Sunday, May 15, 2011
पाक पर दबाव का मौका
पाकिस्तान में पनाह लिए आतंकवादियों से निपटने के लिए भारत को नरमदिल होने की जरूरत नहीं है। न ही भारत के राजनेताओं को राष्ट्रीय हितों को वोट खींचने वाले स्तर तक ले जाना चाहिए। ओबामा और अमेरिकियों के खुश होने की वजह हैं। वे उन लोगों को सबक सिखाने में कामयाब हुए हैं, जिन्होंने अमेरिका पर हमले का दुस्साहस किया था। उनके लिए हर अमेरिकी की सुरक्षा सबसे अहम है। जब राष्ट्रीय सुरक्षा की बात आती है, तब राजनीतिक दृष्टि से एकदूसरे के विरोधी रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स एक हो जाते हैं। दरअसल, अमेरिकी विधि-निर्माताओं ने पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी के बारे में इस्लामाबाद से स्पष्टीकरण मांगने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। 9/11 के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को 20 अरब डालर से अधिक सहायता दी है, क्योंकि अफगान सुरक्षा के बारे में उसे पाकिस्तान की जरूरत है। ओसामा बिन लादेन के सफाए से भारत क्या लाभ उठा सकता है? मुंबई आतंकी हमले के शिकार हमारे लोगों को न्याय दिलाने के बारे में में यह महत्वपूर्ण बिंदु साबित हो सकता है। संसद भवन पर हुए हमले के शिकार लोग अभी तक न्याय की बाट जोह रहे हैं। इस हमले में आतंकवादियों से मुठभेड़ में सुरक्षा गार्डों और संसद के कर्मचारियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। कहा जा सकता है कि नई दिल्ली कानूनी प्रक्रिया अपना रही है। माना इन दोषियों पर कानूनी कार्यवाही हुई है, लेकिन संसद भवन पर हमले की साजिश रचने वाले अफजल गुरु को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद भी उस पर अभी तक अमल क्यों नहीं हुआ है? दया की उसकी याचिका अभी भी राष्ट्रपति के पास पड़ी हुई है। 1993 के मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड दाऊद इब्राहिम किस प्रकार पाकिस्तान में आजाद घूम रहा है? अफजल गुरु को फांसी देने में देरी के बारे में लोगों ने सवाल करने शुरू कर दिए हैं और लादेन के मारे जाने के बाद आने वाले महीनों में यह फुसफुसाहट और बढ़ जाएगी। भारत का राजनीतिक वर्ग, आतंकवादियों के खिलाफ बल प्रयोग से हिचकता है। मुंबई और संसद भवन हमलों के बाद भारत के सेनाध्यक्षों ने सीमा के उस पार अचूक हमले करने का सुझाव दिया था, लेकिन दोनों ही मौकों पर राजनेता हिम्मत नहीं कर पाए और अमेरिका तथा दूसरी विदेशी सरकारों के दबावों के आगे झुक गए। बदकिस्मती से दोषियों के प्रति न्याय और अपनी वोट बैंक राजनीति को लेकर राजनेता उलझन में रहते हैं। भारत को अमेरिका और इजराइल से सबक लेना चाहिए जिन्होंने बार-बार साबित किया है कि आतंकवाद में लिप्त लोगों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ओसामा बिन लादेन के खात्मे ने भारत को पाकिस्तान और दुनिया को 26/11 के बारे में एक संदेश भेजने का अवसर दिया है। इससे मनमोहन सिंह सरकार पर पाकिस्तान और अफ-पाक, दोनों ही के बारे में अपनी नीतियों पर फिर से गौर करने का दबाव पड़ना लाजमी है। ओबामा और विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के संकेतों से साफ हो जाता है कि अफगानिस्तान से निपटने के लिए अमेरिका को पाकिस्तान की लाजिस्टिक सहायता चाहिए, जबकि पाकिस्तानियों को अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने और सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए अमेरिकी डॉलरों की जरूरत है। यह परस्पर निर्भरता, अभी कुछ समय तक जारी रहेगी। इसलिए अमेरिका एक हद तक ही पाकिस्तान पर दबाव डालेगा। नई दिल्ली को इस अवसर का फायदा उठा कर वाशिंगटन और विश्व समुदाय को पाकिस्तान पर दबाव बनाने की जरूरत के बारे में समझाना चाहिए ताकि वह अन्य आतंकी संगठनों के साथ भी इसी प्रकार से निपट सकें। अन्यथा, ओसामा बिन लादेन भले ही मर गया हो, उसका जिहादी आतंकवाद जारी रहेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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