लेखक ओसामा की मौत पर पाकिस्तानी नेतृत्व के विरोधाभासी बयानों में उसकी बेचैनी देख रहे हैं…
ओसामा बिन लादेन के खात्मे के लिए पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिकी कमांडो ऑपरेशन ने जितना तहलका पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान में मचाया है, उतना अलकायदा में भी नहीं मचा, जिसका वह प्रमुख था। इसीलिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सफल अभियान के बाद घोषणा पर पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व को सांप सूंघ गया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, प्रधानमंत्री गिलानी और सैन्य प्रमुख जनरल कियानी को झटके से उबरने में कुछ समय लगा और संभलने के बाद उन्होंने जनभावनाओं के ज्वार को शांत करने के लिए अपनी वाकपटुता का इस्तेमाल किया। हालांकि, जब उन्होंने अपना मुंह खोला, तो वे इस जटिल मुद्दे की गांठें खोलने के बजाए इन्हें और उलझा बैठे। इनमें से कोई भी राजधानी के निकट ओसामा बिन लादेन का एक बड़े बंगले में रहने का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाया। न ही वे यह बता पाए कि अमेरिका ने उन्हें अंधेरे में क्यों रखा। इस सवाल का भी उनके पास कोई जवाब नहीं है कि दूसरा मुल्क उनके देश में एक गोपनीय अभियान को अंजाम देने में कैसे सफल रहा। पाकिस्तानी सत्ता की शुरुआती चुप्पी की यह व्याख्या की जा सकती है कि वह अपने विकल्प तलाश रहा था। उसके सामने यह सवाल नहीं था कि वह सच कैसे बयान करे, बल्कि यह गुत्थी थी कि वह अपने नागरिकों के सामने क्या झूठ बोले। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान के बीचोबीच ओसामा को मारने से पाक नागरिकों के जेहन में दो तरह की भावनाएं उठीं। इनमें से पहली का संबंध पंथिक पहचान से है। लोकतांत्रिक भारत के विपरीत पाकिस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र है, जिसमें पंथिक अल्पसंख्यकों के लिए कोई स्थान नहीं है। वहां 97 फीसदी आबादी मुस्लिम है। आजादी के बाद से ही वहां लोगों को हिंदुओं और हिंदुस्तान के साथ-साथ अमेरिका व पाश्चात्य देशों के खिलाफ घृणा का पाठ पढ़ाया जाता रहा है। इस वातावरण में पाकिस्तानी नौजवान ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकियों के पक्षधर हो गए हैं, जो उनकी तरफ से शैतान देश अमेरिका और काफिरों की भूमि भारत से लड़ता रहा। वे इस्लाम खतरे में के नारे और राजनीति के आसानी से शिकार हो जाते हैं। इसलिए वे यह जानकर आक्रोश से भरे हैं कि उनके पंथिक नायक को कथित शैतानों के देश अमेरिका ने पाकिस्तान के बीचोबीच जाकर मार गिराया है। इस परिप्रेक्ष्य में, राजनीतिक और सैन्य, दोनों प्रतिष्ठानों को यह कहने में सुविधा महसूस होती है कि उन्हें इस अभियान के बारे में कुछ नहीं पता था। माना जा रहा था कि इस तरह वे इस्लाम के दुश्मनों के साथ मिलकर इस्लाम के नायक को मार डालने के आरोप से बच जाएंगे। अधिक से अधिक इतना ही होगा कि लोग देश के राजनीतिक नेतृत्व व सेना को महज अकुशलता और अक्षमता के मुद्दे पर ही घेरेंगे, इस्लाम के प्रति उनकी वफादारी पर सवाल नहीं उठाएंगे। इस प्रकार लोगों का गुस्सा इस्लामाबाद के बजाए अमेरिका के खिलाफ उतरेगा। हालांकि जल्दी ही सरकार और सेना को अहसास हो गया कि इस तिकड़म से भी लोगों के गुस्से को शांत नहीं किया जा सकता है। इसीलिए राष्ट्रीय भावनाओं को भड़काने का दूसरा कार्ड खेला गया। यह भी अगर पंथिक भावनाओं से अधिक गहरा नहीं था, तो इससे कम भी नहीं था। पाकिस्तानी यह देखकर भयाक्रांत थे कि कमांडो से भरे अमेरिकी हेलीकॉप्टर पाकिस्तान में घुस आए, ऑपरेशन को अंजाम देकर अफगानिस्तान स्थित अपने शिविर में वापस लौट गए और पाकिस्तानी सेना को इसकी भनक तक नहीं लगी। इससे पाकिस्तान की रक्षा तैयारियों और चौकसी पर संदेह पैदा हुआ। यह देश के हर नागरिक के लिए शर्मसार करने वाली बात थी। इससे बचने के लिए राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान ने सोचा कि अगर वे कहें कि यह पाकिस्तान और अमेरिका के सहयोग से हुआ तो उनका नुकसान कम हो सकता है। इस स्थिति में लोगों को विश्वास हो जाएगा कि पाकिस्तान की संप्रभुता का हनन नहीं हुआ। पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से प्रतिक्रियाएं इतने विरोधाभासों से भरी हैं कि यह पता लगाना मुश्किल है कि सच क्या है। जिस कुशलता के साथ अमेरिकियों ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया, वह पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के लिए भारी शर्मिदगी है। ये विरोधाभास उनके गले में छछुंदर की तरह फंस गए हैं जो न उगलते बन रहे हैं और न निगलते। अमेरिका द्वारा बार-बार दोहराने के बावजूद कि पाकिस्तान समेत किसी भी देश को इस ऑपरेशन के बारे में नहीं बताया गया था, आइएसआइ प्रमुख शुजा पाशा का यह बयान हास्यास्पद लगता है कि इस ऑपरेशन में पाकिस्तान का भी सहयोग था। विदेश सचिव सलमान बशीर तो कुछ ज्यादा ही मुखर नजर आए। उन्होंने दावा किया कि खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने 2009 में ही अमेरिका खुफिया एजेंसी को लादेन के ठिकाने के बारे में बता दिया था। चूंकि अमेरिका के पास बेहतर तकनीक और संसाधन हैं इसलिए वह हमसे पहले ही लादेन तक पहुंच गया। क्या अपने आत्मसम्मान को ताक पर रखने वाला इस प्रकार का असाधारण स्पष्टीकरण कहीं सुना है? अगर आपने दो साल पहले ही ओसामा के बारे में बता दिया था तो आप हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे थे और एक विदेशी शक्ति को कार्रवाई करने का मौका क्यों दिया? इसके विपरीत पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने दावा किया कि पाकिस्तान को लादेन के एबटाबाद ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उधर, पाकिस्तान सरकार का आधिकारिक बयान है कि इस्लामाबाद 2009 के बाद से सीआइए के साथ सूचनाएं साझा कर रहा था और इन्हीं के आधार पर अमेरिका लादेन तक पहुंचा। जबकि ब्रिटेन में पाकिस्तान के राजदूत ने कहा कि लादेन कभी पाकिस्तान में रहा ही नहीं। वह हाल ही में एबटाबाद में आया था। उस पर नजर रखी जा रही थी, इसलिए वह मारा गया। दूसरे शब्दों में उन्हें अपनी सरकार, अपने विदेश सचिव और आइएसआइ प्रमुख पर भरोसा नहीं है। पाकिस्तान के गृह मंत्री ने और भी विचित्र बयान दिया कि उन्हें ऑपरेशन से 15 मिनट पहले ही इसके बारे में जानकारी मिल गई थी। तहरीक-ए-इंसाफ के नेता इमरान खान ने सही कहा है कि पाकिस्तान के लोग सच नहीं जानते, क्योंकि सरकार हर चीज के बारे में झूठ पर झूठ बोल रही है। अब पाकिस्तान को इज्जत बचाना मुश्किल हो रहा है। घृणा और छल से बना एक राष्ट्र अब असलियत का सामना कर रहा है और कोई भी पाकिस्तानी दर्पण में दिख रही सच्चाई को पसंद नहीं कर रहा है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
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