Wednesday, May 25, 2011

भारत-अफगान रिश्ते हैं अहम

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हालिया दो दिवसीय अफगानिस्तान यात्रा मौजूदा वैश्विक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण समझी जा रही है। भारत का अफगानिस्तान के साथ प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण संबंध रहा है। इन दोनों देशों के आपसी संबंधों में निरंतरता और स्थायीत्व की आवश्यकता पहले भी थी और वर्तमान में तो भारत के लिए सामरिक व कूटनीतिक दृष्टि से खासी अहम है। पाकिस्तान के साथ भारत के कटु संबंधों के परिप्रेक्ष्य में अफगानिस्तान के साथ संबंध विकसित करने की जरूरत और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। खासतौर से ऐसे समय में जब पाकिस्तान चीन से लिपट रहा है। बहरहाल, जिस तरह भारत अपने पड़ोसी अफगानिस्तान को आर्थिक सहायता देता रहा है और हाल की 50 करोड़ डॉलर की आर्थिक सहायता की पेशकश ने दोनों देशों के आपसी संबंधों को और मजबूती देने में मील का पत्थर साबित हो सकती है। अतीत से वर्तमान तक जिस प्रकार पाकिस्तान की दिलचस्पी अफगानिस्तान के प्रति रही है, भारत के लिए आने वाले दिनों में गंभीर संकट का संकेत है। पाकिस्तान की नीयत भारत के विरोधी के रूप में जाहिर हो चुकी है। इस बीच अमेरिकी सैनिकों की वापसी की घोषणा ने भारत की समस्याओं को बढ़ाया है। पाकिस्तान चीन के साथ-साथ एक मजबूत इस्लामी राष्ट्र यानी अफगानिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश में 90 के दशक से ही लगा है। हामिद करजई के सत्ता में आने के साथ भारत-अफगानिस्तान के आपसी संबंधों में गतिशीलता आई है, जो दोनों देशों के लिए जरूरी है। लेकिन पाकिस्तान को यह गंवारा नहीं है। भारत-अफगानिस्तान के अच्छे सामरिक संबंधों से पाकिस्तान को घबराहट होती है। पाकिस्तान नहीं चाहता है कि उसके द्वारा समर्थित देश में भारत की रणनीतिक पहुंच स्थायी हो। अपनी इस कूटनीति के तहत पाकिस्तान अफगानिस्तान को विभिन्न रूपों में भारत के प्रति विरोध दर्ज कर चुका है। 1994 में पाकिस्तान के समर्थन से तालिबान के विकास और कट्टर धार्मिक विचारधारा को आगे बढ़ाए जाने से वहां पर तमाम जटिलताएं पहले की अपेक्षा बढ़ गई। भारत ने वहां के सभी घटनाक्रमों पर सतर्कता बरती है। अपने कूटनीतिक रिश्तों को बहुत ही संवेदनशील तरीके से लागू किया है। उत्तरी भागों में तालिबान के प्रसार और उसकी पैठ ने ग्रेटर अफगानिस्तान की आशंका को मजबूत किया है। वर्ष 2001 में ऑपरेशन एंदुरिंग फ्रीडम यानी ओईएफ की शुरुआत के बाद नाटो के नेतृत्व की आइएसएएफ ने तालिबान को पराजित किया। यह मध्य एशिया सहित अफगानिस्तान के आतंकी संगठनों के लिए सदमे का दौर था। इसके बावजूद कट्टरपंथ और पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां न ही नाकाम हुई और न ही कमजोर। 21वीं सदी से भारत की रणनीतिक सोच में काफी परिवर्तन आया है। भारत की बढ़ती शक्ति और वैश्विक स्तर की स्वीकार्यता ने अफगान नीति के प्रति भारत की महत्वकांक्षा को बढ़ाया है। अफगानिस्तान को सहयोग करने वाले देशों में भारत का चौथा स्थान है। भारत चाहता है कि अफगानिस्तान में एक स्थिर और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का विकास हो। अमेरिकी प्रयासों से तालिबान की निश्चित रूप से पराजय हुई है, लेकिन हमें यह ध्यान रखने की जरूरत है कि उग्रवाद और आतंकवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है। वास्तव में उसमें बढ़ोतरी ही हुई है। भारत की चिंता वास्तव में अपने पड़ोसी देशों में अशांति को लेकर है। जिस प्रकार उग्रवाद और आतंकवाद का सामना भारत समेत दक्षिण एशियाई देश कर रहे हैं, वह चिंताजनक है। हाल के घटनाक्रमों से साफ हो जाता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर इससे लड़ने के बजाय इसे मौन स्वीकृति दे रहा है। जबकि आतंकवाद खुद उसके लिए नासूर बनता जा रहा है। और पाकिस्तान है कि भारत के खिलाफ साजिश रचने के लिए कभी चीन का दौरा कर रहा है तो कभी आतंकियों को सह दे रहा है। इस बीच भारत के प्रधानमंत्री की अफगान यात्रा को कूटनीतिक सफलता के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन भारत को अपनी साम‌र्थ्य का भरपूर इस्तेमाल करते हुए आतंकवाद को जड़ से खत्म करने का प्रयास करना होगा। जाहिर है इसके लिए अफगानिस्तान को भी साथ लेकर चलना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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