Thursday, May 19, 2011

भारत क्यों न करे अमेरिका जैसी कार्रवाई

एबटाबाद कार्रवाई में अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद भारत ने पाकिस्तान को अपने 50 भगौड़ों की सूची सौंप दी है। भारतीय विदेश मंत्रालय इसे अपनी कूटनीतिक जीत मान रहा है। उसे लगता है कि इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान की पहचान आतंकी पनाहगाह के तौर पर और मजबूत होगी। इसलिए सूची में 26/11 मुंबई हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद, लखवी और मुंबई सीरियल ब्लास्ट का आरोपी दाऊद इब्राहिम और उसके 21 गुर्गे के नाम शामिल हैं। बेशक इस बहाने भारत दुनिया को यह जताने में सफल हुआ है कि भारत के 50 भगौड़े पाकिस्तान में छुपे हुए हैं, लेकिन इससे भारत ने अपनी केस स्टडी को कमजोर बना लिया है। यकायक अपने सारे तुरुप के पत्ते खोलकर भारत कूटनीतिक विफलता की दिशा में है। सवाल यह नहीं है कि आखिर इन भगौड़ों की सूची सौंपकर हमें क्या मिलेगा? सवाल यह है कि हमने अपने इरादे पाकिस्तान के सामने जाहिर क्यों किए? आखिर कब तक हम डोजियर पर डोजियर और लिस्ट पर लिस्ट सौंपते रहेंगे? शायद इन्हीं गलतियों की वजह से पाकिस्तान हमें संजीदगी से नहीं लेता है। हाल ही में पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने कहा कि 26/11 हमले को भारत को भुला देना चाहिए। यह काफी पुराना मसला है। जरा सोचिए, जब अमेरिका 9/11 व‌र्ल्ड टेड्र टॉवर हमले को नहीं भुला सका तो हम कैसे भुला दें। जब अमेरिका अपने शहीदों के साथ इंसाफ कर सकता है तो हमें भी अपने शहीदों के साथ इंसाफ करने का हक है। सरकार की इस सूची से कूटनीतिक दबाव बने या नहीं, लेकिन पाकिस्तान पहले से ज्यादा सतर्क हो जाएगा। दाऊद और हाफिज सईद जैसे आतंकी ठिकाने बदलने में सफल हो जाएंगे। मुमकिन है कि कई आतंकी दूसरे देश का रुख करें। ऐसे में आतंकियों की तलाश और कठिन हो जाएगी। बड़ी मुश्किल से भारतीय खुफिया विभागों ने इन आतंकियों के ठिकानों को चिह्नित किया है। यह भी मुमकिन है कि आइएसआइ और पाकिस्तानी फौज इनमें से कुछ आतंकियों को भूमिगत कर दे, जैसा कि ओसामा बिन लादेन के साथ किया था। अंग्रेजी में एक मुहावरा है, ऐक्शन स्पीक्स लाउडर दैन वर्ड यानी कार्रवाई शब्दों से ज्यादा असर करती है। भारत-पाकिस्तान के रिश्ते में इसे अमल करने की जरूरत है। यहां इसका मतलब युद्ध से नहीं निकाला जाए। इसे आतंकियों पर कार्रवाई तक ही सीमित रखने की जरूरत है। अगर हमारी खुफिया एजेंसी और सेना पाकिस्तान में दाऊद को मार गिराती है तो दुनिया को खुद-ब-खुद पता चल जाएगा कि दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान में छुपा था। इसके बाद क्या होगा? दुनिया जानती है कि दाऊद आतंकवादी है और भारत के लिए गुनाहगार है और खतरा भी। इसलिए अमेरिका की तरह हम पर भी कोई अंगुली नहीं उठाएगा। उधर, पाकिस्तान इसे अपनी संप्रभुता पर चोट मानते हुए अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने चीखेगा-चिल्लाएगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने यह जरूर मानेगा कि दाऊद आतंकी था और पाकिस्तान आतंकवादियों के साथ नहीं है। यहां पर भारत को बहुत बड़ी जीत मिलेगी, कूटनीतिक स्तर पर भी और सामरिक स्तर पर भी। तो जरूरत अमेरिका की तरह ही पाक में छुपे आतंकियों पर वार करने की है। डोजियर और लिस्ट से पाकिस्तान के कान में जूं रेंगने वाली नहीं है। देखा जाए तो पिछले तीस सालों से पाकिस्तान को लेकर हमारा रवैया नहीं बदला है। 30 साल इसलिए कि 1970 के दौरान पाकिस्तान ने पंजाब में सिख आतंकवाद को जन्म दिया। तब से लेकर अब तक हमारी स्ट्रैटजिक एंड टेक्टिकल टेक्नीक पाकिस्तान की गुलाम हो गई है। हम सारी तैयारियां, सारी विदेश नीतियां और सारे हथियारों की खरीद पाकिस्तान को ध्यान में रखकर करते हैं, लेकिन एक बार भी सीमापार हमने गोली नहीं चलाई। बस रक्षात्मक रवैया अपनाकर किलेबंदी में जुटे हैं। इसका क्या असर हुआ है, इसे समझने की जरूरत है। हमारा एक और पड़ोसी मुल्क चीन इस दरम्यान हमसे विकास की दौड़ में काफी आगे निकल गया। वह जब चाहता है, हमें घुड़की दे देता है। यही नहीं, दूसरे तमाम पड़ोसी मुल्कों से हमारे संबंध उतार-चढ़ाव भरे हो गए हैं। क्योंकि हम पाकिस्तान के पैतरों से बाहर निकल नहीं पाए हैं। भारत की अब तक की तमाम सरकारों का मानना रहा है कि पाकिस्तान पर दबाव बनाया जाना चाहिए। इसके लिए कभी बातचीत का सहारा लिया जाता है तो कभी अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को नजरअंदाज किया जाता है। क्या अच्छा यह नहीं होता कि पाकिस्तान से सीधा संवाद किया जाए। उसे डराया या धमकाया जाए। इस बार लादेन पर हमले के बाद भारतीय सेनाध्यक्ष की ओर से बयान आया कि भारत भी इस तरह के हमले के लिए तैयार है। सेनाध्यक्ष का बयान काफी राहत वाला था। पहली बार लगा कि पाकिस्तान सहम गया है। इसलिए आनन-फानन में पाकिस्तानी संसद के विशेष सत्र को बुलाया गया। वहां गिलानी आतंकवाद से खुद को अलग करने में जुटे रहे और भारत पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने कहा कि कोई और देश इस तरह के हमले के बारे में नहीं सोंचे। इससे साफ होता है कि पाकिस्तान को लगने लगा था कि भारत पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों पर कार्रवाई कर सकता है, लेकिन इस बयान के चंद दिनों बाद ही भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अफगानिस्तान में बचाव और नैतिकता की मुद्रा में आ गए। उन्होंने एबटाबाद जैसी कार्रवाई पर कहा कि हम अमेरिका जैसे नहीं हैं। भला इस बयान के क्या मायने हैं? नैतिकता के स्तर पर इसे सराहना मिल सकती है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर इसे कमजोरी से ज्यादा कुछ भी नहीं माना जा सकता है। अमेरिका से 20 अरब डॉलर हजम कर जाने वाला पाकिस्तान जब अमेरिका को दगा दे सकता है तो भारत को ठगने में उसे क्या दिक्कत होगी? इन सूची को देखने के बाद पाकिस्तान टका-सा जवाब देगा कि उसके यहां कोई आतंकी नहीं छुपा है और अगर है तो भारत इसका सबूत दे। बात आई और गई हो जाएगी। फिर आतंकवाद के मसले पर सबकुछ यथावत रहेगा। कुछ अरसे में हमें एक दो और आतंकी हमले झेलने पड़ जाएंगे, जिसकी कीमत जनता को चुकानी पड़ेगी। लाजिमी तौर पर पाकिस्तान से शांति की अपेक्षा करना बुजदिली है या यह उम्मीद लगाना कि पाकिस्तान हमारे भगौड़ों को हमें सौंपा देगा, बेवकूफी है। खासकर तब, जबकि अलकायदा की धमकियां आनी शुरू हो गई हैं। अलकायदा ने कहा कि लादेन की मौत का बदला अंतरराष्ट्रीय जगत से लिया जाएगा, लेकिन 9/11 हमले के बाद अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था काफी पुख्ता हो चुकी है। तभी तो 9/11 हमले के बाद अल कायदा किसी और आतंकी साजिश को अमेरिका में अंजाम नहीं दे सका। यूरोप में भी उसके आतंकी मंसूबे विफल ही रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक तो लचर सुरक्षा व्यवस्था और कमजोर खुफिया तंत्र और ऊपर से जवाबी कार्रवाई के प्रति उदासीनता हमें अलकायदा आतंकियों की चपेट में ला सकती है। इसलिए हमें आक्रामक तेवर अपनाने होंगे। सीमापार से आतंकियों के घुसपैठ को रोकने की रणनीति बनानी होगी और महानगरों में धर-पकड़ अभियान को तेज करना होगा। इससे हमें सीमापार के कई सुराग मिल सकते हैं। अमेरिका और दूसरे शक्तिशाली मुल्कों को भरोसे में लेकर हम 50 में से एक भी भगौड़ों को बाहर निकालने या मार गिराने में सफल होते हैं तो इससे हमें निर्णायक बढ़त मिल जाएगी। दुनिया को यह भी पता चल जाएगा कि पाकिस्तान अब भी आतंकवाद का पनाहगाह है। इसके बाद पाकिस्तान खुद रक्षात्मक स्थित में होगा और बातचीत की मेज पर हमारी सारी बातों को मानने में तत्परता दिखाएगा। हो सकता है कि इस तरह की कार्रवाई के दौरान सरकार को जम्मू-कश्मीर और देश के कुछ दूसरे इलाकों से विरोध का सामना करना पड़े, लेकिन दीर्घकालिक हित को ध्यान में रखकर इस तरह के कदम उठाने होंगे। दुनिया के सामने आतंकवाद विरोधी सख्त राष्ट्र की पहचान बनाने के लिए भारत को इन भगौड़ों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करनी होगी। पाकिस्तान को सख्त संदेश देने की जरूरत है और इसके लिए मुफीद वक्त यही है। वरना, एक बार पाकिस्तान एबटाबाद कार्रवाई से उबरेगा तो उसके नापाक चेहरे और खतरनाक हो जाएंगे। इसलिए हमें समझना होगा कि डोजियर और लिस्ट हमारी कूटनीतिक विफलता की पहचान है।

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