Monday, December 27, 2010

2010 : यूरोप का दुस्वप्न

लंदन। कहां तो तय था चराग हरेक घर के लिए। कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए। 2010 में यूरोप पर जो बीती है, उसे बयान करने के लिए दुष्यंत कुमार की इन अमर पंक्तियों से बेहतर पंक्तियां नहीं मिल सकती। वित्तीय संकट से अमेरिका की आर्थिक महाशक्ति क्षीण हो जाने और उसकी मुद्रा डॉलर के दाम और साख गिर जाने के बाद कहां तो यूरोप 2009 में विश्व की नई आर्थिक महाशक्ति बनकर उभरने और यूरो को विश्व की सर्व स्वीकृत मुद्रा के रूप में डॉलर की जगह दिलाने सपने देख रहा था और कहां 2010 में उसे ऋण संकट के कारण अपने यूरोपीय संघ और उसकी मुद्रा यूरो का अस्तित्व बचाना भी भारी पड़ गया। यूरोप के इस पतन की शुरु आत भी ग्रीस से ही हुई। ग्रीक सरकारें पिछले नौ सालों से बजट घाटे को राष्ट्रीय आय के तीन फीसद के भीतर रखने के यूरो संघ के नियम की अनदेखी करते हुए अपने राजस्व या राष्ट्रीय आमदनी से कही अधिक खर्च करती आ रही थीं। 2008 के वित्तीय संकट ने ग्रीस की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी जिससे राजस्व या सरकारी आय और घट गई और बजट घाटा बढ़कर 13 फीसद हो गया। यूरोपीय संघ की सरकारों और केंद्रीय यूरोपीय बैंक ने पहले तो खाली बयानबाजी से ही निवेशकर्ताओं को भरोसा दिलाने की कोशिश की लेकिन थोथी बातों का उल्टा असर होता देखकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ मिलकर मई में ग्रीस को 6,50,000 करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता का ऐलान किया। ग्रीस की इस दशा को देखकर ब्रिटेन की नई लिबरल-कजर्वेटिव गठबंधन सरकार ने अपने खर्चो में 5,85,000 करोड़ की कटौती और करों में बढ़ोतरी द्वारा बजट घाटे को काबू में लाने का ऐलान किया। ब्रिटेन की देखा-देखी जर्मनी, फ्रांस, इटली और स्पेन ने भी सरकारी खर्चे में व्यापक पैमाने की कटौतियों के ऐलान किए। लेकिन निवेशकर्ताओं को ग्रीस की तरह कज्रे में डूबे आयरलैंड, पुर्तगाल, बेल्जियम, स्पेन और इटली जैसे दूसरे कई यूरोपीय देशों की कर्जा चुकाने की क्षमता को लेकर संदेह हो चला था। हारकर यूरोपीय संघ को ऋण संकट में फंसे यूरोपीय देशों की आर्थिक सहायता के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ मिलकर 46,00,000 करोड़ रु पए के एक सहायता कोष का ऐलान करना पड़ा ताकि यूरोपीय सरकारी बोर्डो में पैसा लगाने वाले निवेशकर्ताओं का भरोसा बहाल हो सके। विश्वव्यापी वित्तीय संकट के बाद 2009 तक यूरोप को भाषाई और सांस्कृतिक विविधताओं के बावजूद आर्थिक व राजनीतिक समझदारी और समाजोन्मुखी नीतियों पर बने महासंघ की मिसाल के रूप में देखा जाता था। यूरोपीय संघ की नकल पर दुनिया के कोने-कोने में मुक्त-व्यापार और आर्थिक साझेदारी के क्षेत्रों का गठन किया गया। लेकिन 2010 के ऋण संकट ने यूरोप की कामयाबी के खोल के भीतर छिपी विसंगतियों की पोल खोल दी है। गौरतलब है कि यूरोप में दो प्रमुख संघ हैं। राजनीतिक और आर्थिक नीतियों की साझेदारी के सिद्धांतों पर बना यूरोपीय संघ, जिसमें जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और पोलैंड समेत पश्चिमी, मध्य और पूर्वी यूरोप के 27 देश शामिल हैं। इसी बड़े संघ के भीतर जर्मनी, फ्रांस, स्पेन और इटली जैसे सोलह देशों का यूरो मुद्रा क्षेत्र है जिसके सदस्य देशों में यूरो मुद्रा चलती है। ब्रिटेन ने हमेशा इस यूरो संघ को विसंगत माना है इसिलए वह इसमें शामिल नहीं है। यूरो क्षेत्र के सोलह देशों में यूरो मुद्रा चलती है लेकिन उनकी कराधान और बजट नीतियां अलग-अलग हैं। यूरोप की अर्थव्यवस्था की धाक और यूरो की साख जर्मनी, फ्रांस, हॉलैंड और इटली जैसे देशों की आर्थिक नीतियों के आधार पर जमी है। मोटे तौर पर कहें तो हुआ यह है कि यूरोप की आर्थिक उन्नति के साथ-साथ लोगों का जीवन स्तर एशिया और अफ्रीका के मुकाबले काफी ऊंचा हो गया है। लोगों का जीवन स्तर ऊंचा होने से मजदूरी महंगी हुई है। निर्माण उद्योग धीरे-धीरे सस्ती मजदूरी वाले देशों में चले गए हैं। चीन और भारत के तकनीकी विकास से यह प्रक्रिया और भी तेज हुई है। यूरोप के अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्थाएं सेवा उद्योग और सूचना-उद्योग प्रधान हो गई हैं जिनमें कर्मचारियों के वेतन बढ़े हैं लेकिन रोजगारों की संख्या कम होती गई है। ऐसे माहौल में जब सरकारें शिक्षा-अनुदान में कटौती करने के लिए उच्च शिक्षा की फीस बढ़ाने या सीटों की संख्या घटाने की बात करती हैं तो व्यापक छात्र आंदोलन होते हैं। इस महीने लंदन और रोम की सड़कों पर यही हुआ। यही नहीं, फ्रांस के पेंशन सुधार विरोधी आंदोलनों से लेकर ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल और आयरलैंड के छंटनी और कटौती विरोधी जन आंदोलनों में भी छात्रों और युवकों ने ही बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। यूरोप की नई पीढ़ी को लगता है कि पुरानी पीढ़ी ने आर्थिक हैसियत की सिकुड़ती चादर के भीतर पांव रखने की बजाए चादर से बाहर पांव पसारे हैं। अपनी सुख- सुविधाओं को बरकरार रखने के लिए नई पीढ़ी के भविष्य को गिरवी रखा है और कर्ज लेकर खर्च किया है। उनकी इस भूल मार नई पीढ़ी ही क्यों झेले यूरोपीय संघ में इस समय जर्मनी ही एक ऐसा देश है जहां की अर्थव्यवस्था अच्छी दशा में है। इसिलए जर्मनी की युवा पीढ़ी ग्रीस, और आयरलैंड जैसे देशों को उबारने पर किए जा रहे खर्च को लेकर खफा है। कुछ दक्षिणपंथी पार्टियां युवा पीढ़ी के इस रोष को आप्रवासियों और अल्पसंख्यकों की मोड़कर वोट बटोरने के प्रयास कर रही हैं। मुख्यधारा की पार्टयिां भी दक्षिणपंथ की लहर को भांपकर दक्षिणपंथी नीतियों को अपना रही हैं। इसीलिए ब्रितानी चुनाव में आप्रवासियों की संख्या को बड़ा मुद्दा बनाया गया और नई सरकार ने आते ही भारत जैसे देशों से आने वाले आप्रवासियों की संख्या की सीमा तय कर दी। कुल मिलाकर यह साल यूरोप और उसके आदर्शो के लिए ऐसा दु:स्वप्न साबित हुआ जिसका अंत रिकॉर्ड बर्फबारी की ठिठुरन से हुआ है। लेकिन इस दु:स्वप्न ने केवल कुछ सवाल ही उठाए हैं जिनमें सबसे बड़ा सवाल शायद स्पेन का है। क्या स्पेन हाथ पसारे बिना रह सकेगा? क्या जर्मनी के लोग स्पेन को उबारने की हिम्मत करेंगे? यूरो क्षेत्र और यूरो का भविष्य यही दो सवाल तय करेंगे। यूरोप के लिए ताप के दिन अभी बहुत दूर हैं।

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