Wednesday, May 25, 2011

दोराहे पर पाकिस्तान

लेखक लादेन की मौत का मुस्लिम जगत, खासतौर पर पाकिस्तान पर पड़ने वाले असर का जायजा ले रहे हैं...
आजकल इस्लामी देशों में कोहराम मचा हुआ है। मिश्च के बाद सीरिया, बहरीन, यमन और लीबिया में जमकर खून-खराबा हो रहा है। हजारों लोग मारे जा रहे हैं। खाड़ी देशों के विशेषज्ञों का कहना है कि वैसे तो यह लड़ाई बीसों साल से सत्ता पर काबिज शहंशाहों के खिलाफ है, लेकिन असली लड़ाई शिया-सुन्नियों के बीच है। इन सभी देशों में बहुमत शियाओं का है, लेकिन हुक्मरान सुन्नी हैं। इसीलिए शिया जमात सड़कों पर उतरी हुई है। कहते हैं कि आंदोलनकारियों को ईरान का समर्थन हासिल है। इराक के बारे में भी यही बात कही जाती है कि वहां आबादी शियाओं की ज्यादा थी, लेकिन सद्दाम सुन्नी था। इसी लड़ाई के बीच में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की खबर ने माहौल और गरमा दिया है। ओसामा बिन लादेन को मारने के बाद अमेरिका ने उसे समुद्र में दफन कर दिया। उसे इस बात का एहसास था कि जमीन पर दफन करने से वहां कोई मकबरा बन सकता है, जो कट्टरपंथियों के प्रेरणाश्चोत में बदल सकता है। जिस दिन अमेरिकी फौजों ने लादेन के ठिकाने पर हमला किया उस दिन मैं तुर्की में था। वहां 98 प्रतिशत मुसलमान रहते हैं। लादेन के मारे जाने की खबर सुनते ही वहां के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने इसका स्वागत किया और अमेरिका की तारीफ की। अन्य मुस्लिम देशों की भी यही प्रतिक्रिया थी। तुर्की के इतिहास से सभी वाकिफ हैं। एक जमाने में वहां कट्टरपंथी मुल्लाओं का बहुत जोर था। तब वहां के राष्ट्रपति अतातुर्क कमाल ने सारे कट्टरपंथियों का सफाया करके एक सेक्युलर माहौल बनाया और आज यह देश तरक्की की बुलंदी पर है। वहां दाढ़ी वाले कट्टरपंथी बहुत कम नजर आते हैं। मस्जिदों में साफ-सफाई का बहुत ध्यान रखा जाता है और शांतिपूर्ण ढंग से इबादत होती है। हर मजहब के लोग मस्जिदों के अंदर आते-जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि ज्यादातर मुस्लिम देश लादेन के मारे जाने पर कोई अफसोस नहीं जता रहे हैं। अब यहां सवाल उठता है कि लादेन के मारे जाने से क्या अलकायदा खत्म हो जाएगा? करीब दो महीने पहले दुबई में मेरी मुलाकात पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से हुई। उनका कहना था कि यदि कभी लादेन मारा गया तो भी उसकी विचारधारा नहीं मरेगी। असली काम उस विचारधारा को खत्म करना है। आज लादेन के मारे जाने के बाद यही सवाल अहम है और अमेरिका उसी दिशा में सोच भी रहा है। सब जानते हैं कि मुशर्रफ के जमाने में ही लादेन और तालिबानी नेता मुल्ला उमर अमेरिकी बमबारी से परेशान होकर पाकिस्तान के सीमावर्ती गांव में आकर रहने लगे थे और वहीं से अपने संगठन का काम चलाते थे। यह मानने को कोई तैयार नहीं था कि बिना आइएसआइ की जानकारी के वे वहां रह सकते थे। झगड़ा तो तब शुरू हुआ जब तालिबानों ने अपना अड्डा इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में बना लिया। परवेज मुशर्रफ को तब अपने लिए खतरे का एहसास हुआ और उन्होंने सेना से मस्जिद पर हमला करवाकर उसके अंदर छिपे मौलानाओं व आतंकवादियों को मरवा दिया। इसके बाद से मुशर्रफ कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए थे, वरना पहले उनकी पूरी मिलीभगत थी। इसी लाल मस्जिद से सिर्फ 40 मील दूर एबटाबाद में सैन्य अकादमी के पास एक घर में बिन लादेन आकर बस गया था। इसकी भी जानकारी पाक सेना और आइएसआइ को रही होगी। अलकायदा के पास अरबों डॉलर हैं, हजारों जिहादी हैं फिर भी उसके सरगना की सुरक्षा में एक भी जिहादी नहीं था। खतरे के वक्त छिपने के लिए न तो कोई बंकर था और न ही सुरंग। उसके पास फोन तक नहीं था। पड़ोसियों के मुताबिक वहां कोई आता-जाता भी नहीं था। जिन कमरों में वह रहता था वहां का बेड, सोफा, टीवी, कंप्यूटर और दरी बहुत घटिया किस्म की थीं। कुवैत और पाकिस्तानी टीवी के मुताबिक उसने अपने कपड़ों में 500 यूरो सिल रखे थे कि यदि मुसीबत में जरूरत पड़े तो किसी काम में आ जाएं। 500 यूरो का मतलब है लगभग 40 हजार रुपये। इसमें कोई शक नहीं कि अलकायदा एक बड़ा और धनी आतंकवादी संगठन है, जिसमें तमाम देशों के कट्टरपंथी मदद करते हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आखिरी दिनों में ओसामा अकेला पड़ गया था, अलकायदा उसके हाथ से निकल गया था। क्या उसका सिर्फ नाम था और अलकायदा की कमान दूसरे लोगों ने संभाल ली थी। उन्हीं दिनों खाड़ी देशों के कुछ अखबारों में मैंने इस तरह की अटकलें पढ़ीं जिनमें कयास लगाए जा रहे थे कि कुछ साल पहले अल जवाहिरी व अन्य लोगों ने ओसामा को अलकायदा से विदा कर दिया था और खुद संगठन की कमान संभाल ली थी। अल जवाहिरी आज भी पाक-अफगानिस्तान सीमा के उन्हीं पहाड़ी इलाकों में रहता है और कभी भी एबटाबाद में ओसामा के पास आते-जाते नहीं देखा गया। लोगों का अनुमान था कि लादेन की मौत के बाद अलकायदा का मुखिया अल जवाहिरी ही बनेगा, लेकिन पिछले दिनों सैफ अल अदेल को इसका प्रमुख बना दिया गया है। माना जा रहा है कि यह फैसला अल जवाहिरी की इच्छा के अनुसार ही लिया गया है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान की तालिबान व अलकायदा से मिलीभगत है। लगता है कि आइएसआइ ने दीनहीन ओसामा को तुरूप का पत्ता समझकर एबटाबाद में छिपा रखा था। पाकिस्तान ओसामा को अमेरिका को सौंपकर कोई बड़ा सौदा करना चाहता था। किंतु इस चाल में वह मात खा गया। इससे पहले यह मौका आता, अमेरिकियों ने पाकिस्तान में घुसकर लादेन को मार डाला। इस घटना से पाकिस्तान की दुनिया भर में साख गिर गई और सब उसे हिकारत की नजर से देख रहे हैं। ओसामा की मौत का सबसे ज्यादा नुकसान पाकिस्तान को हुआ। अब वह फंस गया है। कट्टरपंथी समझते हैं कि लादेन पाक की मिलीभगत से मारा गया और अमेरिका इस बात पर खफा है कि उसे पाक सरकार ने छिपा रखा था। बहरहाल, इससे फर्क नहीं पड़ता कि अलकायदा का प्रमुख कौन है। अमेरिका को इससे एक लड़ाई और लड़नी पड़ेगी। तालिबान भी दो भागों में बंट गया है। एक पाकिस्तानी तालिबान और दूसरा अफगानी तालिबान। पाक सरकार को अपने तालिबान से सावधान रहना होगा। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)

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