Wednesday, May 4, 2011

ओसामा और अलकायदा

ओसामा के खिलाफ मिली सफलता के बाद अमेरिका को आत्मचिंतन की नसीहत दे रहे हैं रोबर्ट फिस्क
क्या विश्वासघात हुआ? बिल्कुल। पाकिस्तान बिन लादेन के छुपने की जगह जानता था। एक अधेड़ तुच्छ आदमी पाकिस्तान में मारा गया। अपने जन्म के प्रमाणपत्र की कॉपी पेश करने के बाद तरोताजा अमेरिकी राष्ट्रपति ने आधी रात को ओसामा बिन लादेन का मृत्यु प्रमाणपत्र सौंप दिया। बताया गया कि उसके सिर में एक गोली लगी, किंतु लादेन के शव को गोपनीय ढंग से अफगानिस्तान लाना और इतनी ही गोपनीयता के साथ समुद्र में उसे दफन कर देना, क्या बताता है? एक व्यक्ति के रूप में ओसामा जितना रहस्यमय था और जितना विषैला उसका संगठन था उतने ही रहस्यमयी और गोपनीय तरीके से उसे दफन कर दिया गया। खुशी के मारे अमेरिकी जश्न में डूब गए। डेविड कैमरन के मुताबिक यह एक बड़ा कदम है। भारत ने इसे मील का पत्थर बताया। इजराइली प्रधानमंत्री ने इसे जबरदस्त जीत कहा। किंतु 9/11 को 3,000 अमेरिकियों की मौत, मध्य-पूर्व में अनगिनत के मरने और इराक व अफगानिस्तान में पांच लाख से अधिक लोगों की मृत्यु के बाद अब हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि हमें ऐसी और जोरदार जीत नहीं चाहिए। इसके बदले में हमलों की आशंका है। पश्चिम में छुटभैये समूह ये कर सकते हैं, जिनका अलकायदा से कोई सीधा नाता नहीं है। निश्चित तौर पर अफगानिस्तान में तालिबान में से कोई न कोई ओसामा बिन लादेन की शहादत ब्रिगेड के सपने जरूर देख रहा होगा। अरब जगत में पिछले चार माह के दौरान होने वाले जनविद्रोह से यह पहले ही स्पष्ट हो गया था कि अलकायदा राजनीतिक रूप से मर चुका है। बिन लादेन विश्व को बता चुका है कि वह अरब जगत की पश्चिम परस्त मानसिकता तोड़ना चाहता है। मुबारक और बेन अली जैसे तानाशाहों के राज को मिटाना चाहता है। वह एक नया इस्लामिक खलीफा पैदा करना चाहता था, किंतु पिछले कुछ महीनों में लाखों अरब मुसलमानों ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया-इस्लाम के लिए नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए। ओसामा अत्याचारियों से छुटकारा नहीं दिला पाया। जनता ने उन्हें ठिकाने लगा दिया। उन्हें कोई नया खलीफा नहीं चाहिए। मैं लादेन से तीन बार मिल चुका हूं और केवल एक सवाल उससे नहीं पूछ पाया-इस साल जो क्रांतियां हुई हैं उनके बारे में उसके क्या विचार हैं? ये क्रांतियां राष्ट्र के झंडे तले हुई हैं, इस्लाम के झंडे तले नहीं। मुस्लिम और ईसाइयों ने मिलकर मोर्चा लिया। क्या इस तरह के लोगों का कत्ल करके अलकायदा के आदमी खुश होंगे? खुद उसकी नजर में, उसकी उपलब्धि अलकायदा खड़ा करना थी। इस संगठन में आपको सदस्यता की जरूरत नहीं है। आप सुबह उठते हैं और अलकायदा में शामिल होना चाहते हैं और आप उसमें शामिल हो जाते हैं। वह संस्थापक था, किंतु वह कभी भी कुशल योद्धा नहीं रहा। बमबारी से बचने के लिए उसकी गुफा में कोई कंप्यूटर या फोन नहीं था। ओसामा बिन लादेन की मौत से पाकिस्तान सबकी आंखों में चुभने लगा है। महीनों से राष्ट्रपति जरदारी हमें बताते आ रहे हैं कि बिन लादेन गुफाओं में रह रहा है। अब पता चला है कि वह तो पाकिस्तान में एक शानदार बंगले में रह रहा था। पाकिस्तानी सेना या पाकिस्तानी आइएसआइ को उसके ठिकाने की जानकारी थी, जिसे उन्होंने दुनिया और विशेष रूप से अमेरिका से छिपाया। असलियत में, एक और सवाल का जवाब नहीं मिल पाया है। क्या वे बिन लादेन को पकड़ नहीं सकते थे? सीआइए, अमेरिकी स्पेशल बल, कमांडो टुकड़ी सील आदि के होते हुए वे इस व्यक्ति पर जाल क्यों नहीं फेंक सकते थे? बराक ओबामा ने ओसामा की मौत पर कहा-न्याय हो गया। पुराने दिनों में न्याय का मतलब था एक उचित प्रक्रिया, अदालती कार्यवाही, बचाव का मौका आदि। सद्दाम के बेटों की तरह ओसामा को गोलियों से भून दिया गया। निश्चित तौर पर वह जिंदा पकड़े नहीं जाना चाहता था और जिस कमरे में वह मरा वहां बाल्टियों खून फैला हुआ था, किंतु अदालती कार्यवाही से ओसामा से ज्यादा परेशानी अन्य लोगों को होती। सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर हमले के दौरान वह सीआइए से अपने संबंधों या इस्लामाबाद में सऊदी अरब की खुफिया इकाई के प्रमुख से अपनी मुलाकात का खुलासा कर सकता था। सद्दाम पर कुर्द में हजारों लोगों को गैस से मारने के बजाए केवल 153 लोगों की हत्या का मुकदमा चलाया गया और इससे पहले वह अपना मुंह खोलते कि ये गैस उपकरण उन्हें अमेरिका से मिले और ईरान से युद्ध के दौरान इराक को अमेरिका से सैन्य सहायता मिली, उन्हें मौत की सजा सुना दी गई। अन्य मुसलमानों के साथ ओसामा के संबंध रहस्यमयी थे। जब मैं उससे अफगानिस्तान में मिला तो शुरुआत में वह तालिबान से भयभीत था। उसने मुझे रात को जलालाबाद की यात्रा करने से रोक दिया। अगले दिन उसने अलकायदा के लेफ्टिनेंटों को मुझे सुरक्षित पहुंचाने को कहा। उसके अनुयायी तमाम शिया मुसलमानों को इस्लाम विरोधी मानते हुए उनसे घृणा करते थे। तमाम तानाशाहों को काफिर बताते थे। फिर भी ओसामा ने अमेरिका के खिलाफ लड़ने वाले इराक के पूर्व बाथिस्टों को समर्थन दिया। उसने कभी हमास की तरफदारी नहीं की। 2001 के बाद पाकिस्तान में एक गोपनीय स्थान पर मेरी ओसामा के विश्वासपात्र से बातचीत हुई। मैंने उससे 12 सवाल पूछे, जिनमें से पहला था-ओसामा की कार्रवाई से अमेरिका दो मुस्लिम देशों पर कब्जा कर बैठा। ऐसे में वह अपनी जीत का दावा कैसे कर सकता है? कई सप्ताह तक मुझे कोई जवाब नहीं मिला। बाद में वीडियो टेप के माध्यम से ओसामा बिन लादेन ने मेरा उल्लेख किए बिना उन 12 सवालों के जवाब दिए। और हां, वह चाहता था कि अमेरिका मुस्लिम देशों में आए, ताकि उसे बर्बाद किया जा सके। ओसामा बिन लादेन के कृत्यों की मार उसके परिवार पर भी पड़ी। उसकी एक पत्नी ने उसे छोड़ दिया और रविवार के अमेरिकी हमले में दो और मारी गईं। 1994 में मैं ओसामा और उसके बेटे उमर से मिला था। जब मैंने उमर से पूछा कि क्या वह खुश है तो उसने कहा-हां। किंतु पिछले साल उसकी एक किताब प्रकाशित हुई-लिविंग बिन लादेन। इसमें लादेन को दुष्ट आदमी बताते हुए उसने कहा कि लादेन ने एक रासायनिक युद्धाभ्यास के दौरान उसके पालतू कुत्ते को मार डाला था। 1994 की हमारी मुलाकात को याद करते हुए उसने लिखा कि उसे हां की जगह ना कहना चाहिए था। वह लादेन के साथ खुश नहीं था। (लेखक द इंडिपेंडेंट के स्तंभकार और पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ हैं).

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