Monday, May 9, 2011
नापाक नीति
अमेरिका और पाकिस्तान के बीच जो तनातनी जारी है उसमें एक बार फिर पाकिस्तान का ही पलड़ा भारी रहने के आसार हैं और इसका ताजा प्रमाण है अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का यह बयान कि उनके हिसाब से ओसामा बिन लादेन को छिपाने में न तो पाकिस्तान सरकार का हाथ है और न ही उसकी सेना एवं खुफिया एजेंसी आइएसआइ का। हालांकि उन्होंने ओसामा के इतने दिनों तक पाकिस्तान में छिपे रहने के कारणों की जांच जारी रखने को कहा है, लेकिन जब जांच से पहले निष्कर्ष निकाल लिया जाए तो फिर भावी रवैये का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। ओसामा बिन लादेन के मामले में पूरी तरह बेनकाब हो जाने और शर्मिदा होने के बावजूद पाकिस्तान अमेरिका को जिस तरह न केवल खुलकर जवाब दे रहा है, बल्कि उसे दबाव में लेने की कोशिश कर रहा है उससे यह साफ है कि वह अपनी रीति-नीति बदलने वाला नहीं है और न ही अमेरिका उस पर कोई ठोस दबाव डालने में समर्थ है। अमेरिका की ओर से अलकायदा से संपर्क रखने वाले आइएसआइ अफसरों की सूची मांगे जाने के जवाब में पाकिस्तान ने जिस तरह इस्लामाबाद में तैनात सीआइए अफसर की पहचान खोल दी वह उसके अडि़यल रवैये का नया सबूत है। पाकिस्तान के ऐसे तेवर यही बताते हैं कि वह अमेरिका से सौदेबाजी करने में समर्थ है। अमेरिका भले ही पाकिस्तान पर लाल-पीला हो रहा हो, लेकिन वह उसके खिलाफ अपेक्षित कठोरता शायद ही दिखा पाए। इसका कोई मतलब नहीं कि अनेक अमेरिकी सीनेटर पाकिस्तान की सहायता रोकने की मांग करने के साथ-साथ उस पर अविश्वास जताने में लगे हुए हैं, क्योंकि ओबामा प्रशासन उसे अपना सहयोगी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। अब तो ओबामा प्रशासन ऐसे भी संकेत दे रहा है कि वह ओसामा बिन लादेन के मामले में पाकिस्तान की संदिग्ध भूमिका को तूल नहीं देगा। इन परिस्थितियों में इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती कि पाकिस्तान आतंकवाद का साथ देने की अपनी रणनीति का परित्याग करेगा। किस्म-किस्म के आतंकी संगठनों का सहयोग-समर्थन करने के मामले में आइएसआइ की भूमिका जांचने-परखने का इसलिए कोई अर्थ नहीं, क्योंकि ऐसे न जाने कितने सबूत सामने आ चुके हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि यह खुफिया एजेंसी वस्तुत: आतंकी संगठनों को पालने-पोसने का काम कर रही है। यदि अमेरिका इन सबूतों को पर्याप्त नहीं मानता तो इसका मतलब है कि वह जानबूझकर सच्चाई से मुंह मोड़ने की अपनी नीति छोड़ने के लिए तैयार नहीं। यह स्थिति भारत के लिए विशेष रूप से चिंता का विषय बननी चाहिए, क्योंकि ताजा खुलासे यह बता रहे हैं कि अमेरिका को यह पता था कि किस तरह जैश और लश्कर के अतिरिक्त अलकायदा भारतीय हितों को चोट पहुंचाने की साजिश रच रहे हैं और उसमें आइएसआइ भी शामिल थी। जब ऐसे संकेत उभर रहे हैं कि अमेरिका पाकिस्तान पर एक सीमा से अधिक दबाव नहीं बनाएगा और यदि बनाएगा भी तो केवल अपने हितों की रक्षा करने के लिए तब फिर भारत को यह समझ लेना चाहिए कि उसके पास पाकिस्तान संबंधी अपनी नीति में आमूल-चूल परिवर्तन करने के अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया है।
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