Thursday, May 5, 2011

माओवादियों पर लगाम जरूरी

भारतीय विदेश मंत्री एमएस कृष्णा की हाल की नेपाल यात्रा पर गंभीरता से विचार की जरूरत होनी चाहिए। इसलिए कि माओवादियों के प्रमुख प्रंचड से वार्ता के बाद भी कृष्णा भारतीय हितों और उसके विरुद्ध होने वाली घटनाओं को रोकने का आश्वासन न पा सके। चीन के आगोश में बैठे माओवादियों की भारत विरोधी मानसिकता और नीतियां जगजाहिर हैं। भारत का कूटनीतिक संवर्ग समझ बैठा है कि नेपाल के विकास कायरे में भारी मदद देकर नेपाल के राजनीतिक संवर्ग को सहचर बनाया जा सकता है और यही भूल नेपाल में भारतीय अस्मिता पर छुरी चलाती है। माओवादियों की असली नीति नेपाली सत्ता पर कब्जा करना और भारत के खिलाफ चीन के साथ खड़ा होना है। सत्ता से हटने के बाद भी माओवादी नेपाल की सबसे ताकतवर फोर्स हैं जिनकी गुरिल्ला आर्मी नेपाल आर्मी में शामिल होने के लिए तैयार बैठी है। जिस दिन नेपाली आर्मी में माओवादी आर्मी का विलय हो जायेगा, उस दिन नेपाल में माओवादियों की तानाशाही कायम हो जायेगी। ऐसी स्थिति भारत के लिए सहज हो सकती है क्या? माओवादियों द्वारा एमएस कृष्णा के नेपाल दौरे के समय प्रचारित किया गया कि भारतीय उपनिवेश से नेपाल की संप्रभुता खतरे में है और भारत नेपाल में उपनिवेशवादी नीतियां कायम करने के लिए बिसात बिछा रहा है। माओवादियों ने शक्ति प्रदर्शन कर भारत द्वारा नेपाल में चलाये जा रहे विकास कायरे में भी अड़चन डाली। वहां भारतीय राजदूत राकेश सूद माओवादियों के निशाने पर रहे हैं। भारतीय संप्रभुता के लिए सबसे खतरनाक यह है कि माओवादियों ने भारतीय झंडे का अपमान करने तक की जुर्रत दिखायी। प्रतिक्रिया में भारत की ओर से माओवादियों को कड़ा संदेश दिया जाना चाहिए था पर दुर्भाग्य से वह इसमें विफल रहा है। नेपाल में भारतीय सहायता किस कीमत पर जारी रहे और विकास कायरे को किस कीमत पर गति दी जाये, यह बड़ा सवाल है? सनद रहे कि नेपाल में भारत विकास कायरें पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है। वहां भारत की ओर से कई ऐसी योजनाओं पर काम हो रहा है जिसका लाभ नेपाल की गरीब आबादी को मिलेगा। शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल से जुड़ी योजनाओं का काम पूरा कर उसे नेपाल को सौंपा भी जा चुका है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल योजनाओं के लोकार्पण और उन्हें नेपाल सरकार को सौंपने के लिए भारतीय राजदूत विभिन्न क्षेत्रों के दौरे पर थे, तब माओवादियों ने न केवल उनका विरोध किया था बल्कि उन पर हमले की भी कोशिश हुई। जीएमआर नामक भारतीय कंपनी नेपाल में पनबिजली परियोजना के पर काम कर रही है जिसका लाभ वहां की बड़ी आबादी को मिलेगा। पर भारतीय कंपनी जीएमआर काम समेटने की तैयारी में है क्योंकि माओवादी लगातार अडंगा डाल रहे हैं और परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे हैं। माओवादियों के सामने नेपाली पुलिस असहाय रहती है। ऐसे में भारतीय कंपनी जीएमआर को सुरक्षा मिले भी तो कैसे? दो दशकों से माओवादियों की खूनी गतिविधियों ने नेपाल में विकास की अवधारणा दफन कर दी है। दूरदराज इलाकों से शासन-प्रशासन का प्रभाव लगभग समाप्त है। वहां पर्यटन उद्योग एक बड़ा सहारा था लेकिन माओवादी गतिविधियों के कारण वह बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहां का पशुपति नाथ मंदिर भारत की आस्था का केन्द्र था लेकिन अब लोग वहां जाने से कतराते हैं। नेपाल की लोकतांत्रिक व्यवस्था चीन की अपेक्षा भारत के प्रति आग्रही है क्योंकि भारत ने वहां लोकतांत्रिक धारा मजबूत करने की कोशिश की है और कभी भी नेपाल की जरूरतों से मुंह नहीं मोड़ा जबकि चीन ने उसे आर्थिक मदद देने की जगह डर और पल्रोभन ही दिये हैं लेकिन सरकार की लोकतांत्रिक शक्तियों का माओवादियों को साथ लेकर चलना मजबूरी है। कारण, संविधान सभा में माओवादियों का दल सबसे बड़ा दल है और उसके कायरे में माओवादियों की भूमिका हस्तक्षेपकारी है। ऐसी में भारतीय कूटनीति नेपाल की लोकतांत्रिक ताकतों को सहायता और समर्थन देने की होनी चाहिए। वहां लोकतांत्रिक ताकतें कमजोर होंगी तो यह भारतीय हितों के खिलाफ होगा। माओवादी किसी भी तरह सत्ता में आने के लिए तैयार बैठे हैं और उनका विश्वास लोकतांत्रिक मूल्यों में कोई विश्वास नहीं है। माओवादियों की असल चाल गुरिल्ला आर्मी को नेपाल आर्मी में शामिल कराना है। जिस दिन ऐसा हुआ, उसी दिन नेपाल में माओवादियों की तानाशाही की नींव पड़ जायेगी। हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि माओवादियों की गुरिल्ला आर्मी नेपाली आर्मी का अंग न बने। विदेश मंत्री एमएस कृष्णा की नेपाल यात्रा के बाद भी माओवादियों को कड़ा संदेश नहीं मिला। भारत को नेपाल में अपने हित सुरक्षित रखने हैं और चीन की कुदृष्टि से बचना है तो माओवादियों की भारत विरोधी मानसिकता का प्रबंधन करना ही होगा।

No comments:

Post a Comment