चीन से हमारे संबंध शक-शुबहा और गलाकाट स्पर्धा वाले ही रहेंगे
कुछ लोगों का मानना है कि जब भारत और चीन के बीच व्यापार इतनी तेजी से बढ़ रहा है और अभी तक पचास अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर चुका है, तब क्यों हम छोटी चीजों का सिरदर्द पालते हैं? मसलन, जम्मू कश्मीर के नागरिकों को नत्थी वीजा देने अथवा लद्दाख या अरुणाचल प्रदेश में चीनियों की घुसपैठ आदि।
हमारी समझ में इन सब बातों को कम महत्वपूर्ण नहीं समझा जा सकता। उल्लेखनीय है कि अगर चीन जम्मू-कश्मीर को विवादग्रस्त क्षेत्र कहता है, तो उसका कारण सिर्फ पाकिस्तान को खुश करना नहीं है। अक्साइचिन प्रदेश में सड़क निर्माण के कारण ही चीन ने सीमा विवाद को 1960-62 के बीच विस्फोटक बनाया था। इसी मार्ग से लॉकनौर में परमाणविक अस्रों के परीक्षण स्थल तक उसकी पहुंच बनती है। और यहीं से पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते चीन ग्वादर के बंदरगाह तक पहुंच सकता है, जो हिंद महासागर में उसे नौसैनिक दृष्टि से बेहद प्रभावशाली बना सकता है। यह समझना भी जरूरी है कि नेपाल, म्यांमार और श्रीलंका में भी दोनों के हितों के बीच सीधा टकराव है।
अकसर कहा जाता है कि यदि हिंदुस्तान और चीन एक हो जाएं, तो दुनिया को हिलाकर रख सकते हैं। मगर यह न भूलें कि भारत और चीन दो ऐसी संस्कृतियां हैं, जिनके बुनियादी मूल्य और ऐतिहासिक अनुभव बिल्कुल भिन्न हैं। पड़ोसी देश होने के कारण इनकी महत्वाकांक्षाओं और वाणिज्य-व्यापार के विस्तार के फलस्वरूप टकराव की गुंजाइश ज्यादा है, सहकार की कम। दक्षिण पूर्व एशिया इसका अच्छा उदाहरण है, जहां भारत और चीन के प्रभाव क्षेत्र अलग-अलग नजर आते हैं।
अब इस बहस की भी जरूरत नहीं है कि आर्थिक विकास का कौन-सा विकल्प सही है-एक दलीय तानाशाही वाला चीनी नमूना या कभी-कभार अराजकता की कगार तक पहुंचता, विविधता का जश्न मनाने वाला भारतीय जनतंत्र का। हमें अपनी फिक्र करनी चाहिए। चीन तो खुद अपनी हिफाजत कर ही लेता है। दोनों ही देशों की राजनीति और सामाजिक प्रणालियां अपने संस्कार और जरूरतों के मुताबिक विकसित हुई हैं और इनमें ‘एशियाई’ साम्य दर्शाने की कोशिश नाकाम ही रहेगी। अमेरिका हो या रूस, यूरोपीय समुदाय हो या अफ्रीका अथवा पूर्वी एशिया के दूसरे देश, अपने हित और नफा-नुकसान टटोलते हुए ही चीन या भारत के साथ अपने रिश्ते तय करते रहे हैं। चीनी प्रधानमंत्री के भारत में दिए बयानों से कहीं अधिक अहमियत हमारे लिए उन वक्तव्यों की होनी चाहिए, जो उन्होंने पाकिस्तान में दिए हैं। पाक के साथ चीनी घनिष्ठता 1965 से अनवरत चली आ रही है। कोई कारण नहीं कि अचानक इस मैत्री में दरार पड़ेगी।
इसे भी रेखांकित करने की जरूरत है कि अमेरिका द्वारा उकसाए जाने पर हम हर क्षेत्र में चीन के साथ होड़ लेने पर आमादा न हो जाएं। (दुर्भाग्यवश हम ऐसा ही करते नजर आ रहे हैं।) वास्तव में निकसन और किसिंजर के काल से ही चीन और अमेरिका के संबंध काफी मधुर हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उनकी आर्थिक रिश्तेदारी भी काफी घनिष्ठ है। चीन अमेरिका के ट्रेजरी बांडों में कई खरब डॉलर का निवेश कर चुका है। लगता है कि दूसरे देशों को संशय में रखने के लिए अमेरिका बीच-बीच में चीन के साथ नूरा-कुश्ती लड़ता रहता है। इसका एक मकसद यह भी हो सकता है कि वह इस बहाने चीन तक यह संदेश पहुंचा सके कि उसके लिए बाजार भी कई और हैं और दूसरे मददगार भी। सिर्फ दो उदाहरणों से इस कपट नीति का परदाफाश होता है। पाकिस्तान-अफगानिस्तान हो या फिर उत्तर कोरिया-इन दोनों ही परम विस्फोटक संकट स्थलों में चीनी और अमेरिकी नीतियों का अनोखा सन्निपात देखने को मिल रहा है।
इस पृष्ठभूमि में ही चीनी प्रधानमंत्री की हालिया भारत यात्रा का सही मूल्यांकन किया जा सकता है। एक बात साफ है कि भारत और चीन के संबंध एक-दूसरे के प्रति शक-शुबहे से भरे और अड़ोस-पड़ोस में गलाकाट प्रतिस्पर्धा वाले ही बने रहेंगे। चीन किसी भी कीमत पर तिब्बत की स्वाधीनता या स्वायत्तता को स्वीकार नहीं कर सकता।
वेन ने पाकिस्तान में 36 अरब डॉलर के सौदे किए। यानी हमारे साथ किए कारोबार से तकरीबन सवा दो गुना ज्यादा। इनमें अधिकांश सहकारी योजनाएं, आधारभूत ढांचे के निर्माण से जुड़ी हैं और उस इलाके में पूरी होंगी, जो विवादग्रस्त हैं। इनके जरिये चीन का दक्षिण एशिया में सामरिक प्रभुत्व कई गुना बढ़ जाएगा। जिस गर्मजोशी से वेन का स्वागत पाकिस्तान में हुआ, उसकी तुलना भी हमारी मेहमाननवाजी से नहीं की जा सकती। वेन ने भी पाकिस्तानी दोस्तों को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह ऐलान जोर से किया कि दहशतगर्दी के साथ किसी मुल्क या मजहब का नाम नहीं जोड़ा जा सकता। कुल मिलाकर हिंदुस्तान उनके लिए रास्ते का पड़ाव भर नजर आया।
No comments:
Post a Comment