अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने कहा कि अमेरिका और मुस्लिम देशों के बीच संदेह और विवाद का चक्र खत्म होना चाहिए। मध्य पूर्व देशों के दौरे के क्रम में बराक ओबामा मिस्र की राजधानी काहिरा पहुंचे और अपने महत्त्वपूर्ण भाषण में मुस्लिम देशों के साथ नई शुरुआत की अपील की। यही नहीं, ओबामा ने माना कि दोनों पक्षों के बीच वर्षो से अविश्वास रहा। ओबामा ने भरोसा दिलाया कि इराक और अफगानिस्तान के मसले पर अमेरिका इन देशों में स्थानीय सैनिक अड्डे को स्थापित नहीं करेगा। इस्रइलिफलिस्तीन मुद्दे पर भी ओबामा का भाषण सारगíभत रहा। ईरान को भी शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम चलाने की अनुमति दी गई। ओबामा के इस भाषण को अरब मुल्कों ने नई शुरु आत के तौर पर ही देखा। लेकिन वक्त का पहिया घूमा। 18 मार्च 2011 को संयुक्त राष्ट्र ने अमेरिका की अगुवाई में नाटो को लीबिया पर हमले की मंजूरी दी। वहां के शासक मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ जारी बगावत को ओबामा प्रशासन ने शह दी। अब तक लीबिया में हजारों बेगुनाह लोगों की मौत हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों की अवहेलना करते हुए गद्दाफी और उसके बेटे पर व्यक्तिगत तौर पर हमले किए गए। गद्दाफी के बेटे की मौत हो गई। हमले की वजह लीबिया में निरंकुश शासन का होना नहीं है बल्कि लीबिया के तेल खजाने पर अमेरिकी नजर है।
मकसद था भड़ास निकालना
2 मई 2011 को पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों को दरकिनार करते हुए आतंकी संगठन अलकायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराया गया। वह भी तब जबकि पाकिस्तानी जमीन इन मामलों में काफी संवेदनशील है। खुद पाकिस्तान सरकार की भूमिका संदिग्ध है। और तो और दुनिया के सामने अमेरिका यह नहीं कहते हुए थकता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के साथ है। यहां हमले की वजह आतंकवाद का सफाया करना नहीं है बल्कि ओसामा के खिलाफ अमेरिकी भड़ास को निकालना था। कह सकते हैं, न लेना एक न देना दो। लेकिन अमेरिका अपनी चौधराहट के रास्ते पर फिर लौट आया है। अमेरिका में ओबामा के आने से जो आस बंधी थी, वह अब टूटने लगी है। इस्लामिक और गैर इस्लामिक मुल्कों के बीच बुश की बनाई चौड़ी खाई को पाटने की उम्मीद ओबामा से की जा रही थी लेकिन ओबामा ने इस्लामिक देशों से अपने रिश्ते और कटु कर लिए हैं। अमेरिका चाहता तो ओसामा को आतंकवाद के प्रतीक के तौर पर मार सकता था लेकिन अपनी हरकतों की वजह से उसने ओसामा को कट्टर इस्लामिक जमात में शहीद का दर्जा दिला दिया है।
अमेरिकी चश्मे से देखती दुनिया
एक सचाई यह भी है कि अमेरिका हमें जिस चश्मे से दुनिया दिखाता है, हम उसी चश्मे से दुनिया देखते हैं। अब ओसामा के खात्मे को ही लीजिए। ओसामा की मौत कैसे हुई, कहां हुई और किन परिस्थितियों में हुई, इसकी जानकारी अमेरिका के सिवा किसी मुल्क को नहीं है। यही नहीं, इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को कैसे पकड़ा गया? उन्हें फांसी की सजा किस आधार पर दी गई? इसका चश्मदीद भी अमेरिका ही था। ऐसे में वक्त-बेवक्त अमेरिका का कोई प्रवक्ता हमारे सामने आता है और अपने ढंग से कहानी गढ़ कर निकल जाता है। नतीजतन, हम उसी कहानी में उलझे-सुलझते रहते हैं। देखने का नया नजरिया बना ही नहीं पाते है। इसलिए ओसामा सचमुच मर गया या बहुत पहले ही मर चुका था, इस पर संदेह है। अमेरिका ने तस्वीर जारी नहीं कर इस संदेह को और भी बढ़ा दिया है।
जिंदा पकड़ने से राज खुलते
अलबत्ता, यह भी समझना मुश्किल है कि अगर ओसामा मारा गया तो अमेरिका ने उसे मारा क्यों, ज़िंदा भी पकड़ा जा सकता था? शायद इससे आतंकी साजिश पर से काफी पर्दा उठता। दुनिया भर के आतंकी नेटवकरे की जानकारी मिलती। और तो और पाकिस्तान के दोहरे रवैये से सब वाकिफ होते। भला, कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन को मारने से भारत में हाथियों के दांत और चंदन के पेड़ की तस्करी समाप्त हो गई। लेकिन ओसामा के मरने से आतंकवाद खत्म होने से रहा। वह और तेजी से पनपेगा। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन में युवा मुसलमानों की भरमार हो जाएगी। यकीन मानिए, दो वक्त की रोटी और वजूद के लिए लोग एक दूसरे पर बम बरसाने लगेंगे। जिस ओसामा बिन लादेन ने एक खास धर्म के मुंह पर कालिख लगाई उसी के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान को तबाह कर दिया और पाकिस्तान को भारत की तुलना में खूब तवज्जो दी। फर्ज कीजिए शेख भी खुश रहे, शैतान भी नाराज़ न हो। एक दौर था कि आतंक के इस बाज़ार को ओसामा बिन लादेन के जरिये अमेरिका ने ही रूस के सामने परोसा था।
अमेरिका-आतंकवाद एक ही रास्ते पर
दरअसल, राजनीतिशास्त्र के ‘पॉवर थ्योरी’ के मुताबिक ताकत के आने से क्षमता बढ़ती है और फिर उससे कुव्वत आती है। जो आपको उच्छृंखल और निरंकुश बना देती है। अमेरिका इसी राह का राही और आतंकवाद इस राह की पैदाइश है। अब टकराव तो लाजिमी है लेकिन हाल के दिनों में मध्य पूर्व में काफी अहम बदलाव आए हैं। मिस्र, ट्यूनीशिया जैसे मुल्कों में युवाओं के विरोध-प्रदर्शन से तख्ता पलट हो गया। वहीं यमन, सीरिया जैसे मुल्कों में विरोध-प्रदशर्न जारी है। वर्षो से जारी बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और गरीबी के खिलाफ मध्य पूर्व की जनता ने हमला बोल रखा है। उनके पास ताकत जरूर है लेकिन इसका इस्तेमाल सही नहीं हुआ तो दहशतगर्दी को बढ़ावा मिल सकता है। खासकर वह भी तब जब इन मुल्कों में सार्थक बदलाव दिख रहा है। लेकिन पाकिस्तान की जड़वत सोच को कुछ कट्टरपंथी भुनाकर दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व को अशांत-अस्थिर कर सकते हैं। बहरहाल, ओसामा की मौत से कई सवाल जरूर पनपे हैं।
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