Tuesday, May 3, 2011

करमापा बोले मैं चीन का एजेंट नहीं

आखिर 11 वर्ष के बाद करमापा अवतार उग्येन त्रिनले दोरजे ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए भारत में आने की अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने दो टूक कहा है कि न तो वह कोई चीनी जासूस या एजेंट हैं और न ही उन्हें चीन ने भारत में स्थापित किया है। बल्कि वह भारत सरकार के आभारी हैं, जिन्होंने उन्हें यहां आने पर शरण और हर संभव सहायता दी। उन्होंने भारत के लोगों से मिले प्रेम और स्नेह मिलने पर उसकी कृतज्ञता दोहराते हुए स्पष्ट किया कि भारत उनका घर है और वह इस देश व यहां के लोगों के हितों के खिलाफ कुछ भी नहीं देखना चाहते। उन्होंने परमपावन दलाई लामा को भी अपना आध्यात्मिक व धर्मगुरु बताते हुए तिब्बती लोगों के प्रति भी अपनी प्रतिबद्धताओं को दोहराया है। करमापा अवतार कार्यालय के हवाले से जारी एक बयान में उन्होंने कहा है कि उन्हें मीडिया की अफवाहों के चलते अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ी हैं, क्योंकि अभी तक भी लोग हैरान हैं कि उन्होंने दिसंबर 1999 में तिब्बत को क्यों छोड़ा। करमापा ने कहा कि इस मसले पर वह पहले भी मीडिया को अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं, लेकिन अब वह फिर पुन: दोहरा रहे हैं कि अगर वह तिब्बत में रहते तो वह 17वें करमापा अवतार की आध्यात्मिक शिक्षाओं को ग्रहण नहीं कर पाते। उन्हें अपनी करमापा अवतार की शिक्षाओं को उसी क्रम से ग्रहण करना है जो कड़ी भगवान बुद्ध के समय से भारत में शुरू हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनकी शिक्षाओं की प्रार्दुभाव नालंदा विवि से हुआ था। करमापा की शिक्षाओं की कड़ी की गहरी जड़ें भारत में हैं। इससे पूर्व 16वें करमापा भी भारत में निर्वासित जीवन के लिए आए और उन्होंने सिक्किम में रूमटेक बौद्ध मठ को स्थापित किया। इसलिए इस शिक्षा के सभी गुरु भारत में ही हैं। अगर वह तिब्बत में रहते तो चीन की सरकार कभी भी इन गुरुओं को उन्हें तिब्बत आने की इजाजत नहीं देती।

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