Saturday, May 7, 2011

बिगड़ैल पाकिस्तान

भारत को उकसाने वाला बयान देकर पाकिस्तान ने एक बार फिर अपनी पुरानी आदत का परिचय दिया है। दरअसल उसका इरादा भारत को धमकाना नहीं, बल्कि अपने देश में भारत विरोधी भावनाएं भड़काना और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान भंग करना है। ऐसे में भारत का उसके साथ जुबानी जंग में उलझने से बचना उचित ही है, लेकिन हमारे नीति-नियंताओं को यह भी आभास होना चाहिए कि संयम का परिचय देने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। अतीत में भारत तनाव भरे माहौल में न जाने कितनी बार संयम का परिचय दे चुका है और सब जानते हैं कि इससे पाकिस्तान पर कोई फर्क नहीं पड़ा। इस बार भी नहीं पड़ेगा, क्योंकि उसने भारत की कमजोरी भांप ली है। भारत ने जब-जब पाकिस्तान के प्रति कठोर रवैये का परिचय दिया और उसके तहत बातचीत की प्रक्रिया रोकी तब-तब उसे अपनी कठोरता का परित्याग करना पड़ा। मुंबई हमले के बाद भी ऐसा ही हुआ, क्योंकि पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यह दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया कि भारत ने अडि़यल रवैया अपना लिया है। भारत को अपनी इस कमजोरी को दूर करना ही होगा और इसके लिए यह आवश्यक है कि वह पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी सर्वथा निष्प्रभावी नीति से पीछा छुड़ाए। ऐसा करना इसलिए और जरूरी है, क्योंकि भारत बातचीत के जरिये पाकिस्तान पर दबाव बनाने में तनिक भी समर्थ नहीं। बातचीत की प्रक्रिया में पाकिस्तान तो कुछ न कुछ रियायत हासिल कर लेता है और भारत के हाथ कुछ नहीं लगता। आगे भी नहीं लगेगा और इसका ताजा प्रमाण है भारत के जख्मों पर नमक छिड़कने वाला यह बयान कि मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों को दंडित करने की मांग पुरानी पड़ चुकी है। यदि भारत सरकार यह मान रही है कि पाकिस्तान देर-सबेर मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों को दंडित करेगा अथवा उन आतंकी शिविरों को खत्म करेगा जहां जैश, लश्कर के आतंकी पाले-पोसे और प्रशिक्षित किए जा रहे हैं तो इसका मतलब है कि वह दिवास्वप्न देख रही है। पाकिस्तान को उलझाए रखने और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संतुष्ट करने के लिए तो पाकिस्तान से बातचीत जारी रखने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन सिर्फ इतने तक सीमित रहना भारी भूल के अलावा और कुछ नहीं। भारत को पाकिस्तान की कमजोर नस की पहचान करने और उसे दबाने में और अधिक देर नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसका दुस्साहस और साथ ही कूटनीतिक अशिष्टता बढ़ती जा रही है। पाकिस्तान के कथित नेक इरादों पर भरोसा करना खुद को धोखा देना है। इस पर आश्चर्य नहीं कि यह मांग तेज होती जा रही है कि भारत भी वैसी ही कार्रवाई करे जैसी अमेरिका ने ओसामा को मार गिराने के लिए की। भारत ऐसा करने में सक्षम हो सकता है, जैसा कि थलसेना अध्यक्ष ने कहा और उसे होना भी चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अमेरिका जैसी कार्रवाई एक मात्र विकल्प है। चूंकि इस विकल्प को आजमाने का मतलब है टूटते-बिखरते पाकिस्तान को एकजुट होने का मौका देना इसलिए भारत को अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए। अन्य विकल्पों की कमी भी नहीं है। यदि कमी है तो राजनीतिक इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति की। यह निराशाजनक है कि भारत सरकार बिगड़ैल पाकिस्तान से निपटने के मामले में राजनीतिक इच्छाशक्ति से विहीन नजर आती है। विडंबना यह है कि उसकी कमजोर इच्छाशक्ति का प्रदर्शन रह-रहकर होता रहता है।

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