Monday, May 9, 2011
आर्थिक धुरी में बदलाव
भारतीय परंपरा में लक्ष्मी को अकारण चंचला नहीं कहा गया है। घटनाएं इसकी पुष्टि करती हैं। सन 1700 तक भारत दुनिया की विनिर्माण गतिविधियों का सिरमौर था। 1700 से 1850 के बीच यह पदवी चीन ने हासिल कर ली। 1850 में औद्योगिक क्रांति के बल पर ब्रिटेन ने चीन को हटाकर विश्व के विनिर्माण मानचित्र पर अपनी जगह बनाई। 1895 में अमेरिका ब्रिटेन को अपदस्थ कर इस गद्दी पर बैठा। पूरे 115 साल तक राज करने वाले अमेरिका को अब चीन से चुनौती मिलनी शुरू हुई है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि 2050 तक भारत भी वक्त की सुइयों को अपनी ओर पलटने में सक्षम होगा। विश्व अर्थव्यवस्था की धुरी में हो रहे इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण घटना हाल ही में हुई है। 2010 में चीन ने अमेरिका को पछाड़कर दुनिया के सबसे बड़े विनिर्माणकर्ता देश का तमगा हासिल कर लिया। 2010 में जहां अमेरिका का विनिर्माण उत्पाद 1,951.60 अरब डॉलर रहा, वहीं चीन में विनिर्माण क्षेत्र का आकार बढ़कर 1,995.40 अरब डॉलर हो गया। चीन का विनिर्माण उत्पादन इतना ज्यादा रहा कि अमेरिका के बाद के चोटी के छह देशों के सम्मिलित उत्पादन से भी यह कहीं ज्यादा था। उदाहरण के लिए जर्मनी (312 अरब डॉलर), इटली (315 अरब डॉलर), ब्राजील (273.7 अरब डॉलर), फ्रांस (235 अरब डॉलर), दक्षिण कोरिया (239 अरब डॉलर) और ब्रिटेन (235 अरब डॉलर) जैसे देशों के विनिर्माण को जोड़ने पर यह आंकड़ा 1,993 अरब डॉलर ही बैठता है जो चीन के कुल विनिर्माण उत्पादन से कम ही है। इस सूची में भारत, रूस के साथ दसवें पायदान पर है जिसमें प्रत्येक देश का विनिर्माण उत्पादन 217.8 अरब डॉलर आंका गया है। आइएचएस ग्लोबल इनसाइट नामक आर्थिक शोध संस्था द्वारा जारी इन आंकड़ों के मुताबिक आर्थिक धुरी में बदलाव 1990 के बाद तेज हुआ। उदाहरण के लिए 1990 में विश्व के धनी देश (पश्चिमी यूरोप के देश, अमेरिका, कनाडा और जापान) दुनिया के समस्त विनिर्माण का 80 फीसदी उत्पादन करते थे, वहीं 2000 में इनकी हिस्सेदारी घटकर 72 फीसदी और 10 साल बाद 2010 में सिमटकर महज 50 फीसदी रह गई। इसका सबसे ज्यादा लाभ ब्रिक देशों (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) को मिला है। वर्ष 2000 में विश्व के विनिर्माण उत्पादन में ब्राजील की हिस्सेदारी 2.1 फीसदी थी जो 2010 में बढ़कर 3.1 फीसदी हो गई। वहीं रूस और भारत की भागीदरी भी क्रमश: 0.8 फीसदी और 1.2 फीसदी से बढ़कर 2.2 फीसदी हो गई। लेकिन सर्वाधिक लाभ उठाने वाला देश चीन रहा, जिसने इस दशक के दौरान अपनी 6.9 फीसदी हिस्सेदारी को बढ़ाकर 19.8 फीसदी तक पहुंचा दिया। लेकिन विश्व अर्थव्यवस्था की धुरी में बदलाव अब उतना आसान नहीं रह गया है, जितना पहले था। इसका कारण यह है कि आज अमेरिकी डॉलर जिस ढंग से दुनिया के बाजारों में वर्चस्व बनाए हुए है, वैसी स्थिति पहले किसी मुद्रा को हासिल नहीं थी। चीन इस बात को अच्छी तरह जानता है कि जब तक डॉलर का विकल्प नहीं खोज लिया जाता तब तक नंबर वन की कुर्सी उससे दूर ही रहेगी। इसीलिए चीन डॉलर की जगह विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) को प्रमुख आरक्षित मुद्रा के तौर पर अधिक महत्व देने की मांग करने लगा है। चीन के विनिर्माण, निर्यात और विदेशी मुद्रा भंडार को देखें तो युआन भी एसडीआर बास्केट में शामिल होने का अधिकार रखती है। गौरतलब है कि एसडीआर बास्केट में केवल डॉलर, यूरो, येन और पाउंड जैसी मुद्राएं ही आती हैं। हाल ही में चीन की मेजबानी में हुए ब्रिक देशों के सम्मेलन में आपसी व्यापार के लिए अपनी मुद्राओं के चलन पर सहमत होना भी चीन द्वारा डॉलर को अपदस्थ करने की रणनीति का एक अंग था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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