Thursday, December 23, 2010

अमेरिकी गुस्ताखियों का क्या हो जवाब

पहले अमेरिका में भारत की राजदूत मीरा शंकर और फिर संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरदीप पुरी। एक हफ्ते में ही दो शीर्ष भारतीय राजनयिकों को जलालत भरी अमेरिकी सुरक्षा प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। ताज्जुब की बात है कि हरदीप पुरी के साथ यह वाकया तब हुआ, जबकि तीन दिन पहले ही मीरा शंकर वाले मामले में भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी विदेश मंत्रालय से कड़ा विरोध दर्ज कराया था। वैसे ये मामले कोई नए नहीं हैं। अमेरिकी में ही 2002-03 में तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नाडीस के कपड़े उतरवाकर और 2009 में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के जूते उतरवा कर तलाशी ली गई थी। हाल के दिनों में बॉलीवुड के सुपर स्टार शाहरुख खान और नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को भी अमेरिकी हवाई अड्डों पर बदसलूकी का सामना करना पड़ा। हालांकि इन खबरों पर सपाट टिप्पणी यह की जा सकती कि अमेरिकी गाहे-बगाहे इस तरह की अशिष्टता दिखाकर अपनी दादागिरी दिखाता रहता है, लेकिन इन खबरों को जरा नए परिप्रेक्ष्य में देखिए- चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ अभी-अभी भारत का दौरा करके लौटे हैं। रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवदेव भारत पहुंच चुके हैं। जुलाई से अब तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून, अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी भारत का दौरा कर चुके हैं। यानी यह साल बीतते-बीतते या कह लें छह महीनों के अंदर दुनिया के सबसे शक्तिशाली पी-5 देशों के राष्ट्राध्यक्ष भारत का दौरा कर चुके हैं। पिछले दिनों एक खबर छपी थी, जिसमें एक फ्रेंच राजनयिक के हवाले से कहा गया था कि राजनयिकों की वर्तमान पीढ़ी को याद नहीं कि ऐसा कभी हुआ हो, जब छह महीने के भीतर ही पी-5 देशों के नेताओं ने किसी एक देश का दौरा किया हो। क्या यह भारत की बढ़ती सामरिक, राजनीतिक और आर्थिक ताकत का संकेत नहीं है? कम से कम इन दौरों के दौरान दिए गए बयानों और दस्तखत हुए करारों से तो यही लगता है। दुनिया के ताकतवर नेताओं ने अपनी भारत यात्रा में इस बात को बार-बार दोहराया कि भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारत उभरता हुआ नहीं, उभर चुका देश है, और यह भी कि अब भारत दुनिया की महाशक्तियों की कतार में खड़ा होने को तैयार है। यानी दुनिया हमें विश्व की एक ताकत मान रही है, लेकिन दुनिया की बातें सुनकर फूलकर कुप्पा हो जाने से पहले हमें जरा अपने गिरेबां में झांकना होगा। क्या हम ताकतवर कहलाने लायक हैं? क्या हम ताकतवर देश की तरह व्यवहार कर रहे हैं? पुराने लोग कहा करते थे, ताकत बताने की नहीं जरूरत पड़ने पर दिखाने की चीज है। आज की दुनिया में कोई भी मुल्क अपनी ताकत युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि कूटनीति के ज्ञान में दिखाता है। विकिलीक्स के संपादक जूलियन असांजे का उदाहरण हमारे सामने है। असांजे ने खुलेआम अमेरिकी सत्ता को चुनौती दी। बदले में अमेरिकी डिप्लोमेट्स ने यह सुनिश्चित कर दिया कि दुनिया के किसी भी देश में असांजे जेल की सलाखों के पीछे पहुंच जाएं, भले ही एक अजीबो-गरीब मामले में ही सही। कूटनीति में मेरा ज्ञान भारत के एसएम कृष्णा और देश के विद्वान राजनयिकों के सामने कुछ भी नहीं, इसलिए मैं इन्हें डिप्लोमेसी पर नसीहत देने की धृष्टता नहीं कर सकता, लेकिन फिर भी यह याद दिलाना चाहूंगा कि कूटनीति क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात की तर्ज पर नहीं, बल्कि जैसे को तैसा के सिद्धांत पर चलती है। और ऐसा नहीं कि हम यह जानते नहीं हैं। पाकिस्तान के साथ हम और हमारे साथ पाकिस्तान बरसों से यही खेल खेल रहा है। जब कभी भी हमने पाकिस्तान के किसी राजनयिक को जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया, बदले में पाकिस्तान ने हमारे जासूस को धर पकड़ा। इसी तरह जब भी पाकिस्तान ने हमारे किसी राजनयिक को अपनी धरती से रवाना होने का आदेश दिया तो जवाब में हमने भी एक पाकिस्तानी डिप्लोमेट का बोरिया बिस्तर बांध दिया। पर जो व्यवहार हम पाकिस्तान के साथ करते हैं, वही अमेरिका और चीन के साथ करने में हमारी घिग्गी बंध जाती है। क्यों? क्योंकि आज भी हमारी डिप्लोमेसी का माइंडसेट नहीं बदला है। दुनिया हमें ताकत मान रही है, लेकिन हम छोटे होने के अहसास से बाहर ही नहीं आए हैं। मीरा शंकर के साथ बदसलूकी के बाद जब अमेरिकी विदेश मंत्री सार्वजनिक रूप से अफसोस जता रही थीं, उसी दौरान अमेरिकी की सुरक्षा अधिकारी ने प्रेस कांफ्रेंस में पूरी ठसक के साथ कहा कि सुरक्षा के अपने-अपने नियम हैं, जो कुछ किया गया इन नियमों के तहत ही किया गया। इसे यह भी माना जा सकता है कि 9/11 के बाद अपने देश की सुरक्षा के मामले में अमेरिकी कोई कोताही नहीं बरतता, लेकिन इस बात पर अमेरिकी की पीठ थपथपाने से पहले हमें दो तथ्यों पर ध्यान देना होगा। पहली बात यह कि राजनयिकों के साथ व्यवहार के अपने नियम-कायदे हैं, उनका पालन क्यों नहीं किया जाता और क्या अमेरिकी सुरक्षा अधिकारी चीन के किसी राजनयिक के साथ ऐसा व्यवहार करने का दुस्साहस कर सकते हैं? याद कीजिए कुछ अरसा पहले तिब्बत के आंदोलनकारी जब नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास की दीवारों पर चढ़ गए थे, तब चीन ने भारत की तत्कालीन राजदूत निरूपमा राव को बीजिंग में रात दो बजे विदेश मंत्रालय में बुलाकर विरोध दर्ज कराया था। क्या यही काम अगले दिन सुबह या दिन में नहीं किया जा सकता है? बिल्कुल किया जा सकता था, लेकिन सोते हुए राजदूत को नींद से जगाकर बुलाना यह ताकतवर चीन की कूटनीतिक भाषा है। कूटनीति में शब्दों से ज्यादा संकेतों का इस्तेमाल किया जाता है यानी थोड़ा कहा, बहुत समझना। पर हमारे विदेश मंत्री को जहां बोलना चाहिए था (याद कीजिए इस्लामाबाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्री कुरैशी के साथ एसएम कृष्णा की बहुचर्चित प्रेस कांफ्रेंस), वहां वे खामोश रहे और अब जबकि खामोशी से कुछ करने का वक्त था, तब उन्होंने एक खीझ भरा बयान दे डाला कि अगर भारतीय राजनयिकों के साथ ऐसा होता रहा तो भारत भी अमेरिकी राजनयिकों के साथ ऐसा ही करेगा। दरअसल, यह बात कहने की नहीं थी, करने की थी। अब तक जितनी बार भारतीय राजनयिकों और अति विशिष्ट लोगों के साथ अमेरिका या अन्य देशों में सुरक्षा के नाम पर अशिष्टता बरती गई, उतनी बार हमने सिर्फ विरोध ही दर्ज कराया है। वक्त आ गया है जैसे को तैसा वाली भाषा में बात करने का। आखिर अमेरिका या किसी भी अन्य देश से ज्यादा आतंकवाद का शिकार भारत रहा है, और लगातार आतंकवादी गुटों के निशाने पर है। ऐसे में भारत अपनी सुरक्षा में ढील क्यों दे? कुछ इसी अंदाज में अमेरिकी राजनयिकों को भी कड़ी सुरक्षा प्रक्रिया से गुजारा जाए। एक या दो अमेरिकी राजनयिकों का ऐसी प्रक्रिया से गुजरना दुनिया के दादा को संदेश देने के लिए पर्याप्त होगा। मीरा शंकर और हरदीप पुरी जैसे वाकये ऐसा ही संदेश देने से रुक सकते हैं। पर फिलहाल भारतीय विदेश मंत्रालय ने जिस तरह की प्रतिक्रिया जताई है, उससे इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि देर सबेर अमेरिकी धरती पर भारतीय राजनयिकों या महत्वपूर्ण लोगों के साथ इस तरह की घटनाएं फिर घटेंगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

No comments:

Post a Comment