Sunday, May 1, 2011
पहली बार चोरी छुपे चीन से भारत लाई गई चाय
हर किसी के दिन की शुरुआत चाय की चुस्कियों से होती है, लेकिन इस बात का शायद ही किसी को अंदाजा होगा कि चाय का पौधा चीन से चोरी से भारत (सहारनपुर) लाया गया था। यहां पर शोध के बाद ही पूरे विश्व में भारत की चाय का डंका बजा। 17वीं सदी में चीन की चाय भारत को छोड़कर अन्य देशों में राज कर रही थी। उस समय तक सहारनपुर में कंपनी बाग पर ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा हो चुका था। सन 1832 में वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. फाकनर सहारनपुर के कंपनी बाग में निदेशक के तौर पर तैनात थे। डॉ. फाकनर को विशेष रूप से कई विषयों पर शोध की जिम्मेदारी दी गई। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जेबी हूकर की पुस्तक हिमालयन जनरल में भी इस बात का उल्लेख है। सेंटर काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेद एवं सिद्ध के पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार और वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. एसके उपाध्याय कहते हैं कि डॉ. जेबी हूकर का शोध पत्र सन 1854 में प्रकाशित हुआ था, जो दुनिया के सबसे बड़े वनस्पति उद्यान क्यू बोटेनिकल गार्डन से निकल रहा था। उन दिनों चीन की ओर से चाय का पौधा देने में आनाकानी की जाती थी। कई बार मंगाने पर भी पौधा नहीं दिया गया। लिहाजा इस काम के लिए सहारनपुर के कंपनी बाग में निदेशक के रूप में तैनात डॉ. फाकनर को लगाया गया। डॉ. फाकनर चीन से अन्य औषधीय पौधे मंगाते रहते थे। एक बार उन्होंने औषधीय पौधा चोग चीनी प्लांट को मंगाया तो उसी के साथ चाय (थिया साइनेसिस-वनस्पति नाम) के कुछ पौधे भी छुपाकर भारत ले आए गए। चाय के इन पौधों पर सहारनपुर स्थित कंपनी बाग में शोध किया गया। बाद में इन पौधों को कोलकाता स्थित क्यू बोटेनिकल गार्डन भेजा गया। कोलकाता पहुंचे पौधे चाय के इन पौधों पर कोलकाता में शोध हुआ तो पता चला कि इस प्रकार के पेड़ तो असम की पहाडि़यों पर मौजूद हैं। बाद में क्यू बोटेनिकल गार्डन में इन पर शोध हुआ तो असम की चाय चीन से गुणवत्ता में बेहतर साबित हुई। आगे चलकर पूरे विश्व में भारत की चाय का डंका बजने लगा।
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