लेखक पाकिस्तान के संदर्भ में अमेरिकी नीति में किसी बुनियादी बदलाव की आशा नहीं कर रहे हैं…
आतंकवाद से लड़ने में पाकिस्तान का दोहरा चेहरा उजागर होने के बावजूद इस देश के प्रति दशकों पुरानी अमेरिकी नीति में किसी मूलभूत परिवर्तन की उम्मीद नहीं है। यहां तक कि पाक सेना के प्रमुख ठिकाने एबटाबाद में छह साल से रहने वाले ओसामा बिन लादेन को मार गिराने में अमेरिकी हेलीकॉप्टरों के साहसिक कारनामे के बाद वाशिंगटन ने इस्लामाबाद से महज कुछ कड़े सवाल ही पूछे हैं और लादेन की तीन विधवाओं से पूछताछ की अनुमति की ही इच्छा प्रकट की है। उसने पाकिस्तान के उद्दंड सैन्य प्रतिष्ठान को अनुशासित करने के लिए कुछ नहीं किया है। अमेरिका ने केवल एक बार (9/11 के बाद) ही निर्णायक कदम उठाया था। पूर्व पाकिस्तानी सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ के अनुसार, तब विदेश उपमंत्री रिचर्ड आर्मिटेज ने इस्लामाबाद को अफगानिस्तान में तालिबान शासन की सहायता से बाज आने के लिए धमकी देते हुए कहा था कि अगर वह नहीं माना तो पाकिस्तान को पाषाण युग में पहुंचा दिया जाएगा। इस धमकी ने तुरंत काम किया, किंतु अफगानिस्तान में सत्ता बदलने के बाद पाकिस्तान ने फिर धीमे-धीमे तालिबान को सहायता देनी शुरू कर दी। वास्तव में, अब्दुल कादिर खान के परमाणु तस्करी के खुलासे के बाद अमेरिका ने लीबिया, उत्तर कोरिया और ईरान में परमाणु प्रसार के जिम्मेदार पाक सैन्य प्रतिष्ठान को दंडित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया और सारा दोष एक व्यक्ति के मत्थे मढ़ दिया। अभी तक एक्यू खान से किसी अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी एजेंसी ने पूछताछ तक नहीं की है। अब विश्व के मोस्ट वांटेड आतंकी को पाकिस्तान की प्रमुख सैन्य अकादमी के बगल में पाकर भी अमेरिका पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ को आतंकी व जिहादी समूहों से संबंध तोड़ने को मजबूर करने का मौका गंवा रहा है। अमेरिका अफगानिस्तान युद्ध में अपने संकीर्ण लक्ष्यों की पूर्ति के लिए जरूरी, किंतु मुश्किल साझेदार पाकिस्तान को साधने का प्रयास कर रहा है। अल्पकालिक राजनीतिक निहित स्वार्थो ने अमेरिकी नीति को हमेशा पाकिस्तान के प्रति नरम रखा है। पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ में दशकों से भारी निवेश के हैरतअंगेज परिणाम सामने हैं। इस बीच पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद की धुरी के रूप में उभरा है। पाकिस्तान ऐसे जिहादी समूहों का गढ़ बन गया है जो मजहब के पवित्र औजार के तौर पर खुलेआम हिंसा का प्रवचन देते हैं। पाकिस्तान में इस्लामिक उग्रवाद और अमेरिकी विरोध का ज्वार बढ़ता जा रहा है। पाक जनरल अब भी आतंकी समूहों को पोषित कर रहे हैं। 2008 में मुंबई आतंकी हमला निश्चित तौर पर पाकिस्तान के दोनों दावों का झूठ उजागर करता है कि पाक के सत्ता संस्थानों का इस हमले में कोई योगदान नहीं था और पाकिस्तान तो खुद ही आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार है। असलियत यह है कि पाकिस्तान खुद के प्रायोजित आतंक का शिकार है और लश्करे-तैयबा जैसे आतंकी संगठन पाकिस्तानी सेना के मोहरे भर हैं। लादेन प्रकरण ने पाकिस्तानी सेना को नंगा कर दिया है। अगर लादेन शहरी क्षेत्र में छिप कर रहना चाहता तो उसके पास बहुत से विकल्प थे। एक ऐसे शहर में शरण लेना जहां प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठान होने के नाते चप्पे-चप्पे पर चौकसी थी, यही साबित करता है कि उसे पाकिस्तानी सेना या खुफिया एजेंसी का समर्थन हासिल था। पाकिस्तानी सेना की नाक के नीचे बिन लादेन का शिकार करके और पाकिस्तानी वायुसेना में सेंध लगाकर वहां सैन्य कार्रवाई को अंजाम देकर अमेरिका ने पाकिस्तान पर वर्चस्व पर मुहर लगा दी है। इस प्रक्रिया में देश के रक्षक होने का दावा करने वाले प्रतिष्ठान-पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ की प्रतिष्ठा घर में ही मिट्टी में मिल चुकी है। आखिरकार, पाकिस्तान के बीचोबीच चालीस मिनट का सैन्य अभियान चलाकर अमेरिका ने दिखा दिया है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार भी अमेरिकी पहुंच से बाहर नहीं हैं। इससे पाकिस्तान के प्रमुख सत्ता दलालों और उग्रवादी समूहों को एक कड़ा संदेश मिला है। यह आतंक के प्रायोजकों को दोहरा आघात है कि वाशिंगटन ने इस्लामाबाद के साथ अपने दीर्घकालिक संबंधों की भी परवाह न करते हुए लादेन के खात्मे की सीधी कार्रवाई की, पाकिस्तान को बताए बिना वहां अनेक सीआइए एजेंटों, विशेष बलों और ठेकेदारों को तैनात किया। लादेन अभियान से मात्र एक सप्ताह पहले ही कियानी और पाशा अमेरिका से मांग कर रहे थे कि पाकिस्तान से सीआइए एजेंटों और ठेकेदारों को वापस बुला लिया जाए। वे नहीं चाहते थे कि सीआइए एजेंट पाकिस्तान के कोने-कोने में खुफिया जानकारी जुटाते फिरें, लेकिन इस अभियान से सीआइए की प्रभावी खुफिया कुशलता और कार्यात्मक क्षमताओं ने उन मित्रवत संबंधों को तोड़ दिया, जिनके तहत पाक सैन्य व खुफिया अधिकारी आतंकियों को प्रोत्साहित और पोषित करते थे। अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सदस्य पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिका सहायता पर सवाल उठा रहे हैं। यह सहायता अब प्रतिवर्ष तीन अरब डॉलर पर पहुंच गई है, किंतु कटु सत्य यह है कि पाकिस्तान में जिहादी तत्वों की पकड़ जितनी मजबूत हुई है उसे मिलनी वाली अमेरिकी सहायता में उतनी ही अधिक वृद्धि हुई है। राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में पाकिस्तान इजरायल को पीछे छोड़कर सबसे अधिक अमेरिकी सहायता पाने वाला देश बन गया है। अमेरिका के पास पाकिस्तान में आतंकी ढांचे और सरकारी व गैर-सरकारी अभिनेताओं के बीच मधुर संबंधों के पर्याप्त साक्ष्य हैं। समस्या यह है कि अमेरिकी नीति अल्पकालिक क्षेत्रीय हितों से निर्देशित है। वाशिंगटन को लगता है कि अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से विदाई, 2014 के बाद के अफगानिस्तानी परिदृश्य और ईरान पर दबाव बनाने में पाकिस्तान का सहयोग बहुत जरूरी है। अफगान युद्ध में ओबामा के संकीर्ण लक्ष्यों ने अमेरिका की पाकिस्तान पर निर्भरता को बढ़ा दिया है। अब ओबामा चाहते हैं कि पाकिस्तान तालिबानी जनरलों को वार्ता की मेज पर लाने को बाध्य करे। यद्यपि तालिबान का जन्मदाता आइएसआइ है, किंतु नौवें दशक में इसका लालन-पालन सीआइए ने ही किया। इसीलिए अमेरिका को लगता है कि अपने पूर्व सहयोगी के साथ मेलमिलाप संभव है। इस पृष्ठभूमि में पाक-अमेरिका संबंधों के उलझे धागों को सुलझाने के बजाए लादेन प्रकरण ने इन्हें और उलझा दिया है। पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान के कुछ लोग अमेरिका को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि यह सब आइएसआइ में शामिल कुछ दुष्ट तत्वों का किया धरा है, जबकि सच्चाई यह है कि पूरी आइएसआइ ही दुष्ट है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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