Friday, May 6, 2011
ब्रिटेन की तंगदिली
कारखानों व घरों में सस्ते श्रम की उपलब्धता के लिए पिछली सदी में इंग्लैंड ने बड़ी संख्या में अफ्रीका और दक्षिण एशिया से कामगारों को अपने देश बुलाया। बाद में उन्हें ब्रिटिश नागरिकता प्रदान कर दी गई। आजकल यूरोप के अन्य देशों की तरह ब्रिटेन में भी मंदी छाई हुई है। मंदी अपने साथ बेरोजगारी भी लाई है। बढ़ती बेरोजगारी से त्रस्त इंग्लैंड के श्वेत युवक यह मांग कर रहे हैं कि अफ्रीका और दक्षिण एशिया से आए हुए लोगों की नागरिकता समाप्त करके उन्हें उनके मूल देश वापस भेज दिया जाए। दक्षिण एशिया के ब्रिटिश नागरिकों का कहना है कि अब उनकी तीसरी या चौथी पीढ़ी ब्रिटेन में रह रही है। इसलिए वे भी ब्रिटेन के उसी तरह के नागरिक हैं जैसे कि श्वेत लोग हैं। अत: कोई उन्हें उनके मूल देश वापस जाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। पिछले दिनों म्यूनिसिपल चुनाव के प्रचार के दौरान इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने कहा कि अपने पिछले शासन काल में लेबर पार्टी ने वोट बैंक के चलते बेशुमार विदेशियों को ब्रिटिश नागरिकता दे दी है जिसका ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है। 1997 और 2009 के बीच 22 लाख विदेशी ब्रिटेन आकर बस गए और यहां की नागरिकता प्राप्त कर ली। 2004 में जब यूरोपीय यूनियन में पूर्वी यूरोप के देश शामिल किए गए थे तब यह उम्मीद की गई थी कि इन देशों से 8-10 हजार लोग ही रोजगार की खोज में ब्रिटेन आकर बसेंगे। परंतु नवीनतम आंकड़ों के अनुसार इस दौरान 7 लाख 62 हजार लोग इन देशों से ब्रिटेन आकर बस गए। इन लोगों का भार भी ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। डेविड कैमरून का कहना है कि इंग्लैंड में नागरिकता हासिल करने वाले अधिकतर लोग अंग्रेजी नहीं बोल सकते हैं। वे अपने पड़ोसियों से भी कटे रहते हैं क्योकि इनकी संस्कृति अंग्रेजों की संस्कृति से भिन्न है। अत: समय आ गया है कि विदेशियों का ब्रिटेन आकर बसना रोका जाए। उन्होंने यह भी कहा है कि लेबर पार्टी के जमाने में दक्षिण एशिया के छात्र ऐसे कॉलेजों में दाखिला पा लेते थे जो फर्जी थे। बाद में वे ब्रिटिश नागरिकता हासिल करने में कामयाब हो जाते थे और धीरे-धीरे अपने माता-पिता और दूसरे रिश्तेदारों को भी ब्रिटेन बुलाकर वहां की नागरिकता दिला देते थे। डेविड कैमरून की प्रवासियों के ब्रिटेन आने और वहां बस जाने पर कठोरतापूर्वक लगाम लगाने की घोषणा का ब्रिटिश गठबंधन सरकार की मुख्य सहयोगी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने ही विरोध कर दिया। इस पार्टी के नेता विन्स केबल, जो इंग्लैंड के व्यापार मंत्री भी हैं, ने कहा कि ब्रिटेन के आर्थिक उत्थान में इन प्रवासियों का बहुत बड़ा योगदान है। डेविड कैमरून और उनकी पार्टी के नेताओं को समझना चाहिए कि न केवल ब्रिटेन बल्कि यूरोप के अधिकतर देशों के नागरिकों को सस्ती दर पर काम करने के लिए विदेशी चाहिए। यदि उनका ब्रिटेन में आना रोक दिया जाएगा तो आम ब्रिटिश नागरिक को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। उनका यह भी कहना है कि विदेशी, खासकर भारतीय मूल के डाक्टरों, नसरें, शिक्षकों और दूसरे प्रोफेसनलों का ब्रिटेन को समृद्ध बनाने में बहुत योगदान है। अत: प्रधानमंत्री की यह यह नीति अत्यंत ही अदूरदर्शी और विवेकहीन मानी जाएगी। लेबर पार्टी के नेता एड मिलिबंड ने भी डेविड कैमरून की इस नई नीति का घोर विरोध किया है। आम ब्रिटिश नागरिक आरामपसंद होते हैं। वे चाहते हैं कि दक्षिण एशिया के लोग ब्रिटेन में आकर बसें जिससे सस्ती दरों पर उनकी सेवाएं प्राप्त हो सकें। परंतु डेविड कैमरून अपनी नई नीति पर अड़े हुए हैं। वह विदेशियों, खासकर भारतीय मूल के लोगों का ब्रिटेन में आकर बसने पर रोक लगाने के प्रयास कर रहे हैं। इसका भारत और ब्रिटेन के संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, अभी कहना कठिन है। (लेखक पूर्व सांसद व राजदूत हैं)
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