Wednesday, May 25, 2011
सेना नहीं सुरक्षित तो देश कहां सुरक्षित
कराची नौसैन्य अड्डे पर आतंकवादियों का हमला कई दृष्टियों से पाकिस्तान में आए दिन होने वाले हमलों में सबसे बड़ा एवं दुस्साहसिक कहा जाएगा। संघर्ष में नौसेना के एक अधिकारी सहित 10 सुरक्षाकर्मियों तथा चार आतंकवादियों की मौत के बाद इस हमले का अंत हो गया, लेकिन आतंकवादियों द्वारा बहु पंक्तिवाले सख्त सुरक्षा घेरे को तोड़कर अड्डे के अंदर रॉकेट सहित भारी हथियार व गोला आदि लेकर प्रवेश कर वायुयान, हेलीकॉप्टर आदि को ध्वस्त करना और सबसे बढ़कर सेना से 16 घंटों तक लोहा लेना हैरतअंगेज था। घटनास्थल से निकलती आग की लपटें और धुंआ 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमले की यादें ताजा कर रहा था। हालांकि मुंबई एवं कराची हमले में मौलिक अंतर यह है कि मुंबई में होटलों एवं रेलवे स्टेशन जैसे सार्वजनिक एवं अत्यंत कम सुरक्षा वाले स्थल निशाने पर थे, जबकि कराची में सेना के ऑपरेशन का शीर्ष अड्डा। एक साथ भय, क्षोभ, तिलमिलाहट, घबराहट और छटपटाहट के शिकार पाकिस्तानी नागरिकों की त्वरित प्रतिक्रिया यही थी कि अगर आतंकवादी सेना के अड्डे में घुसकर ऐसा विनाश कर सकते हैं तो फिर आम आदमी की क्या हैसियत है। पहले यह समझने की कोशिश करें कि आतंकवादियों ने इसे निशाना क्यों बनाया? इसे फैजल हवाई अड्डा कहा जाता है, जो नौसेना, वायुसेना एवं सेना का संयुक्त अड्डा है। समुद्र के ऊपर आकाश से की जाने वाली निगरानी (सव्रेइलेंस) का नियंतण्रइसी अड्डे से होता है। यहां अवस्थित नौसेना के हवाई समूह को पीएनएस मेहरान कहा जाता है। आतंकवादियों का निशाना यही पीएनएस मेहरान था। आतंकवादियों द्वारा इसे निशाना बनाने का कारण केवल इतना नहीं है कि सेना इनके खिलाफ युद्ध कर रही है। हालांकि 26 अप्रैल को तहरीक-ए -तालिबान ने कहा था कि सुरक्षा बलों पर वजीरिस्तान एवं अन्य जगह हमला किया जाएगा क्योंकि वह अमेरिका के कहने पर अपने लोगों को मार रहा है। नौसेना के वायु विंग का गठन मुख्यत: भारत के विरुद्ध निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए किया गया था, लेकिन अमेरिका द्वारा अक्टूबर 2001 से आरंभ आतंक विरोधी युद्ध में इसकी प्रत्यक्ष भूमिका हो गई है। नाटो सेनाओं के लिए रसद और साजो सामान कराची बंदरगाह पर उतरता है और वहां से अफगानिस्तान भेजा जाता है। अल कायदा व तालिबान नाटो की आपूर्ति रोकना चाहते हैं। नौसेना वायु निगरानी के कारण उनके लिए समुद्र में प्रवेश एवं नाटो जहाजों पर हमला असंभव हो गया है। पाकिस्तान की थलसेना एवं वायुसेना की ऑपरेशन संबंधी भूमिका अमेरिका के आतंक विरोधी युद्ध में नहीं है, लेकिन पाकिस्तान की नौसेना अमेरिकी नेतृत्व वाले कम्बाइंड टास्क फोर्स अंतरराष्ट्रीय नौसेना बल (इंटरनेशनल नावल फोर्स) की सदस्य है जो समुद्र की पेट्रालिंग करती है ताकि आतंकवादी समूह आपूर्ति में बाधा उत्पन्न न कर सकें। अमेरिका, इटली, जर्मनी, पाकिस्तान, फ्रांस एवं ब्रिटेन इसके सदस्य हैं। इससे स्पष्ट हो जाना चाहिए कि आतंकवादियों के निशाने पर नौसेना क्यों है। पीछे नजर डालें तो पाएंगे कि पाकिस्तान में आतंकवादी नौसेना को निशाना बनाते रहे हैं। 4 मार्च 2008 को दो आत्मघातियों ने लाहौर स्थित नेवेल वार कॉलेज पर हमला किया था। एक ने मोटर साइकिल मुख्य द्वार से भिड़ा दी तो दूसरा पार्किंग में घुस गया। इसमें दोनों हमलवारों के अलावा एक नौसेना अधिकारी व तीन सुरक्षा गार्ड मारे गए। 2 दिसम्बर 2009 को इस्लामाबाद स्थित पाकिस्तान नौसेना के मुख्यालय के बाहर उसके एक खुफिया अधिकारी की चुस्ती से एक आत्मघाती पकड़ा गया। उसे स्वयं को उड़ाने से रोका नहीं गया, पर केवल एक व्यक्ति मौके पर मरा एवं दूसरा बाद में। 26 अप्रैल 2011 को पाकिस्तान के नौसेना अधिकारियों को ले जाने वाली दो बसों के निकट रिमोट कंट्रोल से विस्फोट किया गया। बस से थोड़ी दूरी पर होने के कारण इसमें केवल चार लोग मारे गए एवं 30 घायल हुए। दो पी 3 सी ओरियन विमान का नष्ट होना पाकिस्तानी नौसेना की अब तक की सबसे बड़ी क्षति है। मुख्यत: अमेरिका द्वारा प्रदत्त चार इंजन वाला यह विमान केवल पनडुब्बी रोधी नहीं, बल्कि समुद्र में निगरानी वाला जहाज भी है। यानी इसकी भूमिका रडार की है जो दुश्मन की नौसेना की समुद्र तले की गतिविधियों की सूचनाएं देता रहता है। हालिया वारदात में शायद पाकिस्तान सरकार एवं सेना पूरी क्षति का विवरण सार्वजनिक न करे, लेकिन जितने विस्फोट सुने गए और लंबे समय तक आग की लपटें व धुएं का गुब्बार यह बताने के लिए पर्याप्त थे कि क्षति काफी हुई है। पाकिस्तान के नौसेना प्रमुख एडमिरल नोमन बशीर ने कहा कि हमलावरों ने एअर बेस को काफी नुकसान पहुंचाया। तभी तो हमले की जिम्मेवारी लेने वाले तहरीक ए तालिबान के प्रवक्ता ने इसे बहुत बड़ी विजय बताया। आतंकवादी इतने हथियार और गोला बारुद लेकर प्रवेश करने में कैसे कामयाब हो गए, इस प्रश्न का जवाब मिलना अभी कठिन है। यह अड्डा रात में दो-ढाई घंटों के लिए खोला जाता है और उसी समय हमला हुआ। इसी से साबित होता है कि यह लंबे समय की तैयारी का नतीजा था। यह सेना के केन्द्रों पर पहले होने वालों आत्मघाती हमलों से अलग है। अक्टूबर 2009 में सेना के रावलपिंडी मुख्यालय पर भी आतंकवादियों ने हमला किया था और 22 लोगोें की मृत्यु के साथ काफी क्षति हुई थी किंतु इस हमले का स्वरूप, लक्ष्य एवं परिणाम सभी अलग हैं। इसके लिए लंबे समय से रेकी हुई होगी। नक्शे का पूरा अध्ययन किया गया होगा, कहां सुरक्षा व्यवस्था अभेद्य है और किस बिन्दु पर थोड़ कमजोर- इसकी भी समीक्षा की गई होगी, कहां-कहां से घुसा जा सकता है, कहां कौन जहाज, हेलिकॉप्टर है, तेल डिपो है, हथियार व गोला-बारुद है, कहां से पोजिशन लेनी है आदि के साथ हमलावरों को पूरा प्रशिक्षण मिला होगा और संभव है, मुंबई हमले की तरह इन्हें बाहर से निर्देश भी मिल रहे हों। लगता है कि या तो नौसेना या अंदर के कुछ लोग इनके साथ होंगे या फिर सेना से निकलने के बाद जेहादी विचारधारा वालों की इसमें खास भूमिका होगी। बगैर अंदर की पूरी जानकारी के ऐसा हमला संभव नहीं है। पाकिस्तान के साथ हमारी सहानुभूति है। वहां के आंतरिक मंत्री रहमान मलिक की इस बात से हमारी सहमति है कि तालिबान व अल कायदा पाकिस्तान के भी दुश्मन हैं, लेकिन यह समझने में पाकिस्तान को काफी देर लग गयी और यही कारण है कि नियंतण्रउसके हाथ से निकलता जा रहा है। पाकिस्तानी विश्लेषक इसे ओसामा बिन लादेन की अमेरिकी सैनिकों द्वारा की गई हत्या से जोड़कर देख रहे हैं। ओसामा की मृत्यु के बाद सऊदी अरब के राजनयिक की हत्या हुई, अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ। ओसामा के मारे जाने के बाद से आम पाकिस्तानी स्वयं को लज्जित महसूस कर रहा है। सेना भी झेंपी हुई है। अमेरिका द्वारा पाक संप्रभुता का उल्लंघन बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। हमले के दिन भी इमरान खान ड्रोन हमले के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। कुल मिलाकर पूरे पाकिस्तान में इस समय क्षोभ और गुस्से का उबाल है। आतंकवादी भी इसका लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु क्या ओसामा के मारे जाने के पूर्व आतंकवादी पाकिस्तान में हमले नहीं कर रहे थे? क्या वे सुरक्षा बलों को निशाना नहीं बना रहे थे? पाकिस्तान के करीब पांच हजार सुरक्षा बल आतंकवादियों के साथ युद्ध में मारे जा चुके हैं। वस्तुत: ओसामा की मृत्यु भी आतंकवादियों को पाकिस्तान की सेना एवं सरकार के खिलाफ हमले का उन्मादित उत्प्रेरण बना है, लेकिन यह कहना गलत होगा कि ओसामा को नहीं मारा गया होता तो ये हमले नहीं होते। मुल्ला उमर के मारे जाने के साथ भी ऐसा ही होगा। इस हमले की साजिश ओसामा की मौत से पहले तय लगती है। क्योंकि इसकी तैयारी में पर्याप्त समय लगा होगा। पाकिस्तान का आतंकवादी हिंसा की चपेट में आना बड़ी चिंता है। अगर वहां की सबसे सशक्त एवं प्रभावी संस्था सेना के सुरक्षा दुर्ग को आतंकवादी नेस्तनाबूद कर रहे हैं तो फिर वहां कौन सी संस्था बचेगी जिसे किसी स्वस्थ राज्य का प्रमाण माना जाए। पूरी दुनिया को इस पर विचार करना होगा
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