Wednesday, May 25, 2011
भारत-अफगान रिश्ते हैं अहम
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हालिया दो दिवसीय अफगानिस्तान यात्रा मौजूदा वैश्विक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण समझी जा रही है। भारत का अफगानिस्तान के साथ प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण संबंध रहा है। इन दोनों देशों के आपसी संबंधों में निरंतरता और स्थायीत्व की आवश्यकता पहले भी थी और वर्तमान में तो भारत के लिए सामरिक व कूटनीतिक दृष्टि से खासी अहम है। पाकिस्तान के साथ भारत के कटु संबंधों के परिप्रेक्ष्य में अफगानिस्तान के साथ संबंध विकसित करने की जरूरत और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। खासतौर से ऐसे समय में जब पाकिस्तान चीन से लिपट रहा है। बहरहाल, जिस तरह भारत अपने पड़ोसी अफगानिस्तान को आर्थिक सहायता देता रहा है और हाल की 50 करोड़ डॉलर की आर्थिक सहायता की पेशकश ने दोनों देशों के आपसी संबंधों को और मजबूती देने में मील का पत्थर साबित हो सकती है। अतीत से वर्तमान तक जिस प्रकार पाकिस्तान की दिलचस्पी अफगानिस्तान के प्रति रही है, भारत के लिए आने वाले दिनों में गंभीर संकट का संकेत है। पाकिस्तान की नीयत भारत के विरोधी के रूप में जाहिर हो चुकी है। इस बीच अमेरिकी सैनिकों की वापसी की घोषणा ने भारत की समस्याओं को बढ़ाया है। पाकिस्तान चीन के साथ-साथ एक मजबूत इस्लामी राष्ट्र यानी अफगानिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश में 90 के दशक से ही लगा है। हामिद करजई के सत्ता में आने के साथ भारत-अफगानिस्तान के आपसी संबंधों में गतिशीलता आई है, जो दोनों देशों के लिए जरूरी है। लेकिन पाकिस्तान को यह गंवारा नहीं है। भारत-अफगानिस्तान के अच्छे सामरिक संबंधों से पाकिस्तान को घबराहट होती है। पाकिस्तान नहीं चाहता है कि उसके द्वारा समर्थित देश में भारत की रणनीतिक पहुंच स्थायी हो। अपनी इस कूटनीति के तहत पाकिस्तान अफगानिस्तान को विभिन्न रूपों में भारत के प्रति विरोध दर्ज कर चुका है। 1994 में पाकिस्तान के समर्थन से तालिबान के विकास और कट्टर धार्मिक विचारधारा को आगे बढ़ाए जाने से वहां पर तमाम जटिलताएं पहले की अपेक्षा बढ़ गई। भारत ने वहां के सभी घटनाक्रमों पर सतर्कता बरती है। अपने कूटनीतिक रिश्तों को बहुत ही संवेदनशील तरीके से लागू किया है। उत्तरी भागों में तालिबान के प्रसार और उसकी पैठ ने ग्रेटर अफगानिस्तान की आशंका को मजबूत किया है। वर्ष 2001 में ऑपरेशन एंदुरिंग फ्रीडम यानी ओईएफ की शुरुआत के बाद नाटो के नेतृत्व की आइएसएएफ ने तालिबान को पराजित किया। यह मध्य एशिया सहित अफगानिस्तान के आतंकी संगठनों के लिए सदमे का दौर था। इसके बावजूद कट्टरपंथ और पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां न ही नाकाम हुई और न ही कमजोर। 21वीं सदी से भारत की रणनीतिक सोच में काफी परिवर्तन आया है। भारत की बढ़ती शक्ति और वैश्विक स्तर की स्वीकार्यता ने अफगान नीति के प्रति भारत की महत्वकांक्षा को बढ़ाया है। अफगानिस्तान को सहयोग करने वाले देशों में भारत का चौथा स्थान है। भारत चाहता है कि अफगानिस्तान में एक स्थिर और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का विकास हो। अमेरिकी प्रयासों से तालिबान की निश्चित रूप से पराजय हुई है, लेकिन हमें यह ध्यान रखने की जरूरत है कि उग्रवाद और आतंकवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है। वास्तव में उसमें बढ़ोतरी ही हुई है। भारत की चिंता वास्तव में अपने पड़ोसी देशों में अशांति को लेकर है। जिस प्रकार उग्रवाद और आतंकवाद का सामना भारत समेत दक्षिण एशियाई देश कर रहे हैं, वह चिंताजनक है। हाल के घटनाक्रमों से साफ हो जाता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर इससे लड़ने के बजाय इसे मौन स्वीकृति दे रहा है। जबकि आतंकवाद खुद उसके लिए नासूर बनता जा रहा है। और पाकिस्तान है कि भारत के खिलाफ साजिश रचने के लिए कभी चीन का दौरा कर रहा है तो कभी आतंकियों को सह दे रहा है। इस बीच भारत के प्रधानमंत्री की अफगान यात्रा को कूटनीतिक सफलता के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन भारत को अपनी सामर्थ्य का भरपूर इस्तेमाल करते हुए आतंकवाद को जड़ से खत्म करने का प्रयास करना होगा। जाहिर है इसके लिए अफगानिस्तान को भी साथ लेकर चलना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
चीन-पाक की नापाक जुगलबंदी
वैश्विक आतंक के मसीहा ओसामा बिन लादेन के अमेरिकी हमले में मारे जाने से पाकिस्तान द्वारा जिहादी आतंकवाद को प्रश्रय दिए जाने का भांडा फूट चुका है। अपना काला सच दुनिया के सामने उजागार होने के कारण बौखलाई पाक फौज को अब ओछी और अनर्गल बयानबाजी के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा है। अब पाकिस्तान के राजनेता अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। इन विकट परिस्थितियों में पाकिस्तान को अपने सदाबहार साथी चीन की याद आ रही है। अवसरवादी रिश्ते कायम करने में महारथ हासिल करने वाला पाकिस्तान हमेशा इस बात को लेकर अपनी पीठ गर्व से थपथपाता रहा है कि उसने एक ही वक्त में अमेरिका और चीन जैसे विरोधी विचारधारा वाले दो देशों से अत्यंत प्रगाढ़ संबंध बनाए हुए है। दूसरे अर्थो में कहें तो पाकिस्तान दोनों हाथों से लड्डू बटोरता रहा है, लेकिन पाकिस्तान का निकटतम मित्र रहा अमेरिका आज उसके ही गले की फांस बन चुका है। ऐसे में पाकिस्तानी नेता अपना दुखड़ा अगर चीन के आगे नहीं रोएं तो फिर किसके आगे रोएं। सहानुभूति बटोरने की फिराक में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ऐसे समय में चीन की यात्रा पर गए हैं, जब उनकी अपनी जमीन पर ओसामा बिन लादेन की मौत से पाकिस्तान की वैश्विक छवि को जबरदस्त नुकसान पहंुचा है। चीन और पाकिस्तान अपनी दोस्ती का बखान करने के लिए कई प्रतीकों का सहारा लेते हैं। दोनों देशों के नेता अपनी मित्रता को हिमालय से ऊंची, महासागार से गहरी, स्टील से मजबूत, शहद से मीठी बताते आ रहे हैं। पाकिस्तान फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि और पहचान का जो संकट झेल रहा है वो उसके हर मौसम और हर मौके के दोस्त चीन की शरण में जाकर ही दूर हो सकता है। पिछले कुछ वर्षो में पाकिस्तान की विदेश नीति में चीन की बढ़ती अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आसिफ अली जरदारी 2008 में राष्ट्रपति बनने के बाद सबसे ज्यादा चीन की यात्रा पर गए हैं। प्रधानमंत्री गिलानी की हालिया चीन यात्रा भी कई मायनों में महत्वपूर्ण रही है। वैसे इस साल चीन और पाकिस्तान अपनी मित्रता की साठवीं वर्षगांठ भी मना रहे हैं। 1951 में दोनों देशों में राजनयिक संबंध कायम हुए थे। लादेन की मौत के बाद चीन पाकिस्तान को पहले ही अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त कर चुका है। चीन ने आतंक विरोधी मुहिम में पाकिस्तान के योगदान की जबरदस्त प्रशंसा करते हुए पाकिस्तान की इस मांग का समर्थन किया है कि अमेरिका को उसकी संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए। चीन पहुंचने पर सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ को दिए साक्षात्कार में गिलानी ने कहा कि हम मानते हैं कि चीन हर मुश्किल घड़ी में पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा। हमें गर्व है कि चीन हमारा बेहतरीन और भरोसेमंद दोस्त है। चीन भी पाकिस्तान को हर वक्त अपने साथ खड़ा पाएगा। चीन का गुणगान करने का गिलानी का यह अंदाज अमेरिकी सांसदों को बहुत अखरा है। उनका गुस्सा गैर-वाजिब भी नहीं है, क्योंकि एक तरफ तो अमेरिका पाकिस्तान पर करोड़ों डॉलर खर्च कर रहा है और दूसरी तरफ अहसानफरामोश पाकिस्तान चीन की चापलूसी करने में लगा हुआ है। रिपब्लिकन पार्टी के एक सीनेटर ने पाकिस्तान पर अपनी खीझ उतारते हुए कहा कि अमेरिकी जनता को यह समझाना बेहद मुश्किल है कि एक ऐसे मुल्क को आर्थिक मदद क्यों जारी रखी जाए जिसके प्रधानमंत्री चीन जाकर कहते हैं कि आप हमारे सर्वश्रेष्ठ और सबसे विश्वसनीय मित्र हैं। दरअसल, चीन और पाकिस्तान की सदाबहार दोस्ती की एक बड़ी वजह है भारत, जिसे दोनों देश अपना साझा शत्रु मानते हैं। भारत से वैमनस्य रखने के कारण ही पाकिस्तान को सिर चढ़ाने का काम चीन पिछले चार दशकों से कर रहा है। हालांकि साम्यवादी-माओवादी चीन इस सच्चाई से भलीभांति परिचित है कि जब तक भारत और चीन के मधुर संबंध कायम नहीं रहेंगे तब तक एशिया महाद्वीप में शांति का वातावरण नहीं बन पाएगा। फिर भी चीन ने कभी भारत की परवाह नहीं की, बल्कि मौका मिलते ही पीठ पीछे छुरा घोंप दिया। पाकिस्तान ने अनेक मौकों पर यह साबित किया है कि वह भी चीन के कई छुरों में से एक है। भारत-चीन युद्ध, चीन और पाकिस्तान को और करीब लाए। फिर 1963 में पाकिस्तान ने अपने कब्जे में लिए हुए कश्मीर की काफी भूमि चीन को दोस्ती के नजराने के तौर पर भेंट कर दी। चीन ने भी पाकिस्तान के लिए बहुत कुछ किया। उसे बेहिसाब परंपरागत हथियार दिए और परमाणु बम बनाने में मदद की। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन सदैव पाकिस्तान का हिमायती साबित हुआ है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि पाकिस्तान के फौजी तानाशाहों की कपोल-कल्पित महत्वाकांक्षाओं को हवा देने में चीन का बहुत बड़ा योगदान है। आज जब आतंक के मुद्दे पर पाकिस्तान का दोहरा चेहरा और चरित्र पूरी दुनिया देख चुकी है तो अपनी आंख पर चढ़े पाकिस्तान के चश्मे को उतारने की बजाय चीन फिर से पाकिस्तान की कारगुजारियों पर परदा डालने में लगा हुआ है। यह समय पाकिस्तान की सैन्य क्षमता पर अंकुश लगाकर उस पर दबाव डालने का है, लेकिन पाकिस्तान को भारत के बराबर खड़ा करने की चाहत और रणनीति ने चीन की मति भ्रष्ट कर दी है जिसकी वजह से चीन सही और गलत में फर्क नहीं कर पा रहा है। दरअसल पाकिस्तान को सैन्य सहायता पहुंचाने और उसकी खतरनाक नीतियों का मूक समर्थन करने की मूर्खता भरी चालाकी चीन लंबे समय से करता आ रहा है। पाकिस्तान में नए परमाणु संयंत्र लगााने की घोषणा चीन पहले ही कर चुका है। अब गिलानी की चीन यात्रा के बाद यह खबर आई है कि चीन जल्द ही पाकिस्तान को 50 जेएफ-17 थंडर एयरक्राफ्ट उपलब्ध कराएगा। गाौरतलब है कि दोनों देश आपसी सहयोग से जेएफ-17 विमान तैयार कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान को मिलने वाले नए 50 विमान अत्याधुनिक तकनीक से लैस होंगे। यही नहीं चीन निर्मित जे-20 स्टील्थ जेट और एफसी-1 बहुउद्देश्यीय हल्के लड़ाकू विमान हासिल करने के लिए भी पाकिस्तान काफी कोशिश कर रहा है। क्या चीन इस बात से अनभिज्ञ है कि पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली को और मजबूत करने वाले इन विमानों का असली निशाना भारत ही है? चीन जानता है कि अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन की पाकिस्तान में मौत के बाद विश्व राजनीति में पाकिस्तान बिल्कुल अलग-थलग पड़ चुका है, इसलिए गिलानी की चीन यात्रा के दौरान चीनी नेताओं ने पाकिस्तान के पक्ष में जमकर कसीदे पढ़े। चीन ने केवल वही कहा जो पाकिस्तान सुनना चाहता था। चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो भी बदलाव हो, चीन और पाकिस्तान हमेशा अच्छे पड़ोसी, अच्छे दोस्त, अच्छे साझेदार और अच्छे भाई बने रहेंगे। यहां यह दोहराना अप्रासंगिक नहीं होगा कि जिस दोस्ताना और सदाबहार रिश्तों पर चीन गर्व महसूस कर रहा है आज पूरे दक्षिण एशिया में वह अस्थिरता का अहम कारण बन गए हैं। क्या कारण है कि ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद पाकिस्तान बार-बार संप्रभुता की रट लगा रहा है और अपने हितों की रक्षा की गुहार अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से लगा रहा है। दरअसल, पाकिस्तानी फौज की रणनीति यह है कि आतंकी समूहों के साथ उसके नजदीकी रिश्तों से ध्यान हटाकर अमेरिका द्वारा उसकी संप्रभुता के उल्लंघन का राग अलापने से उसे कई असहज सवालों के जवाब देने से मुक्ति मिल जाएगी। गिलानी की चीन यात्रा का एक छिपा हुआ उद्देश्य यह भी है कि चीन-पाकिस्तान मित्रता का सार्वजनिक ढिंढोरा पीटने से अमेरिका को यह अहसास कराया जाए कि एक हद से ज्यादा वह पाकिस्तान पर दबाव नहीं डाल सकता। अगर अमेरिका वाकई पाकिस्तान के दबाव में आ गया तो यह न केवल क्षेत्रीय शांति व सुरक्षा के लिए नापाक गठबंधन होगा, बल्कि खतरनाक भी, क्योंकि चीन पाकिस्तान के बहाने अपने साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की चाहत रखता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
सेना नहीं सुरक्षित तो देश कहां सुरक्षित
कराची नौसैन्य अड्डे पर आतंकवादियों का हमला कई दृष्टियों से पाकिस्तान में आए दिन होने वाले हमलों में सबसे बड़ा एवं दुस्साहसिक कहा जाएगा। संघर्ष में नौसेना के एक अधिकारी सहित 10 सुरक्षाकर्मियों तथा चार आतंकवादियों की मौत के बाद इस हमले का अंत हो गया, लेकिन आतंकवादियों द्वारा बहु पंक्तिवाले सख्त सुरक्षा घेरे को तोड़कर अड्डे के अंदर रॉकेट सहित भारी हथियार व गोला आदि लेकर प्रवेश कर वायुयान, हेलीकॉप्टर आदि को ध्वस्त करना और सबसे बढ़कर सेना से 16 घंटों तक लोहा लेना हैरतअंगेज था। घटनास्थल से निकलती आग की लपटें और धुंआ 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमले की यादें ताजा कर रहा था। हालांकि मुंबई एवं कराची हमले में मौलिक अंतर यह है कि मुंबई में होटलों एवं रेलवे स्टेशन जैसे सार्वजनिक एवं अत्यंत कम सुरक्षा वाले स्थल निशाने पर थे, जबकि कराची में सेना के ऑपरेशन का शीर्ष अड्डा। एक साथ भय, क्षोभ, तिलमिलाहट, घबराहट और छटपटाहट के शिकार पाकिस्तानी नागरिकों की त्वरित प्रतिक्रिया यही थी कि अगर आतंकवादी सेना के अड्डे में घुसकर ऐसा विनाश कर सकते हैं तो फिर आम आदमी की क्या हैसियत है। पहले यह समझने की कोशिश करें कि आतंकवादियों ने इसे निशाना क्यों बनाया? इसे फैजल हवाई अड्डा कहा जाता है, जो नौसेना, वायुसेना एवं सेना का संयुक्त अड्डा है। समुद्र के ऊपर आकाश से की जाने वाली निगरानी (सव्रेइलेंस) का नियंतण्रइसी अड्डे से होता है। यहां अवस्थित नौसेना के हवाई समूह को पीएनएस मेहरान कहा जाता है। आतंकवादियों का निशाना यही पीएनएस मेहरान था। आतंकवादियों द्वारा इसे निशाना बनाने का कारण केवल इतना नहीं है कि सेना इनके खिलाफ युद्ध कर रही है। हालांकि 26 अप्रैल को तहरीक-ए -तालिबान ने कहा था कि सुरक्षा बलों पर वजीरिस्तान एवं अन्य जगह हमला किया जाएगा क्योंकि वह अमेरिका के कहने पर अपने लोगों को मार रहा है। नौसेना के वायु विंग का गठन मुख्यत: भारत के विरुद्ध निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए किया गया था, लेकिन अमेरिका द्वारा अक्टूबर 2001 से आरंभ आतंक विरोधी युद्ध में इसकी प्रत्यक्ष भूमिका हो गई है। नाटो सेनाओं के लिए रसद और साजो सामान कराची बंदरगाह पर उतरता है और वहां से अफगानिस्तान भेजा जाता है। अल कायदा व तालिबान नाटो की आपूर्ति रोकना चाहते हैं। नौसेना वायु निगरानी के कारण उनके लिए समुद्र में प्रवेश एवं नाटो जहाजों पर हमला असंभव हो गया है। पाकिस्तान की थलसेना एवं वायुसेना की ऑपरेशन संबंधी भूमिका अमेरिका के आतंक विरोधी युद्ध में नहीं है, लेकिन पाकिस्तान की नौसेना अमेरिकी नेतृत्व वाले कम्बाइंड टास्क फोर्स अंतरराष्ट्रीय नौसेना बल (इंटरनेशनल नावल फोर्स) की सदस्य है जो समुद्र की पेट्रालिंग करती है ताकि आतंकवादी समूह आपूर्ति में बाधा उत्पन्न न कर सकें। अमेरिका, इटली, जर्मनी, पाकिस्तान, फ्रांस एवं ब्रिटेन इसके सदस्य हैं। इससे स्पष्ट हो जाना चाहिए कि आतंकवादियों के निशाने पर नौसेना क्यों है। पीछे नजर डालें तो पाएंगे कि पाकिस्तान में आतंकवादी नौसेना को निशाना बनाते रहे हैं। 4 मार्च 2008 को दो आत्मघातियों ने लाहौर स्थित नेवेल वार कॉलेज पर हमला किया था। एक ने मोटर साइकिल मुख्य द्वार से भिड़ा दी तो दूसरा पार्किंग में घुस गया। इसमें दोनों हमलवारों के अलावा एक नौसेना अधिकारी व तीन सुरक्षा गार्ड मारे गए। 2 दिसम्बर 2009 को इस्लामाबाद स्थित पाकिस्तान नौसेना के मुख्यालय के बाहर उसके एक खुफिया अधिकारी की चुस्ती से एक आत्मघाती पकड़ा गया। उसे स्वयं को उड़ाने से रोका नहीं गया, पर केवल एक व्यक्ति मौके पर मरा एवं दूसरा बाद में। 26 अप्रैल 2011 को पाकिस्तान के नौसेना अधिकारियों को ले जाने वाली दो बसों के निकट रिमोट कंट्रोल से विस्फोट किया गया। बस से थोड़ी दूरी पर होने के कारण इसमें केवल चार लोग मारे गए एवं 30 घायल हुए। दो पी 3 सी ओरियन विमान का नष्ट होना पाकिस्तानी नौसेना की अब तक की सबसे बड़ी क्षति है। मुख्यत: अमेरिका द्वारा प्रदत्त चार इंजन वाला यह विमान केवल पनडुब्बी रोधी नहीं, बल्कि समुद्र में निगरानी वाला जहाज भी है। यानी इसकी भूमिका रडार की है जो दुश्मन की नौसेना की समुद्र तले की गतिविधियों की सूचनाएं देता रहता है। हालिया वारदात में शायद पाकिस्तान सरकार एवं सेना पूरी क्षति का विवरण सार्वजनिक न करे, लेकिन जितने विस्फोट सुने गए और लंबे समय तक आग की लपटें व धुएं का गुब्बार यह बताने के लिए पर्याप्त थे कि क्षति काफी हुई है। पाकिस्तान के नौसेना प्रमुख एडमिरल नोमन बशीर ने कहा कि हमलावरों ने एअर बेस को काफी नुकसान पहुंचाया। तभी तो हमले की जिम्मेवारी लेने वाले तहरीक ए तालिबान के प्रवक्ता ने इसे बहुत बड़ी विजय बताया। आतंकवादी इतने हथियार और गोला बारुद लेकर प्रवेश करने में कैसे कामयाब हो गए, इस प्रश्न का जवाब मिलना अभी कठिन है। यह अड्डा रात में दो-ढाई घंटों के लिए खोला जाता है और उसी समय हमला हुआ। इसी से साबित होता है कि यह लंबे समय की तैयारी का नतीजा था। यह सेना के केन्द्रों पर पहले होने वालों आत्मघाती हमलों से अलग है। अक्टूबर 2009 में सेना के रावलपिंडी मुख्यालय पर भी आतंकवादियों ने हमला किया था और 22 लोगोें की मृत्यु के साथ काफी क्षति हुई थी किंतु इस हमले का स्वरूप, लक्ष्य एवं परिणाम सभी अलग हैं। इसके लिए लंबे समय से रेकी हुई होगी। नक्शे का पूरा अध्ययन किया गया होगा, कहां सुरक्षा व्यवस्था अभेद्य है और किस बिन्दु पर थोड़ कमजोर- इसकी भी समीक्षा की गई होगी, कहां-कहां से घुसा जा सकता है, कहां कौन जहाज, हेलिकॉप्टर है, तेल डिपो है, हथियार व गोला-बारुद है, कहां से पोजिशन लेनी है आदि के साथ हमलावरों को पूरा प्रशिक्षण मिला होगा और संभव है, मुंबई हमले की तरह इन्हें बाहर से निर्देश भी मिल रहे हों। लगता है कि या तो नौसेना या अंदर के कुछ लोग इनके साथ होंगे या फिर सेना से निकलने के बाद जेहादी विचारधारा वालों की इसमें खास भूमिका होगी। बगैर अंदर की पूरी जानकारी के ऐसा हमला संभव नहीं है। पाकिस्तान के साथ हमारी सहानुभूति है। वहां के आंतरिक मंत्री रहमान मलिक की इस बात से हमारी सहमति है कि तालिबान व अल कायदा पाकिस्तान के भी दुश्मन हैं, लेकिन यह समझने में पाकिस्तान को काफी देर लग गयी और यही कारण है कि नियंतण्रउसके हाथ से निकलता जा रहा है। पाकिस्तानी विश्लेषक इसे ओसामा बिन लादेन की अमेरिकी सैनिकों द्वारा की गई हत्या से जोड़कर देख रहे हैं। ओसामा की मृत्यु के बाद सऊदी अरब के राजनयिक की हत्या हुई, अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ। ओसामा के मारे जाने के बाद से आम पाकिस्तानी स्वयं को लज्जित महसूस कर रहा है। सेना भी झेंपी हुई है। अमेरिका द्वारा पाक संप्रभुता का उल्लंघन बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। हमले के दिन भी इमरान खान ड्रोन हमले के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। कुल मिलाकर पूरे पाकिस्तान में इस समय क्षोभ और गुस्से का उबाल है। आतंकवादी भी इसका लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु क्या ओसामा के मारे जाने के पूर्व आतंकवादी पाकिस्तान में हमले नहीं कर रहे थे? क्या वे सुरक्षा बलों को निशाना नहीं बना रहे थे? पाकिस्तान के करीब पांच हजार सुरक्षा बल आतंकवादियों के साथ युद्ध में मारे जा चुके हैं। वस्तुत: ओसामा की मृत्यु भी आतंकवादियों को पाकिस्तान की सेना एवं सरकार के खिलाफ हमले का उन्मादित उत्प्रेरण बना है, लेकिन यह कहना गलत होगा कि ओसामा को नहीं मारा गया होता तो ये हमले नहीं होते। मुल्ला उमर के मारे जाने के साथ भी ऐसा ही होगा। इस हमले की साजिश ओसामा की मौत से पहले तय लगती है। क्योंकि इसकी तैयारी में पर्याप्त समय लगा होगा। पाकिस्तान का आतंकवादी हिंसा की चपेट में आना बड़ी चिंता है। अगर वहां की सबसे सशक्त एवं प्रभावी संस्था सेना के सुरक्षा दुर्ग को आतंकवादी नेस्तनाबूद कर रहे हैं तो फिर वहां कौन सी संस्था बचेगी जिसे किसी स्वस्थ राज्य का प्रमाण माना जाए। पूरी दुनिया को इस पर विचार करना होगा
दोराहे पर पाकिस्तान
लेखक लादेन की मौत का मुस्लिम जगत, खासतौर पर पाकिस्तान पर पड़ने वाले असर का जायजा ले रहे हैं...
आजकल इस्लामी देशों में कोहराम मचा हुआ है। मिश्च के बाद सीरिया, बहरीन, यमन और लीबिया में जमकर खून-खराबा हो रहा है। हजारों लोग मारे जा रहे हैं। खाड़ी देशों के विशेषज्ञों का कहना है कि वैसे तो यह लड़ाई बीसों साल से सत्ता पर काबिज शहंशाहों के खिलाफ है, लेकिन असली लड़ाई शिया-सुन्नियों के बीच है। इन सभी देशों में बहुमत शियाओं का है, लेकिन हुक्मरान सुन्नी हैं। इसीलिए शिया जमात सड़कों पर उतरी हुई है। कहते हैं कि आंदोलनकारियों को ईरान का समर्थन हासिल है। इराक के बारे में भी यही बात कही जाती है कि वहां आबादी शियाओं की ज्यादा थी, लेकिन सद्दाम सुन्नी था। इसी लड़ाई के बीच में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की खबर ने माहौल और गरमा दिया है। ओसामा बिन लादेन को मारने के बाद अमेरिका ने उसे समुद्र में दफन कर दिया। उसे इस बात का एहसास था कि जमीन पर दफन करने से वहां कोई मकबरा बन सकता है, जो कट्टरपंथियों के प्रेरणाश्चोत में बदल सकता है। जिस दिन अमेरिकी फौजों ने लादेन के ठिकाने पर हमला किया उस दिन मैं तुर्की में था। वहां 98 प्रतिशत मुसलमान रहते हैं। लादेन के मारे जाने की खबर सुनते ही वहां के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने इसका स्वागत किया और अमेरिका की तारीफ की। अन्य मुस्लिम देशों की भी यही प्रतिक्रिया थी। तुर्की के इतिहास से सभी वाकिफ हैं। एक जमाने में वहां कट्टरपंथी मुल्लाओं का बहुत जोर था। तब वहां के राष्ट्रपति अतातुर्क कमाल ने सारे कट्टरपंथियों का सफाया करके एक सेक्युलर माहौल बनाया और आज यह देश तरक्की की बुलंदी पर है। वहां दाढ़ी वाले कट्टरपंथी बहुत कम नजर आते हैं। मस्जिदों में साफ-सफाई का बहुत ध्यान रखा जाता है और शांतिपूर्ण ढंग से इबादत होती है। हर मजहब के लोग मस्जिदों के अंदर आते-जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि ज्यादातर मुस्लिम देश लादेन के मारे जाने पर कोई अफसोस नहीं जता रहे हैं। अब यहां सवाल उठता है कि लादेन के मारे जाने से क्या अलकायदा खत्म हो जाएगा? करीब दो महीने पहले दुबई में मेरी मुलाकात पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से हुई। उनका कहना था कि यदि कभी लादेन मारा गया तो भी उसकी विचारधारा नहीं मरेगी। असली काम उस विचारधारा को खत्म करना है। आज लादेन के मारे जाने के बाद यही सवाल अहम है और अमेरिका उसी दिशा में सोच भी रहा है। सब जानते हैं कि मुशर्रफ के जमाने में ही लादेन और तालिबानी नेता मुल्ला उमर अमेरिकी बमबारी से परेशान होकर पाकिस्तान के सीमावर्ती गांव में आकर रहने लगे थे और वहीं से अपने संगठन का काम चलाते थे। यह मानने को कोई तैयार नहीं था कि बिना आइएसआइ की जानकारी के वे वहां रह सकते थे। झगड़ा तो तब शुरू हुआ जब तालिबानों ने अपना अड्डा इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में बना लिया। परवेज मुशर्रफ को तब अपने लिए खतरे का एहसास हुआ और उन्होंने सेना से मस्जिद पर हमला करवाकर उसके अंदर छिपे मौलानाओं व आतंकवादियों को मरवा दिया। इसके बाद से मुशर्रफ कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए थे, वरना पहले उनकी पूरी मिलीभगत थी। इसी लाल मस्जिद से सिर्फ 40 मील दूर एबटाबाद में सैन्य अकादमी के पास एक घर में बिन लादेन आकर बस गया था। इसकी भी जानकारी पाक सेना और आइएसआइ को रही होगी। अलकायदा के पास अरबों डॉलर हैं, हजारों जिहादी हैं फिर भी उसके सरगना की सुरक्षा में एक भी जिहादी नहीं था। खतरे के वक्त छिपने के लिए न तो कोई बंकर था और न ही सुरंग। उसके पास फोन तक नहीं था। पड़ोसियों के मुताबिक वहां कोई आता-जाता भी नहीं था। जिन कमरों में वह रहता था वहां का बेड, सोफा, टीवी, कंप्यूटर और दरी बहुत घटिया किस्म की थीं। कुवैत और पाकिस्तानी टीवी के मुताबिक उसने अपने कपड़ों में 500 यूरो सिल रखे थे कि यदि मुसीबत में जरूरत पड़े तो किसी काम में आ जाएं। 500 यूरो का मतलब है लगभग 40 हजार रुपये। इसमें कोई शक नहीं कि अलकायदा एक बड़ा और धनी आतंकवादी संगठन है, जिसमें तमाम देशों के कट्टरपंथी मदद करते हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आखिरी दिनों में ओसामा अकेला पड़ गया था, अलकायदा उसके हाथ से निकल गया था। क्या उसका सिर्फ नाम था और अलकायदा की कमान दूसरे लोगों ने संभाल ली थी। उन्हीं दिनों खाड़ी देशों के कुछ अखबारों में मैंने इस तरह की अटकलें पढ़ीं जिनमें कयास लगाए जा रहे थे कि कुछ साल पहले अल जवाहिरी व अन्य लोगों ने ओसामा को अलकायदा से विदा कर दिया था और खुद संगठन की कमान संभाल ली थी। अल जवाहिरी आज भी पाक-अफगानिस्तान सीमा के उन्हीं पहाड़ी इलाकों में रहता है और कभी भी एबटाबाद में ओसामा के पास आते-जाते नहीं देखा गया। लोगों का अनुमान था कि लादेन की मौत के बाद अलकायदा का मुखिया अल जवाहिरी ही बनेगा, लेकिन पिछले दिनों सैफ अल अदेल को इसका प्रमुख बना दिया गया है। माना जा रहा है कि यह फैसला अल जवाहिरी की इच्छा के अनुसार ही लिया गया है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान की तालिबान व अलकायदा से मिलीभगत है। लगता है कि आइएसआइ ने दीनहीन ओसामा को तुरूप का पत्ता समझकर एबटाबाद में छिपा रखा था। पाकिस्तान ओसामा को अमेरिका को सौंपकर कोई बड़ा सौदा करना चाहता था। किंतु इस चाल में वह मात खा गया। इससे पहले यह मौका आता, अमेरिकियों ने पाकिस्तान में घुसकर लादेन को मार डाला। इस घटना से पाकिस्तान की दुनिया भर में साख गिर गई और सब उसे हिकारत की नजर से देख रहे हैं। ओसामा की मौत का सबसे ज्यादा नुकसान पाकिस्तान को हुआ। अब वह फंस गया है। कट्टरपंथी समझते हैं कि लादेन पाक की मिलीभगत से मारा गया और अमेरिका इस बात पर खफा है कि उसे पाक सरकार ने छिपा रखा था। बहरहाल, इससे फर्क नहीं पड़ता कि अलकायदा का प्रमुख कौन है। अमेरिका को इससे एक लड़ाई और लड़नी पड़ेगी। तालिबान भी दो भागों में बंट गया है। एक पाकिस्तानी तालिबान और दूसरा अफगानी तालिबान। पाक सरकार को अपने तालिबान से सावधान रहना होगा। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)
आजकल इस्लामी देशों में कोहराम मचा हुआ है। मिश्च के बाद सीरिया, बहरीन, यमन और लीबिया में जमकर खून-खराबा हो रहा है। हजारों लोग मारे जा रहे हैं। खाड़ी देशों के विशेषज्ञों का कहना है कि वैसे तो यह लड़ाई बीसों साल से सत्ता पर काबिज शहंशाहों के खिलाफ है, लेकिन असली लड़ाई शिया-सुन्नियों के बीच है। इन सभी देशों में बहुमत शियाओं का है, लेकिन हुक्मरान सुन्नी हैं। इसीलिए शिया जमात सड़कों पर उतरी हुई है। कहते हैं कि आंदोलनकारियों को ईरान का समर्थन हासिल है। इराक के बारे में भी यही बात कही जाती है कि वहां आबादी शियाओं की ज्यादा थी, लेकिन सद्दाम सुन्नी था। इसी लड़ाई के बीच में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की खबर ने माहौल और गरमा दिया है। ओसामा बिन लादेन को मारने के बाद अमेरिका ने उसे समुद्र में दफन कर दिया। उसे इस बात का एहसास था कि जमीन पर दफन करने से वहां कोई मकबरा बन सकता है, जो कट्टरपंथियों के प्रेरणाश्चोत में बदल सकता है। जिस दिन अमेरिकी फौजों ने लादेन के ठिकाने पर हमला किया उस दिन मैं तुर्की में था। वहां 98 प्रतिशत मुसलमान रहते हैं। लादेन के मारे जाने की खबर सुनते ही वहां के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने इसका स्वागत किया और अमेरिका की तारीफ की। अन्य मुस्लिम देशों की भी यही प्रतिक्रिया थी। तुर्की के इतिहास से सभी वाकिफ हैं। एक जमाने में वहां कट्टरपंथी मुल्लाओं का बहुत जोर था। तब वहां के राष्ट्रपति अतातुर्क कमाल ने सारे कट्टरपंथियों का सफाया करके एक सेक्युलर माहौल बनाया और आज यह देश तरक्की की बुलंदी पर है। वहां दाढ़ी वाले कट्टरपंथी बहुत कम नजर आते हैं। मस्जिदों में साफ-सफाई का बहुत ध्यान रखा जाता है और शांतिपूर्ण ढंग से इबादत होती है। हर मजहब के लोग मस्जिदों के अंदर आते-जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि ज्यादातर मुस्लिम देश लादेन के मारे जाने पर कोई अफसोस नहीं जता रहे हैं। अब यहां सवाल उठता है कि लादेन के मारे जाने से क्या अलकायदा खत्म हो जाएगा? करीब दो महीने पहले दुबई में मेरी मुलाकात पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से हुई। उनका कहना था कि यदि कभी लादेन मारा गया तो भी उसकी विचारधारा नहीं मरेगी। असली काम उस विचारधारा को खत्म करना है। आज लादेन के मारे जाने के बाद यही सवाल अहम है और अमेरिका उसी दिशा में सोच भी रहा है। सब जानते हैं कि मुशर्रफ के जमाने में ही लादेन और तालिबानी नेता मुल्ला उमर अमेरिकी बमबारी से परेशान होकर पाकिस्तान के सीमावर्ती गांव में आकर रहने लगे थे और वहीं से अपने संगठन का काम चलाते थे। यह मानने को कोई तैयार नहीं था कि बिना आइएसआइ की जानकारी के वे वहां रह सकते थे। झगड़ा तो तब शुरू हुआ जब तालिबानों ने अपना अड्डा इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में बना लिया। परवेज मुशर्रफ को तब अपने लिए खतरे का एहसास हुआ और उन्होंने सेना से मस्जिद पर हमला करवाकर उसके अंदर छिपे मौलानाओं व आतंकवादियों को मरवा दिया। इसके बाद से मुशर्रफ कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए थे, वरना पहले उनकी पूरी मिलीभगत थी। इसी लाल मस्जिद से सिर्फ 40 मील दूर एबटाबाद में सैन्य अकादमी के पास एक घर में बिन लादेन आकर बस गया था। इसकी भी जानकारी पाक सेना और आइएसआइ को रही होगी। अलकायदा के पास अरबों डॉलर हैं, हजारों जिहादी हैं फिर भी उसके सरगना की सुरक्षा में एक भी जिहादी नहीं था। खतरे के वक्त छिपने के लिए न तो कोई बंकर था और न ही सुरंग। उसके पास फोन तक नहीं था। पड़ोसियों के मुताबिक वहां कोई आता-जाता भी नहीं था। जिन कमरों में वह रहता था वहां का बेड, सोफा, टीवी, कंप्यूटर और दरी बहुत घटिया किस्म की थीं। कुवैत और पाकिस्तानी टीवी के मुताबिक उसने अपने कपड़ों में 500 यूरो सिल रखे थे कि यदि मुसीबत में जरूरत पड़े तो किसी काम में आ जाएं। 500 यूरो का मतलब है लगभग 40 हजार रुपये। इसमें कोई शक नहीं कि अलकायदा एक बड़ा और धनी आतंकवादी संगठन है, जिसमें तमाम देशों के कट्टरपंथी मदद करते हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आखिरी दिनों में ओसामा अकेला पड़ गया था, अलकायदा उसके हाथ से निकल गया था। क्या उसका सिर्फ नाम था और अलकायदा की कमान दूसरे लोगों ने संभाल ली थी। उन्हीं दिनों खाड़ी देशों के कुछ अखबारों में मैंने इस तरह की अटकलें पढ़ीं जिनमें कयास लगाए जा रहे थे कि कुछ साल पहले अल जवाहिरी व अन्य लोगों ने ओसामा को अलकायदा से विदा कर दिया था और खुद संगठन की कमान संभाल ली थी। अल जवाहिरी आज भी पाक-अफगानिस्तान सीमा के उन्हीं पहाड़ी इलाकों में रहता है और कभी भी एबटाबाद में ओसामा के पास आते-जाते नहीं देखा गया। लोगों का अनुमान था कि लादेन की मौत के बाद अलकायदा का मुखिया अल जवाहिरी ही बनेगा, लेकिन पिछले दिनों सैफ अल अदेल को इसका प्रमुख बना दिया गया है। माना जा रहा है कि यह फैसला अल जवाहिरी की इच्छा के अनुसार ही लिया गया है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान की तालिबान व अलकायदा से मिलीभगत है। लगता है कि आइएसआइ ने दीनहीन ओसामा को तुरूप का पत्ता समझकर एबटाबाद में छिपा रखा था। पाकिस्तान ओसामा को अमेरिका को सौंपकर कोई बड़ा सौदा करना चाहता था। किंतु इस चाल में वह मात खा गया। इससे पहले यह मौका आता, अमेरिकियों ने पाकिस्तान में घुसकर लादेन को मार डाला। इस घटना से पाकिस्तान की दुनिया भर में साख गिर गई और सब उसे हिकारत की नजर से देख रहे हैं। ओसामा की मौत का सबसे ज्यादा नुकसान पाकिस्तान को हुआ। अब वह फंस गया है। कट्टरपंथी समझते हैं कि लादेन पाक की मिलीभगत से मारा गया और अमेरिका इस बात पर खफा है कि उसे पाक सरकार ने छिपा रखा था। बहरहाल, इससे फर्क नहीं पड़ता कि अलकायदा का प्रमुख कौन है। अमेरिका को इससे एक लड़ाई और लड़नी पड़ेगी। तालिबान भी दो भागों में बंट गया है। एक पाकिस्तानी तालिबान और दूसरा अफगानी तालिबान। पाक सरकार को अपने तालिबान से सावधान रहना होगा। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)
Sunday, May 22, 2011
पाक को आनन-फानन मिलेंगे 50 जेएफ-17 थंडर चीनी विमान
चीन और पाकिस्तान के बीच तेजी से बढ़ते सैन्य सहयोग का एक और उदाहरण सामने आया है। कम्युनिस्ट शासित चीन पाकिस्तान को एक सहनिर्माण करार के तहत 50 नए जेएफ-17 थंडर बहुद्देशीय विमान देगा। इस नई आपूर्ति के बाद पाकिस्तानी वायुसेना के बेड़े में चीनी विमानों की संख्या 260 हो जाएगी। दोनों देशों के बीच रडार को चकमा देने वाली स्टील्थ तकनीक से युक्त विमानों के सौदे पर भी बात चल रही है। पाकिस्तानी समाचार पत्र डॉन ने एक अधिकारी के हवाले से कहा, चीन पाकिस्तान को अगले कुछ हफ्तों में 50 जेएफ-17 थंडर विमान मुहैया कराएगा। दोनों देश पहले से ही जेएफ-17 विमान का मिलकर निर्माण कर रहे हैं, लेकिन ये नए 50 विमान उच्च श्रेणी के और अत्याधुनिक होंगे। दोनों देश रडार की निगाह से बचने की तकनीक से लैस जे-20 स्टील्थ विमान और जियालोंग एफसी-1 बहुउद्देशीय विमान पर भी बात कर रहे हैं। इसके अलावा चीन आगामी 14 अगस्त को पाकिस्तान के लिए एक उपग्रह का प्रक्षेपण करेगा। यह उपग्रह पाकिस्तान को विभिन्न क्षेत्रों की जानकारी उपलब्ध कराएगा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी चार दिनों की यात्रा पर चीन गए हैं। उनकी यह यात्रा अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मारे जाने के तुरंत बाद हुई है। अमेरिकी कमांडो दस्ते ने दो मई को इस्लामाबाद से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एबटाबाद में लादेन को मार गिराया। पाकिस्तान की संप्रभुता को मान दे अमेरिका : चीन अमेरिकी नौसेना कमांडो सील द्वारा पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मारने के संदर्भ में चीन ने चेतावनी दी है कि पाकिस्तान पर किए गए किसी भी हमले को चीन पर हमले की तरह समझा जाएगा। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह संदेश पिछले सप्ताह अमेरिका के दौरे पर आए चीन के विदेश मंत्री की ओर से दिया गया। पाकिस्तान के प्रमुख समाचार पत्र द न्यूज डेली ने कूटनीतिक सूत्रों के हवाले से कहा चीन ने अमेरिका को पाकिस्तान की संप्रभुता और एकजुटता का सम्मान करने की भी नसीहत दी। दूसरी ओर चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने अपने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को बुधवार को ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में अपनी औपचारिक बातचीत के दौरान अमेरिका के साथ उठाए गए मामलों के बारे में जानकारी दी। चीन ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि पाकिस्तान पर किए गए किसी भी हमले को चीन पर किए गए हमले की तरह समझा जाएगा। वहीं गिलानी ने पाकिस्तान और चीन मित्रता को अद्भुत करार दिया।
Thursday, May 19, 2011
भ्रम से बाहर आए अमेरिका
पाकिस्तान की बौखलाहट अब सीमा पार कर चुकी है। पहले पाकिस्तान के विदेश सचिव ने आक्रामक बयान दिया कि यदि भारत अमेरिका की तरह कोई कार्रवाई करेगा तो उसका मुंहतोड़ जवाब देंगे और अब आईएसआई के मुखिया शुजा पाशा ने कह दिया कि यदि भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध कोई दुस्साहस किया तो उसे पता होना चाहिए कि पाकिस्तान के पास कितने परमाणु बम हैं। ये दोनों बयान बिल्कुल अनावश्यक और असंगत हैं। ओसामा बिन लादेन के सफाए पर भारत के प्रधानमंत्री ने जितनी संतुलित प्रतिक्रिया की, अगर उनकी जगह इस्रइल के प्रधानमंत्री होते तो पता नहीं क्या-क्या कहते? सचाई तो यह है कि पाकिस्तान की मिट्टी पलीत करने का यह अनुपम अवसर भारत सरकार ने अपने हाथ से गंवा दिया। यदि भारत में कोई राजनीतिक प्रधानमंत्री होता तो पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित करवाने के लिए कमर कस लेता। पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर को कम से कम डॉ. मनमोहन सिंह से यह तो सीखना चाहिए था कि कोई नौकरशाह प्रधानमंत्री बन जाने पर भी कितना संयमित रहता है। बशीर ने दूसरी गलती यह की कि भारत के सेनाध्यक्ष को उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मान लिया। भारत पाकिस्तान नहीं है। यदि भारतीय सेना-प्रमुख ने एक सवाल के जवाब में कह दिया कि ऐबटाबाद जैसी कार्रवाई करने की क्षमता भारत में भी है तो इसका अर्थ यह तो नहीं हुआ कि भारत वैसी कार्रवाई करना चाहता है। अपनी काबुल-यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने ऐसी कार्रवाई की सम्भावना से साफ इनकार किया है। जहां तक पाशा का सवाल है, या तो उनका दिमाग फिर गया है या वे अपनी खाल बचाने के लिए डींग मार रहे हैं। ओसामा को लेकर जितनी बेइज्जती पाकिस्तानी फौज और गुप्तचर संगठन, आईएसआई की हुई है, उतनी पहले कभी नहीं हुई। इन दोनों संगठनों को हवा भी नहीं लगी और ओसामा को मारकर अमेरिकी ले गए, इसका एक अर्थ यह भी है कि पाकिस्तान के परमाणु- भंडारों का भी किसी दिन यही हश्र हो सकता है। इसी घबराहट के कारण शुजा पाशा ने परमाणु-आक्रमण की धमकी भारत को दे दी। पाशा भूल गए कि जवाबी हमले में पाकिस्तान का नामोनि शान भी मिट सकता है। इतनी मूर्खतापूर्ण बात भारत में न तो कोई सोचता है और न ही आज तक किसी ने वैसा कहा है। यहां इसका उलटा है। भारत ने घोषणा की है कि वह आगे होकर परमाणु -आक्रमण कदापि नहीं करेगा। उचित तो यह होगा कि पाशा अपने अतिवादी बयान के लिए पाक की जनता से माफी मांगें क्योंकि आखिरकार सबसे ज्यादा नुकसान उसका ही होगा। इस तरह के बयान इसीलिए आ रहे हैं कि पाकिस्तान का सैन्य-सामंती प्रतिष्ठान अब पूरी तरह से निर्वस्त्र हो गया है। जिस अमेरिका को बुद्धू बनाकर उसने अपनी दुकान अब तक जमा रखी थी, अब उसकी आंखें खुल गई हैं। अमेरिकी नीतिनि र्माताओं को पाकिस्तान की दोमुंही चालों का पता चल गया था लेकिन अमेरिकी करदाताओं की नज़र से वह पहली बार गिरा है। इसी का परिणाम है कि अमेरिकन कांग्रेस में दो-दो विधेयक पेश हो गए हैं, जिनका लक्ष्य ओसामा को छिपाए रखने में पाकिस्तान की भूमिका का पता करना है और पाकिस्तान को दी जा रही मदद में कटौती करना है। फिलहाल, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता कि वास्तव में पाकिस्तान को मिल रही अमेरिकी रिश्वत में से कोई कटौती होगी या नहीं क्योंकि अमेरिका अब भी पाकिस्तान पर निर्भर है। अब भी वह शायद यह नहीं मानता कि पाकिस्तान उसकी पीठ में छुरा भोंक रहा है। अब भी उसे पता नहीं चल रहा है कि आतंकवाद अब पाक के लिए बाकायदा एक धंधा बन गया है। यदि आतंकवाद बरकरार रहता है तो पाकिस्तानी फौज का झंडा ऊंचा रहेगा और चरमराती हुई अर्थव्यवस्था को अमेरिका का ठेका मिलता रहेगा। पाकिस्तान के बारे में अमेरिकी विदेश नीति बिल्कुल दिवालिया सिद्ध हो गई है। अमेरिका अब भी तय नहीं कर पाया है कि वह अफगानिस्तान में क्या करेगा? अपनी फौजें वह वहां से कैसे निकालेगा? अमेरिकियों के निकल जाने के बाद हामिद करजई सरकार को कौन टिकाए रखेगा? सीनेट के विदेशी सम्बन्धों की कमेटी के अध्यक्ष जॉन केरी इस्लामाबाद और काबुल हो आए हैं। कुछ अन्य अफसर और कूटनीतिज्ञ भी वहां जा रहे हैं। विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भी जाएंगी लेकिन होगा क्या? अमेरिका की तरफ से शायद कुछ न हो। लेकिन पाकिस्तान अमेरिका से ज्यादा चतुर निकला। चीन की तरफ खुली हुई खिड़की को उसने दरवाजा बनाना ओसामा-कांड के पहले से ही शुरू कर दिया था। अब से तीन हफ्ते पहले काबुल जाकर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री, सैन्य-प्रमुख और गुप्तचर प्रमुख ने हामिद करज़ई को सलाह दी थी कि अब वे चीन का पल्ला पकड़ लें क्योंकि अमेरिका तो पिंड छुड़ाकर भागनेवाला ही है। चीन से पूछे बिना यह सलाह नहीं दी जा सकती थी। यों भी चीन ने अफगानिस्तान में तीन बिलियन डालर लगाकर तांबे की खदान खरीदी है। इस समय पाक प्रधानमंत्री चीन में हैं और कह रहे हैं कि ओसामा-कांड चीन की मैत्रीपूर्ण प्रतिक्रिया अद्वितीय है। चीन की प्रतिक्रिया ने अमेरिकी घावों पर नमक छिड़क दिया है, इसकी चिंता पाकिस्तान को जरा भी नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान सिर्फ एक ही खूंटे से बंधा है, जिसका नाम है, भारत-भय! उसे डर है कि अमेरिकी-वापसी की बेला में काबुल में कहीं भारत का वर्चस्व न हो जाए। नवाज शरीफ ने यह कहकर बड़ी बहादुरी दिखाई है कि पाकिस्तान भारत को अपना दुश्मन नम्बर एक समझना बंद करे। पाकिस्तान के नेताओं को अगर यह बुनियादी बात अब समझ में आ रही है तो मानना पड़ेगा कि अब पाकिस्तान के दिन फिरेंगे। असली सत्ता फौज के हाथ से खिसक कर सरकार और संसद के पास आ सकती है। यदि ऐसा हुआ तो पाकिस्तान के सैन्य-सामंती प्रतिष्ठान का रुतबा घटेगा और भारत-भय की गांठ भी खुलेगी। यह तभी होगा, जब अमेरिका की नींद खुलेगी। यदि अमेरिका अब भी पाक को अपना प्रिय दलाल मानता रहेगा तो यह निश्चित जानिए कि जैसे वह आज जिहादी आतंकवाद के मूल पिता के रूप में जाना जाता है, वैसे ही वह कभी परमाणु-सर्वनाश के पोषक और संरक्षक के रूप में जाना जाएगा।
भारी पड़ता अमेरिकी स्वार्थ
लेखक पाकिस्तान के संदर्भ में अमेरिकी नीति में किसी बुनियादी बदलाव की आशा नहीं कर रहे हैं…
आतंकवाद से लड़ने में पाकिस्तान का दोहरा चेहरा उजागर होने के बावजूद इस देश के प्रति दशकों पुरानी अमेरिकी नीति में किसी मूलभूत परिवर्तन की उम्मीद नहीं है। यहां तक कि पाक सेना के प्रमुख ठिकाने एबटाबाद में छह साल से रहने वाले ओसामा बिन लादेन को मार गिराने में अमेरिकी हेलीकॉप्टरों के साहसिक कारनामे के बाद वाशिंगटन ने इस्लामाबाद से महज कुछ कड़े सवाल ही पूछे हैं और लादेन की तीन विधवाओं से पूछताछ की अनुमति की ही इच्छा प्रकट की है। उसने पाकिस्तान के उद्दंड सैन्य प्रतिष्ठान को अनुशासित करने के लिए कुछ नहीं किया है। अमेरिका ने केवल एक बार (9/11 के बाद) ही निर्णायक कदम उठाया था। पूर्व पाकिस्तानी सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ के अनुसार, तब विदेश उपमंत्री रिचर्ड आर्मिटेज ने इस्लामाबाद को अफगानिस्तान में तालिबान शासन की सहायता से बाज आने के लिए धमकी देते हुए कहा था कि अगर वह नहीं माना तो पाकिस्तान को पाषाण युग में पहुंचा दिया जाएगा। इस धमकी ने तुरंत काम किया, किंतु अफगानिस्तान में सत्ता बदलने के बाद पाकिस्तान ने फिर धीमे-धीमे तालिबान को सहायता देनी शुरू कर दी। वास्तव में, अब्दुल कादिर खान के परमाणु तस्करी के खुलासे के बाद अमेरिका ने लीबिया, उत्तर कोरिया और ईरान में परमाणु प्रसार के जिम्मेदार पाक सैन्य प्रतिष्ठान को दंडित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया और सारा दोष एक व्यक्ति के मत्थे मढ़ दिया। अभी तक एक्यू खान से किसी अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी एजेंसी ने पूछताछ तक नहीं की है। अब विश्व के मोस्ट वांटेड आतंकी को पाकिस्तान की प्रमुख सैन्य अकादमी के बगल में पाकर भी अमेरिका पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ को आतंकी व जिहादी समूहों से संबंध तोड़ने को मजबूर करने का मौका गंवा रहा है। अमेरिका अफगानिस्तान युद्ध में अपने संकीर्ण लक्ष्यों की पूर्ति के लिए जरूरी, किंतु मुश्किल साझेदार पाकिस्तान को साधने का प्रयास कर रहा है। अल्पकालिक राजनीतिक निहित स्वार्थो ने अमेरिकी नीति को हमेशा पाकिस्तान के प्रति नरम रखा है। पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ में दशकों से भारी निवेश के हैरतअंगेज परिणाम सामने हैं। इस बीच पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद की धुरी के रूप में उभरा है। पाकिस्तान ऐसे जिहादी समूहों का गढ़ बन गया है जो मजहब के पवित्र औजार के तौर पर खुलेआम हिंसा का प्रवचन देते हैं। पाकिस्तान में इस्लामिक उग्रवाद और अमेरिकी विरोध का ज्वार बढ़ता जा रहा है। पाक जनरल अब भी आतंकी समूहों को पोषित कर रहे हैं। 2008 में मुंबई आतंकी हमला निश्चित तौर पर पाकिस्तान के दोनों दावों का झूठ उजागर करता है कि पाक के सत्ता संस्थानों का इस हमले में कोई योगदान नहीं था और पाकिस्तान तो खुद ही आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार है। असलियत यह है कि पाकिस्तान खुद के प्रायोजित आतंक का शिकार है और लश्करे-तैयबा जैसे आतंकी संगठन पाकिस्तानी सेना के मोहरे भर हैं। लादेन प्रकरण ने पाकिस्तानी सेना को नंगा कर दिया है। अगर लादेन शहरी क्षेत्र में छिप कर रहना चाहता तो उसके पास बहुत से विकल्प थे। एक ऐसे शहर में शरण लेना जहां प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठान होने के नाते चप्पे-चप्पे पर चौकसी थी, यही साबित करता है कि उसे पाकिस्तानी सेना या खुफिया एजेंसी का समर्थन हासिल था। पाकिस्तानी सेना की नाक के नीचे बिन लादेन का शिकार करके और पाकिस्तानी वायुसेना में सेंध लगाकर वहां सैन्य कार्रवाई को अंजाम देकर अमेरिका ने पाकिस्तान पर वर्चस्व पर मुहर लगा दी है। इस प्रक्रिया में देश के रक्षक होने का दावा करने वाले प्रतिष्ठान-पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ की प्रतिष्ठा घर में ही मिट्टी में मिल चुकी है। आखिरकार, पाकिस्तान के बीचोबीच चालीस मिनट का सैन्य अभियान चलाकर अमेरिका ने दिखा दिया है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार भी अमेरिकी पहुंच से बाहर नहीं हैं। इससे पाकिस्तान के प्रमुख सत्ता दलालों और उग्रवादी समूहों को एक कड़ा संदेश मिला है। यह आतंक के प्रायोजकों को दोहरा आघात है कि वाशिंगटन ने इस्लामाबाद के साथ अपने दीर्घकालिक संबंधों की भी परवाह न करते हुए लादेन के खात्मे की सीधी कार्रवाई की, पाकिस्तान को बताए बिना वहां अनेक सीआइए एजेंटों, विशेष बलों और ठेकेदारों को तैनात किया। लादेन अभियान से मात्र एक सप्ताह पहले ही कियानी और पाशा अमेरिका से मांग कर रहे थे कि पाकिस्तान से सीआइए एजेंटों और ठेकेदारों को वापस बुला लिया जाए। वे नहीं चाहते थे कि सीआइए एजेंट पाकिस्तान के कोने-कोने में खुफिया जानकारी जुटाते फिरें, लेकिन इस अभियान से सीआइए की प्रभावी खुफिया कुशलता और कार्यात्मक क्षमताओं ने उन मित्रवत संबंधों को तोड़ दिया, जिनके तहत पाक सैन्य व खुफिया अधिकारी आतंकियों को प्रोत्साहित और पोषित करते थे। अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सदस्य पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिका सहायता पर सवाल उठा रहे हैं। यह सहायता अब प्रतिवर्ष तीन अरब डॉलर पर पहुंच गई है, किंतु कटु सत्य यह है कि पाकिस्तान में जिहादी तत्वों की पकड़ जितनी मजबूत हुई है उसे मिलनी वाली अमेरिकी सहायता में उतनी ही अधिक वृद्धि हुई है। राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में पाकिस्तान इजरायल को पीछे छोड़कर सबसे अधिक अमेरिकी सहायता पाने वाला देश बन गया है। अमेरिका के पास पाकिस्तान में आतंकी ढांचे और सरकारी व गैर-सरकारी अभिनेताओं के बीच मधुर संबंधों के पर्याप्त साक्ष्य हैं। समस्या यह है कि अमेरिकी नीति अल्पकालिक क्षेत्रीय हितों से निर्देशित है। वाशिंगटन को लगता है कि अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से विदाई, 2014 के बाद के अफगानिस्तानी परिदृश्य और ईरान पर दबाव बनाने में पाकिस्तान का सहयोग बहुत जरूरी है। अफगान युद्ध में ओबामा के संकीर्ण लक्ष्यों ने अमेरिका की पाकिस्तान पर निर्भरता को बढ़ा दिया है। अब ओबामा चाहते हैं कि पाकिस्तान तालिबानी जनरलों को वार्ता की मेज पर लाने को बाध्य करे। यद्यपि तालिबान का जन्मदाता आइएसआइ है, किंतु नौवें दशक में इसका लालन-पालन सीआइए ने ही किया। इसीलिए अमेरिका को लगता है कि अपने पूर्व सहयोगी के साथ मेलमिलाप संभव है। इस पृष्ठभूमि में पाक-अमेरिका संबंधों के उलझे धागों को सुलझाने के बजाए लादेन प्रकरण ने इन्हें और उलझा दिया है। पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान के कुछ लोग अमेरिका को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि यह सब आइएसआइ में शामिल कुछ दुष्ट तत्वों का किया धरा है, जबकि सच्चाई यह है कि पूरी आइएसआइ ही दुष्ट है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
आतंकवाद से लड़ने में पाकिस्तान का दोहरा चेहरा उजागर होने के बावजूद इस देश के प्रति दशकों पुरानी अमेरिकी नीति में किसी मूलभूत परिवर्तन की उम्मीद नहीं है। यहां तक कि पाक सेना के प्रमुख ठिकाने एबटाबाद में छह साल से रहने वाले ओसामा बिन लादेन को मार गिराने में अमेरिकी हेलीकॉप्टरों के साहसिक कारनामे के बाद वाशिंगटन ने इस्लामाबाद से महज कुछ कड़े सवाल ही पूछे हैं और लादेन की तीन विधवाओं से पूछताछ की अनुमति की ही इच्छा प्रकट की है। उसने पाकिस्तान के उद्दंड सैन्य प्रतिष्ठान को अनुशासित करने के लिए कुछ नहीं किया है। अमेरिका ने केवल एक बार (9/11 के बाद) ही निर्णायक कदम उठाया था। पूर्व पाकिस्तानी सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ के अनुसार, तब विदेश उपमंत्री रिचर्ड आर्मिटेज ने इस्लामाबाद को अफगानिस्तान में तालिबान शासन की सहायता से बाज आने के लिए धमकी देते हुए कहा था कि अगर वह नहीं माना तो पाकिस्तान को पाषाण युग में पहुंचा दिया जाएगा। इस धमकी ने तुरंत काम किया, किंतु अफगानिस्तान में सत्ता बदलने के बाद पाकिस्तान ने फिर धीमे-धीमे तालिबान को सहायता देनी शुरू कर दी। वास्तव में, अब्दुल कादिर खान के परमाणु तस्करी के खुलासे के बाद अमेरिका ने लीबिया, उत्तर कोरिया और ईरान में परमाणु प्रसार के जिम्मेदार पाक सैन्य प्रतिष्ठान को दंडित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया और सारा दोष एक व्यक्ति के मत्थे मढ़ दिया। अभी तक एक्यू खान से किसी अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी एजेंसी ने पूछताछ तक नहीं की है। अब विश्व के मोस्ट वांटेड आतंकी को पाकिस्तान की प्रमुख सैन्य अकादमी के बगल में पाकर भी अमेरिका पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ को आतंकी व जिहादी समूहों से संबंध तोड़ने को मजबूर करने का मौका गंवा रहा है। अमेरिका अफगानिस्तान युद्ध में अपने संकीर्ण लक्ष्यों की पूर्ति के लिए जरूरी, किंतु मुश्किल साझेदार पाकिस्तान को साधने का प्रयास कर रहा है। अल्पकालिक राजनीतिक निहित स्वार्थो ने अमेरिकी नीति को हमेशा पाकिस्तान के प्रति नरम रखा है। पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ में दशकों से भारी निवेश के हैरतअंगेज परिणाम सामने हैं। इस बीच पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद की धुरी के रूप में उभरा है। पाकिस्तान ऐसे जिहादी समूहों का गढ़ बन गया है जो मजहब के पवित्र औजार के तौर पर खुलेआम हिंसा का प्रवचन देते हैं। पाकिस्तान में इस्लामिक उग्रवाद और अमेरिकी विरोध का ज्वार बढ़ता जा रहा है। पाक जनरल अब भी आतंकी समूहों को पोषित कर रहे हैं। 2008 में मुंबई आतंकी हमला निश्चित तौर पर पाकिस्तान के दोनों दावों का झूठ उजागर करता है कि पाक के सत्ता संस्थानों का इस हमले में कोई योगदान नहीं था और पाकिस्तान तो खुद ही आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार है। असलियत यह है कि पाकिस्तान खुद के प्रायोजित आतंक का शिकार है और लश्करे-तैयबा जैसे आतंकी संगठन पाकिस्तानी सेना के मोहरे भर हैं। लादेन प्रकरण ने पाकिस्तानी सेना को नंगा कर दिया है। अगर लादेन शहरी क्षेत्र में छिप कर रहना चाहता तो उसके पास बहुत से विकल्प थे। एक ऐसे शहर में शरण लेना जहां प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठान होने के नाते चप्पे-चप्पे पर चौकसी थी, यही साबित करता है कि उसे पाकिस्तानी सेना या खुफिया एजेंसी का समर्थन हासिल था। पाकिस्तानी सेना की नाक के नीचे बिन लादेन का शिकार करके और पाकिस्तानी वायुसेना में सेंध लगाकर वहां सैन्य कार्रवाई को अंजाम देकर अमेरिका ने पाकिस्तान पर वर्चस्व पर मुहर लगा दी है। इस प्रक्रिया में देश के रक्षक होने का दावा करने वाले प्रतिष्ठान-पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ की प्रतिष्ठा घर में ही मिट्टी में मिल चुकी है। आखिरकार, पाकिस्तान के बीचोबीच चालीस मिनट का सैन्य अभियान चलाकर अमेरिका ने दिखा दिया है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार भी अमेरिकी पहुंच से बाहर नहीं हैं। इससे पाकिस्तान के प्रमुख सत्ता दलालों और उग्रवादी समूहों को एक कड़ा संदेश मिला है। यह आतंक के प्रायोजकों को दोहरा आघात है कि वाशिंगटन ने इस्लामाबाद के साथ अपने दीर्घकालिक संबंधों की भी परवाह न करते हुए लादेन के खात्मे की सीधी कार्रवाई की, पाकिस्तान को बताए बिना वहां अनेक सीआइए एजेंटों, विशेष बलों और ठेकेदारों को तैनात किया। लादेन अभियान से मात्र एक सप्ताह पहले ही कियानी और पाशा अमेरिका से मांग कर रहे थे कि पाकिस्तान से सीआइए एजेंटों और ठेकेदारों को वापस बुला लिया जाए। वे नहीं चाहते थे कि सीआइए एजेंट पाकिस्तान के कोने-कोने में खुफिया जानकारी जुटाते फिरें, लेकिन इस अभियान से सीआइए की प्रभावी खुफिया कुशलता और कार्यात्मक क्षमताओं ने उन मित्रवत संबंधों को तोड़ दिया, जिनके तहत पाक सैन्य व खुफिया अधिकारी आतंकियों को प्रोत्साहित और पोषित करते थे। अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सदस्य पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिका सहायता पर सवाल उठा रहे हैं। यह सहायता अब प्रतिवर्ष तीन अरब डॉलर पर पहुंच गई है, किंतु कटु सत्य यह है कि पाकिस्तान में जिहादी तत्वों की पकड़ जितनी मजबूत हुई है उसे मिलनी वाली अमेरिकी सहायता में उतनी ही अधिक वृद्धि हुई है। राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में पाकिस्तान इजरायल को पीछे छोड़कर सबसे अधिक अमेरिकी सहायता पाने वाला देश बन गया है। अमेरिका के पास पाकिस्तान में आतंकी ढांचे और सरकारी व गैर-सरकारी अभिनेताओं के बीच मधुर संबंधों के पर्याप्त साक्ष्य हैं। समस्या यह है कि अमेरिकी नीति अल्पकालिक क्षेत्रीय हितों से निर्देशित है। वाशिंगटन को लगता है कि अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से विदाई, 2014 के बाद के अफगानिस्तानी परिदृश्य और ईरान पर दबाव बनाने में पाकिस्तान का सहयोग बहुत जरूरी है। अफगान युद्ध में ओबामा के संकीर्ण लक्ष्यों ने अमेरिका की पाकिस्तान पर निर्भरता को बढ़ा दिया है। अब ओबामा चाहते हैं कि पाकिस्तान तालिबानी जनरलों को वार्ता की मेज पर लाने को बाध्य करे। यद्यपि तालिबान का जन्मदाता आइएसआइ है, किंतु नौवें दशक में इसका लालन-पालन सीआइए ने ही किया। इसीलिए अमेरिका को लगता है कि अपने पूर्व सहयोगी के साथ मेलमिलाप संभव है। इस पृष्ठभूमि में पाक-अमेरिका संबंधों के उलझे धागों को सुलझाने के बजाए लादेन प्रकरण ने इन्हें और उलझा दिया है। पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान के कुछ लोग अमेरिका को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि यह सब आइएसआइ में शामिल कुछ दुष्ट तत्वों का किया धरा है, जबकि सच्चाई यह है कि पूरी आइएसआइ ही दुष्ट है। (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
अब डोजियर से नहीं बनेगी बात
भारत ने एक बार फिर पाकिस्तान पर सख्ती दिखाते हुए उन 50 मोस्ट वांटेड की सूची दी है, जो भारत में तो अपराधी हैं, पर पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। भारत मोस्ट वांटेड की सूची पाकिस्तान को देता है और वह उसे रद्दी की टोकरी में डाल देता है। पाकिस्तान तो अब अमेरिका के खिलाफ भी गरजने लगा है। ऐसे में वह भारत की सुनेगा, इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव भारतीय राजनीति का एक कमजोर पहलू रहा है। इसीलिए भारत हर मोर्चे पर मात खा रहा है। यही भारत कसाब को कबाब खिला रहा है, उधर पाकिस्तानी जेलों में बरसों से बंद भारतीय अन्न के दाने को तरस रहे हैं। आखिर ऐसा कब तक सहन करेगी भारतीय जनता? पाकिस्तान यदि सभी मोस्ट वांटेड भारत को सौंप भी दे तो उन पर इतना लंबा मुकदमा चलेगा कि आज की पीढ़ी को यह पता भी नहीं चल पाएगा कि उन्हें क्या और कितनी सजा हुई। भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी ने अपने समय में जिसजिंदादिली का परिचय दिया था, वैसा साहस आज के किसी भी नेता में दिखाई नहीं देता। वह एक ऐसी महिला थीं, जो अपनी दृढ़ता के कारण पहचानी जाती थीं। उसके बाद किसी भी पार्टी में ऐसा कद्दावर नेता दिखाई नहीं दिया, जो अपने दम पर पार्टी और सरकार चला ले। आपातकाल के बाद इंदिरा जी को सत्ता से हटना पड़ा। सत्ता से दूर होने के बाद भी उनकी दृढ़ता कायम रही। उसके बाद उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ वापसी भी की। उनके जैसी दृढ़ संकल्पित महिला भारतीय राजनीति में नहीं उभरी। उसके बाद कई सरकारें आई-गई, मिली-जुली सरकार का जमाना आया, लेकिन वह साहस और दूरदर्शिता किसी में दिखाई नहीं दिया। यही कारण है कि पिछले 20 वर्षो में किसी भी आतंकी को सजा नहीं दी गई। इसमें वोट की मजबूरी भी शामिल है। आतंकवाद के मामले में अमेरिका की सख्ती की आज चारों तरफ चर्चा है। उसने 9/11 हमले के मुख्य आरोपी को उसके घर में घुसकर मार डाला। कहां अमेरिका और कहां पाकिस्तान। अमेरिका की सख्ती ही उसके काम आई। यहां हमारे देश में ही छिपे आतंकवादियों को हम नहीं पहचान पा रहे हैं। यही नहीं, उन्हें पनाह देने वाले भी हमारे ही बीच से हैं, पर हम कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। कसाब का मामला जब भी सामने आता है, तब यह नहीं देखा जाता कि अब तक उसे जिंदा रखने के लिए देश के कितने करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। कसाब के साथियों की लाश को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में ही लाखों रुपये खर्च हो गए। इतनी राशि तो अभी तक हमारे जांबाज अधिकारियों को पेंशन में भी नहीं दी गई होगी। पिछले दो दशक में किसी भी सरकार ने ऐसी कोई सख्ती नहीं दिखाई, जिससे हमारे सैन्य अधिकारियों और पुलिस का मनोबल ऊंचा हो। 1993 में मुंबई बम धमाकों को 26/11 के बाद भारत में अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जाता है। 300 से अधिक लोगों की मौत और 700 से अधिक को घायल करने वाले एक के बाद एक 12 धमाकों ने देश की आर्थिक राजधानी को हिलाकर रख दिया था, लेकिन अभी तक इसके एक भी आरोपी को सजा नहीं हो पाई है। आतंकी हमले के 13 साल बाद 2006 में विशेष टाडा कोर्ट का फैसला आया भी तो सजा पाने वाले दोषियों ने उसके खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में अपील कर दी, जहां अब तक सुनवाई चल रही है। वैसे हकीकत यह भी है कि हमले की जांच करने वाली सीबीआइ अब तक मुख्य आरोपी दाऊद समेत 35 दूसरे आरोपियों को गिरफ्तार तक नहीं कर पाई है। अपने यहां लादेन के छिपे होने की बात सिरे से खारिज करने वाला पाकिस्तान अन्य आतंकियों के बारे में भी यही राग अलापता है। मुंबई बम विस्फोट, कांधार कांड, संसद पर आतंकी हमले, जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों की साजिश रचने और खालिस्तानी आतंकी संगठनों के कई कुख्यात आतंकी सरगना पाकिस्तान में शरण लिए हुए हैं, जिनकी भारत सरकार को तलाश है। सबूत इकट्ठा करना, उसे दुनिया को दिखाते रहना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात तो यह है कि सबूत इकट्ठा कर उसे किसी को न बताना और सीधे दुश्मन के घर में घुसकर उसे खत्म कर देना। जिस इच्छाशक्ति की देश को आज आवश्यकता है, उसे प्राप्त करने में काफी वक्त लगेगा। तब तक हम सब्र के बांध ही बनाते रहेंगे। पल्लू पकड़ राजनीति से सबकी नैया तो पार नहीं हो सकती। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
भारत क्यों न करे अमेरिका जैसी कार्रवाई
एबटाबाद कार्रवाई में अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद भारत ने पाकिस्तान को अपने 50 भगौड़ों की सूची सौंप दी है। भारतीय विदेश मंत्रालय इसे अपनी कूटनीतिक जीत मान रहा है। उसे लगता है कि इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान की पहचान आतंकी पनाहगाह के तौर पर और मजबूत होगी। इसलिए सूची में 26/11 मुंबई हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद, लखवी और मुंबई सीरियल ब्लास्ट का आरोपी दाऊद इब्राहिम और उसके 21 गुर्गे के नाम शामिल हैं। बेशक इस बहाने भारत दुनिया को यह जताने में सफल हुआ है कि भारत के 50 भगौड़े पाकिस्तान में छुपे हुए हैं, लेकिन इससे भारत ने अपनी केस स्टडी को कमजोर बना लिया है। यकायक अपने सारे तुरुप के पत्ते खोलकर भारत कूटनीतिक विफलता की दिशा में है। सवाल यह नहीं है कि आखिर इन भगौड़ों की सूची सौंपकर हमें क्या मिलेगा? सवाल यह है कि हमने अपने इरादे पाकिस्तान के सामने जाहिर क्यों किए? आखिर कब तक हम डोजियर पर डोजियर और लिस्ट पर लिस्ट सौंपते रहेंगे? शायद इन्हीं गलतियों की वजह से पाकिस्तान हमें संजीदगी से नहीं लेता है। हाल ही में पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने कहा कि 26/11 हमले को भारत को भुला देना चाहिए। यह काफी पुराना मसला है। जरा सोचिए, जब अमेरिका 9/11 वर्ल्ड टेड्र टॉवर हमले को नहीं भुला सका तो हम कैसे भुला दें। जब अमेरिका अपने शहीदों के साथ इंसाफ कर सकता है तो हमें भी अपने शहीदों के साथ इंसाफ करने का हक है। सरकार की इस सूची से कूटनीतिक दबाव बने या नहीं, लेकिन पाकिस्तान पहले से ज्यादा सतर्क हो जाएगा। दाऊद और हाफिज सईद जैसे आतंकी ठिकाने बदलने में सफल हो जाएंगे। मुमकिन है कि कई आतंकी दूसरे देश का रुख करें। ऐसे में आतंकियों की तलाश और कठिन हो जाएगी। बड़ी मुश्किल से भारतीय खुफिया विभागों ने इन आतंकियों के ठिकानों को चिह्नित किया है। यह भी मुमकिन है कि आइएसआइ और पाकिस्तानी फौज इनमें से कुछ आतंकियों को भूमिगत कर दे, जैसा कि ओसामा बिन लादेन के साथ किया था। अंग्रेजी में एक मुहावरा है, ऐक्शन स्पीक्स लाउडर दैन वर्ड यानी कार्रवाई शब्दों से ज्यादा असर करती है। भारत-पाकिस्तान के रिश्ते में इसे अमल करने की जरूरत है। यहां इसका मतलब युद्ध से नहीं निकाला जाए। इसे आतंकियों पर कार्रवाई तक ही सीमित रखने की जरूरत है। अगर हमारी खुफिया एजेंसी और सेना पाकिस्तान में दाऊद को मार गिराती है तो दुनिया को खुद-ब-खुद पता चल जाएगा कि दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान में छुपा था। इसके बाद क्या होगा? दुनिया जानती है कि दाऊद आतंकवादी है और भारत के लिए गुनाहगार है और खतरा भी। इसलिए अमेरिका की तरह हम पर भी कोई अंगुली नहीं उठाएगा। उधर, पाकिस्तान इसे अपनी संप्रभुता पर चोट मानते हुए अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने चीखेगा-चिल्लाएगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने यह जरूर मानेगा कि दाऊद आतंकी था और पाकिस्तान आतंकवादियों के साथ नहीं है। यहां पर भारत को बहुत बड़ी जीत मिलेगी, कूटनीतिक स्तर पर भी और सामरिक स्तर पर भी। तो जरूरत अमेरिका की तरह ही पाक में छुपे आतंकियों पर वार करने की है। डोजियर और लिस्ट से पाकिस्तान के कान में जूं रेंगने वाली नहीं है। देखा जाए तो पिछले तीस सालों से पाकिस्तान को लेकर हमारा रवैया नहीं बदला है। 30 साल इसलिए कि 1970 के दौरान पाकिस्तान ने पंजाब में सिख आतंकवाद को जन्म दिया। तब से लेकर अब तक हमारी स्ट्रैटजिक एंड टेक्टिकल टेक्नीक पाकिस्तान की गुलाम हो गई है। हम सारी तैयारियां, सारी विदेश नीतियां और सारे हथियारों की खरीद पाकिस्तान को ध्यान में रखकर करते हैं, लेकिन एक बार भी सीमापार हमने गोली नहीं चलाई। बस रक्षात्मक रवैया अपनाकर किलेबंदी में जुटे हैं। इसका क्या असर हुआ है, इसे समझने की जरूरत है। हमारा एक और पड़ोसी मुल्क चीन इस दरम्यान हमसे विकास की दौड़ में काफी आगे निकल गया। वह जब चाहता है, हमें घुड़की दे देता है। यही नहीं, दूसरे तमाम पड़ोसी मुल्कों से हमारे संबंध उतार-चढ़ाव भरे हो गए हैं। क्योंकि हम पाकिस्तान के पैतरों से बाहर निकल नहीं पाए हैं। भारत की अब तक की तमाम सरकारों का मानना रहा है कि पाकिस्तान पर दबाव बनाया जाना चाहिए। इसके लिए कभी बातचीत का सहारा लिया जाता है तो कभी अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को नजरअंदाज किया जाता है। क्या अच्छा यह नहीं होता कि पाकिस्तान से सीधा संवाद किया जाए। उसे डराया या धमकाया जाए। इस बार लादेन पर हमले के बाद भारतीय सेनाध्यक्ष की ओर से बयान आया कि भारत भी इस तरह के हमले के लिए तैयार है। सेनाध्यक्ष का बयान काफी राहत वाला था। पहली बार लगा कि पाकिस्तान सहम गया है। इसलिए आनन-फानन में पाकिस्तानी संसद के विशेष सत्र को बुलाया गया। वहां गिलानी आतंकवाद से खुद को अलग करने में जुटे रहे और भारत पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने कहा कि कोई और देश इस तरह के हमले के बारे में नहीं सोंचे। इससे साफ होता है कि पाकिस्तान को लगने लगा था कि भारत पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों पर कार्रवाई कर सकता है, लेकिन इस बयान के चंद दिनों बाद ही भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अफगानिस्तान में बचाव और नैतिकता की मुद्रा में आ गए। उन्होंने एबटाबाद जैसी कार्रवाई पर कहा कि हम अमेरिका जैसे नहीं हैं। भला इस बयान के क्या मायने हैं? नैतिकता के स्तर पर इसे सराहना मिल सकती है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर इसे कमजोरी से ज्यादा कुछ भी नहीं माना जा सकता है। अमेरिका से 20 अरब डॉलर हजम कर जाने वाला पाकिस्तान जब अमेरिका को दगा दे सकता है तो भारत को ठगने में उसे क्या दिक्कत होगी? इन सूची को देखने के बाद पाकिस्तान टका-सा जवाब देगा कि उसके यहां कोई आतंकी नहीं छुपा है और अगर है तो भारत इसका सबूत दे। बात आई और गई हो जाएगी। फिर आतंकवाद के मसले पर सबकुछ यथावत रहेगा। कुछ अरसे में हमें एक दो और आतंकी हमले झेलने पड़ जाएंगे, जिसकी कीमत जनता को चुकानी पड़ेगी। लाजिमी तौर पर पाकिस्तान से शांति की अपेक्षा करना बुजदिली है या यह उम्मीद लगाना कि पाकिस्तान हमारे भगौड़ों को हमें सौंपा देगा, बेवकूफी है। खासकर तब, जबकि अलकायदा की धमकियां आनी शुरू हो गई हैं। अलकायदा ने कहा कि लादेन की मौत का बदला अंतरराष्ट्रीय जगत से लिया जाएगा, लेकिन 9/11 हमले के बाद अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था काफी पुख्ता हो चुकी है। तभी तो 9/11 हमले के बाद अल कायदा किसी और आतंकी साजिश को अमेरिका में अंजाम नहीं दे सका। यूरोप में भी उसके आतंकी मंसूबे विफल ही रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक तो लचर सुरक्षा व्यवस्था और कमजोर खुफिया तंत्र और ऊपर से जवाबी कार्रवाई के प्रति उदासीनता हमें अलकायदा आतंकियों की चपेट में ला सकती है। इसलिए हमें आक्रामक तेवर अपनाने होंगे। सीमापार से आतंकियों के घुसपैठ को रोकने की रणनीति बनानी होगी और महानगरों में धर-पकड़ अभियान को तेज करना होगा। इससे हमें सीमापार के कई सुराग मिल सकते हैं। अमेरिका और दूसरे शक्तिशाली मुल्कों को भरोसे में लेकर हम 50 में से एक भी भगौड़ों को बाहर निकालने या मार गिराने में सफल होते हैं तो इससे हमें निर्णायक बढ़त मिल जाएगी। दुनिया को यह भी पता चल जाएगा कि पाकिस्तान अब भी आतंकवाद का पनाहगाह है। इसके बाद पाकिस्तान खुद रक्षात्मक स्थित में होगा और बातचीत की मेज पर हमारी सारी बातों को मानने में तत्परता दिखाएगा। हो सकता है कि इस तरह की कार्रवाई के दौरान सरकार को जम्मू-कश्मीर और देश के कुछ दूसरे इलाकों से विरोध का सामना करना पड़े, लेकिन दीर्घकालिक हित को ध्यान में रखकर इस तरह के कदम उठाने होंगे। दुनिया के सामने आतंकवाद विरोधी सख्त राष्ट्र की पहचान बनाने के लिए भारत को इन भगौड़ों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करनी होगी। पाकिस्तान को सख्त संदेश देने की जरूरत है और इसके लिए मुफीद वक्त यही है। वरना, एक बार पाकिस्तान एबटाबाद कार्रवाई से उबरेगा तो उसके नापाक चेहरे और खतरनाक हो जाएंगे। इसलिए हमें समझना होगा कि डोजियर और लिस्ट हमारी कूटनीतिक विफलता की पहचान है।
Wednesday, May 18, 2011
सक्षम देश का अक्षम नेतृत्व
लेखक भारत के लिए एबटाबाद सरीखी कार्रवाई क्यों दूर की कौड़ी है, इसकी तह में जा रहे हैं ….
ओसामा के ठिकाने पर हमले से पहले अमेरिका को चाहिए था कि वह पाकिस्तान को ओसामा के वहां होने के सबूतों की खेप पहुंचाता जैसा कि हमने 26/11 मुंबई हमले के बाद किया था। नाहक उन्होंने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले को राष्ट्रीय मुद्दा बनाते हुए युद्ध घोषित कर दिया और 30 खरब डालर खर्च कर डाले। अच्छा होता अगर वह हमारी तरह मरे हुए लोगों के परिवारों को मुआवजा और सरकारी नौकरी देकर झगड़ा खत्म करता। हमसे वह भी तो कुछ सीख सकता है! क्या हम कभी अमेरिका की तरह अपने शत्रुओं पर हमला कर पाएंगे? ओसामा तो गया, दाऊद को बचाकर रखो-आइएसआइ का नया मंत्र मालूम पड़ता है। इसीलिए शुजा पाशा हमें धमकियां दे रहे हैं। भारत पर हमले की योजनाओं का उन्होंने रिहर्सल भी कर रखा है। हमारी परेशानी यह है कि हम अमेरिकी उपलब्धियों से अपनी तुलना तो करते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि हमारी और उसकी सोच में जमीन-आसमान का फर्क है। 1947 में कश्मीर पर कबायली हमले के साथ ही हमारी जो सोच सामने आई वह आज भी कायम है। हमारी सेनाओं को जब गिलगित बालतिस्तान तक पहुंच जाने का मौका था तो हमने उन्हें उड़ी में ही रोक दिया और कश्मीर मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र में चले गए। सेनाएं कश्मीर को मुक्त करा ले जातीं, लेकिन हमारे नेतृत्व को न जाने क्यों यह गवारा नहीं था। हम अपने नेताओं में रणनीति और राष्ट्रहित की समझ न होने के दुष्परिणाम झेलते रहे हैं। मिश्च के राष्ट्रपति नासिर ने जब स्वेज नहर पर कब्जा किया तो उन्हें अंदाजा था कि कितने बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। नासिर झुके नहीं। इस विजय ने नासिर को नासिर बनाया। 1965 और 1971 के युद्धों की सैन्य उपलब्धियों को हमने अंतरराष्ट्रीय दबाव में गंवाया है। अगर 1971 का युद्ध 15 दिन और चलता तो शायद पाकिस्तान चार राष्ट्रों में बंटा होता। अमेरिका ने अपनी रणनीतिक आवश्यकताओं के मद्देनजर पाकिस्तानी परमाणु अभियान की जानबूझकर अनदेखी की। पाकिस्तान को लेकर अमेरिकी नीतियों में परिवर्तन की निकट भविष्य में कोई गुंजाइश नहीं है। अफगानिस्तान से वापसी तक अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत है। लादेन का आठ वषरें से पाकिस्तान में रहना पाकिस्तानी सेना की शह पर ही संभव हुआ है। उसके बाद भी यदि अमेरिका खून का घूंट पीकर उसे अपना रणनीतिक साथी बता रहा है तो इसके पीछे भूराजनीतिक बाध्यताएं हैं। पाकिस्तान का तो जवाब नहीं। जिस अलकायदा सरगना को वह पनाह देता रहा, उसी के विरुद्ध अभियान में वह अमेरिका का पार्टनर भी है। मैकियावेली भी पाकिस्तान के सामने स्कूली छात्र हैं। अपने अंदरूनी हालात के बावजूद पाकिस्तानी सेना अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा बड़ी मजबूती से कर रही है। अफगान समस्या का ऐसा उपयोग उन्होंने किया है कि अमेरिका उन्हें अपना रणनीतिक साथी बनाए रखने के लिए मजबूर है। चीन से भी उनके संबंध इतने गहरे हैं कि गुलाम कश्मीर में चीनी अब रक्षा दायित्व निभाने की ओर बढ़ रहे हैं। पहले स्टेपल वीजा विवाद, अब चीनी सेनाएं! हम कश्मीर को घिरते हुए नहीं देख पा रहे हैं। कश्मीर के लिए उनकी संयुक्त तैयारियां सामने हैं। उन्हें अफगानिस्तान से बस अमेरिका प्रस्थान का इंतजार है। इसके तुरंत बाद कश्मीर मोर्चा खुलेगा। पाकिस्तान की रणनीतिक मंशा तो कश्मीर को समाहित कर और अफगानिस्तान को अपने पाले में लेकर एक सशक्त देश के रूप में उभरने की है। इसे वह सामरिक गहराई का खूबसूरत सा नाम देता है। पाकिस्तान सेना इस महत्वाकांक्षा के प्रति प्रतिबद्ध प्रतीत होती है। पाकिस्तान का कारगिल ऑपरेशन इसी उद्देश्य को लेकर किया गया प्रयास रहा है। मुशर्रफ को मालूम था कि भारत के पास परमाणु बम हैं। उन्हें यह भी ज्ञान था कि भारतीय सेना सशक्त प्रतिवाद करने की स्थिति में है। फिर भी उन्होंने कारगिल में घुसपैठ की। वह ऐसा इसलिए कर सके, क्योंकि उन्हें हमारे नेतृत्व की सोच का भी अच्छी तरह पता रहा होगा। रणनीतिक सोच वाले राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए तो कारगिल का पाकिस्तानी एडवेंचर एक स्वर्णिम अवसर भी हो सकता था। कारण, युद्ध हमने प्रारंभ नहीं किया था। हम अपने क्षेत्र को मुक्त कराते हुए उन क्षेत्रों तक भी पहुंच सकते थे, जिनका उपयोग भविष्य के हमलों के लिए पाकिस्तान कर सकता था। इसी हल्ले में हम सियाचिन के झगड़े का समाधान कर सकते थे, लेकिन हम एक बार फिर 1947 की तरह शांति के पुजारी बनने लगे। हमने अपनी ही सेनाओं को प्रतिबंधित कर दिया कि तुम एलओसी पार नहीं करोगे। हम भूल गए कि एलओसी के पार का भी इलाका कश्मीर का ही हिस्सा है। हमारी इसी सोच का अगला उदाहरण 26/11 को मुंबई पर हुआ पाकिस्तानी हमला है। यह पाकिस्तानी सरकार का ऑपरेशन था, इसमें अब संदेह की गंुजाइश नहीं है। अगर अमेरिका ने 9/11 और मुंबई हमले को एक ही तराजू से तौलने से इंकार किया है तो इसके लिए सिर्फ हम जिम्मेदार हैं। हमने अमेरिका से ऐसी उम्मीद क्यों लगा रखी है कि हमारी लड़ाई जो हम खुद नहीं लड़ रहे हैं वह अमेरिका लड़ेगा। इजरायल जैसे देश ने द्वितीय विश्वयुद्ध के यहूदियों के हत्यारे नाजियों को दुनियाभर में खोज-खोजकर मारा। एक हम हैं जो सुबूतों, साक्ष्यों, गवाहों की फाइलें बनाते रहे। गांधीवाद के बोझ से दबी राजनीति ने यहां सामरिक हितों की कोई समझ ही नहीं पैदा होने दी। सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह का बयान है कि हमारी सेनाएं एबटाबाद जैसी कार्रवाई करने में सक्षम हैं। सवाल है कि इस सक्षमता का उपयोग क्या है? सेनाएं उतनी ही शक्तिशाली होती हैं, जितनी कि हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति। वह सोच जो 1947 में मुजफ्फराबाद की ओर बढ़ती हुई सेनाओं को उड़ी में रोक देती है, जो 1965 में लाहौर पर कब्जा नहीं करती, जो 1971 में इकतरफा युद्धविराम घोषित करती है, जो कारगिल में अपने ही सैनिकों के हाथ बांध देती है, उस मानसिकता को बदले बगैर सीमापार आतंकी ठिकानों पर हमला कर पाना सिर्फ दूर की कौड़ी है। ऐसा लगता है कि जैसे हम एक मुर्दा गांव के मुर्दा निवासी हों। हम अनगिनत आतंकी हमलों में मारे गए साथियों की लाशें उठाते रहे। समस्याओं के समाधान के लिए हम पहल के बजाय प्रतिक्रिया ही करते रहे हैं। अगर पहल की गई होती तो पाकिस्तान आज हमारी चुनौती न बन पाता। हमारी सत्ताओं ने राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय अस्मिता और सम्मान को प्राथमिकता नहीं दी। हम जानते ही नहीं कि आर्थिक शक्ति को किस प्रकार सशक्त सामरिक शक्ति में बदला जा सकता है। एक प्रसिद्ध पद है, साधो ई मुरदन के गांव..। संत कबीर की यह पंक्ति जैसे कबीर ग्रंथावली से उठकर हमारे भाग्य के साथ नत्थी हो गई है।(लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं )
ओसामा के ठिकाने पर हमले से पहले अमेरिका को चाहिए था कि वह पाकिस्तान को ओसामा के वहां होने के सबूतों की खेप पहुंचाता जैसा कि हमने 26/11 मुंबई हमले के बाद किया था। नाहक उन्होंने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले को राष्ट्रीय मुद्दा बनाते हुए युद्ध घोषित कर दिया और 30 खरब डालर खर्च कर डाले। अच्छा होता अगर वह हमारी तरह मरे हुए लोगों के परिवारों को मुआवजा और सरकारी नौकरी देकर झगड़ा खत्म करता। हमसे वह भी तो कुछ सीख सकता है! क्या हम कभी अमेरिका की तरह अपने शत्रुओं पर हमला कर पाएंगे? ओसामा तो गया, दाऊद को बचाकर रखो-आइएसआइ का नया मंत्र मालूम पड़ता है। इसीलिए शुजा पाशा हमें धमकियां दे रहे हैं। भारत पर हमले की योजनाओं का उन्होंने रिहर्सल भी कर रखा है। हमारी परेशानी यह है कि हम अमेरिकी उपलब्धियों से अपनी तुलना तो करते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि हमारी और उसकी सोच में जमीन-आसमान का फर्क है। 1947 में कश्मीर पर कबायली हमले के साथ ही हमारी जो सोच सामने आई वह आज भी कायम है। हमारी सेनाओं को जब गिलगित बालतिस्तान तक पहुंच जाने का मौका था तो हमने उन्हें उड़ी में ही रोक दिया और कश्मीर मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र में चले गए। सेनाएं कश्मीर को मुक्त करा ले जातीं, लेकिन हमारे नेतृत्व को न जाने क्यों यह गवारा नहीं था। हम अपने नेताओं में रणनीति और राष्ट्रहित की समझ न होने के दुष्परिणाम झेलते रहे हैं। मिश्च के राष्ट्रपति नासिर ने जब स्वेज नहर पर कब्जा किया तो उन्हें अंदाजा था कि कितने बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। नासिर झुके नहीं। इस विजय ने नासिर को नासिर बनाया। 1965 और 1971 के युद्धों की सैन्य उपलब्धियों को हमने अंतरराष्ट्रीय दबाव में गंवाया है। अगर 1971 का युद्ध 15 दिन और चलता तो शायद पाकिस्तान चार राष्ट्रों में बंटा होता। अमेरिका ने अपनी रणनीतिक आवश्यकताओं के मद्देनजर पाकिस्तानी परमाणु अभियान की जानबूझकर अनदेखी की। पाकिस्तान को लेकर अमेरिकी नीतियों में परिवर्तन की निकट भविष्य में कोई गुंजाइश नहीं है। अफगानिस्तान से वापसी तक अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत है। लादेन का आठ वषरें से पाकिस्तान में रहना पाकिस्तानी सेना की शह पर ही संभव हुआ है। उसके बाद भी यदि अमेरिका खून का घूंट पीकर उसे अपना रणनीतिक साथी बता रहा है तो इसके पीछे भूराजनीतिक बाध्यताएं हैं। पाकिस्तान का तो जवाब नहीं। जिस अलकायदा सरगना को वह पनाह देता रहा, उसी के विरुद्ध अभियान में वह अमेरिका का पार्टनर भी है। मैकियावेली भी पाकिस्तान के सामने स्कूली छात्र हैं। अपने अंदरूनी हालात के बावजूद पाकिस्तानी सेना अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा बड़ी मजबूती से कर रही है। अफगान समस्या का ऐसा उपयोग उन्होंने किया है कि अमेरिका उन्हें अपना रणनीतिक साथी बनाए रखने के लिए मजबूर है। चीन से भी उनके संबंध इतने गहरे हैं कि गुलाम कश्मीर में चीनी अब रक्षा दायित्व निभाने की ओर बढ़ रहे हैं। पहले स्टेपल वीजा विवाद, अब चीनी सेनाएं! हम कश्मीर को घिरते हुए नहीं देख पा रहे हैं। कश्मीर के लिए उनकी संयुक्त तैयारियां सामने हैं। उन्हें अफगानिस्तान से बस अमेरिका प्रस्थान का इंतजार है। इसके तुरंत बाद कश्मीर मोर्चा खुलेगा। पाकिस्तान की रणनीतिक मंशा तो कश्मीर को समाहित कर और अफगानिस्तान को अपने पाले में लेकर एक सशक्त देश के रूप में उभरने की है। इसे वह सामरिक गहराई का खूबसूरत सा नाम देता है। पाकिस्तान सेना इस महत्वाकांक्षा के प्रति प्रतिबद्ध प्रतीत होती है। पाकिस्तान का कारगिल ऑपरेशन इसी उद्देश्य को लेकर किया गया प्रयास रहा है। मुशर्रफ को मालूम था कि भारत के पास परमाणु बम हैं। उन्हें यह भी ज्ञान था कि भारतीय सेना सशक्त प्रतिवाद करने की स्थिति में है। फिर भी उन्होंने कारगिल में घुसपैठ की। वह ऐसा इसलिए कर सके, क्योंकि उन्हें हमारे नेतृत्व की सोच का भी अच्छी तरह पता रहा होगा। रणनीतिक सोच वाले राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए तो कारगिल का पाकिस्तानी एडवेंचर एक स्वर्णिम अवसर भी हो सकता था। कारण, युद्ध हमने प्रारंभ नहीं किया था। हम अपने क्षेत्र को मुक्त कराते हुए उन क्षेत्रों तक भी पहुंच सकते थे, जिनका उपयोग भविष्य के हमलों के लिए पाकिस्तान कर सकता था। इसी हल्ले में हम सियाचिन के झगड़े का समाधान कर सकते थे, लेकिन हम एक बार फिर 1947 की तरह शांति के पुजारी बनने लगे। हमने अपनी ही सेनाओं को प्रतिबंधित कर दिया कि तुम एलओसी पार नहीं करोगे। हम भूल गए कि एलओसी के पार का भी इलाका कश्मीर का ही हिस्सा है। हमारी इसी सोच का अगला उदाहरण 26/11 को मुंबई पर हुआ पाकिस्तानी हमला है। यह पाकिस्तानी सरकार का ऑपरेशन था, इसमें अब संदेह की गंुजाइश नहीं है। अगर अमेरिका ने 9/11 और मुंबई हमले को एक ही तराजू से तौलने से इंकार किया है तो इसके लिए सिर्फ हम जिम्मेदार हैं। हमने अमेरिका से ऐसी उम्मीद क्यों लगा रखी है कि हमारी लड़ाई जो हम खुद नहीं लड़ रहे हैं वह अमेरिका लड़ेगा। इजरायल जैसे देश ने द्वितीय विश्वयुद्ध के यहूदियों के हत्यारे नाजियों को दुनियाभर में खोज-खोजकर मारा। एक हम हैं जो सुबूतों, साक्ष्यों, गवाहों की फाइलें बनाते रहे। गांधीवाद के बोझ से दबी राजनीति ने यहां सामरिक हितों की कोई समझ ही नहीं पैदा होने दी। सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह का बयान है कि हमारी सेनाएं एबटाबाद जैसी कार्रवाई करने में सक्षम हैं। सवाल है कि इस सक्षमता का उपयोग क्या है? सेनाएं उतनी ही शक्तिशाली होती हैं, जितनी कि हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति। वह सोच जो 1947 में मुजफ्फराबाद की ओर बढ़ती हुई सेनाओं को उड़ी में रोक देती है, जो 1965 में लाहौर पर कब्जा नहीं करती, जो 1971 में इकतरफा युद्धविराम घोषित करती है, जो कारगिल में अपने ही सैनिकों के हाथ बांध देती है, उस मानसिकता को बदले बगैर सीमापार आतंकी ठिकानों पर हमला कर पाना सिर्फ दूर की कौड़ी है। ऐसा लगता है कि जैसे हम एक मुर्दा गांव के मुर्दा निवासी हों। हम अनगिनत आतंकी हमलों में मारे गए साथियों की लाशें उठाते रहे। समस्याओं के समाधान के लिए हम पहल के बजाय प्रतिक्रिया ही करते रहे हैं। अगर पहल की गई होती तो पाकिस्तान आज हमारी चुनौती न बन पाता। हमारी सत्ताओं ने राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय अस्मिता और सम्मान को प्राथमिकता नहीं दी। हम जानते ही नहीं कि आर्थिक शक्ति को किस प्रकार सशक्त सामरिक शक्ति में बदला जा सकता है। एक प्रसिद्ध पद है, साधो ई मुरदन के गांव..। संत कबीर की यह पंक्ति जैसे कबीर ग्रंथावली से उठकर हमारे भाग्य के साथ नत्थी हो गई है।(लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं )
अमेरिका ने पाकिस्तान को हाशिए पर रख तालिबान से वार्ता तेज की
ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अमेरिका-पाक संबंधों में पैदा हुआ तनाव कम होने के नाम नहीं ले रहा है। वैश्विक जेहाद का गढ़ कहे जाने वाले पाकिस्तान के कबाइली इलाके उत्तर वजीरिस्तान में मंगलवार को उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के दो हेलीकॉप्टर घुस आने के बाद पाक सुरक्षाबलों ने जवाबी कार्रवाई की। अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो के सैनिकों के साथ गोलीबारी में पाकिस्तान के दो सुरक्षाकर्मी घायल हो गए। दूसरी ओर समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट ने खबर दी कि अमेरिका ने अफगान तालिबान के साथ वार्ता तेज कर दी है। व्हाइट हाउस ने अफगानिस्तान से जुलाई में चरणबद्ध सैन्य वापसी शुरू करने की घोषणा कर रखी है। पाकिस्तान कई वर्षो से तालिबान के साथ अमेरिकी वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाने का इच्छुक रहा है, लेकिन लादेन की मौत के बाद बदले समीकरण में अमेरिका ने पाक को हाशिए पर रख सीधे तालिबान से वार्ता के लिए कदम बढ़ा दिया है। एक वरिष्ठ अफगान अधिकारी ने बताया, हाल ही में कतर और जर्मनी में बैठकें हुई। इनमें एक अमेरिकी प्रतिनिधि शामिल हुआ था। ये बैठकें आठ या नौ दिनों पहले हुई थीं। बैठकों में मुल्ला मोहम्मद उमर का एक करीबी अधिकारी शामिल था। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता माइकल ए हैमर ने अफगान अधिकारी के बयान के बारे में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। उन्होंने इतना जरूर कहा, अफगानिस्तान और उस पूरे क्षेत्र में अमेरिका व्यापक स्तर पर संपर्क बनाए हुए है। हम उन संपर्कों के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दे सकते। अखबार के अनुसार अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि जुलाई की समयसीमा से पहले इस बातचीत को कोई न कोई नतीजा निकलेगा। इसकी सूचना अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को दी जायगी। दूसरी ओर नाटो सैनिकों के साथ गोलीबारी के बारे में पाक के मुख्य सैन्य प्रवक्ता मेजर जनरल अतहर अब्बास ने कहा कि नाटो हेलीकॉप्टरों ने मंगलवार तड़के उत्तर वजीरिस्तान में आदमी कोट सीमा चौकी पर वायुसीमा का उल्लंघन किया। अब्बास ने कहा, चौकी पर तैनात सैनिकों ने हेलीकॉप्टरों पर गोलियां चलाई। दोनों पक्षों के बीच चले संघर्ष में हमारे कम से कम दो सैनिक घायल हो गए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान सेना ने इस घटना पर जबर्दस्त विरोध जताया है और फ्लैग बैठक की मांग की है। घटना पर अमेरिका ने कहा कि यह क्षेत्र तालिबान और अलकायदा के आतंकवादियों का सुरक्षित ठिकाना है। ये तत्व सीमापार से अफगानिस्तान में नाटो बलों को लगातार निशाना बनाते रहते हैं। घायल सैनिकों को पाकिस्तानी हेलीकॉप्टर से इलाके के मुख्य कस्बे मीरांशाह लाया गया। नाटो ने कहा है कि वह वायु हमले की खबरों की जांच कर रहा है। नाटो और पाक सैनिकों के बीच हुई गोलीबारी की यह घटना अमेरिका की विदेश मामलों से जुड़ी सीनेट की समिति के प्रमुख जॉन कैरी की इस्लामाबाद यात्रा के ठीक बाद हुई। कैरी के पाकिस्तान दौरे का मकसद एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को ढेर करने के बाद पाक के साथ पैदा हुए तनाव को कम करना था। सोमवार को कैरी ने पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, सेना प्रमुख अशफाक परवेज कयानी, प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी और गृह मंत्री रहमान मलिक से मुलाकात कर विवादित मुद्दों को हल करने के साथ ही आतंकवाद पर कड़ा रुख अख्तियार करने की बात कही थी। ड्रोन हमलों में 14 आतंकी ढेर उत्तर वजीरिस्तान इलाके में सोमवार रात किए गए दो अलग-अलग अमेरिकी ड्रोन हमलों में कम से कम 14 लोगों की मौत हो गई। एक मानवरहित विमान ने पहले हमले में उत्तर वजीरिस्तान के खेसरो गांव में स्थित एक घर को निशाना बनाते हुए दो मिसाइलें दागीं। इस हमले में नौ संदिग्ध आतंकवादी मारे गए और जिस घर पर हमला किया गया वह पूरी तरह से तहस-नहस हो गया। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक यह घर आतंकवादियों का ठिकाना था। अन्य हमले में अमेरिकी ड्रोन से मिरांशाह में घूमते एक वाहन को निशाना बनाकर दो मिसाइलें दागी गईं। हमले में वाहन में सवार पांच यात्री मारे गए और वाहन भी पूरी तरह नष्ट हो गया। मई के महीने में हुआ यह पांचवा ड्रोन हमला था। महिला फिदाइयिनों समेत पांच आतंकियों को मार गिराया कराची : पाकिस्तानी पुलिस ने क्वेटा में सुरक्षा चौकी पर वाहन को रोककर पांच संदिग्ध चेचन आत्मघाती हमलावरों को मार गिराया और इस तरह एक बड़े आतंकवादी हमले को नाकाम कर दिया। पुलिस ने बताया कि पांच आत्मघाती हमलावरों में तीन महिलाएं थीं। हमलावर कम उम्र के थे। उनमें से एक की उम्र 20 साल थी। सभी की कमर पर आत्मघाती पेटी बंधी थी। पुलिस ने बताया कि गोलीबारी के दौरान कमजोर पड़ने पर महिला आत्मघाती हमलावर ने अपनी पेटी में विस्फोट करा दिया। नगर पुलिस प्रमुख ने बताया कि पांच लोग कार पर सवार थे। उन्होंने अपनी कमर पर विस्फोटकों की पेटी बांध रखी थी। वह प्रत्यक्षत: बलूचिस्तान की राजधानी पर हमला करने की गर्ज से जा रहे थे। पुलिस प्रमुख ने कहा, उन्हें पहले हवाई अड्डे के पास औचक जांच के लिए रुकने का आदेश दिया गया था, लेकिन वे वहां से भाग निकले। इसके बाद उन्हें खारोटाबाद में फ्रंटियर कांस्टेबलरी चौकी पर रोका गया।
Tuesday, May 17, 2011
पाकिस्तान को नहीं मिलेंगे अब और ब्लैंक चेक
इस्लामाबाद, एजेंसी : एबटाबाद में दो मई को अमेरिकी कार्रवाई के दौरान ओसामा बिन लादेन की मौत दो सप्ताह बाद रविवार रात सीनेटर जॉन कैरी इस्लामाबाद पहुंचे। इसमें शक नहीं कि अमेरिकी सीनेटी की विदेश मामलों की समिति के प्रमुख कैरी की यात्रा का मकसद लादेन की मौत के बाद रिश्तों में आए तनाव को कम करना है, लेकिन उन्होंने पाक नेताओं संग वार्ता में कड़वे बोल बोलने से भी गुरेज नहीं किया। अफगान यात्रा के बाद इस्लामाबाद पहुंचे कैरी ने सोमवार को पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, सेना प्रमुख अशफाक परवेज कयानी, प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी सहित कई शीर्ष नेताओं से मुलाकात की। कैरी ने कहा कि पाकिस्तान के साथ अमेरिकी रिश्ते अहम हैं, लेकिन भविष्य में संबंधों को दिशा एक्शन पर निर्भर होगी न कि शब्दों पर। उन्होंने पाक सेना और आइएसआइ के आतंकियों के साथ रिश्तों की ओर भी इशारा किया। कैरी ने कहा कि हम इस बात से भी चिंतित हैं कि ये दोनों अब भी आतंकियों को मदद देना जारी रखे हुए हैं। वरिष्ठ सीनेटर ने पाकिस्तान को वित्तीय सहायता पर कहा, इस समय दोनों देशों के रिश्तों में संदेह है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इसके कई आधार हैं और यही कारण है कि अमेरिका में कई सीनेटर पाक को वित्तीय मदद न देने पर अड़े हैं। कैरी ने कहा, यह सच है कि लादेन का पाकिस्तान में पाया जाना दोनों देशों के रिश्तों के बारे में सोचने पर विवश करता है। अमेरिका में ऐसे कई सीनेटर हैं जो आइएसआइ और पाक सेना की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। वे पाकिस्तान में सुरक्षित आतंकी नेटवर्क से भी चिंतित हैं। इसे नष्ट करना होगा। दूसरी ओर पाक सेना प्रमुख ने कैरी से कहा कि एबटाबाद में अमेरिकी कार्रवाई को लेकर सेना में आक्रोश है। रावलपिंडी में हुई इस मुलाकात में कयानी ने यह बात कही। कैरी व कयानी की मुलाकात के बाद एक सैन्य बयान में कहा गया, सरकार के साथ संयुक्त बैठक के दौरान पाक-अमेरिका संबंधों पर विस्तृत चर्चा किए जाने का निर्णय लिया गया है। इससे पहले एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया कि अमेरिका, पाकिस्तान को दी जाने वाली तीन अरब डॉलर की वार्षिक मदद को बंद करने की कांग्रेस की धमकी का इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा।
विदेशी सहायता स्वीकार नहीं करेगी पंजाब सरकार : शहबाज शरीफ लाहौर : पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ ने आज घोषणा की कि उनकी सरकार अब विदेशी सहायता स्वीकार नहीं करेगी। मंत्रिमंडल की बैठक के बाद शरीफ ने संवाददाताओं से कहा कि यह निर्णय पंजाब प्रांत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लिया गया है। शरीफ ने विदेशी सहायता स्वीकार नहीं करने की बात हाल में ही अमेरिकी बलों द्वारा ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए पाकिस्तान के एबटाबाद में की गई एकतरफा कार्रवाई के बाद कही है। पाकिस्तान इसे अपनी संप्रभुता हनन का मामला मान रहा है। शरीफ ने कहा कि उनकी सरकार भीख के कटोरे को छोड़कर व्यापार पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहती है। पाकिस्तान की संप्रभुता पर पहुंची चोट के बारे में शरीफ ने कहा, हमें विदेशी सहायता पर निर्भर नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह हमारे सम्मान को चोट पहंुचा रही है। हम इसका विरोध करते हैं।
विदेशी सहायता स्वीकार नहीं करेगी पंजाब सरकार : शहबाज शरीफ लाहौर : पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ ने आज घोषणा की कि उनकी सरकार अब विदेशी सहायता स्वीकार नहीं करेगी। मंत्रिमंडल की बैठक के बाद शरीफ ने संवाददाताओं से कहा कि यह निर्णय पंजाब प्रांत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लिया गया है। शरीफ ने विदेशी सहायता स्वीकार नहीं करने की बात हाल में ही अमेरिकी बलों द्वारा ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए पाकिस्तान के एबटाबाद में की गई एकतरफा कार्रवाई के बाद कही है। पाकिस्तान इसे अपनी संप्रभुता हनन का मामला मान रहा है। शरीफ ने कहा कि उनकी सरकार भीख के कटोरे को छोड़कर व्यापार पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहती है। पाकिस्तान की संप्रभुता पर पहुंची चोट के बारे में शरीफ ने कहा, हमें विदेशी सहायता पर निर्भर नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह हमारे सम्मान को चोट पहंुचा रही है। हम इसका विरोध करते हैं।
Sunday, May 15, 2011
चीनियों के घर भर रहे भारतीय देवी-देवता
चीन के लोगों की हिंदू देवी-देवताओं के प्रति आस्था है या नहीं यह तो पता नहीं लेकिन ये देव उनकी कमाई का जरिया बन गए हैं। चीन में निर्मित हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां इन दिनों कई भारतीयों के घरों की शोभा बढ़ा कर चीनियों के घर लक्ष्मी से भर रही हैं। मेड इन चाइना हिंदू भगवान की मूर्तियां थोक में प्रदेश के बाजारों में पहुंच रही हैं। मंदिरों व हिंदू धर्म से जुडे़ कई लोगों के घरों में भी चाइना मिट्टी से तैयार मूर्तियां देखी जा रही हैं। चीन के बाजार ने देश के ग्राहकों की नब्ज पहचानते हुए इलेक्ट्रॉनिक व खिलौनों के बाद भगवान की मूर्तियों का व्यापार भी शुरू कर दिया है। चीन निर्मित मूर्तियां ग्राहकों की पहली पसंद बन रही हैं। हिमाचल में इन मूर्तियों का हर सप्ताह लाखों रुपये का कारोबार हो रहा है। भारतीयों की पसंद को ध्यान में रख कर चीन तमाम उत्पाद बनाकर व्यापार कर रहा था, लेकिन लोगों के लिए अब स्वदेश में बनी भगवान की मूर्तियों के सामने चाइना मेड भगवान की मूर्तियां पहली पसंद बन रही हैं। ऊना जिला के प्रमुख मंदिरों के पुजारियों व हिंदू धर्म से जुडे़ संगठनों के कई प्रमुख लोगों के घरों में मेड इन चाइना भगवान की मूर्तियां दिखाई दे रही हैं। चीन निर्मित वस्तुओं की आपूर्ति करने वाले अतुल चौधरी ने कहा कि रोजाना लाखों का चीन निर्मित सामान हिमाचल आ रहा है। लोगों को चीन में निर्मित एक फुट की मूर्ति 250 से 300 रुपये में मिल रही है। इन मूर्तियों पर बेहतरीन कलाकारी की गई है। स्थानीय दुकानदार राकेश कुमार, पंकज, अमित व राजीव कुमार ने बताया कि चाइना मेड भगवान की मूर्तियों की मांग लगातार बढ़ रही है। चीन निर्मित जिस मूर्ति की कीमत 200 रुपये है, वह देखने में सुंदर और हल्की है। स्वदेश में बनी वैसी ही मूर्ति पांच गुणा महंगी है जिस कारण उसकी मांग शून्य के बराबर है। आबकारी एवं कराधान अधिकारी एसके ठाकुर का कहना है कि दुकानों में चीन निर्मित मूर्तियां आ रही हैं मगर उन्हें सामान उपलब्ध करवाने वाली फर्म पंजीकृत है। सामान पर वैट लगा है तो उन्हें कोई समस्या नहीं है। सामान चीन या जापान से पहुंचा है तो यह कस्टम विभाग के अधिकार क्षेत्र की बात है।
पाक पर दबाव का मौका
पाकिस्तान में पनाह लिए आतंकवादियों से निपटने के लिए भारत को नरमदिल होने की जरूरत नहीं है। न ही भारत के राजनेताओं को राष्ट्रीय हितों को वोट खींचने वाले स्तर तक ले जाना चाहिए। ओबामा और अमेरिकियों के खुश होने की वजह हैं। वे उन लोगों को सबक सिखाने में कामयाब हुए हैं, जिन्होंने अमेरिका पर हमले का दुस्साहस किया था। उनके लिए हर अमेरिकी की सुरक्षा सबसे अहम है। जब राष्ट्रीय सुरक्षा की बात आती है, तब राजनीतिक दृष्टि से एकदूसरे के विरोधी रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स एक हो जाते हैं। दरअसल, अमेरिकी विधि-निर्माताओं ने पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी के बारे में इस्लामाबाद से स्पष्टीकरण मांगने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। 9/11 के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को 20 अरब डालर से अधिक सहायता दी है, क्योंकि अफगान सुरक्षा के बारे में उसे पाकिस्तान की जरूरत है। ओसामा बिन लादेन के सफाए से भारत क्या लाभ उठा सकता है? मुंबई आतंकी हमले के शिकार हमारे लोगों को न्याय दिलाने के बारे में में यह महत्वपूर्ण बिंदु साबित हो सकता है। संसद भवन पर हुए हमले के शिकार लोग अभी तक न्याय की बाट जोह रहे हैं। इस हमले में आतंकवादियों से मुठभेड़ में सुरक्षा गार्डों और संसद के कर्मचारियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। कहा जा सकता है कि नई दिल्ली कानूनी प्रक्रिया अपना रही है। माना इन दोषियों पर कानूनी कार्यवाही हुई है, लेकिन संसद भवन पर हमले की साजिश रचने वाले अफजल गुरु को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद भी उस पर अभी तक अमल क्यों नहीं हुआ है? दया की उसकी याचिका अभी भी राष्ट्रपति के पास पड़ी हुई है। 1993 के मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड दाऊद इब्राहिम किस प्रकार पाकिस्तान में आजाद घूम रहा है? अफजल गुरु को फांसी देने में देरी के बारे में लोगों ने सवाल करने शुरू कर दिए हैं और लादेन के मारे जाने के बाद आने वाले महीनों में यह फुसफुसाहट और बढ़ जाएगी। भारत का राजनीतिक वर्ग, आतंकवादियों के खिलाफ बल प्रयोग से हिचकता है। मुंबई और संसद भवन हमलों के बाद भारत के सेनाध्यक्षों ने सीमा के उस पार अचूक हमले करने का सुझाव दिया था, लेकिन दोनों ही मौकों पर राजनेता हिम्मत नहीं कर पाए और अमेरिका तथा दूसरी विदेशी सरकारों के दबावों के आगे झुक गए। बदकिस्मती से दोषियों के प्रति न्याय और अपनी वोट बैंक राजनीति को लेकर राजनेता उलझन में रहते हैं। भारत को अमेरिका और इजराइल से सबक लेना चाहिए जिन्होंने बार-बार साबित किया है कि आतंकवाद में लिप्त लोगों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ओसामा बिन लादेन के खात्मे ने भारत को पाकिस्तान और दुनिया को 26/11 के बारे में एक संदेश भेजने का अवसर दिया है। इससे मनमोहन सिंह सरकार पर पाकिस्तान और अफ-पाक, दोनों ही के बारे में अपनी नीतियों पर फिर से गौर करने का दबाव पड़ना लाजमी है। ओबामा और विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के संकेतों से साफ हो जाता है कि अफगानिस्तान से निपटने के लिए अमेरिका को पाकिस्तान की लाजिस्टिक सहायता चाहिए, जबकि पाकिस्तानियों को अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने और सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए अमेरिकी डॉलरों की जरूरत है। यह परस्पर निर्भरता, अभी कुछ समय तक जारी रहेगी। इसलिए अमेरिका एक हद तक ही पाकिस्तान पर दबाव डालेगा। नई दिल्ली को इस अवसर का फायदा उठा कर वाशिंगटन और विश्व समुदाय को पाकिस्तान पर दबाव बनाने की जरूरत के बारे में समझाना चाहिए ताकि वह अन्य आतंकी संगठनों के साथ भी इसी प्रकार से निपट सकें। अन्यथा, ओसामा बिन लादेन भले ही मर गया हो, उसका जिहादी आतंकवाद जारी रहेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
पाकिस्तान की छटपटाहट
लेखक ओसामा की मौत पर पाकिस्तानी नेतृत्व के विरोधाभासी बयानों में उसकी बेचैनी देख रहे हैं…
ओसामा बिन लादेन के खात्मे के लिए पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिकी कमांडो ऑपरेशन ने जितना तहलका पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान में मचाया है, उतना अलकायदा में भी नहीं मचा, जिसका वह प्रमुख था। इसीलिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सफल अभियान के बाद घोषणा पर पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व को सांप सूंघ गया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, प्रधानमंत्री गिलानी और सैन्य प्रमुख जनरल कियानी को झटके से उबरने में कुछ समय लगा और संभलने के बाद उन्होंने जनभावनाओं के ज्वार को शांत करने के लिए अपनी वाकपटुता का इस्तेमाल किया। हालांकि, जब उन्होंने अपना मुंह खोला, तो वे इस जटिल मुद्दे की गांठें खोलने के बजाए इन्हें और उलझा बैठे। इनमें से कोई भी राजधानी के निकट ओसामा बिन लादेन का एक बड़े बंगले में रहने का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाया। न ही वे यह बता पाए कि अमेरिका ने उन्हें अंधेरे में क्यों रखा। इस सवाल का भी उनके पास कोई जवाब नहीं है कि दूसरा मुल्क उनके देश में एक गोपनीय अभियान को अंजाम देने में कैसे सफल रहा। पाकिस्तानी सत्ता की शुरुआती चुप्पी की यह व्याख्या की जा सकती है कि वह अपने विकल्प तलाश रहा था। उसके सामने यह सवाल नहीं था कि वह सच कैसे बयान करे, बल्कि यह गुत्थी थी कि वह अपने नागरिकों के सामने क्या झूठ बोले। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान के बीचोबीच ओसामा को मारने से पाक नागरिकों के जेहन में दो तरह की भावनाएं उठीं। इनमें से पहली का संबंध पंथिक पहचान से है। लोकतांत्रिक भारत के विपरीत पाकिस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र है, जिसमें पंथिक अल्पसंख्यकों के लिए कोई स्थान नहीं है। वहां 97 फीसदी आबादी मुस्लिम है। आजादी के बाद से ही वहां लोगों को हिंदुओं और हिंदुस्तान के साथ-साथ अमेरिका व पाश्चात्य देशों के खिलाफ घृणा का पाठ पढ़ाया जाता रहा है। इस वातावरण में पाकिस्तानी नौजवान ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकियों के पक्षधर हो गए हैं, जो उनकी तरफ से शैतान देश अमेरिका और काफिरों की भूमि भारत से लड़ता रहा। वे इस्लाम खतरे में के नारे और राजनीति के आसानी से शिकार हो जाते हैं। इसलिए वे यह जानकर आक्रोश से भरे हैं कि उनके पंथिक नायक को कथित शैतानों के देश अमेरिका ने पाकिस्तान के बीचोबीच जाकर मार गिराया है। इस परिप्रेक्ष्य में, राजनीतिक और सैन्य, दोनों प्रतिष्ठानों को यह कहने में सुविधा महसूस होती है कि उन्हें इस अभियान के बारे में कुछ नहीं पता था। माना जा रहा था कि इस तरह वे इस्लाम के दुश्मनों के साथ मिलकर इस्लाम के नायक को मार डालने के आरोप से बच जाएंगे। अधिक से अधिक इतना ही होगा कि लोग देश के राजनीतिक नेतृत्व व सेना को महज अकुशलता और अक्षमता के मुद्दे पर ही घेरेंगे, इस्लाम के प्रति उनकी वफादारी पर सवाल नहीं उठाएंगे। इस प्रकार लोगों का गुस्सा इस्लामाबाद के बजाए अमेरिका के खिलाफ उतरेगा। हालांकि जल्दी ही सरकार और सेना को अहसास हो गया कि इस तिकड़म से भी लोगों के गुस्से को शांत नहीं किया जा सकता है। इसीलिए राष्ट्रीय भावनाओं को भड़काने का दूसरा कार्ड खेला गया। यह भी अगर पंथिक भावनाओं से अधिक गहरा नहीं था, तो इससे कम भी नहीं था। पाकिस्तानी यह देखकर भयाक्रांत थे कि कमांडो से भरे अमेरिकी हेलीकॉप्टर पाकिस्तान में घुस आए, ऑपरेशन को अंजाम देकर अफगानिस्तान स्थित अपने शिविर में वापस लौट गए और पाकिस्तानी सेना को इसकी भनक तक नहीं लगी। इससे पाकिस्तान की रक्षा तैयारियों और चौकसी पर संदेह पैदा हुआ। यह देश के हर नागरिक के लिए शर्मसार करने वाली बात थी। इससे बचने के लिए राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान ने सोचा कि अगर वे कहें कि यह पाकिस्तान और अमेरिका के सहयोग से हुआ तो उनका नुकसान कम हो सकता है। इस स्थिति में लोगों को विश्वास हो जाएगा कि पाकिस्तान की संप्रभुता का हनन नहीं हुआ। पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से प्रतिक्रियाएं इतने विरोधाभासों से भरी हैं कि यह पता लगाना मुश्किल है कि सच क्या है। जिस कुशलता के साथ अमेरिकियों ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया, वह पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के लिए भारी शर्मिदगी है। ये विरोधाभास उनके गले में छछुंदर की तरह फंस गए हैं जो न उगलते बन रहे हैं और न निगलते। अमेरिका द्वारा बार-बार दोहराने के बावजूद कि पाकिस्तान समेत किसी भी देश को इस ऑपरेशन के बारे में नहीं बताया गया था, आइएसआइ प्रमुख शुजा पाशा का यह बयान हास्यास्पद लगता है कि इस ऑपरेशन में पाकिस्तान का भी सहयोग था। विदेश सचिव सलमान बशीर तो कुछ ज्यादा ही मुखर नजर आए। उन्होंने दावा किया कि खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने 2009 में ही अमेरिका खुफिया एजेंसी को लादेन के ठिकाने के बारे में बता दिया था। चूंकि अमेरिका के पास बेहतर तकनीक और संसाधन हैं इसलिए वह हमसे पहले ही लादेन तक पहुंच गया। क्या अपने आत्मसम्मान को ताक पर रखने वाला इस प्रकार का असाधारण स्पष्टीकरण कहीं सुना है? अगर आपने दो साल पहले ही ओसामा के बारे में बता दिया था तो आप हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे थे और एक विदेशी शक्ति को कार्रवाई करने का मौका क्यों दिया? इसके विपरीत पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने दावा किया कि पाकिस्तान को लादेन के एबटाबाद ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उधर, पाकिस्तान सरकार का आधिकारिक बयान है कि इस्लामाबाद 2009 के बाद से सीआइए के साथ सूचनाएं साझा कर रहा था और इन्हीं के आधार पर अमेरिका लादेन तक पहुंचा। जबकि ब्रिटेन में पाकिस्तान के राजदूत ने कहा कि लादेन कभी पाकिस्तान में रहा ही नहीं। वह हाल ही में एबटाबाद में आया था। उस पर नजर रखी जा रही थी, इसलिए वह मारा गया। दूसरे शब्दों में उन्हें अपनी सरकार, अपने विदेश सचिव और आइएसआइ प्रमुख पर भरोसा नहीं है। पाकिस्तान के गृह मंत्री ने और भी विचित्र बयान दिया कि उन्हें ऑपरेशन से 15 मिनट पहले ही इसके बारे में जानकारी मिल गई थी। तहरीक-ए-इंसाफ के नेता इमरान खान ने सही कहा है कि पाकिस्तान के लोग सच नहीं जानते, क्योंकि सरकार हर चीज के बारे में झूठ पर झूठ बोल रही है। अब पाकिस्तान को इज्जत बचाना मुश्किल हो रहा है। घृणा और छल से बना एक राष्ट्र अब असलियत का सामना कर रहा है और कोई भी पाकिस्तानी दर्पण में दिख रही सच्चाई को पसंद नहीं कर रहा है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
ओसामा बिन लादेन के खात्मे के लिए पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिकी कमांडो ऑपरेशन ने जितना तहलका पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान में मचाया है, उतना अलकायदा में भी नहीं मचा, जिसका वह प्रमुख था। इसीलिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सफल अभियान के बाद घोषणा पर पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व को सांप सूंघ गया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, प्रधानमंत्री गिलानी और सैन्य प्रमुख जनरल कियानी को झटके से उबरने में कुछ समय लगा और संभलने के बाद उन्होंने जनभावनाओं के ज्वार को शांत करने के लिए अपनी वाकपटुता का इस्तेमाल किया। हालांकि, जब उन्होंने अपना मुंह खोला, तो वे इस जटिल मुद्दे की गांठें खोलने के बजाए इन्हें और उलझा बैठे। इनमें से कोई भी राजधानी के निकट ओसामा बिन लादेन का एक बड़े बंगले में रहने का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाया। न ही वे यह बता पाए कि अमेरिका ने उन्हें अंधेरे में क्यों रखा। इस सवाल का भी उनके पास कोई जवाब नहीं है कि दूसरा मुल्क उनके देश में एक गोपनीय अभियान को अंजाम देने में कैसे सफल रहा। पाकिस्तानी सत्ता की शुरुआती चुप्पी की यह व्याख्या की जा सकती है कि वह अपने विकल्प तलाश रहा था। उसके सामने यह सवाल नहीं था कि वह सच कैसे बयान करे, बल्कि यह गुत्थी थी कि वह अपने नागरिकों के सामने क्या झूठ बोले। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान के बीचोबीच ओसामा को मारने से पाक नागरिकों के जेहन में दो तरह की भावनाएं उठीं। इनमें से पहली का संबंध पंथिक पहचान से है। लोकतांत्रिक भारत के विपरीत पाकिस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र है, जिसमें पंथिक अल्पसंख्यकों के लिए कोई स्थान नहीं है। वहां 97 फीसदी आबादी मुस्लिम है। आजादी के बाद से ही वहां लोगों को हिंदुओं और हिंदुस्तान के साथ-साथ अमेरिका व पाश्चात्य देशों के खिलाफ घृणा का पाठ पढ़ाया जाता रहा है। इस वातावरण में पाकिस्तानी नौजवान ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकियों के पक्षधर हो गए हैं, जो उनकी तरफ से शैतान देश अमेरिका और काफिरों की भूमि भारत से लड़ता रहा। वे इस्लाम खतरे में के नारे और राजनीति के आसानी से शिकार हो जाते हैं। इसलिए वे यह जानकर आक्रोश से भरे हैं कि उनके पंथिक नायक को कथित शैतानों के देश अमेरिका ने पाकिस्तान के बीचोबीच जाकर मार गिराया है। इस परिप्रेक्ष्य में, राजनीतिक और सैन्य, दोनों प्रतिष्ठानों को यह कहने में सुविधा महसूस होती है कि उन्हें इस अभियान के बारे में कुछ नहीं पता था। माना जा रहा था कि इस तरह वे इस्लाम के दुश्मनों के साथ मिलकर इस्लाम के नायक को मार डालने के आरोप से बच जाएंगे। अधिक से अधिक इतना ही होगा कि लोग देश के राजनीतिक नेतृत्व व सेना को महज अकुशलता और अक्षमता के मुद्दे पर ही घेरेंगे, इस्लाम के प्रति उनकी वफादारी पर सवाल नहीं उठाएंगे। इस प्रकार लोगों का गुस्सा इस्लामाबाद के बजाए अमेरिका के खिलाफ उतरेगा। हालांकि जल्दी ही सरकार और सेना को अहसास हो गया कि इस तिकड़म से भी लोगों के गुस्से को शांत नहीं किया जा सकता है। इसीलिए राष्ट्रीय भावनाओं को भड़काने का दूसरा कार्ड खेला गया। यह भी अगर पंथिक भावनाओं से अधिक गहरा नहीं था, तो इससे कम भी नहीं था। पाकिस्तानी यह देखकर भयाक्रांत थे कि कमांडो से भरे अमेरिकी हेलीकॉप्टर पाकिस्तान में घुस आए, ऑपरेशन को अंजाम देकर अफगानिस्तान स्थित अपने शिविर में वापस लौट गए और पाकिस्तानी सेना को इसकी भनक तक नहीं लगी। इससे पाकिस्तान की रक्षा तैयारियों और चौकसी पर संदेह पैदा हुआ। यह देश के हर नागरिक के लिए शर्मसार करने वाली बात थी। इससे बचने के लिए राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान ने सोचा कि अगर वे कहें कि यह पाकिस्तान और अमेरिका के सहयोग से हुआ तो उनका नुकसान कम हो सकता है। इस स्थिति में लोगों को विश्वास हो जाएगा कि पाकिस्तान की संप्रभुता का हनन नहीं हुआ। पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से प्रतिक्रियाएं इतने विरोधाभासों से भरी हैं कि यह पता लगाना मुश्किल है कि सच क्या है। जिस कुशलता के साथ अमेरिकियों ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया, वह पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के लिए भारी शर्मिदगी है। ये विरोधाभास उनके गले में छछुंदर की तरह फंस गए हैं जो न उगलते बन रहे हैं और न निगलते। अमेरिका द्वारा बार-बार दोहराने के बावजूद कि पाकिस्तान समेत किसी भी देश को इस ऑपरेशन के बारे में नहीं बताया गया था, आइएसआइ प्रमुख शुजा पाशा का यह बयान हास्यास्पद लगता है कि इस ऑपरेशन में पाकिस्तान का भी सहयोग था। विदेश सचिव सलमान बशीर तो कुछ ज्यादा ही मुखर नजर आए। उन्होंने दावा किया कि खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने 2009 में ही अमेरिका खुफिया एजेंसी को लादेन के ठिकाने के बारे में बता दिया था। चूंकि अमेरिका के पास बेहतर तकनीक और संसाधन हैं इसलिए वह हमसे पहले ही लादेन तक पहुंच गया। क्या अपने आत्मसम्मान को ताक पर रखने वाला इस प्रकार का असाधारण स्पष्टीकरण कहीं सुना है? अगर आपने दो साल पहले ही ओसामा के बारे में बता दिया था तो आप हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे थे और एक विदेशी शक्ति को कार्रवाई करने का मौका क्यों दिया? इसके विपरीत पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने दावा किया कि पाकिस्तान को लादेन के एबटाबाद ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उधर, पाकिस्तान सरकार का आधिकारिक बयान है कि इस्लामाबाद 2009 के बाद से सीआइए के साथ सूचनाएं साझा कर रहा था और इन्हीं के आधार पर अमेरिका लादेन तक पहुंचा। जबकि ब्रिटेन में पाकिस्तान के राजदूत ने कहा कि लादेन कभी पाकिस्तान में रहा ही नहीं। वह हाल ही में एबटाबाद में आया था। उस पर नजर रखी जा रही थी, इसलिए वह मारा गया। दूसरे शब्दों में उन्हें अपनी सरकार, अपने विदेश सचिव और आइएसआइ प्रमुख पर भरोसा नहीं है। पाकिस्तान के गृह मंत्री ने और भी विचित्र बयान दिया कि उन्हें ऑपरेशन से 15 मिनट पहले ही इसके बारे में जानकारी मिल गई थी। तहरीक-ए-इंसाफ के नेता इमरान खान ने सही कहा है कि पाकिस्तान के लोग सच नहीं जानते, क्योंकि सरकार हर चीज के बारे में झूठ पर झूठ बोल रही है। अब पाकिस्तान को इज्जत बचाना मुश्किल हो रहा है। घृणा और छल से बना एक राष्ट्र अब असलियत का सामना कर रहा है और कोई भी पाकिस्तानी दर्पण में दिख रही सच्चाई को पसंद नहीं कर रहा है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
Saturday, May 14, 2011
Friday, May 13, 2011
Wednesday, May 11, 2011
पाक का विरोध दिखावटी, दस साल पहले हो गया था बुश संग करार!
दुनिया के दुर्दात आतंकी ओसामा बिन लादेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए अमेरिका और पाकिस्तान के बीच 10 साल पहले ही गुप्त समझौता हो गया था। समझौते के तहत ओसामा के पाकिस्तान में पाए जाने पर अमेरिका एकतरफा कार्रवाई करेगा। बाद में इस्लामाबाद इस पर जोरदार विरोध दर्ज कराएगा। एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। ब्रिटिश अखबार द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2001 में अफगानिस्तान की दुर्गम पहाडि़यों तोरा बोरा से अमेरिकी सेना के चंगुल से बच निकलने के बाद तत्कालीन सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के बीच ओसामा को लेकर यह गुप्त समझौता हुआ था। अखबार ने सेवानिवृत्त पाकिस्तानी और अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा, समझौते के मुताबिक पाकिस्तान अपनी सरजमीं पर ओसामा और अलकायदा के दूसरे नंबर के नेता अयमान अल जवाहिरी की खोज के लिए भी अमेरिकी सेना को एकतरफा कार्रवाई करने देगा। आतंकवाद निरोधी मामलों से जुड़े अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, बुश और मुशर्रफ के बीच समझौता हुआ था कि अगर ओसामा के बारे में पता चल जाएगा कि वो कहां हैं, तो हम उसे पकड़ लेंगे। उसके बाद पाकिस्तान आपत्ति दर्ज कराएगा, लेकिन वह हमें रोकेगा नहीं। यही नहीं पिछले सप्ताह पाकिस्तान की ओर से किया गया अमेरिकी विरोध जनता के बीच अपनी छवि चमकाने का प्रयास था। एक वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी के मुताबिक समझौता मुशर्रफ के शासनकाल में हुआ, लेकिन फरवरी, 2008 से छह महीने के दौरान जब लोकतंत्र की बहाली हो रही थी, सेना ने इस समझौते पर दोबारा मुहर लगाई। उस दौरान मुशर्रफ राष्ट्रपति तो थे लेकिन लोकतांत्रिक सरकार चुनी जा चुकी थी। दूसरी ओर मुशर्रफ ने ऐसा कोई लिखित या मौखिक गुप्त समझौता होने से इंकार किया है। उन्होंने फेसबुक पर कहा, अखबार की खबर में कोई सचाई नहीं है। राष्ट्रपति बुश और मेरे बीच कभी इस विषय पर वार्ता नहीं हुई।
Monday, May 9, 2011
अमेरिका, आतंकवाद और इस्लामिक देश
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने कहा कि अमेरिका और मुस्लिम देशों के बीच संदेह और विवाद का चक्र खत्म होना चाहिए। मध्य पूर्व देशों के दौरे के क्रम में बराक ओबामा मिस्र की राजधानी काहिरा पहुंचे और अपने महत्त्वपूर्ण भाषण में मुस्लिम देशों के साथ नई शुरुआत की अपील की। यही नहीं, ओबामा ने माना कि दोनों पक्षों के बीच वर्षो से अविश्वास रहा। ओबामा ने भरोसा दिलाया कि इराक और अफगानिस्तान के मसले पर अमेरिका इन देशों में स्थानीय सैनिक अड्डे को स्थापित नहीं करेगा। इस्रइलिफलिस्तीन मुद्दे पर भी ओबामा का भाषण सारगíभत रहा। ईरान को भी शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम चलाने की अनुमति दी गई। ओबामा के इस भाषण को अरब मुल्कों ने नई शुरु आत के तौर पर ही देखा। लेकिन वक्त का पहिया घूमा। 18 मार्च 2011 को संयुक्त राष्ट्र ने अमेरिका की अगुवाई में नाटो को लीबिया पर हमले की मंजूरी दी। वहां के शासक मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ जारी बगावत को ओबामा प्रशासन ने शह दी। अब तक लीबिया में हजारों बेगुनाह लोगों की मौत हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों की अवहेलना करते हुए गद्दाफी और उसके बेटे पर व्यक्तिगत तौर पर हमले किए गए। गद्दाफी के बेटे की मौत हो गई। हमले की वजह लीबिया में निरंकुश शासन का होना नहीं है बल्कि लीबिया के तेल खजाने पर अमेरिकी नजर है।
मकसद था भड़ास निकालना
2 मई 2011 को पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों को दरकिनार करते हुए आतंकी संगठन अलकायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराया गया। वह भी तब जबकि पाकिस्तानी जमीन इन मामलों में काफी संवेदनशील है। खुद पाकिस्तान सरकार की भूमिका संदिग्ध है। और तो और दुनिया के सामने अमेरिका यह नहीं कहते हुए थकता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के साथ है। यहां हमले की वजह आतंकवाद का सफाया करना नहीं है बल्कि ओसामा के खिलाफ अमेरिकी भड़ास को निकालना था। कह सकते हैं, न लेना एक न देना दो। लेकिन अमेरिका अपनी चौधराहट के रास्ते पर फिर लौट आया है। अमेरिका में ओबामा के आने से जो आस बंधी थी, वह अब टूटने लगी है। इस्लामिक और गैर इस्लामिक मुल्कों के बीच बुश की बनाई चौड़ी खाई को पाटने की उम्मीद ओबामा से की जा रही थी लेकिन ओबामा ने इस्लामिक देशों से अपने रिश्ते और कटु कर लिए हैं। अमेरिका चाहता तो ओसामा को आतंकवाद के प्रतीक के तौर पर मार सकता था लेकिन अपनी हरकतों की वजह से उसने ओसामा को कट्टर इस्लामिक जमात में शहीद का दर्जा दिला दिया है।
अमेरिकी चश्मे से देखती दुनिया
एक सचाई यह भी है कि अमेरिका हमें जिस चश्मे से दुनिया दिखाता है, हम उसी चश्मे से दुनिया देखते हैं। अब ओसामा के खात्मे को ही लीजिए। ओसामा की मौत कैसे हुई, कहां हुई और किन परिस्थितियों में हुई, इसकी जानकारी अमेरिका के सिवा किसी मुल्क को नहीं है। यही नहीं, इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को कैसे पकड़ा गया? उन्हें फांसी की सजा किस आधार पर दी गई? इसका चश्मदीद भी अमेरिका ही था। ऐसे में वक्त-बेवक्त अमेरिका का कोई प्रवक्ता हमारे सामने आता है और अपने ढंग से कहानी गढ़ कर निकल जाता है। नतीजतन, हम उसी कहानी में उलझे-सुलझते रहते हैं। देखने का नया नजरिया बना ही नहीं पाते है। इसलिए ओसामा सचमुच मर गया या बहुत पहले ही मर चुका था, इस पर संदेह है। अमेरिका ने तस्वीर जारी नहीं कर इस संदेह को और भी बढ़ा दिया है।
जिंदा पकड़ने से राज खुलते
अलबत्ता, यह भी समझना मुश्किल है कि अगर ओसामा मारा गया तो अमेरिका ने उसे मारा क्यों, ज़िंदा भी पकड़ा जा सकता था? शायद इससे आतंकी साजिश पर से काफी पर्दा उठता। दुनिया भर के आतंकी नेटवकरे की जानकारी मिलती। और तो और पाकिस्तान के दोहरे रवैये से सब वाकिफ होते। भला, कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन को मारने से भारत में हाथियों के दांत और चंदन के पेड़ की तस्करी समाप्त हो गई। लेकिन ओसामा के मरने से आतंकवाद खत्म होने से रहा। वह और तेजी से पनपेगा। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन में युवा मुसलमानों की भरमार हो जाएगी। यकीन मानिए, दो वक्त की रोटी और वजूद के लिए लोग एक दूसरे पर बम बरसाने लगेंगे। जिस ओसामा बिन लादेन ने एक खास धर्म के मुंह पर कालिख लगाई उसी के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान को तबाह कर दिया और पाकिस्तान को भारत की तुलना में खूब तवज्जो दी। फर्ज कीजिए शेख भी खुश रहे, शैतान भी नाराज़ न हो। एक दौर था कि आतंक के इस बाज़ार को ओसामा बिन लादेन के जरिये अमेरिका ने ही रूस के सामने परोसा था।
अमेरिका-आतंकवाद एक ही रास्ते पर
दरअसल, राजनीतिशास्त्र के ‘पॉवर थ्योरी’ के मुताबिक ताकत के आने से क्षमता बढ़ती है और फिर उससे कुव्वत आती है। जो आपको उच्छृंखल और निरंकुश बना देती है। अमेरिका इसी राह का राही और आतंकवाद इस राह की पैदाइश है। अब टकराव तो लाजिमी है लेकिन हाल के दिनों में मध्य पूर्व में काफी अहम बदलाव आए हैं। मिस्र, ट्यूनीशिया जैसे मुल्कों में युवाओं के विरोध-प्रदर्शन से तख्ता पलट हो गया। वहीं यमन, सीरिया जैसे मुल्कों में विरोध-प्रदशर्न जारी है। वर्षो से जारी बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और गरीबी के खिलाफ मध्य पूर्व की जनता ने हमला बोल रखा है। उनके पास ताकत जरूर है लेकिन इसका इस्तेमाल सही नहीं हुआ तो दहशतगर्दी को बढ़ावा मिल सकता है। खासकर वह भी तब जब इन मुल्कों में सार्थक बदलाव दिख रहा है। लेकिन पाकिस्तान की जड़वत सोच को कुछ कट्टरपंथी भुनाकर दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व को अशांत-अस्थिर कर सकते हैं। बहरहाल, ओसामा की मौत से कई सवाल जरूर पनपे हैं।
मकसद था भड़ास निकालना
2 मई 2011 को पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों को दरकिनार करते हुए आतंकी संगठन अलकायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को मार गिराया गया। वह भी तब जबकि पाकिस्तानी जमीन इन मामलों में काफी संवेदनशील है। खुद पाकिस्तान सरकार की भूमिका संदिग्ध है। और तो और दुनिया के सामने अमेरिका यह नहीं कहते हुए थकता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के साथ है। यहां हमले की वजह आतंकवाद का सफाया करना नहीं है बल्कि ओसामा के खिलाफ अमेरिकी भड़ास को निकालना था। कह सकते हैं, न लेना एक न देना दो। लेकिन अमेरिका अपनी चौधराहट के रास्ते पर फिर लौट आया है। अमेरिका में ओबामा के आने से जो आस बंधी थी, वह अब टूटने लगी है। इस्लामिक और गैर इस्लामिक मुल्कों के बीच बुश की बनाई चौड़ी खाई को पाटने की उम्मीद ओबामा से की जा रही थी लेकिन ओबामा ने इस्लामिक देशों से अपने रिश्ते और कटु कर लिए हैं। अमेरिका चाहता तो ओसामा को आतंकवाद के प्रतीक के तौर पर मार सकता था लेकिन अपनी हरकतों की वजह से उसने ओसामा को कट्टर इस्लामिक जमात में शहीद का दर्जा दिला दिया है।
अमेरिकी चश्मे से देखती दुनिया
एक सचाई यह भी है कि अमेरिका हमें जिस चश्मे से दुनिया दिखाता है, हम उसी चश्मे से दुनिया देखते हैं। अब ओसामा के खात्मे को ही लीजिए। ओसामा की मौत कैसे हुई, कहां हुई और किन परिस्थितियों में हुई, इसकी जानकारी अमेरिका के सिवा किसी मुल्क को नहीं है। यही नहीं, इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को कैसे पकड़ा गया? उन्हें फांसी की सजा किस आधार पर दी गई? इसका चश्मदीद भी अमेरिका ही था। ऐसे में वक्त-बेवक्त अमेरिका का कोई प्रवक्ता हमारे सामने आता है और अपने ढंग से कहानी गढ़ कर निकल जाता है। नतीजतन, हम उसी कहानी में उलझे-सुलझते रहते हैं। देखने का नया नजरिया बना ही नहीं पाते है। इसलिए ओसामा सचमुच मर गया या बहुत पहले ही मर चुका था, इस पर संदेह है। अमेरिका ने तस्वीर जारी नहीं कर इस संदेह को और भी बढ़ा दिया है।
जिंदा पकड़ने से राज खुलते
अलबत्ता, यह भी समझना मुश्किल है कि अगर ओसामा मारा गया तो अमेरिका ने उसे मारा क्यों, ज़िंदा भी पकड़ा जा सकता था? शायद इससे आतंकी साजिश पर से काफी पर्दा उठता। दुनिया भर के आतंकी नेटवकरे की जानकारी मिलती। और तो और पाकिस्तान के दोहरे रवैये से सब वाकिफ होते। भला, कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन को मारने से भारत में हाथियों के दांत और चंदन के पेड़ की तस्करी समाप्त हो गई। लेकिन ओसामा के मरने से आतंकवाद खत्म होने से रहा। वह और तेजी से पनपेगा। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन में युवा मुसलमानों की भरमार हो जाएगी। यकीन मानिए, दो वक्त की रोटी और वजूद के लिए लोग एक दूसरे पर बम बरसाने लगेंगे। जिस ओसामा बिन लादेन ने एक खास धर्म के मुंह पर कालिख लगाई उसी के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान को तबाह कर दिया और पाकिस्तान को भारत की तुलना में खूब तवज्जो दी। फर्ज कीजिए शेख भी खुश रहे, शैतान भी नाराज़ न हो। एक दौर था कि आतंक के इस बाज़ार को ओसामा बिन लादेन के जरिये अमेरिका ने ही रूस के सामने परोसा था।
अमेरिका-आतंकवाद एक ही रास्ते पर
दरअसल, राजनीतिशास्त्र के ‘पॉवर थ्योरी’ के मुताबिक ताकत के आने से क्षमता बढ़ती है और फिर उससे कुव्वत आती है। जो आपको उच्छृंखल और निरंकुश बना देती है। अमेरिका इसी राह का राही और आतंकवाद इस राह की पैदाइश है। अब टकराव तो लाजिमी है लेकिन हाल के दिनों में मध्य पूर्व में काफी अहम बदलाव आए हैं। मिस्र, ट्यूनीशिया जैसे मुल्कों में युवाओं के विरोध-प्रदर्शन से तख्ता पलट हो गया। वहीं यमन, सीरिया जैसे मुल्कों में विरोध-प्रदशर्न जारी है। वर्षो से जारी बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और गरीबी के खिलाफ मध्य पूर्व की जनता ने हमला बोल रखा है। उनके पास ताकत जरूर है लेकिन इसका इस्तेमाल सही नहीं हुआ तो दहशतगर्दी को बढ़ावा मिल सकता है। खासकर वह भी तब जब इन मुल्कों में सार्थक बदलाव दिख रहा है। लेकिन पाकिस्तान की जड़वत सोच को कुछ कट्टरपंथी भुनाकर दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व को अशांत-अस्थिर कर सकते हैं। बहरहाल, ओसामा की मौत से कई सवाल जरूर पनपे हैं।
नापाक नीति
अमेरिका और पाकिस्तान के बीच जो तनातनी जारी है उसमें एक बार फिर पाकिस्तान का ही पलड़ा भारी रहने के आसार हैं और इसका ताजा प्रमाण है अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का यह बयान कि उनके हिसाब से ओसामा बिन लादेन को छिपाने में न तो पाकिस्तान सरकार का हाथ है और न ही उसकी सेना एवं खुफिया एजेंसी आइएसआइ का। हालांकि उन्होंने ओसामा के इतने दिनों तक पाकिस्तान में छिपे रहने के कारणों की जांच जारी रखने को कहा है, लेकिन जब जांच से पहले निष्कर्ष निकाल लिया जाए तो फिर भावी रवैये का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। ओसामा बिन लादेन के मामले में पूरी तरह बेनकाब हो जाने और शर्मिदा होने के बावजूद पाकिस्तान अमेरिका को जिस तरह न केवल खुलकर जवाब दे रहा है, बल्कि उसे दबाव में लेने की कोशिश कर रहा है उससे यह साफ है कि वह अपनी रीति-नीति बदलने वाला नहीं है और न ही अमेरिका उस पर कोई ठोस दबाव डालने में समर्थ है। अमेरिका की ओर से अलकायदा से संपर्क रखने वाले आइएसआइ अफसरों की सूची मांगे जाने के जवाब में पाकिस्तान ने जिस तरह इस्लामाबाद में तैनात सीआइए अफसर की पहचान खोल दी वह उसके अडि़यल रवैये का नया सबूत है। पाकिस्तान के ऐसे तेवर यही बताते हैं कि वह अमेरिका से सौदेबाजी करने में समर्थ है। अमेरिका भले ही पाकिस्तान पर लाल-पीला हो रहा हो, लेकिन वह उसके खिलाफ अपेक्षित कठोरता शायद ही दिखा पाए। इसका कोई मतलब नहीं कि अनेक अमेरिकी सीनेटर पाकिस्तान की सहायता रोकने की मांग करने के साथ-साथ उस पर अविश्वास जताने में लगे हुए हैं, क्योंकि ओबामा प्रशासन उसे अपना सहयोगी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। अब तो ओबामा प्रशासन ऐसे भी संकेत दे रहा है कि वह ओसामा बिन लादेन के मामले में पाकिस्तान की संदिग्ध भूमिका को तूल नहीं देगा। इन परिस्थितियों में इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती कि पाकिस्तान आतंकवाद का साथ देने की अपनी रणनीति का परित्याग करेगा। किस्म-किस्म के आतंकी संगठनों का सहयोग-समर्थन करने के मामले में आइएसआइ की भूमिका जांचने-परखने का इसलिए कोई अर्थ नहीं, क्योंकि ऐसे न जाने कितने सबूत सामने आ चुके हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि यह खुफिया एजेंसी वस्तुत: आतंकी संगठनों को पालने-पोसने का काम कर रही है। यदि अमेरिका इन सबूतों को पर्याप्त नहीं मानता तो इसका मतलब है कि वह जानबूझकर सच्चाई से मुंह मोड़ने की अपनी नीति छोड़ने के लिए तैयार नहीं। यह स्थिति भारत के लिए विशेष रूप से चिंता का विषय बननी चाहिए, क्योंकि ताजा खुलासे यह बता रहे हैं कि अमेरिका को यह पता था कि किस तरह जैश और लश्कर के अतिरिक्त अलकायदा भारतीय हितों को चोट पहुंचाने की साजिश रच रहे हैं और उसमें आइएसआइ भी शामिल थी। जब ऐसे संकेत उभर रहे हैं कि अमेरिका पाकिस्तान पर एक सीमा से अधिक दबाव नहीं बनाएगा और यदि बनाएगा भी तो केवल अपने हितों की रक्षा करने के लिए तब फिर भारत को यह समझ लेना चाहिए कि उसके पास पाकिस्तान संबंधी अपनी नीति में आमूल-चूल परिवर्तन करने के अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया है।
आर्थिक धुरी में बदलाव
भारतीय परंपरा में लक्ष्मी को अकारण चंचला नहीं कहा गया है। घटनाएं इसकी पुष्टि करती हैं। सन 1700 तक भारत दुनिया की विनिर्माण गतिविधियों का सिरमौर था। 1700 से 1850 के बीच यह पदवी चीन ने हासिल कर ली। 1850 में औद्योगिक क्रांति के बल पर ब्रिटेन ने चीन को हटाकर विश्व के विनिर्माण मानचित्र पर अपनी जगह बनाई। 1895 में अमेरिका ब्रिटेन को अपदस्थ कर इस गद्दी पर बैठा। पूरे 115 साल तक राज करने वाले अमेरिका को अब चीन से चुनौती मिलनी शुरू हुई है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि 2050 तक भारत भी वक्त की सुइयों को अपनी ओर पलटने में सक्षम होगा। विश्व अर्थव्यवस्था की धुरी में हो रहे इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण घटना हाल ही में हुई है। 2010 में चीन ने अमेरिका को पछाड़कर दुनिया के सबसे बड़े विनिर्माणकर्ता देश का तमगा हासिल कर लिया। 2010 में जहां अमेरिका का विनिर्माण उत्पाद 1,951.60 अरब डॉलर रहा, वहीं चीन में विनिर्माण क्षेत्र का आकार बढ़कर 1,995.40 अरब डॉलर हो गया। चीन का विनिर्माण उत्पादन इतना ज्यादा रहा कि अमेरिका के बाद के चोटी के छह देशों के सम्मिलित उत्पादन से भी यह कहीं ज्यादा था। उदाहरण के लिए जर्मनी (312 अरब डॉलर), इटली (315 अरब डॉलर), ब्राजील (273.7 अरब डॉलर), फ्रांस (235 अरब डॉलर), दक्षिण कोरिया (239 अरब डॉलर) और ब्रिटेन (235 अरब डॉलर) जैसे देशों के विनिर्माण को जोड़ने पर यह आंकड़ा 1,993 अरब डॉलर ही बैठता है जो चीन के कुल विनिर्माण उत्पादन से कम ही है। इस सूची में भारत, रूस के साथ दसवें पायदान पर है जिसमें प्रत्येक देश का विनिर्माण उत्पादन 217.8 अरब डॉलर आंका गया है। आइएचएस ग्लोबल इनसाइट नामक आर्थिक शोध संस्था द्वारा जारी इन आंकड़ों के मुताबिक आर्थिक धुरी में बदलाव 1990 के बाद तेज हुआ। उदाहरण के लिए 1990 में विश्व के धनी देश (पश्चिमी यूरोप के देश, अमेरिका, कनाडा और जापान) दुनिया के समस्त विनिर्माण का 80 फीसदी उत्पादन करते थे, वहीं 2000 में इनकी हिस्सेदारी घटकर 72 फीसदी और 10 साल बाद 2010 में सिमटकर महज 50 फीसदी रह गई। इसका सबसे ज्यादा लाभ ब्रिक देशों (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) को मिला है। वर्ष 2000 में विश्व के विनिर्माण उत्पादन में ब्राजील की हिस्सेदारी 2.1 फीसदी थी जो 2010 में बढ़कर 3.1 फीसदी हो गई। वहीं रूस और भारत की भागीदरी भी क्रमश: 0.8 फीसदी और 1.2 फीसदी से बढ़कर 2.2 फीसदी हो गई। लेकिन सर्वाधिक लाभ उठाने वाला देश चीन रहा, जिसने इस दशक के दौरान अपनी 6.9 फीसदी हिस्सेदारी को बढ़ाकर 19.8 फीसदी तक पहुंचा दिया। लेकिन विश्व अर्थव्यवस्था की धुरी में बदलाव अब उतना आसान नहीं रह गया है, जितना पहले था। इसका कारण यह है कि आज अमेरिकी डॉलर जिस ढंग से दुनिया के बाजारों में वर्चस्व बनाए हुए है, वैसी स्थिति पहले किसी मुद्रा को हासिल नहीं थी। चीन इस बात को अच्छी तरह जानता है कि जब तक डॉलर का विकल्प नहीं खोज लिया जाता तब तक नंबर वन की कुर्सी उससे दूर ही रहेगी। इसीलिए चीन डॉलर की जगह विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) को प्रमुख आरक्षित मुद्रा के तौर पर अधिक महत्व देने की मांग करने लगा है। चीन के विनिर्माण, निर्यात और विदेशी मुद्रा भंडार को देखें तो युआन भी एसडीआर बास्केट में शामिल होने का अधिकार रखती है। गौरतलब है कि एसडीआर बास्केट में केवल डॉलर, यूरो, येन और पाउंड जैसी मुद्राएं ही आती हैं। हाल ही में चीन की मेजबानी में हुए ब्रिक देशों के सम्मेलन में आपसी व्यापार के लिए अपनी मुद्राओं के चलन पर सहमत होना भी चीन द्वारा डॉलर को अपदस्थ करने की रणनीति का एक अंग था। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
पाक के बचाव में उतरा अमेरिका
पाकिस्तानी सेना की नाक के नीचे पिछले हफ्ते मारे गए अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को छुपा कर रखने के आरोप से पाकिस्तान सरकार को थोड़ी राहत मिली है। पाकिस्तान के बचाव में उतरे अमेरिका ने उसे क्लीनचिट देते हुए कहा कि अब तक इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि लादेन के एबटाबाद में छुपे होने की जानकारी पाकिस्तानी राजनेताओं, सेना और वहां की खुफिया एजेंसी को थी। हालांकि अमेरिका ने यह जरूर साफ कर दिया कि अभी इस मामले में जांच जारी रहेगी। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से लगभग 60 किमी उत्तर में स्थित एबटाबाद में लादेन पिछले कुछ वर्षो से रह रहे लादेन को अमेरिकी सील्स कमांडो ने हफ्ते भर पहले मार गिराया था। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार टॉम डोनीलोन ने रविवार को पत्रकारों से कहा, मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं कि मुझे ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं, जिससे हम कह सकें कि पाकिस्तान के राजनीतिक, सेना या फिर खुफिया नेतृत्व को ओसामा के उसके देश में छुपे होने की जानकारी थी, लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि इसकी जांच जारी रहेगी। टॉम से पूछा गया था कि क्या पाकिस्तान अलकायदा सरगना को शरण देने का दोषी था। डोनीलोन ने कहा, पाकिस्तानी ने कहा है कि वह जांच करने जा रहा है। वर्तमान में पाकिस्तान में यह बहुत बड़ा मुद्दा है। पाकिस्तान में यह सब कैसे हुआ? हम इसकी जांच चाहते हैं। हम पाकिस्तानियों के साथ काम करना चाहते हैं और इसके लिए उस पर दबाव भी बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी अधिकारी भी चाहते हैं कि लादेन जिस परिसर में मारा गया है और अमेरिकी अधिकारियों ने वहां से जो जानकारियां हासिल की हैं, वे उन्हें उपलब्ध कराई जाएं। इसमें उसकी तीन पत्नियां भी हैं जो इस समय पाकिस्तान की ही कस्टडी में हैं। हालांकि उन्होंने कहा, अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों में कुछ तनाव होने के बावजूद हमने अपने आतंकवाद विरोधी प्रयासों में पाकिस्तान के साथ मिलकर बहुत बारीकी से काम किया है। हमने अधिकतर आतंकियों और अतिवादियों को या तो कब्जे में ले लिया या फिर मारे गिराया। मालूम हो कि पाकिस्तान बहुत कुछ अमेरिका की अरबों डॉलर की सहायता पर निर्भर है। शनिवार को वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा था कि अमेरिकी नेवी सील के मारे जाने से पहले बिन लादेन पाकिस्तान में सात वर्षो से अधिक समय से रह रहा था। इससे इस बात के संदेह गहरा गए हैं कि पाकिस्तान की इंटर सर्विस इंटेलीजेंस जासूसी एजेंसी, जिसका आतंकी संगठनों से रिश्तों का पुराना इतिहास रहा है, क्या उसके बिन लादेन के साथ या फिर कम से कम उसके कुछ एजेंटों से संबंध थे। हालांकि पाकिस्तान ने इस सब संदेहों को बकवास करार दिया है और कहा कि 11 सितंबर 2011 के हमले के बाद अमेरिका के आतंकियों के खिलाफ युद्ध का समर्थन करने की उसने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। डोनीलोन ने कहा कि लादेन का मारा जाना आतंकी संगठन अलकायदा के सूचना तंत्र के लिए बड़ा झटका है। उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष के अंत में प्रशासन के आकलन के बाद निश्चित हो गया था कि 2001 के बाद से अलकायदा अपने सबसे कमजोर रूप में है, यद्यपि वह अब भी खतरनाक है। उन्होंने कहा, पाकिस्तानी परिसर में हमला करने और ओसामा के मारने का कदम उठाने का फैसला हमने लिया क्योंकि वे अब भी बेहद कमजोर स्थिति में हैं।
Saturday, May 7, 2011
अमेरिका को सता रहा स्टील्थ हेलीकॉप्टर का रहस्य खुलने का डर
ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए एबटाबाद में चलाए गए अभियान में अमेरिका ने स्टील्थ हेलीकॉप्टर (रडार से बचने में सक्षम) का प्रयोग किया था। अमेरिका ने इस खास हेलीकॉप्टर को अब तक दुनिया से नजरों से दूर रखा था, लेकिन लादेन के खात्मे के लिए उसे इसकी जरूरत थी, इसलिए पहली बार इसका प्रयोग किया गया। अमेरिका अभियान सफल रहा और इस खास हेलिकॉप्टर की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। ऐसे में अमेरिका हेलीकॉप्टर को डर सता रहा है कि उसके स्टील्थ हेलीकॉप्टर का रहस्य चीन के हाथ न लग जाए। उसे ज्यादा चिंता इसलिए भी हो रही है, क्योंकि एबटाबाद में कार्रवाई के दौरान एक स्टील्थ हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिसका मलबा अमेरिका ने पाकिस्तान में ही छोड़ दिया था। पाकिस्तान, चीन के साथ मिलकर जेएफ-17 थंडर लड़ाकू विमान की परियोजना पर काम कर रहा है। ब्रिटिश समाचार पत्र डेली टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी नौसेना के सील्स कमांडो ने पाकिस्तान के एबटाबाद में अपने मिशन के लिए स्टील्थ हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल इसलिए किया था, ताकि वे पाकिस्तानी रडारा की पकड़ में न आ पाएं और लादेन के ठिकाने तक पहुंचने के दौरान किसी को कुछ पता न चल सके। एबटाबाद में कार्रवाई के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर का पिछला हिस्सा सलामत रह गया था और पाकिस्तानी सेना ने उसे कब्जे में ले लिया है। अब अमेरिका को चिंता सता रही है कि कहीं पाकिस्तान हेलीकॉप्टर के पिछले हिस्से को लौटाने के अमेरिकी अनुरोध को खारिज न कर दे। लादेन की पाकिस्तान में मौत के बाद वह पूरी दुनिया के निशाने पर है और अमेरिका के साथ उसकी तनातनी चल रही है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पाकिस्तान इसे लौटा भी देता तो भी रहस्य खुलने का डर बना रहेगा, क्योंकि पाकिस्तानी विशेषज्ञों को हेलीकॉप्टर का निरीक्षण करने से तो अमेरिका नहीं रोक सकता। आखिरकार हेलीकॉप्टर का पिछला हिस्सा उसके ही कब्जे में है। वैसे भी पाकिस्तान और चीन की दोस्ती किसी से छिपी नहीं। अगर पाक के पास कोई जानकारी होगी तो वह चीन से जरूर साझा करेगा। ब्लैकहॉक का आधुनिक संस्करण है स्टील्थ इस हेलीकॉप्टर की खुफिया क्षमता इस बात से स्पष्ट हो जाती है कि लादेन के पड़ोस के लोगों को उसकी आवाज तब तक नहीं सुनाई दी, जब तक कि वह उनके सिर पर नहीं पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि इस हेलीकॉप्टर का आकार और उसकी डिजाइन आरएएच-66 कमांचे हेलीकॉप्टर जैसी ही है। संभव है कि उसी तकनीक को ब्लैकहॉक में इस्तेमाल किया गया हो। परिवर्धित पिछले हिस्से ने शोर को कम कर दिया होगा और लगता है कि स्टील्थ लड़ाकू विमानों पर इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री की परत उस पर चढ़ा दी गई। अखबार ने जेन्स डिफेंस वीकली के संपादक पीटर फेलस्टीड के हवाले से कहा, अमेरिका हेलीकॉप्टर के मलबे को हर हाल में वापस लेना चाहेगा, लेकिन उसकी प्रौद्योगिकी के चीन पहुंचने को लेकर भी चिंताएं होंगी। इस तरह की प्रौद्योगिकी इस समय उनके लिए बहुत उपयोगी होगी। इस समय अमेरिका और चीन के बीच हथियारों को लेकर जबर्दस्त होड़ लगी है, लेकिन ड्रोन और स्टील्थ के दम पर अमेरिका आगे है।
बिगड़ैल पाकिस्तान
भारत को उकसाने वाला बयान देकर पाकिस्तान ने एक बार फिर अपनी पुरानी आदत का परिचय दिया है। दरअसल उसका इरादा भारत को धमकाना नहीं, बल्कि अपने देश में भारत विरोधी भावनाएं भड़काना और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान भंग करना है। ऐसे में भारत का उसके साथ जुबानी जंग में उलझने से बचना उचित ही है, लेकिन हमारे नीति-नियंताओं को यह भी आभास होना चाहिए कि संयम का परिचय देने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। अतीत में भारत तनाव भरे माहौल में न जाने कितनी बार संयम का परिचय दे चुका है और सब जानते हैं कि इससे पाकिस्तान पर कोई फर्क नहीं पड़ा। इस बार भी नहीं पड़ेगा, क्योंकि उसने भारत की कमजोरी भांप ली है। भारत ने जब-जब पाकिस्तान के प्रति कठोर रवैये का परिचय दिया और उसके तहत बातचीत की प्रक्रिया रोकी तब-तब उसे अपनी कठोरता का परित्याग करना पड़ा। मुंबई हमले के बाद भी ऐसा ही हुआ, क्योंकि पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यह दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया कि भारत ने अडि़यल रवैया अपना लिया है। भारत को अपनी इस कमजोरी को दूर करना ही होगा और इसके लिए यह आवश्यक है कि वह पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी सर्वथा निष्प्रभावी नीति से पीछा छुड़ाए। ऐसा करना इसलिए और जरूरी है, क्योंकि भारत बातचीत के जरिये पाकिस्तान पर दबाव बनाने में तनिक भी समर्थ नहीं। बातचीत की प्रक्रिया में पाकिस्तान तो कुछ न कुछ रियायत हासिल कर लेता है और भारत के हाथ कुछ नहीं लगता। आगे भी नहीं लगेगा और इसका ताजा प्रमाण है भारत के जख्मों पर नमक छिड़कने वाला यह बयान कि मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों को दंडित करने की मांग पुरानी पड़ चुकी है। यदि भारत सरकार यह मान रही है कि पाकिस्तान देर-सबेर मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों को दंडित करेगा अथवा उन आतंकी शिविरों को खत्म करेगा जहां जैश, लश्कर के आतंकी पाले-पोसे और प्रशिक्षित किए जा रहे हैं तो इसका मतलब है कि वह दिवास्वप्न देख रही है। पाकिस्तान को उलझाए रखने और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संतुष्ट करने के लिए तो पाकिस्तान से बातचीत जारी रखने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन सिर्फ इतने तक सीमित रहना भारी भूल के अलावा और कुछ नहीं। भारत को पाकिस्तान की कमजोर नस की पहचान करने और उसे दबाने में और अधिक देर नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसका दुस्साहस और साथ ही कूटनीतिक अशिष्टता बढ़ती जा रही है। पाकिस्तान के कथित नेक इरादों पर भरोसा करना खुद को धोखा देना है। इस पर आश्चर्य नहीं कि यह मांग तेज होती जा रही है कि भारत भी वैसी ही कार्रवाई करे जैसी अमेरिका ने ओसामा को मार गिराने के लिए की। भारत ऐसा करने में सक्षम हो सकता है, जैसा कि थलसेना अध्यक्ष ने कहा और उसे होना भी चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अमेरिका जैसी कार्रवाई एक मात्र विकल्प है। चूंकि इस विकल्प को आजमाने का मतलब है टूटते-बिखरते पाकिस्तान को एकजुट होने का मौका देना इसलिए भारत को अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए। अन्य विकल्पों की कमी भी नहीं है। यदि कमी है तो राजनीतिक इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति की। यह निराशाजनक है कि भारत सरकार बिगड़ैल पाकिस्तान से निपटने के मामले में राजनीतिक इच्छाशक्ति से विहीन नजर आती है। विडंबना यह है कि उसकी कमजोर इच्छाशक्ति का प्रदर्शन रह-रहकर होता रहता है।
पाक की मुश्किलें
ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद पाकिस्तान बुरी तरह फंस गया है। एक तरफ उसे अमेरिकी गुस्से का कोपभाजन बनना पड़ रहा है तो दूसरी तरफ देश के उग्रवादी तत्वों का। इस बार उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि वह कैसे अपना बचाव करे। दुनिया का सबसे खतरनाक और वांछित आतंकवादी ओसामा बिन लादेन देश की सबसे प्रतिष्ठित मिलिट्री छावनी में एक आलीशान इमारत में ठाठ से रह रहा था, जिसे अमेरिका ने अपने दम पर मार गिराया। अलकायदा की लड़ाई एक वैश्विक लड़ाई है, जिसका जाल दूर-दूर तक फैला हुआ है। ओसामा की मौत के बाद पाकिस्तान खुद को असमंजस की स्थिति में पा रहा है। ओसामा बिन लादेन काकुल मिलिट्री अकादमी से करीब एक मील दूर एक छावनी में रह था। अब अमेरिकियों को यह समझाना पाक के लिए मुश्किल है कि वह इतने दिन वहां रहा और पाक ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। पाक अब तक तो इस बहाने का फायदा उठाता रहा है कि आतंकवाद विरोधी आपरेशन में साझा खुफिया अभियानों से ही जीत संभव है, लेकिन पाकिस्तान पर अविश्वास जताकर अमेरिका ने बता दिया कि वह किस हद तक उस पर विश्वास करता है। नि:संदेह आने वाले दिनों में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और ओसामा की मौत में पाकिस्तान की भूमिका स्पष्ट होगी। पाक के लिए यह यकीन करना बहुत मुश्किल है कि कोई विदेशी विमान उसके क्षेत्र में इतनी दूर तक घुस आए और उसे पता भी न चले। पाकिस्तान को तो इसका तब पता चला जब अमेरिकी टुकड़ी कार्रवाई के बाद वापस लौट चुकी थी। बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी के साथ इस आपरेशन के बारे में बात की। हालांकि बेचारगी में ही सही प्रधानमंत्री गिलानी ने बिन लादेन की मौत को उसकी जीत बताया। पाकिस्तानी अखबारों के मुताबिक इस्लामाबाद के लिए इस पूरे मामले से उलझन ही पैदा हुई है। सालों तक जोरदार तरीके से इंकार करने के बाद भी बिन लादेन पाकिस्तानी जमीन पर पाया गया। नेशन की रिपोर्ट के मुताबिक लगता है यह कार्रवाई पाकिस्तान पर उसे छिपाने का आरोप लगाने के लिए की गई है। अखबार लिखता है कि भारतीय गृहमंत्री ने यह संकेत समझते हुए ही कहा है कि पाकिस्तान आतंकवादियों की शरणस्थली है। इससे ड्रोन हमलों को उचित ठहराने का दबाव बढ़ेगा। इसी तरह डॉन ने लिखा है कि पाकिस्तान के लिए इनकार करने का समय बीत गया है, क्योंकि ओसामा किसी गुफा में नहीं, बल्कि ऊंची दीवारों से घिरे एक बड़े मकान में पाया गया। यह पाक सरकार की बहुत बड़ी खुफिया नाकामी है। 9/11 के बाद पाकिस्तानी खुफिया तथा पुलिस विभाग ने सीआइए के साथ मिलकर कई अलकायदा नेताओं को पकड़ा है जिनमें से करीब-करीब सभी कबाइली इलाकों की बजाय शहरों में मिले थे। अब ओसामा बिन लादेन के न रहने से पाकिस्तान को अधिक ईमानदारी से आत्ममंथन का मौका मिला है। डॉन लिखता है कि अब पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान के लिए चुनौती शहरों और कस्बों में रह रहे विदेशी तथा स्थानीय उग्रवादी संगठनों से है। सरकार ने पुष्टि की है कि ओसामा आपरेशन अकेले अमेरिका का प्रयास था। अगर आगे भी अमेरिका इस्लामाबाद की अनदेखी करके इस प्रकार के अभियान चलाती है तो देश-विदेश में पाकिस्तान के लिए इसके नतीजे अप्रिय हो सकते हैं। पाकिस्तान की प्रभुसत्ता के उल्लंघन के बारे में सवाल उठने लगेंगे और दुनिया में आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगाह के रूप में पाकिस्तान की छवि और पाकिस्तान के उग्रवाद से निपटने में नाकाम होने की सोच मजबूत होगी। इसलिए उग्रवादियों को कार्रवाई चलाने और जिहादियों के भर्ती केंद्र के रूप में पाकिस्तान का इस्तेमाल करने से रोकना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Friday, May 6, 2011
ब्रिटेन की तंगदिली
कारखानों व घरों में सस्ते श्रम की उपलब्धता के लिए पिछली सदी में इंग्लैंड ने बड़ी संख्या में अफ्रीका और दक्षिण एशिया से कामगारों को अपने देश बुलाया। बाद में उन्हें ब्रिटिश नागरिकता प्रदान कर दी गई। आजकल यूरोप के अन्य देशों की तरह ब्रिटेन में भी मंदी छाई हुई है। मंदी अपने साथ बेरोजगारी भी लाई है। बढ़ती बेरोजगारी से त्रस्त इंग्लैंड के श्वेत युवक यह मांग कर रहे हैं कि अफ्रीका और दक्षिण एशिया से आए हुए लोगों की नागरिकता समाप्त करके उन्हें उनके मूल देश वापस भेज दिया जाए। दक्षिण एशिया के ब्रिटिश नागरिकों का कहना है कि अब उनकी तीसरी या चौथी पीढ़ी ब्रिटेन में रह रही है। इसलिए वे भी ब्रिटेन के उसी तरह के नागरिक हैं जैसे कि श्वेत लोग हैं। अत: कोई उन्हें उनके मूल देश वापस जाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। पिछले दिनों म्यूनिसिपल चुनाव के प्रचार के दौरान इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने कहा कि अपने पिछले शासन काल में लेबर पार्टी ने वोट बैंक के चलते बेशुमार विदेशियों को ब्रिटिश नागरिकता दे दी है जिसका ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा है। 1997 और 2009 के बीच 22 लाख विदेशी ब्रिटेन आकर बस गए और यहां की नागरिकता प्राप्त कर ली। 2004 में जब यूरोपीय यूनियन में पूर्वी यूरोप के देश शामिल किए गए थे तब यह उम्मीद की गई थी कि इन देशों से 8-10 हजार लोग ही रोजगार की खोज में ब्रिटेन आकर बसेंगे। परंतु नवीनतम आंकड़ों के अनुसार इस दौरान 7 लाख 62 हजार लोग इन देशों से ब्रिटेन आकर बस गए। इन लोगों का भार भी ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। डेविड कैमरून का कहना है कि इंग्लैंड में नागरिकता हासिल करने वाले अधिकतर लोग अंग्रेजी नहीं बोल सकते हैं। वे अपने पड़ोसियों से भी कटे रहते हैं क्योकि इनकी संस्कृति अंग्रेजों की संस्कृति से भिन्न है। अत: समय आ गया है कि विदेशियों का ब्रिटेन आकर बसना रोका जाए। उन्होंने यह भी कहा है कि लेबर पार्टी के जमाने में दक्षिण एशिया के छात्र ऐसे कॉलेजों में दाखिला पा लेते थे जो फर्जी थे। बाद में वे ब्रिटिश नागरिकता हासिल करने में कामयाब हो जाते थे और धीरे-धीरे अपने माता-पिता और दूसरे रिश्तेदारों को भी ब्रिटेन बुलाकर वहां की नागरिकता दिला देते थे। डेविड कैमरून की प्रवासियों के ब्रिटेन आने और वहां बस जाने पर कठोरतापूर्वक लगाम लगाने की घोषणा का ब्रिटिश गठबंधन सरकार की मुख्य सहयोगी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने ही विरोध कर दिया। इस पार्टी के नेता विन्स केबल, जो इंग्लैंड के व्यापार मंत्री भी हैं, ने कहा कि ब्रिटेन के आर्थिक उत्थान में इन प्रवासियों का बहुत बड़ा योगदान है। डेविड कैमरून और उनकी पार्टी के नेताओं को समझना चाहिए कि न केवल ब्रिटेन बल्कि यूरोप के अधिकतर देशों के नागरिकों को सस्ती दर पर काम करने के लिए विदेशी चाहिए। यदि उनका ब्रिटेन में आना रोक दिया जाएगा तो आम ब्रिटिश नागरिक को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। उनका यह भी कहना है कि विदेशी, खासकर भारतीय मूल के डाक्टरों, नसरें, शिक्षकों और दूसरे प्रोफेसनलों का ब्रिटेन को समृद्ध बनाने में बहुत योगदान है। अत: प्रधानमंत्री की यह यह नीति अत्यंत ही अदूरदर्शी और विवेकहीन मानी जाएगी। लेबर पार्टी के नेता एड मिलिबंड ने भी डेविड कैमरून की इस नई नीति का घोर विरोध किया है। आम ब्रिटिश नागरिक आरामपसंद होते हैं। वे चाहते हैं कि दक्षिण एशिया के लोग ब्रिटेन में आकर बसें जिससे सस्ती दरों पर उनकी सेवाएं प्राप्त हो सकें। परंतु डेविड कैमरून अपनी नई नीति पर अड़े हुए हैं। वह विदेशियों, खासकर भारतीय मूल के लोगों का ब्रिटेन में आकर बसने पर रोक लगाने के प्रयास कर रहे हैं। इसका भारत और ब्रिटेन के संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, अभी कहना कठिन है। (लेखक पूर्व सांसद व राजदूत हैं)
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