Wednesday, May 4, 2011

पाकिस्तान के सामने आर्थिक संकट

पाकिस्तान के सामने आर्थिक संकट के हालात पैदा हो सकते हैं। लेकिन पाकिस्तान के लिए इससे भी बुरा होनेवाला है। पिछले दस साल से मुशर्रफ से लेकर जरदारी तक पूरी दुनिया में बताते रहे हैं कि ओसामा पाकिस्तान में नहीं है। अगर होगा भी तो कहीं उत्तर के वजीरिस्तान इलाके में होगा। अब जब ओसामा को एबटाबाद जैसे अहम शहर में पकड़कर मार दिया गया है तो पाकिस्तानी हुकूमत के लिए बहुत ही मुश्किल पेश आनेवाली है..रीब 10 साल की कोशिश के बाद अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मार डाला। पूरी दुनिया में आतंक का पर्याय बन चुके ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने ही बंदूक के रास्ते पर डाला था और उसका इस्तेमाल किया था। जब पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक का राज था तो अमेरिका ने अफगानिस्तान में घुस आए सोवियत फौजियों को भगाने के लिए जो योद्धा तैयार किए थे, ओसामा बिन लादेन उसके मुखिया थे। अमेरिका ने उनकी खूब मदद की। खूब हथियार दिया, आर्थिक सहायता भी खूब किया और अपने काम के लिए इस्तेमाल किया। इस दौर में जनरल जिया ने भी अमेरिका से खूब माल खींचा। लेकिन जब सोवियत रूस टूट गया और रूसी फौजें अफगानिस्तान से भाग गईं तो वहां अमेरिका की रुचि खत्म हो गई। अमेरिका ने पाकिस्तान को भी फ्रीजर में लगा दिया और ओसामा बिन लादेन को भुला दिया। उसका तो दाना-पानी ही बंद हो गया। ओसामा ने गुस्से में अमेरिका के खिलाफ काम करना शुरू कर दिया। इस बीच अफगानिस्तान में रूसियों के खिलाफ युद्ध में उसके साथ रहे तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लिया। इस तरह ओसामा को रहने का ठिकाना तो मिल गया लेकिन अफगानिस्तान खुद एक गरीब मुल्क था। वहां ओसामा का आर्थिक गुजर नहीं हो सकता था। ओसामा ने अमेरिकी हितों को नुकसान पंहुचाने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया। उसने अमेरिका के खिलाफ पहला बड़ा हमला वर्ष 1993 में उसी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर किया जिसे सितम्बर 2001 में जमींदोज किया गया। सितम्बर 2001 के पहले और बाद में भी अल-कायदा ने अमेरिकी हितों को बहुत नुकसान पंहुचाया। इस तरह से अमेरिका की कृपा से ही आतंक की दुनिया में प्रवेश करने वाले लादेन को अमेरिका ने अपना दुश्मन नंबर एक घोषित कर दिया। पिछले दस साल से अमेरिका ने ओसामा को मार डालने या जिंदा पकड़ने के लिए खरबों डॉलर खर्च किया है।

ओसामा को पकड़ने और आतंकवाद से लड़ने के नाम पर पाकिस्तान ने ही अमेरिका से करीब 20 अरब डॉलर की रकम दस्तयाब की है, लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिली थी। पाकिस्तान ने लादेन को तलाशने के लिए वजीराबाद के कबायली इलाके में अपनी फौज लगा रखा है, वहां उसकी फौज को बहुत सारी मुश्किलात पेश आ रही हैं लेकिन ओसामा को तलाशने का अभियान चल रहा है। बहरहाल अमरीकी खुफिया एजेंसी, सीआईए ने स्वतंत्र रूप से पता लगाने की कोशिश की और ओसामा मिल गया। वह पाकिस्तान के एक हिल स्टेशन पर आराम की जिंदगी गुजार रहा था।

जब अमेरिका को पता चला कि पाकिस्तानी फौज के इतने महत्वपूर्ण शहर में ओसामा रह रहा है और पाकिस्तानी सेना के मुखिया अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक सहायता के बदले उसकी तलाश देश के उत्तरी दुर्गम इलाकों में करवा रहे हैं, तो अमेरिकी हुकूमत की समझ में उसका पूरा खेल आ गया। उनको पता लग गया कि पाकिस्तान के असली हुक्मरान वहां के फौजी अफसर हैं और वे लादेन को किसी भी सूरत में अमेरिका के हवाले नहीं करने वाले हैं। शायद उसी के बाद सीआईए ने तय किया कि ओसामा प्रोजेक्ट पर बिना पाकिस्तानी सहयोग के काम किया जाएगा। ओसामा को खत्म करने में अमेरिका को सफलता केवल इसी रणनीतिक सोच की वजह से मिली है।

लादेन के मारे जाने का दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग असर पड़ेगा। मसलन अमेरिका में राष्ट्रपति ओबामा को दोबारा राष्ट्रपति बनने में आसानी होगी। जहां तक अमेरिका के खिलाफ अल-कायदा के आतंक का सवाल है तो उस पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। पिछले दस साल से वैसे भी लादेन का सीधे तौर पर अलकायदा के काम में दखल नहीं था लेकिन अल-कायदा की गतिविधियों में कहीं कोई कमी नहीं आई थी। इस घटना का सबसे ज्यादा असर पाकिस्तान में महसूस किया जाएगा। इस बात की पूरी संभावना है कि अब अमेरिका पाकिस्तान को वह रकम देना भी बंद कर देगा जो अब तक प्रोजेक्ट ओसामा के नाम पर बंधी हुई थी। यह कोई मामूली दौलत नहीं थी। इससे एक बार फिर पाकिस्तान के सामने आर्थिक संकट के हालात पैदा हो सकते हैं। लेकिन पाकिस्तान के लिए इससे भी बुरा होने वाला है। पिछले दस साल से मुशर्रफ से लेकर जरदारी तक पूरी दुनिया में बताते रहे हैं कि ओसामा पाकिस्तान में नहीं है। अगर होगा भी तो कहीं उत्तर के वजीरिस्तान इलाके में होगा। अब जब ओसामा को एबटाबाद जैसे अहम शहर में पकड़कर मार दिया गया है तो पाकिस्तानी हुकूमत के लिए बहुत ही मुश्किल पेश आने वाली है। उसकी विश्वसनीयता पर संकट पैदा हो चुका है। हालांकि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि जरदारी, गिलानी और रहमान मलिक जैसे राजनेताओं को पाकिस्तानी फौज ने बताया ही न हो कि ओसामा उनकी हिफाजत में है लेकिन यह तो और भी बुरा है। दुनिया के सामने तो फौज भी सिविलियन सरकार को ही सामने रखकर बात करती है।

हां, इस बात में कोई दम नहीं कि पाकिस्तानी फौज को भी नहीं मालूम था कि ओसामा पाकिस्तान की मिलटरी अकेडमी वाले शहर में ही रह रहा है। वह लगभग पूरी तरह से सेना की कृपा से ही रह रहा था। इसके कई कारण हैं। ओसामा के नाम पर ही पाकिस्तान को अमेरिकी मदद मिलती थी। इतने कीमती आदमी को सहेज कर रखना किसी के लिए भी जरूरी होता है। हालांकि यह बात भी भरोसे लायक नहीं लगती कि बिना सरकारी मदद के इतना बड़ा कारनामा किया जा सकता है।

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