Wednesday, May 4, 2011
सामने आई पाक की दोहरी भूमिका
ओसामा बिन लादेन को किसने मारा? आतंक के इस पर्याय की मौत के क्या मायने हैं? ओसामा के जाने के बाद ये दो सवाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने हैं। इतना तो साफ है कि ओसामा की मौत के पीछे अमेरिका की नेवी सील और पाकिस्तान की आइएसआइ व पाकिस्तानी फौज की साझा मुहिम रही, लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी आयामों पर ध्यान देना होगा। सबसे पहले ओसामा की मौत को अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने साझा मुहिम कहा, लेकिन पाकिस्तान ने इससे अपने को किनारे कर लिया। अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने इसके जवाब में कहा कि अमेरिकी ऑपरेशन टीम को सूचनाएं मिली थीं। इस आधार पर कार्रवाई की गई, लेकिन पाकिस्तान ने यहां तक कह डाला कि किसी प्रकार की सूचना नहीं बांटी गई थी। अब अमेरिका कह रहा है कि पाकिस्तान में पांच सालों से लादेन छिपा था, यानी पाकिस्तान ने लादेन को पनाह दी। इस पर पाकिस्तान से सफाई मांगी गई है। इसके बाद से पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी बचाव की मुद्रा में आ गए हैं। उनका कहना है कि हम क्यों आतंकी को पनाह देंगे, जबकि हमारा मुल्क दुनिया में आतंक का सबसे बड़ा शिकार है। देखा जाए तो ओसामा बिन लादेन की मौत के 24 घंटे के अंदर ही सबसे बड़े आतंकी पर फतह का पूरा श्रेय लेने से हर कोई बच रहा है। इसमें अमेरिका की अपनी चाल है और पाकिस्तान का अपना पैंतरा। अमेरिका अपनी कूटनीतिक कसरत में जुटा है। दरअसल, यह तो मुमकिन ही नहीं कि अमेरिका अपने बूते पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को मार गिराए। इसके लिए निश्चित तौर पर पाकिस्तान सरकार की खुफिया एजेंसी की मदद ली गई है, लेकिन पाकिस्तान इस्लामिक आतंकवाद की धधक से खुद को दूर रखना चाहता है। इसकी एक वजह पाकिस्तानी अवाम के सामने पाक-साफ दिखना भी है। यही पाकिस्तान का दोहरा रवैया है। गुड़ खाएं और गुलगुले से परहेज। एक तरफ अमेरिका को साधने की चालाकी तो दूसरी तरफ जनता को गुमराह रखने की कोशिश। अलबत्ता ओसामा बिन लादेन की मौत ने पाकिस्तान-अमेरिका के बनते-बिगड़ते रिश्ते को और जटिल कर दिया है। जिस ग्वांतानामो बे में गिरफ्तार संदिग्धों की पूछताछ रिपोर्ट के आधार पर यह कार्रवाई हुई, उसमें इस बात का भी उल्लेख है कि आइएसआइ आतंकियों की पनाहगाह है। अब सवाल यह उठता है कि क्या ओसामा के बाद अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई थम जाएगी या अमेरिका 9/11 के गुनाहगारों को सजा दिलाने की तर्ज पर मुंबई हमले के लिए भी अहम कदम उठाएगा? अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना झेल रहा अमेरिका क्या अब अफगानिस्तान से साल 2014 से पहले निकल जाएगा या यों ही पाकिस्तान और अफगानिस्तान को अरबों-खरबों की आर्थिक मदद मिलती रहेगी? अमेरिकी चश्मे से बाहर देखें तो ओसामा बिन लादेन को मार गिराना महज एक सांकेतिक कार्रवाई भर ही है। कहा जा सकता है कि ओसामा बिन लादेन जेहादियों का प्रेरणा स्रोत और आतंकवाद का सबसे बड़ा चेहरा था और अमेरिका ने इसे खत्म कर दिया। लेकिन इससे न तो आतंकवाद का नासूर खत्म होगा और न ही इस्लामी चरमपंथियों पर लगाम लगने वाली है। दक्षिण एशियाई राजनीतिक हलचलों का सूक्ष्मता से अध्ययन करें तो भारत, अमेरिका, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवाद का मसला बना रहेगा। इससे मुस्लिम और गैर मुस्लिम धर्मो के बीच की खाई और बढ़ेगी। इसमें संदेह नहीं कि ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका और भारत को अपना शत्रु बताया था, लेकिन लादेन के जाने के बाद ऐसा नहीं है कि भारत में आतंकवाद का सफाया हो जाएगा। भारत में आतंकवाद के पीछे कोई आतंकी संगठन नहीं, बल्कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ और पाकिस्तानी फौज है। इसके अलावा कई छोटे-मोटे आतंकी संगठन हैं, जिन्हें बड़े आतंकी संगठनों से पैसा मिलता है। खुद भारत में ही कई आतंकी संगठन बन गए हैं, जिनके स्लीपर सेल लगातार काम कर रहे हैं। वैसे इन दिनों पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर तालिबानी लड़ाकों और हक्कानी ग्रुप का खौफ बढ़ा है। तभी तो आए दिन पाकिस्तान-अफगानिस्तान में आतंकी हमले हो रहे हैं। वहीं अरब मुल्कों में हालात और बिगड़ेंगे और चीन अमेरिका के किसी भी झांसे में नहीं आने वाला है। दरअसल, न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में हमले के बाद अलकायदा दबाव में आ गया था। इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका का आक्त्रमक होना था। हालांकि साल 2005 में ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट का गठन हुआ। इसमें अलकायदा समेत दुनिया भर के इस्लामी आतंकी संगठन शामिल हुए। मसलन, जैश-ए-मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान के आतंकी भी इस जमात में आए। इससे काफी हद तक इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा मिला और आतंकियों के बीच जिहाद सार्वभौमिक लक्ष्य बना। इस दौरान कई इस्लामिक देशों से फंडिंग हुई। कूटनीति के स्तर पर माना जा सकता है कि इस दौरान यानी साल 2005 में ओसामा बिन लादेन को मजबूती मिली है, लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपने हमले तेज किए, अलकायदा का जिहादियों से नियंत्रण उठता गया। इस दौरान कई छोटे-मोटे स्थानीय स्तर पर आतंकी संगठन बने। काफी हद तक जिहाद एक आंदोलन से बढ़कर पेशा हो गया। इस मायने में ओसामा बिन लादेन अपनी योजनाओं में सफल हुआ, लेकिन कभी खुद को वह तोरा-बोरा की पहाडि़यों में बचाता रहा तो कभी पाकिस्तान सीमा पर। इसलिए मौजूदा आतंकवाद ओसामा बिन लादेन से काफी आगे चला गया है, जो भारत और अमेरिका के लिए चिंता की बात है। ऐसे में एक कमजोर और जिंदा लादेन दुनिया के लिए हितकर साबित होता। वैसे, आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान की दोहरी भूमिका भी सबके सामने आ गई है। इस्लामाबाद के पास एबटाबाद में दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी ओसामा बिन लादेन हवेली बनाकर रह रहा था और पाकिस्तान इससे बेखबर रहने की बात कर रहा है। इस इलाके में पाकिस्तान का आर्मी एकेडमी भी थी और मिलिट्री हेडक्वॉर्टर भी। यानी यह इलाका सबसे सुरक्षित इलाकों में एक था और सबकुछ पाकिस्तान सरकार की देखरेख में था। वक्त का तकाजा है कि भारत अब 26/11 मुंबई हमले के दोषियों को सख्त सजा दिलाने के लिए पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाए। इसमें भारत को अमेरिका का साथ स्वाभाविक तौर पर मिलेगा। हालांकि ओसामा बिन लादेन की मौत की बाद वैश्विक समुदाय को किसी दूसरी मुहिम को शुरू करने से पहले प्रतिक्रियाओं का इंतजार करना चाहिए। यानी वक्त आ गया है कि दुनिया भर की जनता को सुना जाए। देखना होगा कि ओबामा के समर्थन में और ओसामा के समर्थन में कितने लोग, कितनी सरकारें, कितने संगठन हैं। यह भी देखना होगा कि आतंकवाद का क्रूर चेहरा इस्लामी आतंकवाद का बृहत्तर रूप नहीं ले। छोटे आतंकी संगठनों को मिलने वाली फंडिंग पर रोक के तत्काल उपाय खोजने होंगे। वरना, हजारों लादेन पैदा हो सकते हैं। अगर सचमुच दुनिया को आतंकवाद और ओसामा बिन लादेन से निजात पानी है तो आतंकवाद को समर्थन देने वाले मुल्कों पर ठोस कार्रवाई की योजना बनानी होगी। वैसे, इस पर एक बृहत्तर सहमति बन जाए तो सबकी भलाई है। (लेखक अमेरिका में भारत के राजदूत रह चुके हैं).
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