Wednesday, May 4, 2011

चीन की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षा

चीन की अंतरिक्ष स्टेशन योजना पर लेखक की टिप्पणी
करीब आठ साल पहले अंतरिक्ष में अपना पहला आदमी भेज कर चीन ने दुनिया का चौंका दिया था। अब उसने दस साल के भीतर अंतरिक्ष में अपना अलग स्टेशन निर्मित करने का इरादा जाहिर किया है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का प्रतिद्वंद्वी खड़ा कर चीन दुनिया को न सिर्फ एक कड़ा राजनीतिक संदेश देना चाहता है, बल्कि अंतरिक्ष में रूस और अमेरिका के वर्चस्व को भी चुनौती देना चाहता है। चीन का तिएनगोंग (स्वर्ग- महल) प्रोजेक्ट इस बात का सबूत है कि वह एक बड़ी अंतरिक्ष शक्ति बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर हो रहा है। चीन ने 2003 में अपने ही रॉकेट से अपना अंतरिक्षयात्री अंतरिक्ष में भेजा था। 2008 में उसे अंतरिक्ष में चहलकदमी (स्पेसवाक) करने में भी सफलता मिल गई थी। चीन अगले दो साल के अंदर चंद्रमा पर अपने पहले यान की लैंडिंग कराना चाहता है और 2025 तक वहां अपना पहला मानव उतारने का इरादा भी रखता है। यह स्टेशन कम से कम दस साल तक काम करने में सक्षम होगा। इसमें तीन अंतरिक्षयात्रियों के रहने की जगह होगी। स्टेशन की प्रयोगशाला-इकाइयों में अंतरिक्ष-विकिरण, जीव-विज्ञान, खगोल-विज्ञान और सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण जैसे विषयों पर रिसर्च की जाएगी। यदि सब कुछ ठीकठाक रहा तो यह रूस के मीर अंतरिक्ष-स्टेशन और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के बाद अंतरिक्ष में स्थापित होने वाला तीसरा बहु-कक्ष स्टेशन बन जाएगा। एक चीनी रिसर्चर पंग चीहाओ का कहना है कि प्रस्तावित चीनी स्टेशन 419 टन वजनी अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन और 1986 से 2001 तक कार्य करने वाले 137 टन वजनी रूस मीर अंतरिक्ष स्टेशन की तुलना में बहुत छोटा है, लेकिन यह दुनिया का तीसरा बहु-मोड्यूल स्पेस स्टेशन है, जिसमें एक ही मोड्यूल वाली स्पेस लैब की तुलना में ज्यादा जटिल टेक्नोलॉजी की आवश्यकता पड़ती है। चीन इस साल तिएनगोंग-1 मोड्यूल को लांच करने की योजना बना रहा है। पहले एक अंतरिक्ष-यात्री रहित अंतरिक्षयान मोड्यूल के साथ जुड़ने की कोशिश करेगा। इसके बाद दो पायलटयुक्त अंतरिक्ष यान मोड्यूल से जुड़ेंगे। इस सारी कसरत का असली उद्देश्य अंतरिक्ष में दो यानों को जोड़ने वाली तकनीकों में दक्षता हासिल करना है। चीन एक मालवाही अंतरिक्षयान भी विकसित कर रहा है, जो करीब 13 टन वजनी होगा। इसका प्रयोग अंतरिक्ष स्टेशन के लिए आवश्यक सप्लाई और सामान भेजने के लिए किया जाएगा। स्पेस स्टेशन प्रोजेक्ट के एक प्रवक्ता वांग चाओयाओ के अनुसार कुछ रिसर्चर यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि अंतरिक्षयात्री कम से कम 20 दिन तक अंतरिक्ष में रहें और सामान सुरक्षित तरीके से अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुंच जाए। चीन की योजना अंतरिक्ष में अन्वेषण करने वाले बड़े देशों के बीच शक्ति संतुलन में भी बड़ा बदलाव करेगी। नासा इस साल जून में अपने शटल बेड़े को रिटायर करने जा रहा है। इस स्थिति में सिर्फ रूस ही अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाने और वहां से लाने में समर्थ होगा। करीब 100 अरब डॉलर की लागत वाली इस अंतरिक्ष-चौकी का कार्यकाल 2020 तक है, जिसे बढ़ा कर 2028 तक किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में अंतरिक्ष शक्ति के रूप में चीन का उदय बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। चीन की इस बढ़ती हुई अंतरिक्ष-महत्वाकांक्षा के आखिर माने क्या हैं? नासा के सलाहकार जॉन लोग्सडन का कहना है कि चीन की योजनाओं से उसे मानव अंतरिक्ष उड़ानों के लिए स्वदेशी दक्षता हासिल हो जाएगी। चीन यह सिद्ध करना चाहता है कि हम अंतरिक्ष में वह सब कर सकते हैं, जो दूसरे बड़े देश करते हैं। दरअसल अंतरिक्ष में एक चौकी बनाकर चीन पूरी दुनिया पर भी नजर रखना चाहता है। यह चौकी उसकी एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक भी होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

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