Wednesday, May 25, 2011
चीन-पाक की नापाक जुगलबंदी
वैश्विक आतंक के मसीहा ओसामा बिन लादेन के अमेरिकी हमले में मारे जाने से पाकिस्तान द्वारा जिहादी आतंकवाद को प्रश्रय दिए जाने का भांडा फूट चुका है। अपना काला सच दुनिया के सामने उजागार होने के कारण बौखलाई पाक फौज को अब ओछी और अनर्गल बयानबाजी के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा है। अब पाकिस्तान के राजनेता अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। इन विकट परिस्थितियों में पाकिस्तान को अपने सदाबहार साथी चीन की याद आ रही है। अवसरवादी रिश्ते कायम करने में महारथ हासिल करने वाला पाकिस्तान हमेशा इस बात को लेकर अपनी पीठ गर्व से थपथपाता रहा है कि उसने एक ही वक्त में अमेरिका और चीन जैसे विरोधी विचारधारा वाले दो देशों से अत्यंत प्रगाढ़ संबंध बनाए हुए है। दूसरे अर्थो में कहें तो पाकिस्तान दोनों हाथों से लड्डू बटोरता रहा है, लेकिन पाकिस्तान का निकटतम मित्र रहा अमेरिका आज उसके ही गले की फांस बन चुका है। ऐसे में पाकिस्तानी नेता अपना दुखड़ा अगर चीन के आगे नहीं रोएं तो फिर किसके आगे रोएं। सहानुभूति बटोरने की फिराक में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ऐसे समय में चीन की यात्रा पर गए हैं, जब उनकी अपनी जमीन पर ओसामा बिन लादेन की मौत से पाकिस्तान की वैश्विक छवि को जबरदस्त नुकसान पहंुचा है। चीन और पाकिस्तान अपनी दोस्ती का बखान करने के लिए कई प्रतीकों का सहारा लेते हैं। दोनों देशों के नेता अपनी मित्रता को हिमालय से ऊंची, महासागार से गहरी, स्टील से मजबूत, शहद से मीठी बताते आ रहे हैं। पाकिस्तान फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि और पहचान का जो संकट झेल रहा है वो उसके हर मौसम और हर मौके के दोस्त चीन की शरण में जाकर ही दूर हो सकता है। पिछले कुछ वर्षो में पाकिस्तान की विदेश नीति में चीन की बढ़ती अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आसिफ अली जरदारी 2008 में राष्ट्रपति बनने के बाद सबसे ज्यादा चीन की यात्रा पर गए हैं। प्रधानमंत्री गिलानी की हालिया चीन यात्रा भी कई मायनों में महत्वपूर्ण रही है। वैसे इस साल चीन और पाकिस्तान अपनी मित्रता की साठवीं वर्षगांठ भी मना रहे हैं। 1951 में दोनों देशों में राजनयिक संबंध कायम हुए थे। लादेन की मौत के बाद चीन पाकिस्तान को पहले ही अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त कर चुका है। चीन ने आतंक विरोधी मुहिम में पाकिस्तान के योगदान की जबरदस्त प्रशंसा करते हुए पाकिस्तान की इस मांग का समर्थन किया है कि अमेरिका को उसकी संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए। चीन पहुंचने पर सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ को दिए साक्षात्कार में गिलानी ने कहा कि हम मानते हैं कि चीन हर मुश्किल घड़ी में पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा। हमें गर्व है कि चीन हमारा बेहतरीन और भरोसेमंद दोस्त है। चीन भी पाकिस्तान को हर वक्त अपने साथ खड़ा पाएगा। चीन का गुणगान करने का गिलानी का यह अंदाज अमेरिकी सांसदों को बहुत अखरा है। उनका गुस्सा गैर-वाजिब भी नहीं है, क्योंकि एक तरफ तो अमेरिका पाकिस्तान पर करोड़ों डॉलर खर्च कर रहा है और दूसरी तरफ अहसानफरामोश पाकिस्तान चीन की चापलूसी करने में लगा हुआ है। रिपब्लिकन पार्टी के एक सीनेटर ने पाकिस्तान पर अपनी खीझ उतारते हुए कहा कि अमेरिकी जनता को यह समझाना बेहद मुश्किल है कि एक ऐसे मुल्क को आर्थिक मदद क्यों जारी रखी जाए जिसके प्रधानमंत्री चीन जाकर कहते हैं कि आप हमारे सर्वश्रेष्ठ और सबसे विश्वसनीय मित्र हैं। दरअसल, चीन और पाकिस्तान की सदाबहार दोस्ती की एक बड़ी वजह है भारत, जिसे दोनों देश अपना साझा शत्रु मानते हैं। भारत से वैमनस्य रखने के कारण ही पाकिस्तान को सिर चढ़ाने का काम चीन पिछले चार दशकों से कर रहा है। हालांकि साम्यवादी-माओवादी चीन इस सच्चाई से भलीभांति परिचित है कि जब तक भारत और चीन के मधुर संबंध कायम नहीं रहेंगे तब तक एशिया महाद्वीप में शांति का वातावरण नहीं बन पाएगा। फिर भी चीन ने कभी भारत की परवाह नहीं की, बल्कि मौका मिलते ही पीठ पीछे छुरा घोंप दिया। पाकिस्तान ने अनेक मौकों पर यह साबित किया है कि वह भी चीन के कई छुरों में से एक है। भारत-चीन युद्ध, चीन और पाकिस्तान को और करीब लाए। फिर 1963 में पाकिस्तान ने अपने कब्जे में लिए हुए कश्मीर की काफी भूमि चीन को दोस्ती के नजराने के तौर पर भेंट कर दी। चीन ने भी पाकिस्तान के लिए बहुत कुछ किया। उसे बेहिसाब परंपरागत हथियार दिए और परमाणु बम बनाने में मदद की। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन सदैव पाकिस्तान का हिमायती साबित हुआ है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि पाकिस्तान के फौजी तानाशाहों की कपोल-कल्पित महत्वाकांक्षाओं को हवा देने में चीन का बहुत बड़ा योगदान है। आज जब आतंक के मुद्दे पर पाकिस्तान का दोहरा चेहरा और चरित्र पूरी दुनिया देख चुकी है तो अपनी आंख पर चढ़े पाकिस्तान के चश्मे को उतारने की बजाय चीन फिर से पाकिस्तान की कारगुजारियों पर परदा डालने में लगा हुआ है। यह समय पाकिस्तान की सैन्य क्षमता पर अंकुश लगाकर उस पर दबाव डालने का है, लेकिन पाकिस्तान को भारत के बराबर खड़ा करने की चाहत और रणनीति ने चीन की मति भ्रष्ट कर दी है जिसकी वजह से चीन सही और गलत में फर्क नहीं कर पा रहा है। दरअसल पाकिस्तान को सैन्य सहायता पहुंचाने और उसकी खतरनाक नीतियों का मूक समर्थन करने की मूर्खता भरी चालाकी चीन लंबे समय से करता आ रहा है। पाकिस्तान में नए परमाणु संयंत्र लगााने की घोषणा चीन पहले ही कर चुका है। अब गिलानी की चीन यात्रा के बाद यह खबर आई है कि चीन जल्द ही पाकिस्तान को 50 जेएफ-17 थंडर एयरक्राफ्ट उपलब्ध कराएगा। गाौरतलब है कि दोनों देश आपसी सहयोग से जेएफ-17 विमान तैयार कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान को मिलने वाले नए 50 विमान अत्याधुनिक तकनीक से लैस होंगे। यही नहीं चीन निर्मित जे-20 स्टील्थ जेट और एफसी-1 बहुउद्देश्यीय हल्के लड़ाकू विमान हासिल करने के लिए भी पाकिस्तान काफी कोशिश कर रहा है। क्या चीन इस बात से अनभिज्ञ है कि पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली को और मजबूत करने वाले इन विमानों का असली निशाना भारत ही है? चीन जानता है कि अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन की पाकिस्तान में मौत के बाद विश्व राजनीति में पाकिस्तान बिल्कुल अलग-थलग पड़ चुका है, इसलिए गिलानी की चीन यात्रा के दौरान चीनी नेताओं ने पाकिस्तान के पक्ष में जमकर कसीदे पढ़े। चीन ने केवल वही कहा जो पाकिस्तान सुनना चाहता था। चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो भी बदलाव हो, चीन और पाकिस्तान हमेशा अच्छे पड़ोसी, अच्छे दोस्त, अच्छे साझेदार और अच्छे भाई बने रहेंगे। यहां यह दोहराना अप्रासंगिक नहीं होगा कि जिस दोस्ताना और सदाबहार रिश्तों पर चीन गर्व महसूस कर रहा है आज पूरे दक्षिण एशिया में वह अस्थिरता का अहम कारण बन गए हैं। क्या कारण है कि ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद पाकिस्तान बार-बार संप्रभुता की रट लगा रहा है और अपने हितों की रक्षा की गुहार अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से लगा रहा है। दरअसल, पाकिस्तानी फौज की रणनीति यह है कि आतंकी समूहों के साथ उसके नजदीकी रिश्तों से ध्यान हटाकर अमेरिका द्वारा उसकी संप्रभुता के उल्लंघन का राग अलापने से उसे कई असहज सवालों के जवाब देने से मुक्ति मिल जाएगी। गिलानी की चीन यात्रा का एक छिपा हुआ उद्देश्य यह भी है कि चीन-पाकिस्तान मित्रता का सार्वजनिक ढिंढोरा पीटने से अमेरिका को यह अहसास कराया जाए कि एक हद से ज्यादा वह पाकिस्तान पर दबाव नहीं डाल सकता। अगर अमेरिका वाकई पाकिस्तान के दबाव में आ गया तो यह न केवल क्षेत्रीय शांति व सुरक्षा के लिए नापाक गठबंधन होगा, बल्कि खतरनाक भी, क्योंकि चीन पाकिस्तान के बहाने अपने साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की चाहत रखता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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