Thursday, May 19, 2011
अब डोजियर से नहीं बनेगी बात
भारत ने एक बार फिर पाकिस्तान पर सख्ती दिखाते हुए उन 50 मोस्ट वांटेड की सूची दी है, जो भारत में तो अपराधी हैं, पर पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। भारत मोस्ट वांटेड की सूची पाकिस्तान को देता है और वह उसे रद्दी की टोकरी में डाल देता है। पाकिस्तान तो अब अमेरिका के खिलाफ भी गरजने लगा है। ऐसे में वह भारत की सुनेगा, इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव भारतीय राजनीति का एक कमजोर पहलू रहा है। इसीलिए भारत हर मोर्चे पर मात खा रहा है। यही भारत कसाब को कबाब खिला रहा है, उधर पाकिस्तानी जेलों में बरसों से बंद भारतीय अन्न के दाने को तरस रहे हैं। आखिर ऐसा कब तक सहन करेगी भारतीय जनता? पाकिस्तान यदि सभी मोस्ट वांटेड भारत को सौंप भी दे तो उन पर इतना लंबा मुकदमा चलेगा कि आज की पीढ़ी को यह पता भी नहीं चल पाएगा कि उन्हें क्या और कितनी सजा हुई। भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी ने अपने समय में जिसजिंदादिली का परिचय दिया था, वैसा साहस आज के किसी भी नेता में दिखाई नहीं देता। वह एक ऐसी महिला थीं, जो अपनी दृढ़ता के कारण पहचानी जाती थीं। उसके बाद किसी भी पार्टी में ऐसा कद्दावर नेता दिखाई नहीं दिया, जो अपने दम पर पार्टी और सरकार चला ले। आपातकाल के बाद इंदिरा जी को सत्ता से हटना पड़ा। सत्ता से दूर होने के बाद भी उनकी दृढ़ता कायम रही। उसके बाद उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ वापसी भी की। उनके जैसी दृढ़ संकल्पित महिला भारतीय राजनीति में नहीं उभरी। उसके बाद कई सरकारें आई-गई, मिली-जुली सरकार का जमाना आया, लेकिन वह साहस और दूरदर्शिता किसी में दिखाई नहीं दिया। यही कारण है कि पिछले 20 वर्षो में किसी भी आतंकी को सजा नहीं दी गई। इसमें वोट की मजबूरी भी शामिल है। आतंकवाद के मामले में अमेरिका की सख्ती की आज चारों तरफ चर्चा है। उसने 9/11 हमले के मुख्य आरोपी को उसके घर में घुसकर मार डाला। कहां अमेरिका और कहां पाकिस्तान। अमेरिका की सख्ती ही उसके काम आई। यहां हमारे देश में ही छिपे आतंकवादियों को हम नहीं पहचान पा रहे हैं। यही नहीं, उन्हें पनाह देने वाले भी हमारे ही बीच से हैं, पर हम कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। कसाब का मामला जब भी सामने आता है, तब यह नहीं देखा जाता कि अब तक उसे जिंदा रखने के लिए देश के कितने करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। कसाब के साथियों की लाश को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में ही लाखों रुपये खर्च हो गए। इतनी राशि तो अभी तक हमारे जांबाज अधिकारियों को पेंशन में भी नहीं दी गई होगी। पिछले दो दशक में किसी भी सरकार ने ऐसी कोई सख्ती नहीं दिखाई, जिससे हमारे सैन्य अधिकारियों और पुलिस का मनोबल ऊंचा हो। 1993 में मुंबई बम धमाकों को 26/11 के बाद भारत में अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जाता है। 300 से अधिक लोगों की मौत और 700 से अधिक को घायल करने वाले एक के बाद एक 12 धमाकों ने देश की आर्थिक राजधानी को हिलाकर रख दिया था, लेकिन अभी तक इसके एक भी आरोपी को सजा नहीं हो पाई है। आतंकी हमले के 13 साल बाद 2006 में विशेष टाडा कोर्ट का फैसला आया भी तो सजा पाने वाले दोषियों ने उसके खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में अपील कर दी, जहां अब तक सुनवाई चल रही है। वैसे हकीकत यह भी है कि हमले की जांच करने वाली सीबीआइ अब तक मुख्य आरोपी दाऊद समेत 35 दूसरे आरोपियों को गिरफ्तार तक नहीं कर पाई है। अपने यहां लादेन के छिपे होने की बात सिरे से खारिज करने वाला पाकिस्तान अन्य आतंकियों के बारे में भी यही राग अलापता है। मुंबई बम विस्फोट, कांधार कांड, संसद पर आतंकी हमले, जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों की साजिश रचने और खालिस्तानी आतंकी संगठनों के कई कुख्यात आतंकी सरगना पाकिस्तान में शरण लिए हुए हैं, जिनकी भारत सरकार को तलाश है। सबूत इकट्ठा करना, उसे दुनिया को दिखाते रहना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात तो यह है कि सबूत इकट्ठा कर उसे किसी को न बताना और सीधे दुश्मन के घर में घुसकर उसे खत्म कर देना। जिस इच्छाशक्ति की देश को आज आवश्यकता है, उसे प्राप्त करने में काफी वक्त लगेगा। तब तक हम सब्र के बांध ही बनाते रहेंगे। पल्लू पकड़ राजनीति से सबकी नैया तो पार नहीं हो सकती। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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