खार ने कहा, मुझे खुशी है कि दोनों देश के बीच बातचीत जारी है, जिसे हम हर हाल में सफल और एक-दूसरे के लिए लाभकारी बनाना चाहते हैं। हिना ने कहा कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के एजेंडे में सबसे पुराने कश्मीर सहित सभी लंबित मुद्दों को भारत के साथ सुलझाने के लिए उत्सुक है। उन्होंने कहा, कश्मीरी लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा करने के लिए शांति प्रस्ताव लाना जरूरी है। खार ने कहा कि परमाणु हथियार संपन्न भारत और पाकिस्तान पर आपसी विश्वास, हथियारों की स्पद्र्धा से बचने और रणनीतिक स्थिरता को बढ़ाने के लिए साथ मिलकर काम करने की भारी जिम्मेदारी है। उन्होंने वादा किया कि लोकतांत्रिक देश के तौर पर पाकिस्तान विश्व शांति और समृद्धि के लिए अपने प्रयास जारी रखेगा। आइएसआइ का बचाव हिना रब्बानी खार ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ का हक्कानी नेटवर्क से संबंधों के आरोप का बचाव किया। खार ने कहा कि पाक अपनी भूमि से आतंक खत्म करने के लिए दृढ़ संकल्प है और पड़ोसियों को महसूस होने वाले खतरे से अवगत है। उन्होंने कहा, यदि मैं आतंकवाद खत्म करने में पाकिस्तान की कुर्बानी और समझौते गिनाने लगी तो सभी को यहां अगले वर्ष सितंबर तक बैठना पड़ेगा। हम आतकंवाद को हल्के में नहीं ले सकते क्योंकि लंबे समय से हमें इससे नुकसान हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा का अधिवेशन संपन्न संयुक्त राष्ट्र महासभा का 66वां अधिवेशन समाप्त हो गया है। पिछले सप्ताह बुधवार को बुलाए गए इस अधिवेशन की थीम विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में मध्यस्थता की भूमिका था। एक सप्ताह तक चले महासभा के अधिवेशन में 120 देशों के राष्ट्र प्रमुखों सहित संयुक्त राष्ट्र के 193 प्रतिनिधियों ने वर्ष 2015 तक शताब्दी विकास लक्ष्य पूरा करने को लेकर भाषण दिए। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 66वें अध्यक्ष नासिर अब्दुल अजीज अल नासिर ने कहा कि सदस्य देशों को अपनी प्रतिबद्धताओं को अमल में लाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने कहा, हमारी संयुक्त जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए आवश्यक है कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए हम आपसी सहमति बनाएं। बराबर संपर्क में रहते हैं ओबामा-मनमोहन अमेरिका के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर राष्ट्रपति बराक ओबामा के मन में पूरा सम्मान और प्रशंसा का भाव है और दोनों नेता बराबर संपर्क में रहते हैं। जन मामलों के सहायक विदेश मंत्री माइक हैमर ने कहा, मजबूत संबंधों के विकास के लिए भारत के साथ साझेदारी पर हमारा ध्यान जारी है। उन्होंने कहा, आपको मालूम है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए राष्ट्रपति बराक ओबामा के मन में पूरा सम्मान और प्रशंसा का भाव है और वे अक्सर संपर्क में रहते हैं ताकि जो गति बनी है उसे बरकरार रखा जा सके। विदेशी पत्रकारों के साथ बातचीत में एक सवाल के जवाब में हैमर ने कहा, भारत अमेरिकी साझेदारी का सबसे खूबसूरत हिस्सा यह है कि राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से यह वास्तव में शुरू हुआ और राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के शासनकाल में यह जारी रहा और राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल में इसने गति पकड़ी है। उन्होंने कहा कि अनेक मुद्दों पर ओबामा प्रशासन का भारत के साथ उत्कृष्ट सहयोग जारी है। तुर्की-ईरान की बढ़ती दोस्ती से अमेरिका नाराज तुर्की-ईरान के बीच बढ़ती नजदीकियों से अमेरिका इतना नाराज हो गया है कि उसने तुर्की को चेतावनी दी है कि यदि अंकारा और तेहरान के बीच दोस्ती और बढ़ी तो वह दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है। अंकारा और तेहरान के बीच बढ़ते संबंधों के कारण ही अमेरिका ने शीर्ष कोष अधिकारी रोजर कोहेन को अंकारा भेजा। उन्होंने वहां कहा, यदि दोनों देशों के बीच ऐसे ही व्यापार बढ़ा तो यह अमेरिका की ईरान पर प्रतिबंध लगाने की इच्छा के खिलाफ होगा। पिछले कुछ साल में ईरान और तुर्की ने आपस में ऊर्जा, सुरक्षा, व्यापार, शिक्षा और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया है। तुर्की संसद में विदेशी मामलों की समिति के प्रमुख वौनकेन बोजकिर ने अमेरिकी धमकी को खारिज करते हुए कहा कि तुर्की अब दस साल पहले वाला देश नहीं है। उन्होंने कहा कि सिर्फ संयुक्त राष्ट्र ही किसी देश पर प्रतिबंध लगा सकता है, अमेरिका नहीं। यदि संयुक्त राष्ट्र ऐसा करता है तो तुर्की इसका पालन करेगा।
ड्रैगन ने दक्षिणी चीन सागर पर फिर जताया हक
चीन ने दक्षिणी चीन सागर और उसके आसपास के द्वीपों पर फिर दावा जताया है। भारत पर निशाना साधते हुए चीन की सेना ने बुधवार को कहा कि वियतनाम, फिलीपींस और अन्य एशियाई देशों द्वारा मामले का वैश्विकरण किया जा रहा है। दक्षिण चीन सागर में तेल उत्खनन के काम में विदेशी सेनाओं की मौजूदगी से यह विवाद और गहरा जाएगा। चीन की सेना के प्रवक्ता गेंग यानशेंग ने कहा, दक्षिण चीन सागर और उसके आसपास के द्वीपों पर चीन का आधिपत्य है। मामले के वैश्विकरण का कोई भी प्रयास विवाद को और जटिल बना देगा। चीन हमेशा द्विपक्षीय बातचीत के जरिये शांतिपूर्ण तरीके से मामले का हल खोजने का हिमायती रहा है। चीन, वियतनाम और फिलीपींस के अलावा मलेशिया, ताइवान और ब्रुनेई भी दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा करते हैं। सभी की नजर दक्षिण चीन सागर में तेल और गैस के प्रचुर भंडार पर है। पिछले दिनों वियतनाम ने भारतीय कंपनी ओएनजीसी विदेश को दो ब्लॉक में तेल उत्खनन का काम सौंपा है। चीन ने इस पर एतराज करते हुए आरोप लगाया था कि वियतनाम उसके आधिपत्य का उल्लंघन कर रहा है। इस विवाद के बीच ऐसी खबरें भी आई थीं कि चीन की नौसेना ने दक्षिण चीन सागर में मौजूद भारतीय युद्धपोत विराट को तत्काल वह क्षेत्र छोड़ने को कहा था। बाद में हालांकि चीन और भारत ने इन खबरों का खंडन किया था। भारत-अमेरिका समुद्री रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमत वाशिंगटन : क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि के लिए भारतीय हिंद महासागर में बिछे केबलों की सुरक्षा को महत्वपूर्ण बताते हुए भारत और अमेरिका ने समुद्री सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। अमेरिका में भारत की राजदूत निरूपमा राव ने कहा, विश्व ऊर्जा आपूर्ति का पांचवा हिस्सा हिंद महासागर से गुजरता है। हिंद महासागर में बिछे केबलों की सुरक्षा न सिर्फ भारत और अमेरिका के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है। समुद्री डकैती से हम सभी को समान रूप से खतरा है। इसलिए हम समुद्री सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं।
Tuesday, September 27, 2011
खाड़ी के धनी भारतीयों में जगतियानी शीर्ष पर
खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) क्षेत्र में अमीर भारतीयों की सूची में रिटेल कंपनी लैंडमार्क के प्रमुख मिकी जगतियानी शीर्ष पर रहे हैं। उनकी कुल परिसंत्तियां 3.2 अरब डालर की आंकी गई हैं। अरेबियन बिजनेस साप्ताहिक पत्रिका द्वारा कराए गए सव्रेक्षण में यह तथ्य सामने आया है कि दुबई के जगतियानी की परिसंपत्तियां दूसरे स्थान पर रहे न्यू मेडिकल सेंटर समूह के मुखिया बीआर शेट्टी से लगभग 1.5 अरब डालर अधिक रही हैं। शेट्टी की कुल परिसंपत्तियां 1.72 अरब डालर आंकी गई हैं। वह सूची में दूसरे स्थान पर रहे।
समुद्र में चीन की चुनौती
17 सितंबर को चीन ने घोषणा की है कि वह हिंद महासागर की तलहटी में खनिज तलाशी विस्तार योजना चलाएगा। पॉली मेटलिक सल्फाइड अयस्क को खोजने के लिए क्षेत्र विस्तार की अनुमति उसे अंतरराष्ट्रीय प्राधिकरण से मिली है। पॉली मेटलिक सल्फाइड एक ऐसा खनिज है जिसमें तीन या उससे अधिक धातुएं बड़ी मात्रा में पाई जाती है। चीन को पहले ही दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर तलहटी में दस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अयस्क खोजने की अनुमति मिली हुई है। अब नई अनुमति से उसके समुद्री क्षेत्र के विस्तार की संभावनाएं बढ़ गई हैं। चीन की इस योजना से भारत का चिंतित होना स्वभाविक है क्योंकि इससे भारत की सुरक्षा को खतरा बढ़ेगा। भारत के लिए समस्या यह है कि चीन का समुद्री खनिज संसाधन शोध एवं विकास संघ वर्ष 2011 के अंत तक अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण के साथ 15 वर्ष के लिए समझौता करने जा रहा है जिससे वह इस क्षेत्र को अयस्क धरोहर के रूप में विकसित कर सके। यदि ऐसा हुआ तो चीन भारत के पिछले हिस्से में अपने युद्धपोतों के संचालन के साथ-साथ भारतीय सामुद्रिक क्षेत्र की निगरानी भी कर सकेगा जो भारत के लिए खतरनाक सिद्ध होगा। 10 अगस्त, 2011 को चीन ने अपने पहले विमानवाहक पोत का जलावतरण करके हिंद महासागर व प्रशांत क्षेत्र में अपनी नौसैनिक शक्ति दिखा दी है। इस पोत को ऐसे समय पर समुद्री परीक्षण के लिए भेजा गया है जब चीन और आसियान समूह के कई देशों के बीच दक्षिण चीन सागर के द्वीप समूहों को लेकर विवाद बढ़ गया है। चीन के सैन्य अधिकारियों के मुताबिक इसका इस्तेमाल अनुसंधान प्रयोग और प्रशिक्षण के लिए किया जाएगा। जबकि सत्यता यह है कि इस पोत से चीनी नौसेना में एक नया आयाम जुडे़गा जो हिंद महासागर में एक बड़ी चुनौती बन सकता है। अब चीन विदेशों में भी अमेरिका की तरह अपने अड्डे भी बना सकता है जो एक गंभीर समस्या है। चीन की बढ़ती सैन्य महत्वाकांक्षा पर अमेरिका की भी चिंता बढ़ गई है। उधर चीन के मुताबिक अभी तक सुरक्षा परिषद के प्रमुख पांच देशों में चीन ही अकेला ऐसा देश था जिसके पास विमानवाहक पोत नहीं था। जबकि अमेरिका, रूस, भारत, जापान व दक्षिण कोरिया के पास यह ताकत थी। चीनी नौसेना में अभी बेइहाई, डोगहाई व ननहाई नामक तीन बेडे़ हैं। इन सभी के अपने सपोर्ट अड्डे, छोटे बेड़े, समुद्री गैरिसन कमांड, विमान डिविजन व समुद्री ब्रिगेड है। अब चीन ने प्रशांत महासागर के साथ-साथ हिंद महासागर में भी अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। इसके लिए उसने म्यांमार, श्रीलंका व बांग्लादेश से सामरिक संबंध बना लिए हैं। इस पोत से पहले चीन ने प्रशांत महासागर में 5057 मीटर की गहराई पर अपनी पनडुब्बी जियोओलांग का 27 जुलाई, 2011 को सफल परीक्षण किया। परीक्षण के दौरान यह पनडुब्बी प्रशांत महासागर के अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में 5057 मीटर की गहराई तक पहुंच गई। महासमुद्री प्रशासन (एसओए) के मुताबिक यह पनडुब्बी दुनिया में समुद्र के 70 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र में पहुंच सकती है। इस उपलब्धि के बाद चीन समुद्री स्तर से 3500 मीटर से अधिक गहराई तक पनडुब्बी भेजने वाले अमेरिका, फ्रांस, रूस व जापान के बाद 5वां देश बन गया है। लेकिन गहराई के मामले में चीन प्रथम है। अपनी सामुद्रिक शक्ति में इजाफा करने के उद्देश्य से चीन सामुद्रिक क्षेत्र में अत्याधुनिक कैरियर मिसाइलों को तैनात कर रहा है। यह पोतरोधी मिसाइल है। यह मिसाइल चीन की डीएफ-21डी मिसाइलों का उन्नत रूप है। इसकी मारक क्षमता 20,000 किलोमीटर है। यह मिसाइल तेज गति से चलने के साथ-साथ किसी भी आधुनिक युद्धपोत को 900 किलोमीटर की दूरी से भेद सकती है। इन्हें समुद्र के साथ-साथ जमीन से भी दागा जा सकता है। चीन का मानना है कि इन मिसाइलों की तैनाती से अमेरिकी नौ सेना के वर्चस्व को रोकने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि चीन अपनी जल सीमा के निकट किसी भी विदेशी युद्धपोतों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। (लेखक सैन्य विज्ञान विषय के प्राध्यापक हैं
Friday, September 23, 2011
रेडक्रास का बीपीएल सीमा पर फिर से विचार का सुझाव
गरीबी रेखा की सरकारी परिभाषा पर उभरे विवाद के मद्देनजर विश्व के सबसे बड़ी लोकोपकारी संगठन इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेडक्रास (आइएफआरसी) ने गुरुवार को गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीवनयापन कर रहे लोगों के वर्गीकरण पर फिर से विचार करने का सुझाव दिया। यह भी कहा जा रहा है कि प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक देश में भूख को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। रेडक्रास ने कहा, गरीबी रेखा से नीचे या ऊपर जीवन-यापन करने वाले लोगों के वर्गीकरण पर फिर से विचार करने की जरूरत है। आइएफआरसी व रेड क्रेसेंट सोसायटीज ने विश्व आपदा रपट-2011 में कहा, इसके बदले असंगठित क्षेत्र में उद्यम से जुड़े राष्ट्रीय आयोग के निष्कर्ष को अर्थपूर्ण सबके लिए भोजन कार्यक्रम का आधार बनाया जाना चाहिए जिसमें कहा गया है कि भारत के 83.6 करोड़ लोग खाने पर एक दिन में 20 रुपये से कम खर्च कर रहे हैं। रपट में यह भी सुझाव दिया गया कि प्रति व्यक्ति 35 किलो औसत राशन को भी बढ़ाने की जरूरत होगी। खाद्य बॉस्केट के विस्तार की भी जरूरत है जिसमें मोटा अनाज और दाल शामिल की जा सकें। आइएफआरसी ने कहा कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक भारत में भूख को खत्म करने में पर्याप्त नहीं होगा और सुझाव दिया कि गरीबों के लिए जीवनयापन का जरिया सुनिश्चित करने के लिए समग्र रवैया अपनाया जाना चाहिए तथा लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पर्याप्त अनाज उत्पादन किया जाना चाहिए। विश्व खाद्य कार्यक्रम की निदेशक (भारत) मिहोको तामामुरा ने कहा, सिर्फ खाना ही इसका हल नहीं है .. सरकार को गरीब परिवारों को जीवनयापन का जरिया मुहैया कराने के लिए योजना शुरू करने और लगातार ज्यादा खाद्य उत्पादन की जरूरत है। आइएफआरसी ने सरकार को यह भी सलाह दी कि सरकार गांवों और उप जिला स्तर पर अनाज बैंक बनाए। आइएफआरसी और रेड क्रेसेंट सोसायटीज ने भारत में कृषि क्षेत्र और निवेश की सलाह दी। एजेंसी ने कहा, कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार है। पिछले कुछ वर्षो में भारत का कृषि उत्पादन स्थिर रहा है और लगातार बढ़ रही आबादी के अनुपात में इसमें बढ़ोतरी नहीं हुई है। रपट में कहा गया, तेजी से हो रहे शहरीकरण और जीविका की तलाश में ग्रामीण इलाकों से शहर आ रहे लोगों की बढ़ी तादाद कुछ ऐसे तथ्य हैं जिससे भारत में कृषि का विकास प्रभावित हो रहा है। भारत समेत विश्व भर में खाद्य कीमतों में तेजी पर चिंता जाहिर करते हुए रपट में कहा गया, जनवरी 2011 में भारत में खाद्य कीमतें साल भर के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। भारत के करोड़ों लोग खाने पर अपने परिवार की आय का 50 फीसदी खर्च करते हैं इसलिए खाने की कीमत में किसी भी तरह की बढ़ोतरी स्वास्थ्य, कल्याण और सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है
राहत न पहुंचने से सिक्किम में नाराजगी
गंगटोक भारत में हमारी सरकार हमें नहीं बचा पा रही। चीन आ जाएगा तो क्या करेगी ? आक्रोश भरा यह सवाल सिक्किम की राजधानी गंगटोक में उठ रहा है। ये सब भूकंप से पीडि़त वे लोग हैं, जिनके नाते-रिश्तेदारों का पांच दिनों बाद भी अता-पता नहीं है। इन पीडि़तों के सब्र का बांध टूट रहा है- वे आपा खो रहे हैं। गुरुवार को दैनिक जागरण से मुखातिब लोगों में आक्रोश था। सब लोग गंगटोक आकर यहीं से लौट जा रहे हैं..। बाहर के लोगों को पता नहीं चल रहा कि हकीकत क्या है। क्या हम भारत के नागरिक नहीं हैं? हमारी आवाज दिल्ली तक नहीं पहुंच रही है। नेता लोग हॉस्पिटल में घायलों से मिलकर चले गए। ल्हाचुंग क्यों नहीं जाते? पता नहीं लोग वहां जिंदा हैं भी या नहीं। जो मर गए, वो मर गए। जिंदा लोगों को तो बचा लीजिए। हम कह रहे, हमें हेलीकॉप्टर से वहां ले चलिए। कोई नहीं ले जा रहा। कह रहे, हेलीकॉप्टर लैंड नहीं होगा। पैदल चलकर लोग वहां से कैसे आ गए? गोद में अबोध बच्चे को लिए सोनम लांबा की बातों में दर्द भी है, उम्मीद भी और आक्रोश भी। उस जैसे तमाम लोग हैं। दरअसल, सर्वाधिक प्रभावित उत्तरी सिक्किम के गांव-कस्बों को लेकर पता ही नहीं चल पा रहा कि वहां कौन मरा और कौन बचा। बस्तियां बची भी हैं या नहीं। हालांकि सेना के जवान दिन-रात बचाव कार्य में लगे हुए हैं, लेकिन संसाधनों की यहां कमी भी है। हाल तो गंगटोक का देख लीजिए। नहाना दूर, पीने का पानी मुश्किल है। टैंकरों से जैसे-तैसे पानी पहुंचाया जा रहा है, तो ल्हाचुंग जैसे इलाके में जिंदा बचे लोगों का हाल क्या होगा ? लुचुआ कहती हैं, चिदंबरम साहब आए थे। हम लोगों ने मिलने की कोशिश की, मुलाकात नहीं हो सकी। लुचुआ कहती है, मेरे माता-पिता वहां फंसे हुए हैं, पांच दिन हो गए। कोई अता-पता नहीं। हम दो बहनें यहां गंगटोक में अकेली हैं। गुस्सा स्थानीय मशीनरी से लेकर दिल्ली तक पर बरस रहा। स्थिति भयावह है। संसाधन सीमित। राहत-बचाव कार्य बेशक चल रहा है, अपने नाते-रिश्तेदारों से बेखबर लोग क्या करें। सो, वे गुस्से में हैं
सेना को मिलेगा अपना सेटेलाइट
नई दिल्ली आपात हालात में सैन्य संचार को त्वरित और सुरक्षित बनाने की कोशिशें जल्द ही परवान चढ़ सकती हैं। बदले हालात और नई चुनौतियों के लिहाज से सेना के नेटवर्क को तैयार करने के लिए उसे अपना संचार सेटेलाइट जीसेट-7एस इस साल के अंत तक मिलने की उम्मीद है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एस-बैंड पर सुरक्षित संचार की सुविधा मुहैया कराने वाले उपग्रह को इसी साल लांच करने की तैयारी कर रहा है। इसरो के मुताबिक 2011 के अंत तक जीएसएलवी से छोड़े जाने वाले उपग्रह जीसेट-7एस में एस बैंड के अलावा अति उच्च फ्रीक्वेंसी (यूएचएफ) के साथ केयू और सी बैंड के भी ट्रांसपोंडर होंगे। सैन्य सूत्रों के मुताबिक जीसेट-7एस हैकिंग और सूचना तंत्र के घुसपैठियों के खिलाफ दीवार दुरुस्त करने में लगी फौज को अपना सुरक्षित मोबाइल नेटवर्क तैयार करने में भी मदद करेगा। क्लोज यूजर ग्रुप की इस मोबाइल सेवा से फौज के आला अधिकारी ही नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के आला अफसर भी जुड़ सकेंगे। साथ ही आपात स्थितियों में शीर्ष सुरक्षा तंत्र के संवाद के लिए मौजूदा वाणिज्यिक दूरसंचार नेटवर्क पर निर्भरता भी खत्म हो सकेगी। कुछ खास अधिकारियों के लिए सीमित इस नेटवर्क के नंबरों तक बाहरी दूरसंचार सेवा से पहुंचना नामुमकिन होगा। सुरक्षित एस-बैंड की सेटेलाइट सुविधा सेना को नेटवर्क आधारित अभियानों के भी संचालन की बेहतर सुविधा मुहैया कराएगी। इसके अलावा पायलट रहित टोही विमानों के बेड़े को भी सेटेलाइट संचालन प्रणाली से लैस करने पर काम जारी है। सेना ने अपने संचार तंत्र को 2017 तक पूरी तरह नेटवर्क आधारित बनाने का फैसला किया है। वैसे तो अभी भी हवा में उड़ता जहाज जमीन पर दौड़ते टैंक से संवाद स्थापित कर सकता है, लेकिन यह तंत्र पूरी तरह सक्षम नहीं है। रक्षा मंत्रालय की योजना तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और सामंजस्य बनाने वाली नेटवर्क व्यवस्था स्थापित करने की है। इसके लिए एक डिफेंस कम्यूनिकेशन नेटवर्क के विकास का भी काम जारी है
सोनिया-राहुल और दिग्विजय को कोर्ट ने किया तलब
योगगुरु बाबा रामदेव के मानहानि के दावे पर सुनवाई करते हुए कोटा के स्थानीय कोर्ट ने कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया और महासचिव दिग्विजयसिंह तथा राहुल गांधी को नोटिस जारी किए हैं। उन्हें 4 नवंबर को कोर्ट में तलब किया है। कोटा छावनी निवासी आरएसएस कार्यकत्र्ता नेता खंडेलवाल ने 14 जून को एसीजेएम की अदालत में कांग्रेस के तीनों शीर्ष नेताओं के खिलाफ ानहानि का परिवाद पेश किया था, लेकिन, अधीनस्थ कोर्ट ने 2 जुलाई को इसे खारिज कर दिया था। खंडेलवाल ने आदेश के विरुद्ध 13 सितंबर को जिला एवं सेशन न्यायालय में निगरानी याचिका दाखिल की थी। न्यायालय ने याचिका को सुनवाई के लिए एडीजे में भेज दिया। इस पर एडीजे कोर्ट ने तीनों को नोटिस जारी कर 4 नवंबर को तलब करने के आदेश दे दिए। याची ने कहा कि कोर्ट में उसने आरएसएस एवं बाबा रामदेव की पतंजलि योग पीठ का सदस्य व पदाधिकारी होने के साथ-साथ व्यक्तिगत आहत होने के आधार पर यह परिवाद पेश किया है
चिदंबरम पर बढ़ा इस्तीफे का दबाव
नई दिल्ली 2 जी घोटाले में अपने ही कठघरे में खड़ी सरकार पर विपक्ष ने जोरदार हमला बोला है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री को लिखे पत्र के खुलासे से विपक्ष को सरकार के खिलाफ नया गोला बारूद मिल गया है। भाजपा ने दो टूक कहा है कि अब गृह मंत्री पी चिदंबरम को जाना ही होगा। चाहे वह खुद इस्तीफा दें या फिर उन्हें बर्खास्त किया जाए। साथ ही मनमोहन सिंह को भी निशाने पर लेते हुए कहा, वह गुमराह क्यों हो जाते हैं, देश की जनता इसका जवाब चाहती है। सरकार की सहयोगी द्रमुक ने विपक्ष के सुर में सुर मिलाया है। गैर राजग दल अन्नाद्रमुक ने भी चिदंबरम का इस्तीफा मांगा, जबकि माकपा ने चिदंबरम के खिलाफ सीबीआइ से जांच की मांग की है। भाजपा के वरिष्ठ नेता व पीएसी के अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने 2जी घोटाले के लिए चिदंबरम को जेल में बंद ए. राजा के साथ सह अपराधी करार देते हुए कहा है कि प्रणब मुखर्जी के पत्र से सारा सच सामने आ गया है। साल 2008 में वित्त सचिव की आपत्ति के बावजूद वित्त मंत्री रहते चिदंबरम ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन का समर्थन किया। यदि उन्होंने यह नहीं किया होता तो यह घोटाला नहीं होता। डॉ. जोशी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि वह गुमराह क्यों होते हैं? अब उनको इसका जवाब देश को देना होगा। संसद की लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में भी चिदंबरम की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। सरकार के खिलाफ तीखे तेवरों व धारदार आरोपों से लैस डॉ. जोशी ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की भी विदाई की मांग कर डाली। उन्होंने कहा, गरीबी की बेतुकी परिभाषा गढ़ने वाले मोंटेक को भी चिदंबरम की राह पर भेज दिया जाए तो अच्छा होगा। यह दोनों अपने पद छोड़ कर हमें बख्श दें तो अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम उस समय के दूरसंचार मंत्री ए. राजा के 2जी स्पेक्ट्रम फार्मूले से सहमत थे। अगर तब चिदंबरम ने यह रूख अपनाया होता कि 2008 में 2001 के दामों पर स्पेक्ट्रम नहीं बेचा जा सकता है तो देश में इतना बड़ा घोटाला नहीं होता। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने भी चिदंबरम का इस्तीफा मांगते हुए मनमोहन सिंह को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा, मुखर्जी के पत्र के साथ 21 और पत्र हैं जो प्रधानमंत्री व वित्त मंत्रालय के बीच के हैं। ऐसे में क्या प्रधानमंत्री कहेंगे कि उन्हें कुछ नहीं मालूम था? जब इस मामले में न्यायपालिका कुछ कहती है तो कांग्रेस उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने का सवाल उठाती है, लेकिन अब तो उसके सबसे वरिष्ठ व अनुभवी मंत्री ने सारा खुलासा किया है। यह मामला जनता के बीच है और उसे यह जानने का हक है कि चिदंबरम ने सही काम किया या नहीं। अन्नाद्रमुक ने भी भाजपा की राह पर चलते हुए चिदंबरम का इस्तीफा मांगा है। माकपा ने इस मामले में चिदंबरम के खिलाफ सीबीआइ से जांच की मांग की है। सरकार की सहयोगी द्रमुक ने भी विपक्ष के साथ खड़े होकर चिदंबरम की तरफ अंगुली उठाई है
लक्ष्मण रेखा न लांघे कोर्ट
नई दिल्ली 2जी घोटाले में सुप्रीम कोर्ट में पेश नये दस्तावेज गृह मंत्री पी चिदंबरम की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। सीबीआइ इन दस्तावेजों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट अदालत में पेश कर सकती है। हालांकि इस मामले में हुई सुनवाई के दौरान सीबीआइ और केंद्र सरकार ने चिदंबरम का खुलकर बचाव किया, लेकिन लिखित बयान दाखिल कर केंद्र ने कहा,सीबीआइ नये दस्तावेजों की जांच करेगी। केंद्र ने शीर्ष अदालत में लक्ष्मण रेखा न लांघने का तर्क देने के साथ ही मामले की निगरानी बंद करने का अनुरोध भी किया। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी व एके गांगुली की पीठ के समक्ष सुब्रमण्यम स्वामी की अर्जी पर सुनवाई में केंद्र के वकील पीपी राव ने गुरुवार को पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा, आरोपपत्र दाखिल होने के बाद सुप्रीमकोर्ट को निगरानी बंद कर देनी चाहिए। आगे मामले पर सिर्फ ट्रायल कोर्ट विचार कर सकता है। उन्होंने कहा, सुप्रीमकोर्ट की निगरानी की कोई लक्ष्मण रेखा तय होनी चाहिए। उनकी दलील पर कोर्ट की टिप्पणीं थी कि लक्ष्मण रेखा सीमित उद्देश्य के लिए होती है। कोर्ट ने हल्के -फुल्के अंदाज में कहा कि अगर सीता ने लक्ष्मण रेखा नहीं लांघी होती तो राक्षसों का दमन नहीं होता। कोर्ट का इशारा सीमा में न बांधने की ओर था। राव ने कोर्ट में एक लिखित नोट भी दिया जिसमें कहा गया है कि अगर जांच अधिकारी के पास कुछ नये दस्तावेज आते हैं तो सीबीआइ अपने कर्तव्य का निर्वाह करेगी। स्वाभाविक है कि सीबीआइ सुप्रीमकोर्ट में दाखिल ताजा दस्तावेजों की जांच और अध्ययन करेगी और हो सकता है कि अगली स्थिति रिपोर्ट उस पर हो। सीबीआइ के वकील वेणुगोपाल ने चिदंबरम का बचाव करते हुए कहा कि वित्तमंत्री लाइसेंस नहीं रद कर सकते थे वे सिर्फ कीमत तय कर सकते थे। अकेले वित्तमंत्री पर आक्षेप नहीं लगाये जा सकते हैं क्योंकि वे अकेले निर्णय नहीं ले सकते। ऐसे तो तत्कालीन वित्त सचिव सुब्बा राव भी बराबर के जिम्मेदार हैं क्योंकि वे भी निर्णय में शामिल थे। उन्होंने कहा कि अन्यथा लोकतंत्र को खतरा पैदा हो जाएगा। कोर्ट के जांच का आदेश देने का परिणाम ठीक नहीं होगा। ऐसे में नीतिगत मामलों में निर्णय लेना मुश्किल हो जाएगा। अत: सिस्टम को काम करने दिया जाए। अगर इसमें दखल दिया गया तो वह फेल हो जाएगा। हालांकि उन्होंने साफ किया कि वे कोर्ट की निगरानी का विरोध नहीं कर रहे हैं। स्वामी की अर्जी में 2जी घोटाले में गृहमंत्री चिदंबरम की भूमिका की सीबीआइ जांच की मांग की गई है। स्वामी ने बुधवार को सुप्रीमकोर्ट में प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा गया वित्त मंत्रालय का नोट व अन्य दस्तावेज दाखिल किये थे जिनमें 2जी स्पेक्ट्रम की कीमतें तय करने में तत्कालीन वित्तमंत्री पी. चिदंबरम के भी शामिल होने की बात कही गयी है। मंगलवार को फिर सुनवाई होगी। (पेज-3 भी देखें
Wednesday, September 21, 2011
ड्रैगन से चौकस रहना होगा
राजीव रंजन तिवारी लंबे अरसे से चीन की चतुराई ने भारत को परेशान कर रखा था। अब जब भारत ने वियतनाम के सहयोग से दक्षिणी चीन सागर में अपनी गतिविधियां बढ़ानी शुरू की तो उसके होश फाख्ता हो गए। अब चीन अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला देते हुए इस इलाके से भारत और अन्य देशों को हट जाने की गुहार लगा रहा है। यदि भारत की ही चर्चा करें तो चीन भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में अक्सर अपनी गतिविधियां चलाता रहता है, उस वक्त उसे अंतरराष्ट्रीय कानून की याद नहीं आती। देर से ही सही, जब भारत ने दक्षिणी चीन सागर में अपनी गतिविधियां चलानी शुरू की तो वह अपनी प्रभुसत्ता और अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई देने लगा, जबकि भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि दक्षिण चीन सागर में हो रही तेल की खोज से वह पीछे हटने वाला नहीं है। इन सबके बावजूद दक्षिणी चीन सागर में कथित चीन विरोधी गतिविधियां चलाने वाले देशों को जिस तरह अमेरिका की मदद मिल रही है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि इस प्रायद्वीप में लगी आक्रोश की आग और धधकेगी। हाल ही में चीन ने अप्रत्यक्ष रूप से भारत को चेतावनी दी थी कि वह दक्षिण चीन सागर से दूर रहे, क्योंकि ऐसा करना चीन की प्रभुसत्ता का उल्लंघन है। दरअसल, भारतीय तेल कंपनी ओएनजीसी ने दक्षिण चीन सागर के वियतनामी ब्लॉक में तेल की खोज के लिए वियतनामी कंपनियों के साथ एक करार किया है। दक्षिण चीन सागर को भारी मात्रा में तेल और गैस का गढ़ कहा जाता है। इसमें मौजूद द्वीपों को लेकर चीन और वियतनाम के बीच तनाव रहता है। इस वजह से भी यह विवाद है। इस बाबत चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग ली ने स्पष्ट कहा है, दक्षिण सागर के द्वीपों पर चीन का अधिकार बनता है। यह दावा ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। अगर कोई दूसरा देश इस क्षेत्र में चीन सरकार की इजाजत के बगैर तेल और गैस की खोज से जुड़ी गतिविधियां चलाता है तो वह चीन की प्रभुसत्ता का उल्लंघन होगा। इसी वक्तव्य पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारत के रक्षा राज्य मंत्री एमएम पल्लम राजू ने कहा कि चीन को भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर देश अपने अधिकारों को बल देने की कोशिश करता है और चीन भी यही कर रहा है। अपने अधिकारों और हितों को लेकर भारत का रुख साफ है। हम अपने हितों की मजबूती से रक्षा करेंगे। ऐसे में पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता। कहा जा रहा है कि भारत की ओर से दक्षिण चीन सागर में तेल की खोज जारी रखने के बाद चीन ने हिंद महासागर में सक्रियता बढ़ाने की बात कही है। चीन का कहना है कि वह हिंद महासागर के दक्षिण पश्चिम में दस हजार किलोमीटर तक अपनी खनन गतिविधियों का विस्तार करेगा। चीन ने वियतनाम पर अपनी संपूर्ण संप्रभुता का दावा करते हुए भारत और दूसरे देशों से कहा है कि वे दक्षिणी चीन सागर में वियतनाम की ओर से प्रस्तावित समुद्री इलाकों में तेल की खोज से दूर रहें। इस बाबत चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता जियांग यू ने कहा है कि दक्षिणी चीन सागर पर चीन की पूरी संप्रभुता है। चीन का पक्ष ऐतिहासिक तथ्यों और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित है। जबकि भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विष्णु प्रकाश ने कहा कि ऊर्जा के क्षेत्र में भारत वियतनाम के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प है। उन्होंने कहा कि वियतनाम या किसी भी देश के साथ भारत का संबंध हमेशा से अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक रहा है। दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर भारत की स्थिति को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि भारत दक्षिण चीन सागर में जहाजों की आवाजाही की आजादी का समर्थन करता है और आशा करता है कि इस विवाद से जुड़े सभी पक्ष 2002 में की गई घोषणा का पालन करेंगे। बताते हैं कि भारत का यह कदम वियतनाम के उस दावे पर आधारित है, जिसमें वियतनाम 1982 के एक संयुक्त राष्ट्र समझौते का हवाला देते हुए दो तेल क्षेत्रों पर अपना दावा करता है। पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपने अधिकार का दावा करने के कारण उस इलाके में चीन का वियतनाम, जापान और फिलिपींस समेत कई देशों के साथ विवाद बना हुआ है। इस मुद्दे पर अमेरिका अन्य देशों का समर्थन करते हुए चीन के दावों को खारिज करता है। बहरहाल, दक्षिणी चीन सागर की गतिविधियों ने अन्य देशों के अलावा भारत और चीन के बीच भी तनाव को बढ़ा दिया है। इस स्थिति में अमेरिका का रुख देखना खास है, जो चीन विरोधी देशों के पक्ष में है। समझा जा रहा है कि वहां की स्थिति और बिगड़ने वाली है। देखना है कि आगे क्या-क्या होता है
पाक परस्त चीन के नापाक इरादे
रहीस सिंह दक्षिण चीन सागर में आइएनएस ऐरावत से चीनी युद्धपोत की झड़प के बाद ऐरावत को तत्काल दक्षिण चीन सागर से बाहर निकालने की चेतावनी, भारतीय सीमा पर परमाणु क्षमता से संपन्न अत्याधुनिक सीएसएस-5 एमआरबीएम मिसाइलों की तैनाती और निकट भविष्य में पाक अधिकृत कश्मीर को चीन के झिंजियांग प्रांत से जोड़ने के लिए रेल लाइन बिछाने की योजना, ये सभी तथ्य यही स्पष्ट करते हंै कि चीन के इरादे ठीक नहीं हैं। इस बीच चीन ने वियतनाम के साथ मिलकर दक्षिणी चीन सागर में भारत के तेल और गैस निकालने की योजना पर एक बार फिर निशाना साधा है। सवाल यह उठता है कि यह उसके युद्धोन्मादी पक्ष की अभिव्यक्ति है या फिर आत्मरक्षा की उत्कंठा? एक विशेष वर्ग इसे केवल आत्मरक्षा से जोड़कर देख सकता है, लेकिन यह दृष्टिकोण संपूर्ण सच को व्यक्त करने वाला नहीं होगा। ऐसी खबर है कि निकट भविष्य में चीन और पाकिस्तान पाक-अधिकृत कश्मीर और चीन के झिंजियांग प्रांत के बीच रेल लाइन बिछाने वाले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार चीन और पाकिस्तान ने इस बावत आपसी बातचीत भी शुरू कर दी है। चीन में पाकिस्तान के राजदूत मसूद खान ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है। मसूद के अनुसार चीनी इंजीनियर इस परियोजना का बड़ी ही बारीकी से छानबीन कर रहे हैं और एक बार चीन से हरी झंडी मिलते ही इस परियोजना को अमल में लाया जाएगा। इस रेल परियोजना के लागू होने से चीन और पाकिस्तान के व्यापार को खासा लाभ होने की संभावना है, लेकिन इसका एकमात्र आर्थिक पक्ष ही नहीं है, बल्कि यह रेल लाइन सामरिक रूप से भी चीन और पाकिस्तान को करीब कर देगी, जो भारत के लिए अहम चिंता का विषय बन कर उभर सकता है। ऐसा कहना इसलिए युक्तिसंगत है, क्योंकि चीन लगातार ऐसी गतिविधियां चला रहा है, जो भारत के लिए सामरिक लिहाज से हितकर नहीं हैं। यह अलग बात है कि भारत की तरफ से इन चीनी हरकतों के खिलाफ कड़ा प्रतिरोध प्रदर्शित नहीं किया गया है। चीन लगातार अपनी शक्ति का विस्तार करने में जुटा हुआ है। इसलिए यह प्रश्न उभरना स्वाभाविक है कि आखिर वह ऐसा क्यों कर रहा है? चीन ने धीरे-धीरे भारत के इर्दगिर्द ऐसी शक्ति-बाधाओं का निर्माण कर लिया है, जिनकी प्रकृति भारत पर दबाव बनाने या भारत को डराने जैसी लग रही है। इंग्लैंड के फाइनेंशियल टाइम्स की खबर के मुताबिक अभी कुछ दिन पहले ही विवादित दक्षिण चीन सागर में चीनी युद्धपोत की भारतीय युद्धपोत आइएनएस ऐरावत से झड़प हो गई थी, जिसके बाद चीनी युद्धपोत ने ऐरावत को तत्काल दक्षिण चीन सागर से बाहर निकलने की चेतावनी दे डाली। सामान्य कारण तो यह है कि चीन दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा जताता रहता है, इसलिए वह इस समुद्र पर मलयेशिया, वियतनाम, ताइवान आदि के दावों को स्वीकार नहीं करता। लेकिन असल कारण यह लगता है कि भारत की लुक ईस्ट की नीति को वह अपनी स्टि्रंग ऑफ पर्ल्स को काउंटर बैलेंस करने के हथियार के तौर पर देखता है। भले ही इस घटना को भारतीय नौसेना न स्वीकार रही हो, लेकिन इतना तो मानना ही पड़ेगा कि कहीं कुछ हुआ तो था। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन द्वारा जारी की गई खबर और भी चिंता पैदा कर रही है। उसके अनुसार चीन ने रडार से बच निकलने वाले स्टील्थ लड़ाकू विमान, विमानवाहक पोत, अंतरिक्ष और क्रूज मिसाइल के विकास में सफलता प्राप्त करने के बाद चीन की सेना अत्याधुनिक हथियारों से लैस हो रही है। इसमें यह भी अनुमान लगाया गया है कि चीन प्रमुख विश्व शक्तियों के साथ प्रौद्योगिकी अंतर को वर्ष 2020 तक समाप्त कर दुनिया की बड़ी ताकत बनकर उभरेगा। उसकी रक्षा पंक्ति केवल यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि पेंटागन की एक रिपोर्ट की मानें तो उसने भारतीय सीमा पर परमाणु क्षमता से संपन्न अत्याधुनिक सीएसएस-5 एमआरबीएम मिसाइलें भी तैनात कर दी हैं। हालांकि इससे पहले उसने भारतीय सीमा पर तरल ईधन वाली सीएसएस-2 आइआरबीएम मिसाइलें तैनात कर रखी थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन ने व्यापार और उच्च स्तरीय बातचीत के जरिए भारत के साथ रिश्ते मजबूत बनाए हैं, जिसके कारण वर्ष 2010 में द्विपक्षीय व्यापार 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया। लेकिन उसने भारत के साथ अपने सीमा विवादों को हल करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है। यही कारण है कि सीमा पर उत्पन्न तनाव दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित कर रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने पिछले साल अपनी नयी दिल्ली यात्रा के दौरान मतभेदों को कुछ हद तक दूर करने का प्रयास किया था, लेकिन गंभीर बातों पर गौर नहीं किया। फलत: दोनों के बीच जो गलतफहमियां मौजूद थीं, वे अभी तक कायम हैं। रिपोर्ट पर भले ही हमारे नीतिकार ध्यान दें, लेकिन सच तो यह है कि चीन भारत के साथ अपने रिश्तों को आर्थिक क्षेत्र तक सीमित रखना चाहता है। इससे उसी का लाभ है, क्योंकि भारत का बड़ा बाजार चीन के निर्यातों के लिए पूरी तरह से खुला हुआ। इसके बावजूद वह भारत को दक्षिण एशिया में काउंटर बैलेंस करने के लिए पाकिस्तान को शक्तिशाली बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। यह बात केवल पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी हदें नेपाल, बांग्लादेश सहित कुछ अन्य देशों तक भी विस्तृत हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि सामरिक मामलों में उसका रवैया भारत विरोधी ही रहता है। फिर चाहे वह मामला तवांग मठ का हो, नत्थी वीजा को हो, पाकिस्तान को विभिन्न प्रकार की सैनिक-आणविक मदद का हो या फिर हिंद महासागर में अपनी मोतियों की माला वाली रणनीति के जरिए भारत को घेरने का। दक्षिण एशिया में अब पाकिस्तान चीन के विश्वस्त सिपहसालार की भूमिका में आ चुका है और जरदारी साहब यह इच्छा भी जाहिर कर चुके हैं कि पाकिस्तान और चीन में सीमा अवरोध पूरी तरह से समाप्त हो जाए। इसलिए चीन पाकिस्तान को सैनिक मामलों में शक्तिशाली बनाना चाहता है। इस संदर्भ में पेंटागन द्वारा दी गई रिपोर्ट का कहना है कि चीन के पाकिस्तान से नजदीकी सैन्य रिश्ते और हिंद महासागर, मध्य एशिया एवं अफ्रीका में बीजिंग की बढ़ती दखल भारत के लिए चिंता का विषय है। उसके अनुसार पाकिस्तान पारंपरिक हथियारों को लेकर चीन का प्रमुख ग्राहक बना हुआ है। चीन ने पाकिस्तान को जेएफ-17 विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक, के-8 ट्रेनर्स, एफ-7 लड़ाकू विमान, हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, पोत भेदी मिसाइलें और तकनीक मुहैया कराई है। चीन पाकिस्तान की सेना का प्रशिक्षित करने के लिए लगातार संयुक्त युद्धाभ्यास की रणनीति अपनाए हुए है। अभी कुछ समय पहले ही चीन की 101, 102 और 103 इंजीनियरिंग रेजीमेंट ने पाकिस्तानी सेना के साथ रहिमयार खान क्षेत्र के सिंध नाला व सूर्यान केट व बीकानेर से लगती सीमा के अंदर चोलिस्तान क्षेत्र के भावलपनूर व यजमान मंडी में युद्धाभ्यास किया। इस युद्धाभ्यास का मकसद चीन द्वारा पाकिस्तान को बेचे गए युद्ध के उपकरणों व हथियारों का प्रशिक्षण देना बताया गया है, लेकिन यह बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है, क्योंकि इससे पहले गैस व तेल की खोज के बहाने चीन जैसलमेर सीमा तक आ चुका है। सीमा के उस पार इस प्रकार की चीनी सक्रियता का लगातार दिखना पेशानी पर बल डालने वाला है। क्या ये गतिविधियां वास्तव में इस बात का संकेत नहीं हो सकतीं कि पूर्वी सीमा पर एक सकारात्मक स्थिति निर्मित कर लेने के बाद चीनी सेना पाकिस्तान के सहयोग से भारत की पश्चिमी सीमा पर भी वैसी ही रणनीति को अंजाम देना चाहती है? चीन की हाल भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़ी खबरें जिस तस्वीर का निर्माण करती हैं, उनसे एक बात तो बहुत हद तक साफ हो जाती है कि चीन का भारत के प्रति दोस्ताना नजरिया नहीं है। इस स्थिति में चीन प्रत्येक स्थिति में भारत की प्रगति को रोकने के साथ-साथ स्वयं को कम से कम दक्षिण एशिया में महाशक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। ऐसे में यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि चीनी सक्रियता भारत की सुरक्षा के लिए एक प्रबल चुनौती है। यह अलग बात है कि भारत का नीति-नियामक तंत्र इसे स्वीकार न करे, लेकिन यह सच है। फिलहाल इतिहास तो हमें हर क्षण यही हिदायत देता है कि हम चीन से सावधान रहें, ताकि उसे दोहराने का खतरा उत्पन्न न हो। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं
Subscribe to:
Comments (Atom)